बेंगलुरु: कर्नाटक सरकार ने भारतीय वायुसेना यानी इंडियन एयर फोर्स से वैकल्पिक जमीन मांगी है. यह मांग येलहंका में वायुसेना के एक प्रमुख ट्रेनिंग स्कूल द्वारा इस्तेमाल की जा रही करीब 160 एकड़ वन भूमि के बदले की गई है. यह जानकारी दिप्रिंट को मिली है.
मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने कहा कि बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट जाने वाले रास्ते पर स्थित येलहंका एयरफोर्स स्टेशन का रनवे, जो फिलहाल इस्तेमाल में है, दरअसल अतिक्रमित वन भूमि पर बना हुआ है.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, “वायुसेना को बदले में दूसरी जमीन देनी होगी. हमने बेलगावी में वायुसेना की कुछ जमीन दिखाई है और अगर वायुसेना और वन विभाग इस पर सहमत होते हैं तो उसका ट्रांसफर किया जाएगा.”
कर्नाटक सरकार ने अतिक्रमण की सही सीमा पता करने के लिए वायुसेना के साथ संयुक्त सर्वे किया है. हालांकि यह संभावना कम है कि वायुसेना इस जमीन को छोड़ेगी, क्योंकि इसका अभी सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रहा है और इसे लौटाने से सुरक्षा से जुड़ी मुश्किलें बढ़ सकती हैं.
येलहंका एयरफोर्स स्टेशन करीब 2,000 एकड़ जमीन पर फैला है. इसमें से करीब 160 एकड़ का रनवे वन विभाग के विवाद के दायरे में है.
वन विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “दस्तावेजों के मुताबिक 132.03 एकड़ और 27 एकड़ के दो भूखंड फिलहाल वायुसेना इस्तेमाल कर रही है. कुल मिलाकर यह करीब 159.29 एकड़ बनता है. इस संपत्ति को वापस लेने के लिए हमने वायुसेना के साथ बातचीत की है.”
कर्नाटक सरकार फिलहाल उन सभी वन जमीनों को वापस लेने की कोशिश कर रही है जिन पर लोगों या संस्थाओं ने अतिक्रमण किया हुआ है.
दिप्रिंट को मिले आंकड़ों के मुताबिक 2,04,229.762 एकड़ वन भूमि पर अतिक्रमण हुआ है. इसमें बेंगलुरु ग्रामीण में 864.20 एकड़ और बेंगलुरु शहरी इलाके में 2,043.44 एकड़ जमीन शामिल है.
सरकार ने यह नहीं बताया है कि वायुसेना और अन्य रक्षा संस्थानों द्वारा कितना अतिक्रमण किया गया है, अगर किया गया है तो.
कर्नाटक के वन मंत्री ईश्वर खंड्रे कई ऐसे अतिक्रमण हटाने के अभियान में लगे हुए हैं. इनमें कुछ औपनिवेशिक दौर के लीज समझौते भी शामिल हैं, जिनके तहत कुछ कंपनियां या संस्थाएं सैकड़ों एकड़ जमीन पर कब्जा किए हुए हैं और बहुत कम किराया देकर उसे बनाए हुए हैं.
दस्तावेजों के मुताबिक इन लीज में कोडागु जैसे इलाकों की प्लांटेशन और लकड़ी कंपनियां शामिल हैं, जो बेंगलुरु से करीब 225 किलोमीटर दूर है. अधिकारियों ने कहा कि इनमें से कुछ कंपनियां प्रति एकड़ सालाना करीब 1,500 रुपये दे रही हैं.
बेंगलुरु का एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम भी एक बड़ा विवादित मामला है, क्योंकि रक्षा मंत्रालय का दावा है कि जिस जमीन पर यह स्टेडियम बना है वह उसकी है.
कई सिविल सोसाइटी समूहों ने मंत्रालय से यह जमीन वापस लेने की मांग की है, क्योंकि कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन इसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कर रही थी, जिसमें इंडियन प्रीमियर लीग मैच आयोजित करना भी शामिल है. यह मुद्दा तब उठा जब सिद्धारमैया कैबिनेट ने क्रिकेट स्टेडियम को शहर से बाहर ले जाने का फैसला किया.
इसी तरह कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां कर्नाटक सरकार या बेंगलुरु नगर निगम पर सड़क चौड़ीकरण या दूसरे विकास कार्यों के लिए रक्षा भूमि पर अतिक्रमण करने के आरोप लगे हैं. पहले भी दोनों के बीच विवाद हुए हैं और ऐसे समझौते भी हुए हैं जिनमें रक्षा विभाग ने शहर के बीच की जमीन छोड़कर बेंगलुरु के बाहर बड़ी जमीन ली है.
इंडियन एयर फोर्स ने टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया.
येलहंका एयरफोर्स स्टेशन इंडियन एयर फोर्स का प्रमुख ट्रेनिंग स्कूल है और यहां हर दो साल में होने वाला एयर शो एयरो इंडिया आयोजित किया जाता है. करीब आठ दशक पुराने इस बेस का इस्तेमाल एमआई7, एमआई-17 हेलिकॉप्टर, एएन-32 और डॉर्नियर डीओ-228 विमान प्रशिक्षण स्कूल के रूप में होता है. यही वह जगह भी है जहां पुराने दौर के मशहूर विमान डकोटा को शामिल किया गया था.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद युद्धबंदियों को रखने वाली जगहों में यह भी शामिल था. करीब 20,000 युद्धबंदियों को येलहंका, जक्कुर और अन्य जगहों पर एयरफील्ड बनाने का काम सौंपा गया था.
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद 1 अगस्त 1963 को येलहंका एयरफोर्स स्टेशन को आधिकारिक रूप से स्थापित किया गया था. यह बेंगलुरु के तीन सक्रिय हवाई अड्डों में से एक है, हालांकि यहां से व्यावसायिक उड़ानें संचालित नहीं होती हैं.
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