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Thursday, 13 August, 2026
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अमृतपाल का पंथिक दांव: इंदिरा हत्याकांड के दोषी के बेटे को दिया टिकट, अकालियों के सामने नई चुनौती

जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह की अध्यक्षता वाला अकाली दल (वारिस पंजाब दे) पिछले जनवरी में अस्तित्व में आया, जो शिरोमणि अकाली दल का एक पंथिक विकल्प पेश करता है.

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चंडीगढ़: अकाली दल (वारिस पंजाब दे), जेल में बंद खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाली गैर-पंजीकृत राजनीतिक पार्टी, पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित करने वाला पहला संगठन बन गया है. विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने की उम्मीद है.

रविवार को पार्टी ने 61 साल के सतवंत सिंह को आरक्षित बसी पठाना सीट से अपना उम्मीदवार घोषित किया. यह सीट फतेहगढ़ साहिब लोकसभा क्षेत्र के तहत आती है. सतवंत, केहर सिंह के बेटे हैं. केहर सिंह एक सरकारी कर्मचारी थे, जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या में भूमिका के लिए फांसी दी गई थी.

सतवंत को उम्मीदवार बनाकर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) न सिर्फ पंजाब में पंथिक वोट के लिए अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश करता दिख रहा है, बल्कि अलग-अलग हो चुके अकाली गुटों को एक साझा एजेंडे के पीछे लाने और खुद को शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ सीधे मुकाबले में खड़ा करने की कोशिश भी कर रहा है.

सतवंत के पिता केहर सिंह को इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश में दोषी ठहराया गया था. इंदिरा गांधी को 31 अक्टूबर, 1984 को उनके आवास पर उनके दो सुरक्षाकर्मियों, बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मारी थी. बेअंत सिंह को सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत बाद मार दिया था, जबकि सतवंत सिंह को केहर सिंह के साथ 6 जनवरी, 1989 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी.

पार्टी के अंदर के लोगों का कहना है कि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का मानना है कि पंजाब के ग्रामीण किसानों में पंथिक भावना फिर से बढ़ रही है और पूर्व उग्रवादियों या उनके रिश्तेदारों को टिकट देकर इस भावना को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

सतवंत को उम्मीदवार घोषित करने से एक हफ्ते पहले, नवंबर 2025 में हुए तरन तारन उपचुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवार रहे मनदीप सिंह ने संगठन से अलग होने का फैसला किया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी उन परिवारों को नजरअंदाज कर रही है, जिनके लोगों ने पंजाब के उग्रवाद के दौर में खालिस्तान के लिए अपनी जान कुर्बान की थी. मनदीप, संदीप सिंह उर्फ सनी के भाई हैं. सनी पर नवंबर 2022 में शिव सेना (टक्साली) नेता सुधीर सूरी की हत्या का आरोप है.

पिछले हफ्ते कई यूट्यूब चैनलों को दिए इंटरव्यू में मनदीप ने कहा कि उन्होंने अपना संगठन बनाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उन्हें लगा कि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) उन लोगों को ज्यादा महत्व दे रहा है जो दूसरी पार्टियों से आए हैं, जबकि जिन लोगों को टिकट मिलना चाहिए, उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है. उन्होंने कहा, “मैं ऐसे योग्य लोगों के परिवारों के संपर्क में हूं. उन्हें भी लगता है कि उन्हें उनका हक नहीं दिया जा रहा है.”

DAV कॉलेज, सेक्टर 10, चंडीगढ़ के राजनीति विज्ञान विभाग की डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा कि सतवंत सिंह की उम्मीदवारी को अकाली दल (वारिस पंजाब दे) की SAD के साथ सीधे मुकाबले में आने की कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, “वे सिर्फ यह कहकर वोट हासिल करने की उम्मीद नहीं कर सकते कि हम भी एक सिख पार्टी हैं. उन्हें यह दिखाना होगा कि उनकी राजनीति ज्यादा सख्त है और सिख समुदाय की ऐतिहासिक शिकायतों से ज्यादा जुड़ी हुई है.” उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद दूसरे अकाली गुटों को भी इस उम्मीदवारी पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करना और बातचीत का रुख पंथिक मुद्दों की ओर करना है, जहां उसे लगता है कि फिलहाल उसकी विचारधारा मजबूत है.

अकाली दल (वारिस पंजाब दे) पिछले जनवरी में अस्तित्व में आया था और उसने SAD के सामने एक बड़े पंथिक विकल्प के तौर पर खुद को पेश किया. इसकी अगुवाई अमृतपाल सिंह करते हैं. वह कट्टरपंथी उपदेशक से लोकसभा सांसद बने और फिलहाल असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं. पहले उन्हें कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत रखा गया था और अब वे गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत जेल में हैं.

इस संगठन के एक और नेता सरबजीत सिंह हैं, जो फरीदकोट से सांसद हैं. सरबजीत, इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह के बेटे हैं. सरबजीत की बहन अमृत कौर मलोआ ने भी बसी पठाना सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी.

