चंडीगढ़: हनी त्रेहान की फिल्म सतलुज के रिलीज़ होने के बाद पंजाब में उग्रवाद के दौर को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ गई है.
इसी बीच रेलवे और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री और राज्यसभा सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म के खिलाफ एक जोरदार अभियान शुरू किया है, ताकि एक अलग पक्ष लोगों के सामने रखा जा सके.
पूर्व पंजाब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते बिट्टू ने सोशल मीडिया पोस्ट, इंटरव्यू और सोमवार को नई दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए फिल्म बनाने वालों पर “आधी कहानी” दिखाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि फिल्म में पुलिस की कथित ज्यादतियों पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जबकि उग्रवाद के पीड़ितों की कहानी को नज़रअंदाज़ किया गया.
पिछले एक हफ्ते से बिट्टू सोशल मीडिया पर लगातार ऐसा अभियान चला रहे हैं, जिसका मकसद फिल्म ‘सतलुज’ में दिखाई गई ऐतिहासिक कहानी को चुनौती देना है. उन्होंने इन्फोग्राफिक्स, पुराने अखबारों की कतरनें, तस्वीरें और आंकड़ों वाले चार्ट शेयर किए हैं. इनके जरिए वे खालिस्तानी उग्रवादियों की हिंसा को दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि फिल्म को लेकर हो रही चर्चा में आतंकवाद के पीड़ितों की बात लगभग गायब है.
उग्रवाद से जुड़ी हिंसा, अपराध के आंकड़े और सिख समुदाय की उपलब्धियों को सामने रखते हुए बिट्टू का अभियान उस बात का जवाब देने की कोशिश करता है, जिसे वे पंजाब के इतिहास की “चुनिंदा तरीके से सुनाई गई कहानी” कहते हैं. साथ ही उन्होंने फिल्म बनाने वालों के इस्तेमाल किए गए आंकड़ों और उनके तरीके पर भी सवाल उठाए हैं.
बिट्टू ने रविवार को एक्स पर लिखा, “पंजाब का इतिहास चुनिंदा कहानियां सुनाकर दोबारा नहीं लिखा जा सकता. प्रचार पर सच की जीत होनी चाहिए, कल्पना पर तथ्य और भावनाओं पर सबूत भारी पड़ने चाहिए.”
सोमवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिट्टू दो बड़े डिस्प्ले बोर्ड भी लेकर आए, जिनमें पंजाब के उग्रवाद के दौर की दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाने की कोशिश की गई. एक बोर्ड पर उग्रवादियों की तस्वीरें थीं. साथ ही उन हमलों की जानकारी भी दी गई थी, जिनमें उन पर आम लोगों, पुलिसकर्मियों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की हत्या का आरोप है. दूसरे बोर्ड पर सेना के अधिकारियों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और कारोबारियों समेत कई प्रमुख सिख हस्तियों की तस्वीरें लगाई गई थीं. इसके जरिए बिट्टू ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सिख पहचान को हिंसा नहीं, बल्कि उपलब्धियों के जरिए देखा जाना चाहिए.
उनका कहना है कि इस प्रस्तुति का मकसद पंजाब के युवाओं को उग्रवाद के दौर की “पूरी तस्वीर” दिखाना है.
बिट्टू की लिस्ट
बिट्टू को फिल्म पर पांच बड़ी आपत्तियां हैं. पहली, बिट्टू का कहना है कि सतलुज पंजाब के हाल के इतिहास का सिर्फ एक पहलू दिखाता है. यह मानते हुए कि पुलिस के कुछ हिस्सों की ज्यादतियों की जांच हुई है और कोर्ट ने उन्हें सज़ा दी है, उनका कहना है कि फिल्म मिलिटेंट ग्रुप्स द्वारा की गई हिंसा और उन हज़ारों आम लोगों, सरकारी कर्मचारियों और नेताओं पर चुप है जिन्होंने बगावत के दौरान अपनी जान गंवाई. उनके अनुसार, उस समय के किसी भी ईमानदार ब्यौरे में सरकार की ज्यादतियां और मिलिटेंट हिंसा दोनों शामिल होने चाहिए.
बिट्टू ने पूछा, “फिल्म में मिलिटेंट द्वारा बस यात्रियों, दुकानदारों, मजदूरों, सरकारी कर्मचारियों और आम लोगों की हत्याओं का एक बार भी ज़िक्र क्यों नहीं किया गया?” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आतंकवाद से लड़ने वाले पंजाब पुलिस के जवानों, सुरक्षा बलों और आम लोगों के बलिदान को काफी हद तक नज़रअंदाज़ क्यों किया गया, “अपनी जान गंवाने वालों पर कोई फिल्म क्यों नहीं बनाई गई?”
