बेंगलुरु: लाखों समर्थक, जीवनी जारी करने के लिए दो कार्यक्रम, और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पश्चिम बंगाल में शपथ ग्रहण समारोह से सीधे उड़कर आना. जब भारतीय जनता पार्टी शनिवार को चित्रदुर्ग में बी.एस. येदियुरप्पा के सार्वजनिक जीवन के 50 साल पूरे होने का कार्यक्रम मनाएगी, तो इस आयोजन का पैमाना एक ऐसा संदेश देगा जिसे किसी भी आधिकारिक बयानबाजी से छिपाया नहीं जा सकता: पार्टी को इस बुजुर्ग नेता की जरूरत है.
बेंगलुरु की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में फैकल्टी और राजनीतिक विश्लेषक ए. नारायण ने कहा, “बीजेपी को पार्टी को उस कमजोर मनोबल से बाहर निकालने के लिए फिर से उनके पास लौटना पड़ रहा है, जिससे वह कुछ समय से गुजर रही है. यह दिखाता है कि बीजेपी येदियुरप्पा का कोई विकल्प नहीं ढूंढ पाई है.”
उन्होंने आगे कहा, “वे शायद मजबूरी में फिर से येदियुरप्पा के पास लौट रहे हैं.”
जश्न की शुरुआत शुक्रवार को हुई, जब चार बार के मुख्यमंत्री रहे येदियुरप्पा को चित्रदुर्ग की सड़कों पर भव्य जुलूस के साथ ले जाया गया. पटाखे फोड़े गए, लाउडस्पीकर पर उनकी तारीफ में गाने बजाए गए और लोक कलाकार भी इस मार्च में शामिल थे. वरिष्ठ पार्टी नेता, जिनमें डी.वी. सदानंद गौड़ा, सी.टी. रवि और बी. श्रीरामुलु शामिल थे, उनके साथ मौजूद रहे.
येदियुरप्पा के छोटे भाई और कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने इस मौके को “सांस्कृतिक उत्सव” बताया था, और शनिवार का मुख्य कार्यक्रम भी इसी अंदाज में जारी रहेगा.
कार्यक्रम दोपहर बाद रखा गया है ताकि शाह, जो पश्चिम बंगाल में बीजेपी की शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के बाद शाम 3:45 बजे पहुंचेंगे, इसे मिस न करें. पश्चिम बंगाल में यह बीजेपी की पहली सरकार है.
येदियुरप्पा के बड़े बेटे और शिवमोग्गा से बीजेपी सांसद बी.वाई. राघवेंद्र ने शुक्रवार को पत्रकारों से कहा, “येदियुरप्पा के प्रति सम्मान की एक खास बात यह है कि हमारे गृह मंत्री पश्चिम बंगाल में शपथ ग्रहण समारोह खत्म करके इस कार्यक्रम में शामिल होंगे. देश में चल रहे कई राजनीतिक घटनाक्रमों के बावजूद वह इस कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे हैं, इससे इसकी अहमियत समझी जा सकती है.”
जरूरत की राजनीति
शाह की मौजूदगी उस सच्चाई को दिखाती है जिससे कर्नाटक बीजेपी लंबे समय से बाहर नहीं निकल पाई है. पार्टी ने राज्य में दो बार बिना पूर्ण बहुमत के सरकार बनाई है. जिला पंचायत, तालुका पंचायत और ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के चुनाव नजदीक हैं, और 2028 में असली बहुमत हासिल करने की उम्मीद पार्टी नेतृत्व के दिमाग में है. ऐसे में पार्टी ने तय किया है कि उसे अपने 83 वर्षीय जनाधार वाले नेता की जरूरत है.
यह रिश्ता लंबे समय से उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. येदियुरप्पा को 2011 में भ्रष्टाचार के एक मामले में जेल हुई थी, हालांकि कई साल बाद उन्हें बरी कर दिया गया. उन्हें कम से कम दो बार मुख्यमंत्री पद से हटाया गया. 2012 में बीजेपी ने उन्हें पार्टी छोड़कर अपनी पार्टी—कर्नाटक जनता पार्टी (KJP)—बनाते भी देखा. इस टूट का असर यह हुआ कि 2008 के विधानसभा चुनाव में 110 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2013 में सिर्फ 40 सीटों पर सिमट गई. इसके बाद उन्हें फिर पार्टी में वापस लाया गया.