इस सीट से सतवंत सिंह को उम्मीदवार बनाने का फैसला ऐसे समय में आया है, जब अमृतपाल के संगठन पर SAD (पुनर सुरजीत) की ओर से काफी दबाव है. यह अकाली दल का एक अलग हुआ गुट है, जिसकी अगुवाई पूर्व अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह कर रहे हैं. ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने पिछले हफ्ते मीडिया से कहा था कि अगर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) पंथ की बात कर रहा है, तो उसे कम से कम 35 प्रतिशत टिकट ‘शहीदों’ के परिवारों को देने चाहिए.

पूर्व जत्थेदार के राजनीतिक संगठन ने कुछ समय के लिए अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के साथ हाथ मिलाया था, लेकिन अमृतपाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के मुद्दे पर मतभेद होने के बाद दोनों अलग हो गए. SAD (पुनर सुरजीत) की एक और नेता बीबी जागीर कौर ने खुलकर कहा है कि संगठन अमृतपाल को किसी साझा पंथिक गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में स्वीकार नहीं करेगा.

इसी समय, दाखा से बागी SAD विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने SAD (पुनर सुरजीत) से अपना समर्थन वापस ले लिया और जून में औपचारिक रूप से अकाली दल (वारिस पंजाब दे) में शामिल हो गए. उन्होंने उस समय मीडिया से कहा था कि अमृतपाल की अगुवाई वाला राजनीतिक संगठन लोकतांत्रिक तरीके से खालिस्तान की मांग को आगे बढ़ाएगा.

पंथिक वोट के दावेदार

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ही पंथिक वोट का अकेला दावेदार नहीं है. भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार की ओर से जगतार सिंह हवारा को पैरोल दिलाने की कोशिश भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है.

मान ने सबसे पहले 8 अगस्त को पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखकर हवारा के लिए 10 दिन की पैरोल मांगी थी. उन्होंने मानवीय आधार पर यह मांग की थी, ताकि हवारा अपनी बीमार मां से मिल सकें. बुधवार को मान ने राज्यपाल से मुलाकात की और यह मामला उनके सामने रखा. उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि पंजाब सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी इंतजाम कर सकती है.

हवारा बाबर खालसा का पूर्व उग्रवादी है, जिसे तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था. 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर एक मानव बम के जरिए बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई थी.

हवारा को ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में उसकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. सिख समुदाय के कुछ हिस्सों में उसे राजनीतिक कैदी या “बंदी सिंह” माना जाता है. पिछले कई वर्षों से उसका मामला पंथिक राजनीति में बेहद भावनात्मक मुद्दा बना हुआ है. कट्टरपंथी सिख जनवरी 2023 से मोहाली-चंडीगढ़ सीमा पर धरने पर बैठे हैं और क्वामी इंसाफ मोर्चा के नेतृत्व में हवारा सहित अन्य लोगों की रिहाई की मांग कर रहे हैं.

डॉ. कंवलप्रीत कौर ने बताया कि पंजाब का राजनीतिक माहौल कम से कम फिलहाल बदल गया है और पंथिक मुद्दों पर ध्यान बढ़ गया है. यह बदलाव दिलजीत दोसांझ की फिल्म “सतलुज” के रिलीज होने और बाद में वापस लिए जाने के बाद देखने को मिला है.

उन्होंने कहा, “राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि जिस तरह लोगों ने गुरुद्वारों में फिल्म देखना शुरू किया, वह पंथिक मुद्दों के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता को दिखाता है. और यह सिर्फ माझा क्षेत्र तक सीमित नहीं है. कोई भी पार्टी ऐसी नहीं दिखना चाहती कि वह इन मुद्दों से दूर है.”

इस बीच, अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के नेताओं और समर्थकों ने चंडीगढ़ पुलिस की मदद से 29 जुलाई को यहां एक विरोध मार्च निकाला था. इसमें अमृतपाल सिंह और अन्य लोगों की रिहाई की मांग की गई थी. संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष और अमृतपाल के पिता तरसेम सिंह ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पार्टी का संसदीय बोर्ड टिकट बांटने का फैसला पारदर्शी तरीके से करेगा. इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के भतीजे सुखविंदर सिंह अगवान को इस साल की शुरुआत में संगठन के संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया था.

बुधवार को फरीदकोट के सांसद सरबजीत सिंह की अगुवाई में संसदीय बोर्ड के सदस्यों ने पांच विधानसभा सीटों के लिए नियुक्त किए गए प्रभारियों के नाम घोषित किए. इनमें मोगा के लिए गुरमीत सिंह बुक्कनवाला और अजनाला के लिए दलजीत कलसी शामिल हैं. दोनों को अमृतपाल सिंह के करीबी सहयोगी माना जाता है और फरवरी 2023 में अजनाला पुलिस थाने पर हुए हमले के बाद उन्हें अमृतपाल के साथ NSA के तहत हिरासत में लिया गया था. NSA के तहत उनकी हिरासत की अवधि खत्म हो चुकी है, लेकिन वे दूसरे आपराधिक मामलों में अभी भी जेल में हैं. संगठन के संसदीय बोर्ड के सदस्यों ने बुधवार को कहा कि बुक्कनवाला और कलसी की ओर से नियुक्त पांच-पांच सदस्यों वाली समितियां उनकी तरफ से प्रचार शुरू करेंगी, जबकि वे जेल में हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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