दूसरी, बिट्टू ने फिल्म में बताए गए गैर-कानूनी तरीके से जलाए गए 25,000 लोगों के गायब होने के आंकड़े को सीधे चुनौती दी है. उस नंबर को अनवेरिफाइड बताते हुए, बिट्टू ने दावे को साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्री प्रूफ और ऑफिशियल रिकॉर्ड की मांग की है. उन्होंने कहा है कि अगर मेकर्स वेरिफाइड नामों और रिकॉर्ड के साथ आंकड़ा साबित कर सकते हैं, तो वह पब्लिकली फिल्म का सपोर्ट करेंगे. नहीं तो, उनका तर्क है कि फिल्म में एक डिस्क्लेमर होना चाहिए जिससे यह साफ हो जाए कि यह आंकड़ा ऑफिशियली साबित नहीं हुआ है, बल्कि विवादित है.
रविवार को जारी एक प्रेस स्टेटमेंट में, बिट्टू ने कहा कि उन्होंने फिल्म मेकर्स से कहा है कि वे 25,000 के आंकड़े के लिए डॉक्यूमेंट्री बेसिस को सही समय के अंदर पब्लिकली रिलीज करें. उन्होंने कहा, “अगर वे इस दावे को भरोसेमंद और वेरिफाइड सबूतों से साबित करने में फेल रहते हैं, तो उन्हें पंजाब के लोगों को यह साफ पब्लिक क्लैरिफिकेशन देना होगा कि यह आंकड़ा ऑफिशियली वेरिफाइड गिनती नहीं है.”
एक्स पर बिट्टू द्वारा शेयर किए गए ग्राफिक्स में से एक में फिल्म मेकर्स द्वारा अपनाए गए “मल्टीप्लाई फॉर्मूला” पर सवाल उठाया गया है. इसमें द ट्रिब्यून और द संडे ट्रिब्यून के पहले पन्ने दिखाए गए हैं, जिनमें चार बड़े आतंकवादी हमलों की रिपोर्ट है—7 जुलाई 1987 को सिरसा के पास बस हत्याकांड (40 मारे गए), 8 अगस्त 1987 को अमृतसर के एक गांव में हत्याकांड (12 मारे गए), 5 नवंबर 1988 को बटाला बम धमाके (49 मारे गए) और 15 जून 1991 को ट्रेन हत्याकांड (125 मारे गए).
इन चारों हमलों में कुल मिलाकर 226 लोगों की जान गई, यानी हर घटना में औसतन 56 मौतें हुईं. फिर यह ग्राफिक 1980 और 1999 के बीच दर्ज 34,881 आतंकवादी घटनाओं के औसत का अनुमान लगाता है कि इस तरह के तरीके से लगभग 19.5 लाख मौतों का एक अविश्वसनीय अनुमान लगाया जा सकता है. इस तरीके से, बिट्टू का तर्क है कि बिना वेरिफाइड रिकॉर्ड के स्टैटिस्टिकल अनुमान से गुमराह करने वाले नतीजे निकल सकते हैं.
पुराने जख्म फिर हरे होने का डर
तीसरा, बिट्टू का कहना है कि सतलुज जैसी फिल्में पंजाब के उन पुराने जख्मों को फिर से हरा कर सकती हैं, जिन्हें भरने में राज्य को दशकों लग गए. उनका कहना है कि 1980 और 1990 के दशक की हिंसा के बाद पंजाब में हिंदुओं और सिखों ने मिलकर सामाजिक सौहार्द फिर से बनाया. अगर इस पूरे दौर की सिर्फ एकतरफा कहानी दिखाई जाएगी, तो दोनों समुदायों के बीच फिर से अविश्वास पैदा हो सकता है.
बिट्टू कई बार कह चुके हैं कि आज का पंजाब शांति और भाईचारे का प्रतीक है और उसे फिर से पुराने विवादों की ओर नहीं धकेला जाना चाहिए. उन्होंने कहा, “मैं यह नहीं कह रहा कि पुराने जख्म खुलने के डर से इतिहास नहीं बताया जाना चाहिए, लेकिन इतिहास को निष्पक्ष, बिना किसी पक्षपात के और संतुलित तरीके से बताया जाना चाहिए. पंजाब में हिंदुओं और सिखों को अलग करना नामुमकिन है. दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. विदेशों में बैठे कुछ कट्टरपंथी सिख लगातार पंजाब में उग्रवाद के पुराने दिन वापस लाने और हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित नहीं हुआ है.”
