scorecardresearch
Monday, 26 October, 2026
होममत-विमतयुवा क्यों बेचैन हैं? पूंजीवाद के लिए असंतोष का साल

युवा क्यों बेचैन हैं? पूंजीवाद के लिए असंतोष का साल

सड़कों से बड़ा संदेश यह हो सकता है कि मार्केट की कुशलता और सोशल सिक्योरिटी के बीच का बैलेंस बहुत ज़्यादा बिगड़ गया है.

Text Size:

दुनिया में अलग-अलग देशों की सड़कों पर कुछ असामान्य हो रहा है.

इसके पीछे की वजहें मुख्तलिफ हैं. बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर छात्रों का विरोध शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही यह एक बहुत बड़े आंदोलन में बदल गया. नेपाल में सोशल मीडिया पर पाबंदियां इस विरोध की शुरुआत बनीं, लेकिन इसके पीछे भ्रष्टाचार, आर्थिक ठहराव और राजनीतिक रूप से ताकतवर लोगों के विशेषाधिकार वाली जीवनशैली को लेकर लंबे समय से जमा गुस्सा था. दोनों देशों में लंबे समय तक अफरा-तफरी का माहौल रहा, जिसके बाद वहां की राजनीति का पूरा स्वरूप बदल गया.

भारत में भी युवाओं का गुस्सा अलग-अलग मौकों पर सामने आया है. पहले प्रवेश परीक्षाओं और पेपर लीक को लेकर और फिर मतदाता सूची में बदलाव को लेकर. भारत में प्रदर्शनकारी लगातार अहिंसक रहे हैं और वे बड़े राजनीतिक बदलावों की मांग भी नहीं कर रहे हैं. इसके बावजूद सरकार उन्हें लेकर असहज नजर आती है. हाल के दिनों में फ्रांस, बेल्जियम, इटली और अल्बानिया में हुए प्रदर्शनों में भी युवाओं की बड़ी भूमिका रही है. इनमें से कई प्रदर्शन हिंसक भी रहे हैं.

ऊपरी तौर पर इन आंदोलनों को जोड़ने वाला कोई साझा संगठन नहीं है, न ही इनका कोई साझा घोषणापत्र है और निश्चित रूप से इनकी कोई एक विचारधारा भी नहीं है. इन देशों के राजनीतिक हालात भी एक-दूसरे से काफी अलग हैं. इसलिए इन सभी को एक वैश्विक आंदोलन कहना सही नहीं होगा. लेकिन इनके पीछे चल रही एक जैसी नाराजगी को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी.

‘नई अर्थव्यवस्था’ में पीछे छूटी पीढ़ी

इस गुस्से की एक बड़ी वजह यह है कि एक पूरी पीढ़ी अब उस आर्थिक व्यवस्था पर सवाल उठाने लगी है, जिसका वादा उससे किया गया था. कई दशकों तक बाजार आधारित पूंजीवाद को एक आसान सी सोच के आधार पर सही ठहराया जाता रहा. यह माना जाता था कि आर्थिक विकास से नए अवसर पैदा होंगे, शिक्षा से लोगों को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा और मेहनत करने वालों को उसका फल मिलेगा. हर पीढ़ी यह उम्मीद कर सकती थी कि उसका जीवन पिछली पीढ़ी से कुछ बेहतर होगा. वहीं, सरकार से यह उम्मीद थी कि वह स्कूलों, विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएगी.

लेकिन अब इस व्यवस्था पर भरोसा लगातार कमजोर पड़ रहा है. दुनिया भर में युवाओं के बीच बेरोजगारी की दर अब भी ऊंची है और कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुके युवा इससे खास तौर पर प्रभावित हैं. हालांकि, आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते. सुरक्षित और अच्छी नौकरी पाने के पारंपरिक रास्ते लगातार कम हो रहे हैं. युवाओं को तेजी से अस्थायी नौकरियों, स्थिर वेतन की कमी, महंगे घरों और सीमित सुरक्षित नौकरियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है. उनसे कहा जाता है कि वे ‘नई अर्थव्यवस्था’ और उसके गिग वर्क जैसे काम करने के तरीकों का जश्न मनाएं, लेकिन कई युवा ऐसा करने को तैयार नहीं हैं. उनकी यह अनिच्छा समझ में आती है.

