लखनऊ: अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में कांग्रेस ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की जगह रामपुर खास से तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को नियुक्त कर दिया.
पार्टी ने सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को प्रदेश इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किया.
मिश्रा पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता थीं. वह ऐसे समय में यह जिम्मेदारी संभाल रही हैं, जब कांग्रेस अपने सहयोगी समाजवादी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे का फॉर्मूला तय करने के लिए बातचीत कर रही है.
ब्राह्मण नेता मिश्रा, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं. उन्होंने राजनीति की शुरुआत जमीनी स्तर से प्रतापगढ़ में ब्लॉक प्रमुख के रूप में की थी, जिसके बाद वह राज्य विधानसभा में पहुंचीं.
ब्लॉक प्रमुख से UPSC प्रमुख तक
1974 में प्रयागराज में जन्मी आराधना मिश्रा ‘मोना’ 1998 में कांग्रेस में शामिल हुईं. 2002 में उन्होंने प्रतापगढ़ के संग्रामगढ़ से ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़ा और जीत गईं. इसके बाद उन्होंने लगातार तीन बार ब्लॉक प्रमुख के रूप में काम किया.
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाली मिश्रा ने कॉरपोरेट सेक्टर में भी काम किया, जिसमें सहारा इंडिया भी शामिल है. राजनीति में आने से पहले वह कई गैर-लाभकारी संस्थाओं से भी जुड़ी रही थीं.
उनके राजनीतिक करियर में 2014 में बड़ा बदलाव आया, जब उनके पिता प्रमोद तिवारी राज्यसभा चले गए. मिश्रा ने रामपुर खास से उपचुनाव लड़ा और जीत गईं. इस तरह पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचीं. तिवारी परिवार का रामपुर खास से लंबे समय से जुड़ाव रहा है. प्रमोद तिवारी ने 1980 से 2012 तक लगातार नौ बार यह सीट जीती.
2014 में विधानसभा उपचुनाव जीतने के बाद मिश्रा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भी यह सीट अपने पास रखी, जबकि पूरे राज्य में बीजेपी का प्रदर्शन मजबूत रहा था. 2022 में उन्होंने बीजेपी के नागेश प्रताप सिंह को 14,741 वोटों से हराकर लगातार तीसरी बार यह सीट जीती.
उन्हें फिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया. वह अब तक इस पद पर थीं.
प्रमोद तिवारी का असर
मिश्रा को आगे बढ़ाए जाने से उनके पिता प्रमोद तिवारी के राजनीतिक प्रभाव और संगठन के नेटवर्क पर भी फिर से ध्यान गया है. तिवारी फिलहाल उच्च सदन में विपक्ष के उपनेता हैं. वह कई दशकों से उत्तर प्रदेश के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता रहे हैं और राजनीतिक हलकों में अलग-अलग पार्टियों के नेताओं के साथ संबंध बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं.
2014 में उनका राज्यसभा के लिए चुना जाना उस समय हुआ था, जब कांग्रेस के पास अकेले उन्हें उच्च सदन में भेजने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं थी. वह समाजवादी पार्टी के समर्थन से चुने गए थे. कांग्रेस के नेताओं के अनुसार, तिवारी और समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बीच वर्षों तक करीबी संबंध रहे.
2022 में तिवारी राजस्थान से फिर राज्यसभा के लिए चुने गए. उनकी उम्मीदवारी को राज्य कांग्रेस नेतृत्व का समर्थन मिला था, जिसमें उस समय के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी शामिल थे.
इस बीच तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई है. कांग्रेस नेताओं द्वारा अक्सर दिए जाने वाले उदाहरणों में 2022 का विधानसभा चुनाव भी शामिल है, जब समाजवादी पार्टी ने रामपुर खास से उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था. उस समय दोनों पार्टियां औपचारिक गठबंधन में नहीं थीं.
प्रियंका की टीम के साथ संबंध
मिश्रा उस समय भी कांग्रेस नेतृत्व के करीब बनी रहीं, जब कई राजनीतिक परिवारों से जुड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए. इनमें जितिन प्रसाद, आर.पी.एन. सिंह और ललितेश पति त्रिपाठी शामिल थे. ये नेता 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी वाड्रा के पार्टी की जिम्मेदारी संभालने के बाद कांग्रेस छोड़ गए थे.
मिश्रा प्रियंका की टीम की एक महत्वपूर्ण सदस्य बनी हुई हैं. दोनों ने 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान के दौरान मिलकर काम किया था.
मिश्रा के अलावा, जो ब्राह्मण हैं, और प्रमुख मुस्लिम चेहरा मसूद के अलावा, पार्टी ने देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी नियुक्त किया है. इससे नई राज्य टीम में ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व भी आया है.
राजनीतिक जानकार इन नियुक्तियों को 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस के सामाजिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने और संगठन की स्थिति मजबूत करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं. इसे कांग्रेस के बीच ब्राह्मणों, मुसलमानों और दलितों के पारंपरिक समर्थन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, हालांकि पार्टी की नई नियुक्तियों में इस समीकरण से ज्यादा व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व है.
कांग्रेस के लिए मिश्रा का चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ उसके संबंधों पर भी असर डाल सकता है. दोनों पार्टियों ने 2024 का लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था.
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट को बताया कि राज्य प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने शीर्ष स्तर पर बदलाव के लिए जोर दिया था और शुरुआत में ओबीसी चेहरे के पक्ष में थे. लेकिन उत्तर प्रदेश के नेताओं से बातचीत के बाद ध्यान मिश्रा की ओर चला गया.
इस नेता ने कहा कि गौतम ने पिछले महीने दिल्ली में प्रमोद तिवारी के घर जाकर उनसे मुलाकात की थी. बताया जाता है कि इस मुलाकात के बाद मिश्रा को आगे बढ़ाने की चर्चा ने जोर पकड़ा. गौतम यह भी जानते थे कि अगस्त 2023 से इस पद पर रहे अजय राय को हटाने के लिए उन्हें तिवारी का समर्थन चाहिए होगा. इसलिए उन्होंने भी मिश्रा के नाम का समर्थन किया.
यूपी कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद मिश्रा ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का धन्यवाद किया और कहा कि उनकी तुरंत प्राथमिकता पूरे राज्य में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच भरोसा पैदा करना होगी. उन्होंने कहा, “यह सच है कि समय कम है और चुनौतियां बहुत हैं. मेरी प्राथमिकता पूरे राज्य के हर कांग्रेस कार्यकर्ता के अंदर यह भरोसा पैदा करना होगी कि हम 2027 में सरकार बनाने जा रहे हैं.”
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