यह दिलचस्प है कि चीन के शीर्ष नेता शी जिनपिंग ने डॉनल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा के दौरान “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का ज़िक्र किया. उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत देने की कोशिश की कि अमेरिका को चीन के उभार से ज्यादा डरने की ज़रूरत नहीं है और उसे चीन के साथ साझेदारी करनी चाहिए.
“थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का विचार पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स से जुड़ा है. उन्होंने एथेंस और स्पार्टा के बीच हुए पेलोपोनेशियन युद्ध के कारणों को समझने की कोशिश की थी.
इस सिद्धांत के मुताबिक जब कोई नई ताकत उभरती है, तो पुरानी ताकत खुद को खतरे में महसूस करती है और अक्सर इसका नतीजा युद्ध होता है.
थ्यूसीडाइड्स का मानना था कि इस युद्ध की मुख्य वजह एथेंस के बढ़ते प्रभाव से स्पार्टा का डर था, लेकिन मज़ाक, अगर शी उसे समझ सकें, तो उन्हीं पर भारी पड़ सकता है. सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि चीन भी “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” में फंस सकता है—अगर वह पहले से इसमें नहीं फंसा है—जब वह भारत के उभार को देखेगा.
हालांकि, भारत का उभार अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है जहां चीन को सीधा खतरा महसूस हो, लेकिन चीन ने इस पर ध्यान देना शुरू कर दिया है और भारत की प्रगति को धीमा करने की कोशिश भी कर रहा है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन का समर्थन और 2020 के गलवान संघर्ष के समय भारत को सीमा पर डराने की कोशिश, जबकि भारत कोविड से जूझ रहा था, यह दिखाता है कि शी को थ्यूसीडाइड्स को दोबारा पढ़ने की ज़रूरत है. उन्हें मानसिक रूप से यह स्वीकार करना होगा कि भारत का उभार बिना युद्ध, प्रॉक्सी युद्ध या कॉर्पोरेट दबाव के भी संभव है.
दो ताकतों—एक पुरानी और एक उभरती हुई—के बीच सीधा युद्ध ही “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का एकमात्र रूप नहीं है.
इसमें आर्थिक युद्ध भी शामिल हो सकता है. जब ट्रंप ने टैरिफ लगाए, तो चीन ने रेयर अर्थ मैग्नेट के निर्यात पर रोक लगाकर जवाब दिया. इससे उन उद्योगों पर खतरा पैदा हुआ जो इन जरूरी सप्लाई पर निर्भर हैं. यह असर उन देशों पर भी पड़ा, जिन्होंने चीन पर टैरिफ नहीं लगाए थे.
मैनेजमेंट और रणनीति विशेषज्ञ राम चरण ने अपनी नई किताब China’s 90% Model में लिखा है कि चीन की युद्ध नीति आर्थिक है. इसमें कई अहम उद्योगों में 90 प्रतिशत तक उत्पादन पर कब्ज़ा बनाना शामिल है. इससे चीन को उन देशों पर दबाव बनाने की ताकत मिलती है जो उसकी शर्तें नहीं मानते. यह नहीं लगता कि चीन ने “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” के व्यापक मतलब को पूरी तरह समझा है.
आर्थिक और सूचना युद्ध भी आखिरकार युद्ध ही हैं. “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” सिर्फ इस बारे में नहीं है कि एक देश दूसरे के उभार से डरता है. यह भी हो सकता है कि दो ताकतें मिलकर किसी तीसरी उभरती ताकत को नीचे दबाने की कोशिश करें. इस मामले में यह सिर्फ अमेरिका द्वारा चीन को रोकने की कोशिश नहीं हो सकती, बल्कि अमेरिका और चीन दोनों मिलकर भारत और भविष्य की अन्य उभरती ताकतों को रोकने की कोशिश कर सकते हैं. इसके लिए आंतरिक संघर्ष, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध, यहां तक कि युद्ध का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.
यह विचार दुनिया के लगभग हर शक्ति संबंध पर लागू हो सकता है—चाहे वह कॉर्पोरेट ताकत हो, लैंगिक शक्ति, जनसंख्या शक्ति या बौद्धिक शक्ति.
जब महिलाएं सत्ता और नेतृत्व में आगे बढ़ती हैं, तो पुरुष खुद को खतरे में महसूस करते हैं. जब नए इनोवेटर पुराने एकाधिकार को चुनौती देते हैं, तो पुरानी कंपनियां उन्हें रोकने की कोशिश करती हैं. इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) व्यवस्था, जिसे असली इनोवेटर्स की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया जाता है, कई बार प्रतिस्पर्धा को सीमित करने का तरीका भी बन जाती है. यह “ट्रैप” हर तरह के शक्ति संबंधों पर लागू होता है. जब राजनीतिक नेता, कॉर्पोरेट प्रमुख या आध्यात्मिक गुरु अपने उत्तराधिकारी तय नहीं करते, तो उसके पीछे भी सत्ता खोने का डर होता है. असल समस्या इंसान के भीतर मौजूद उस डर से पैदा होती है जिसमें वह शक्ति खोने से डरता है. इसका समाधान मानसिक बदलाव में है, जहां व्यक्ति अस्थायी और भौतिक ताकत से आगे की चीजों पर ध्यान देना सीखता है.
यही बात चार पुरुषार्थ—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास भी बताते हैं. जीवन के एक चरण पर व्यक्ति को सत्ता छोड़कर आगे बढ़ना होता है. जब गृहस्थ जीवन और धन-सत्ता का चरण खत्म होने लगता है, तब व्यक्ति को वानप्रस्थ की ओर बढ़ना चाहिए, जहां वह रोजमर्रा की जिम्मेदारियां दूसरों को सौंपने लगता है. इसका मतलब पूरी तरह पीछे हटना नहीं, बल्कि ध्यान को आंतरिक विकास की ओर मोड़ना है. जब देशों को नए प्रतिद्वंद्वियों से खतरा महसूस होता है, तो उन्हें नए देशों के लिए जगह बनानी चाहिए ताकि वे भी आगे बढ़ सकें.
कंपनियां भी ऐसा करती हैं.
जब उन्हें नए प्रतियोगी दिखाई देते हैं, तो वे कम लाभ वाले कारोबार छोड़कर ज्यादा मूल्य वाले क्षेत्रों में आगे बढ़ती हैं. प्रकृति के नियम भी एक तय चक्र का पालन करते हैं—सृजन, स्थिरता, विनाश और पुनर्जन्म. इसे हिंदू मान्यता में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की भूमिकाओं से समझा जाता है. “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” इसी प्राकृतिक सत्य का एक रूप है.
इसका मतलब है कि ताकतवर देशों को दुनिया में उभर रही नई ताकतों के लिए जगह बनानी चाहिए और अपनी शक्ति का इस्तेमाल बड़े लक्ष्यों के लिए करना चाहिए. दूसरों को खत्म करके अपनी सर्वोच्चता बनाए रखने की कोशिश आखिरकार असफल होती है. अमेरिका, चीन और भविष्य में भारत को भी शक्ति संतुलन में बदलाव की इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा, बिना जीत-हार की सोच में फंसे.
आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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