पढ़े-लिखे युवा के लिए बेरोजगारी का मतलब सिर्फ कमाई न होना नहीं है. यह उस उम्मीद के टूटने का भी संकेत है, जो उससे की गई थी. परिवार शिक्षा पर काफी पैसा खर्च करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे आर्थिक रूप से आगे बढ़ने का रास्ता खुलेगा. लेकिन जब डिग्रियां नौकरी की गारंटी नहीं देतीं और प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों उम्मीदवारों के बीच किस्मत आजमाने जैसा मामला बन जाती हैं, तो निराशा का राजनीतिक रूप लेना स्वाभाविक है.

यही वजह है कि शिक्षा और रोजगार बार-बार विरोध प्रदर्शनों की बड़ी वजह बने रहे हैं. बांग्लादेश में युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन सरकारी नौकरियों में अवसर पाने के मुद्दे से जुड़ा था. भारत में पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से पता चला कि सीमित अवसरों को हासिल करने के लिए युवाओं पर कितना दबाव है. यूरोप के कई हिस्सों में छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने शिक्षा के लिए कम बजट, वेतन और सरकारी सेवाओं की गिरती गुणवत्ता के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं.

निश्चित रूप से इन सभी की शिकायतें अलग-अलग हैं, लेकिन इनके पीछे एक ही सवाल छिपा है: समाज अपने युवाओं को कैसा भविष्य दे रहा है? यह सवाल अब और भी अहम हो गया है, क्योंकि आर्थिक असुरक्षा के साथ-साथ उन सरकारी सेवाओं पर भी दबाव बढ़ रहा है, जिन पर आम लोग निर्भर हैं.

दुनिया भर की सरकारों के सामने पैसों से जुड़ी वास्तविक सीमाएं हैं. आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है. सरकारों पर कर्ज बढ़ा है. स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च बढ़ रहा है. रक्षा और सुरक्षा पर भी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है. भारत जैसे देशों में आर्थिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर विकसित करने की जरूरत अब भी है. इसमें से काफी काम सरकार को ही करना होगा. इन दबावों को सिर्फ नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

लेकिन जब बजट में कटौती या खर्च घटाने के फैसलों का असर खराब होते स्कूलों, महंगे विश्वविद्यालयों, आम लोगों की पहुंच से बाहर होते घरों, कमजोर सामाजिक सुरक्षा और दबाव में चल रही स्वास्थ्य सेवाओं के रूप में सामने आता है, तो इसके राजनीतिक नतीजे भी होते हैं. सरकार के बजट में खर्च को तर्कसंगत बनाने का फैसला किसी युवा को बिल्कुल अलग नजर आ सकता है, जो अपनी स्वतंत्र जिंदगी शुरू करने के लिए संघर्ष कर रहा है.

सामाजिक समझौते को नए सिरे से बनाने का समय

इस संकट के साथ-साथ एक और बदलाव हो रहा है, जो शायद इससे भी ज्यादा चिंता पैदा करने वाला है. यह है कुछ लोगों के हाथों में बहुत ज्यादा दौलत का जमा होना और उसका सबके सामने लगातार दिखाई देना. पूंजीवाद में हमेशा से आर्थिक असमानता रही है. लेकिन अब कुछ समाजों में यह असमानता बहुत बढ़ गई है और दुनिया भर में यह पहले से कहीं ज्यादा साफ दिखाई देने लगी है. जिन युवाओं को असुरक्षित नौकरियों और अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है, वे उसी समय डिजिटल दुनिया में ऐसे लोगों को भी देखते हैं, जिनके पास बेहिसाब दौलत है और जो अपनी आलीशान जीवनशैली का लगातार प्रदर्शन करते हैं. नेपाल इसका एक बेहद साफ उदाहरण है, जहां ताकतवर लोगों के परिवारों की जीवनशैली व्यापक नाराजगी का बड़ा कारण बन गई.

लेकिन मामला सिर्फ दौलत दिखाने तक सीमित नहीं है. अलग-अलग देशों में बेहद अमीर लोगों और कंपनियों का तकनीक, मीडिया, राजनीतिक अभियानों और सार्वजनिक बहस पर बढ़ता प्रभाव है. सफल कारोबार, नए आविष्कार और जोखिम उठाने की क्षमता आज भी आर्थिक समृद्धि के लिए बेहद जरूरी हैं. सिर्फ अमीर होना अपने आप में समस्या नहीं है. समस्या तब शुरू होती है, जब लोगों को लगने लगता है कि दौलत के दम पर राजनीति में जरूरत से ज्यादा प्रभाव हासिल किया जा सकता है या फिर जो नियम आम लोगों पर लागू होते हैं, वे समाज के सबसे ताकतवर लोगों पर उसी तरह लागू नहीं होते. तब असमानता सिर्फ अर्थव्यवस्था से जुड़ा कोई दूर का आंकड़ा नहीं रह जाती, बल्कि युवाओं को गहराई से महसूस होने वाला अन्याय बन जाती है.