जुलाई 2021 में बीजेपी नेतृत्व ने कथित तौर पर उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर किया और उनकी जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया. अगस्त 2022 तक वह फिर बीजेपी की संसदीय बोर्ड समिति में वापस आ गए. पार्टी ने उन्हें प्रशासनिक पद देने के लिए अपनी 75 साल की उम्र सीमा का नियम भी तोड़ दिया था, और 2018 विधानसभा चुनाव से पूरे एक साल पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया था.
कर्नाटक विंध्य के दक्षिण का इकलौता राज्य है जहां बीजेपी की मजबूत मौजूदगी है. 2024 के लोकसभा चुनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया. एच.डी. देवेगौड़ा की जनता दल (सेक्युलर) के साथ गठबंधन करने के बाद, बीजेपी के साथ अब देवेगौड़ा के बेटे और पूर्व कर्नाटक मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में इस्पात और भारी उद्योग मंत्री हैं.
येदियुरप्पा की राजनीतिक पहचान 2007 में कुमारस्वामी द्वारा सत्ता साझेदारी समझौता तोड़ने के विरोध से ही बनी थी. पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस नए राजनीतिक समीकरण को संभालने की उनकी क्षमता भी एक और वजह है कि पार्टी उन्हें किनारे नहीं कर सकती.
कर्नाटक में अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होगा.
संतोष के साथ नरमी
चित्रदुर्ग के समारोह से एक हफ्ते पहले, 2 मई को, येदियुरप्पा ने अपने लंबे समय के राजनीतिक विरोधी और बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष के साथ अपने घर पर लंच किया. इस मुलाकात में साफ दिख रहा था कि पार्टी नेतृत्व के कहने पर दोनों के बीच सुलह कराई गई है.
येदियुरप्पा ने संतोष की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि वह पार्टी को “बेहद कुशलता” से चला रहे हैं और संतोष की “काबिलियत और समझ” हर पार्टी कार्यकर्ता के लिए प्रेरणा है.
हाल की घटनाओं को देखते हुए यह गर्मजोशी कुछ असहज लग रही थी. येदियुरप्पा ने पहले उन नेताओं को निशाना बनाया था जिन्हें संतोष का करीबी माना जाता है—सी.टी. रवि, नलिन कुमार कटील और प्रताप सिम्हा. पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर ने खुलकर संतोष पर लिंगायत समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया था. और संतोष के आलोचक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल को येदियुरप्पा द्वारा खुली छूट देना भी दोनों के रिश्ते में लंबे समय से तनाव की वजह रहा है.
लिंगायतों के मजबूत नेता
बुकनाकेरे सिद्धलिंगप्पा येदियुरप्पा का जन्म 27 फरवरी 1943 को शिकारीपुरा में हुआ था. उन्होंने 1965 में समाज कल्याण विभाग में फर्स्ट डिवीजन क्लर्क के रूप में नौकरी शुरू की. कुछ समय बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी, वापस शिकारीपुरा लौटे और वीरभद्र शास्त्री की शंकरा राइस मिल में क्लर्क की नौकरी करने लगे.
1967 में उन्होंने राइस मिल मालिक की बेटी मैत्रादेवी से शादी की. बाद में उन्होंने शिवमोग्गा में हार्डवेयर की दुकान शुरू की. उनके दो बेटे—राघवेंद्र और विजयेंद्र—और तीन बेटियां—अरुणादेवी, पद्मावती और उमादेवी हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से उनका जुड़ाव शुरुआती दिनों में ही शुरू हो गया था, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनकी औपचारिक एंट्री 1970 में हुई, जब उन्हें शिकारीपुरा RSS इकाई का सचिव (कार्यवाह) बनाया गया. 1972 में वह टाउन म्युनिसिपैलिटी में पहुंचे और उसी साल स्थानीय जनसंघ तालुक इकाई के अध्यक्ष बने. 1975 तक वह शिकारीपुरा टाउन म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष बन गए थे. 1980 में बीजेपी की शिकारीपुरा तालुक इकाई की जिम्मेदारी उन्हें मिली और 1985 में शिवमोग्गा जिला इकाई भी उनके पास आ गई.
1988 में वह कर्नाटक बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने.
उन्होंने पहली बार 1983 में के. वसंत बंगेरा के साथ कर्नाटक विधानसभा में प्रवेश किया और तब से छह बार शिकारीपुरा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. लेकिन सत्ता का पहला स्वाद चखने के लिए उन्हें 24 साल इंतजार करना पड़ा.