चौथा, बिट्टू ने फिल्म की रिलीज़ के समय पर भी सवाल उठाया. उन्होंने सोमवार को कहा, “फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ हुई है, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, लेकिन इसके रिलीज का समय सवाल खड़े करता है. जब राज्य में चुनाव होने वाले हैं, तो ऐसी चीज़ें क्यों दिखाई जा रही हैं, जो लोगों में बंटवारा बढ़ा सकती हैं?”
बिट्टू ने यह भी कहा कि ‘सतलुज’ को ZEE5 से हटाने के फैसले का बीजेपी या केंद्र सरकार से कोई संबंध नहीं है. उन्होंने विपक्षी दलों और पंजाब सरकार के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक और कानूनी फैसले खुद लेते हैं. फिल्म हटाने का कोई निर्देश बीजेपी या केंद्र सरकार ने नहीं दिया.
पांचवीं चिंता उन्होंने युवा पीढ़ी को लेकर जताई.
बिट्टू का कहना है कि आज के कई युवा पंजाब में उग्रवाद के दौर को अपनी आंखों से नहीं देख पाए हैं. इसलिए वे उस समय को समझने के लिए फिल्मों और सोशल मीडिया पर भरोसा करते हैं. अगर इन कहानियों में उग्रवादी संगठनों द्वारा की गई हत्याओं का ज़िक्र नहीं होगा, तो इससे हिंसा को सही ठहराने या उसका महिमामंडन होने का खतरा है. इससे कुछ युवा कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रति सहानुभूति भी रख सकते हैं.
उन्होंने सवाल किया, “अगर यह फिल्म देखने के बाद कोई युवा भड़क जाए और मानव बम बनने का फैसला कर ले, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?”
खून से जुड़ी विरासत
रवनीत सिंह बिट्टू के दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की अगस्त 1995 में चंडीगढ़ स्थित पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर एक आत्मघाती बम हमले में हत्या कर दी गई थी. बेअंत सिंह ने पंजाब में उग्रवाद के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया था.
इस पूरे विवाद के दौरान बिट्टू बार-बार अपने दादा की इस विरासत का ज़िक्र करते रहे हैं. उनका कहना है कि आतंकवाद के पीड़ितों को भी पंजाब की सामूहिक यादों में बराबर जगह मिलनी चाहिए. हालांकि, बिट्टू के इस रुख का विरोध उनकी अपनी पार्टी के कुछ नेताओं ने भी किया है.
पूर्व विधायक फतेहजंग सिंह बाजवा ने कहा कि ‘सतलुज’ को लेकर बिट्टू की राय पूरी तरह उनकी निजी राय है. बाजवा ने कहा कि बीजेपी फिल्म का समर्थन करती है और उसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाने में पार्टी की कोई भूमिका नहीं है. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और बीजेपी के वरिष्ठ नेता इकबाल सिंह लालपुरा ने भी कहा कि बिट्टू को अपनी सीमाओं में रहना चाहिए.
लालपुरा ने कहा कि 25,000 लोगों का आंकड़ा सबसे पहले जसवंत सिंह खालड़ा ने उठाया था, जिसकी बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी जांच की थी.
पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने फिल्म को लेकर सावधानी भरा लेकिन सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि पार्टी लोगों और उनकी भावनाओं के साथ खड़ी है. ढिल्लों ने बताया कि उन्होंने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री से संपर्क कर फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाने के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है.
पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा ने दिप्रिंट से कहा कि यह पूरा विवाद सबसे पहले बीजेपी ने ही खड़ा किया. रंधावा ने कहा, “बिट्टू किस बात पर रो रहे हैं? पुराने जख्म फिर से हरे करने से किसी का फायदा नहीं होगा. लेकिन मैं मानता हूं कि अगर उस दौर को दिखाया जाए, तो उसे पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से और हर पहलू के साथ दिखाया जाना चाहिए. हालांकि आज का पंजाब भी उतना ही डरावना होता जा रहा है. उग्रवादियों की जगह अब गैंगस्टरों ने ले ली है. कम से कम उग्रवादियों के पास लड़ने का एक मकसद था. आज पंजाब बेवजह की हिंसा से जूझ रहा है. बिट्टू को यह भी बताना चाहिए कि एक खतरनाक उग्रवादी गुजरात की जेल में बैठकर अपना गैंग कैसे चला रहा है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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