आर्थिक असंतोष और लोकलुभावन राजनीति के बीच एक असहज रिश्ता उभर रहा है. कई लोकतांत्रिक देशों में अमीरों के कुछ वर्गों ने दक्षिणपंथी लोकलुभावन आंदोलनों के साथ हाथ मिलाया है. ये आंदोलन कम टैक्स, नियमों में ढील और संस्थागत पाबंदियों से राहत देने का वादा करते हैं. लोकलुभावन नेता अक्सर आर्थिक चिंता को दूसरे मुद्दों की ओर मोड़ने में माहिर साबित हुए हैं. इनमें आव्रजन, सांस्कृतिक पहचान, अल्पसंख्यक और पुरानी संस्थाएं शामिल हैं.

इसमें एक बड़ा विरोधाभास है. आर्थिक असुरक्षा से परेशान लोग कभी-कभी ऐसे राजनीतिक आंदोलनों का समर्थन करने लगते हैं, जिनकी आर्थिक नीतियां दौलत और अवसरों के मौजूदा बंटवारे को बदलने के लिए बहुत कम करती हैं. यही वजह है कि दुनिया भर में हो रहे मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को सिर्फ ‘वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ’ के पुराने नजरिये से देखना एक अहम बात को नजरअंदाज करना है. कई युवा प्रदर्शनकारी पारंपरिक विचारधारा की भाषा में बात नहीं करते. वे नौकरियों, परीक्षाओं, किराए, स्कूलों, भ्रष्टाचार, सम्मान और निष्पक्षता की बात करते हैं. वे राजनीतिक दलों या ट्रेड यूनियनों के बजाय सोशल मीडिया के जरिए संगठित होते हैं. इसलिए उनका आंदोलन अचानक खड़ा हो सकता है, बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व के आगे बढ़ सकता है और उसके अगले कदम का अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है.

यह भी सच है कि सड़क पर होने वाले हर प्रदर्शन को अच्छा या आदर्श नहीं माना जा सकता. कई बार विरोध आंदोलन बिखरे हुए और बिना किसी स्पष्ट दिशा के नज़र आते हैं. जायज प्रदर्शन भी हिंसा में बदल सकते हैं. सोशल मीडिया सही शिकायतों के साथ-साथ गलत सूचनाओं को भी तेजी से फैला सकता है. सरकारों को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों हैं. लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखना और लोगों की नाराजगी को समझना दो अलग-अलग काम हैं.

सड़कों से उठने वाला बड़ा संदेश शायद यह है कि बाजार की कार्यक्षमता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बहुत ज्यादा बिगड़ गया है. पूंजीवाद ने दौलत पैदा करने, नए आविष्कारों और तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने की असाधारण क्षमता दिखाई है. लेकिन उसे राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बने रहने के लिए एक और चीज की जरूरत है. लोगों की एक बड़ी संख्या को यह भरोसा होना चाहिए कि उन्हें भी इस समृद्धि में हिस्सा लेने का उचित अवसर मिलेगा.

दुनिया भर में सामाजिक समझौते को नए सिरे से बनाने की तत्काल जरूरत है. इसका मतलब है अवसरों और सामाजिक तरक्की के रास्तों को फिर से खोलना, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और घरों तक उचित पहुंच सुनिश्चित करना, आर्थिक ताकत पर कुछ लोगों के स्थायी कब्जे के बजाय वास्तविक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और दौलत तथा राजनीतिक प्रभाव के बीच स्पष्ट सीमाएं बनाए रखना. दुनिया भर की सरकारों को समझना होगा कि आर्थिक विकास जरूरी है, लेकिन सिर्फ आर्थिक विकास को ही किसी सफल समाज का पैमाना नहीं माना जा सकता.

प्रवेश शर्मा एक पूर्व IAS अधिकारी हैं, उन्होंने मध्य प्रदेश, PMO और UN में काम किया है. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: सैकड़ों करोड़ की साइबर ठगी के शक में बेंगलुरु में 4 गिरफ्तार, 320 सिम स्लॉट मिले


 

share & View comments