यह मौका नवंबर 2007 में आया, जब कर्नाटक में एक महीने के राष्ट्रपति शासन के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन उनकी सरकार सिर्फ सात दिन चली. येदियुरप्पा की बीजेपी ने एच.डी. कुमारस्वामी की जनता दल (सेक्युलर) के साथ गठबंधन किया था, जिसमें तय हुआ था कि दोनों बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनेंगे. कुमारस्वामी 20 महीने से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रह चुके थे, लेकिन येदियुरप्पा के सिर्फ सात दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद उन्होंने समर्थन वापस ले लिया.
बाद में यही घटना येदियुरप्पा की राजनीति बनाने वाली साबित हुई.
बेंगलुरु के एक राजनीतिक विश्लेषक, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बात की, ने कहा, “येदियुरप्पा ने बहुत चतुराई से यह नैरेटिव बनाया कि एक वोक्कालिगा (कुमारस्वामी) ने लिंगायतों को सत्ता का मौका नहीं दिया.”
वोक्कालिगा समुदाय दक्षिण कर्नाटक में रहने वाला एक प्रभावशाली कृषि समुदाय है और देवेगौड़ा की JD(S) का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है. इस घटना ने येदियुरप्पा को एक ऐसा मुद्दा दे दिया जिसका उन्होंने लंबे समय तक फायदा उठाया. कर्नाटक के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से निर्णायक समुदायों में से एक लिंगायत समुदाय मजबूती से उनके पीछे खड़ा हो गया और बीजेपी ने 2008 विधानसभा चुनाव में 110 सीटें जीत लीं.
बीजेपी में येदियुरप्पा की मजबूत स्थिति हमेशा निजी और कानूनी विवादों के साथ रही है. उनके खिलाफ POCSO का मामला चल रहा है और उन पर तथा उनके परिवार के सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. 2004 में उनकी पत्नी मैत्रादेवी की मौत से जुड़ी परिस्थितियां भी समय-समय पर राजनीतिक चर्चा में सामने आती रही हैं. जनवरी 2022 में उनकी पोती—पद्मावती की बेटी—ने बेंगलुरु में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. वह 30 साल की थीं.
2011 में जमीन डिनोटिफिकेशन घोटाले में कथित भूमिका को लेकर उन्हें लगभग 20 दिन न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा. इसी मामले के कारण उन्हें पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था. उन पर बल्लारी के ‘रेड्डी ब्रदर्स’ से जुड़े कथित आयरन ओर माइनिंग “घोटाले” से फायदा उठाने के आरोप भी लगे.
वंशवाद की राजनीति के खिलाफ बीजेपी की आधिकारिक लाइन, येदियुरप्पा के राजनीतिक व्यवहार के साथ साफ विरोधाभास में दिखती है.
येदियुरप्पा के पुराने सहयोगी के.एस. ईश्वरप्पा ने सार्वजनिक रूप से “अप्पा-मक्लू (पिता-बच्चे)” संस्कृति की आलोचना की है. उनका आरोप है कि समर्पित पार्टी कार्यकर्ताओं और हिंदू नेताओं को किनारे कर येदियुरप्पा के छोटे बेटे विजयेंद्र—जो अब कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष और शिकारीपुरा से विधायक हैं—के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है.
2019 से 2021 के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने विजयेंद्र पर अपने पिता के इशारे पर समानांतर सरकार चलाने का आरोप भी लगाया था. 2020 की शुरुआत में बीजेपी नेताओं और मंत्रियों के एक समूह की ओर से लिखी गई कथित खुली चिट्ठी भी सामने आई थी, जिसमें विजयेंद्र के रोजमर्रा के प्रशासन में हस्तक्षेप का मुद्दा उठाया गया था.
इन सबके बावजूद, येदियुरप्पा अब भी राज्य के बीजेपी विधायकों पर मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं और विपक्ष के नेता जैसे अहम पदों की नियुक्ति में भी उनका बड़ा प्रभाव है. जैसा कि नारायण कहते हैं, वह इस समय इसलिए सुर्खियों में नहीं हैं क्योंकि उन्होंने खुद ऐसा कुछ किया है जिससे ध्यान खींचा हो. वह इसलिए चर्चा में हैं क्योंकि पार्टी को उनकी जरूरत है.
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