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Saturday, 16 May, 2026
होमहेल्थNTA ‘ढांचागत रूप से विफल’, सिर्फ ऑनलाइन परीक्षा समाधान नहीं: डॉक्टरों के संगठन FAIMA ने जताई चिंता

NTA ‘ढांचागत रूप से विफल’, सिर्फ ऑनलाइन परीक्षा समाधान नहीं: डॉक्टरों के संगठन FAIMA ने जताई चिंता

डॉक्टरों के संगठन FAIMA ने NTA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया है कि NTA ने परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था में बुनियादी बदलावों की सिफारिशों को लागू नहीं किया. दिप्रिंट को इस याचिका की विस्तृत जानकारी मिली है.

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नई दिल्ली: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को घोषणा की कि 2027 से NEET-UG को कंप्यूटर आधारित टेस्ट यानी CBT फॉर्मेट में कराया जाएगा. इसके बाद फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन यानी FAIMA ने कहा कि सिर्फ फॉर्मेट बदलने से परीक्षा की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवाल खत्म नहीं होंगे.

फाइमा ने कहा कि CBT फॉर्मेट में भी पेपर लीक और गड़बड़ियों के मामले सामने आ चुके हैं. इनमें निजी संस्थानों और कंसल्टिंग सेवाओं की कथित भूमिका भी शामिल रही है.

फाइमा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. अथर्व शिंदे ने कहा, “CBT पर जाने से पहले सरकार को एक मजबूत उच्च स्तरीय समिति बनानी चाहिए, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और फॉरेंसिक विशेषज्ञ शामिल हों.”

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान धर्मेंद्र प्रधान ने “कमांड चेन में चूक” की जिम्मेदारी स्वीकार की और 21 जून 2026 को दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा की.

डॉ. अथर्व शिंदे ने नई परीक्षा की घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए दिप्रिंट से कहा, “सरकार को सिस्टम की खामियां दूर करने और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी NTA को फिर से व्यवस्थित करने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बार-बार पेपर लीक होना यह दिखाता है कि परीक्षा कराने के तरीके में गहरी समस्याएं हैं.”

ये प्रतिक्रियाएं तब आई हैं जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने 12 मई को NEET-UG 2026 परीक्षा रद्द कर दी थी. यह परीक्षा 3 मई को हुई थी. केंद्रीय एजेंसियों ने पुष्टि की थी कि प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले व्हाट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुपों में लीक हो गया था. उसी दिन मामला दर्ज करने वाली सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने बाद में दिल्ली की अदालत को बताया कि लीक का स्रोत खुद NTA के भीतर था.

परीक्षा में शामिल हुए 22.7 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों को अब 21 जून को दोबारा परीक्षा देनी होगी.

13 मई को फाइमा, जो खुद को भारत में रेजिडेंट डॉक्टरों का सबसे बड़ा राष्ट्रीय संगठन बताता है, ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. इसमें कहा गया कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी सुरक्षित दोबारा परीक्षा कराने के लिए “संरचनात्मक रूप से सक्षम नहीं” है. संगठन ने अदालत से मांग की कि 21 जून की दोबारा परीक्षा से पहले वह अपनी निगरानी समिति नियुक्त करे.

याचिकाकर्ताओं की वकील तन्वी दुबे ने कहा कि यह घोषणा उन मुद्दों पर सावधानी बरते बिना की गई है जिनको लेकर छात्र वास्तव में चिंतित हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “सिर्फ परीक्षा को ऑनलाइन कराने से कुछ नहीं होगा, जब तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2024 में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया जाता.”

डुबे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं में NEET-PG में स्कोर में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं, जबकि यह परीक्षा पहले से ही कंप्यूटर आधारित है. उन्होंने इसे इस बात का उदाहरण बताया कि सिर्फ फॉर्मेट बदलना सुरक्षा की गारंटी नहीं है.

अब तक क्या हुआ

NEET-UG 2026 परीक्षा 3 मई को 5,400 से ज्यादा केंद्रों पर आयोजित की गई थी, जिसमें करीब 22.7 लाख उम्मीदवार शामिल हुए थे. कुछ ही दिनों में व्हाट्सऐप और टेलीग्राम पर घूम रहे एक ‘गेस पेपर’ के सवाल परीक्षा में पूछे गए सवालों से मेल खाते पाए गए.

राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप यानी एसओजी ने जांच शुरू की थी. यह जांच सीकर में सामने आए एक दस्तावेज के बाद शुरू हुई. जांच में करीब 410 सवालों वाली सामग्री मिली, जिनमें से लगभग 120 सवाल कथित तौर पर बायोलॉजी और केमिस्ट्री सेक्शन से मेल खाते थे. याचिका में कहा गया है कि कुल 720 अंकों में से करीब 600 अंकों के सवाल पहले से बाहर घूम रहे हो सकते थे.

यह सामग्री नासिक, गुरुग्राम, जयपुर और सीकर के कोचिंग नेटवर्क के जरिए “इंपॉर्टेंट क्वेश्चन” या “वीआईपी सेट” के नाम से बांटी गई थी. इन पेपरों तक पहुंच के लिए उम्मीदवारों से लाखों रुपये लिए गए थे.

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने केंद्रीय एजेंसियों से जानकारी मिलने के बाद 12 मई को परीक्षा रद्द कर दी. उसी दिन सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने मामला दर्ज किया.

याचिका में क्या कहा गया

पूरे देश में डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले फाइमा ने 13 मई को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. इसमें NTA, केंद्र सरकार और सीबीआई को पक्षकार बनाया गया है.

याचिका का मुख्य दावा है कि NTA ने राधाकृष्णन समिति की अहम सिफारिशों को कभी लागू नहीं किया. यह समिति 2024 के पेपर लीक विवाद के बाद बनाई गई थी और इसकी अध्यक्षता पूर्व इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने की थी. समिति ने परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव का सुझाव दिया था.

समिति की मुख्य सिफारिशों में एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र शामिल थे, जिन्हें डिजिटल तरीके से परीक्षा केंद्रों तक भेजा जाए और परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले वहीं प्रिंट किया जाए. इससे प्रश्नपत्र ले जाने की प्रक्रिया में होने वाली गड़बड़ियों की संभावना खत्म हो जाती. समिति ने कई शिफ्ट में परीक्षा कराने, आधार से जुड़ी बायोमेट्रिक जांच लागू करने, उम्मीदवारों की पहचान पर नजर रखने के लिए “डिजी-एग्जाम” सिस्टम लाने और “रेड टीम/ब्लू टीम” मॉडल के जरिए लगातार सुरक्षा जांच करने की भी सिफारिश की थी. इसमें एथिकल हैकर्स सिस्टम की कमजोरियों की जांच करते हैं. समिति ने अमेरिका की एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विस जैसी वैश्विक व्यवस्थाओं का भी अध्ययन किया था.

याचिका के मुताबिक इनमें से कुछ भी लागू नहीं किया गया.

इसके बजाय, याचिका में कहा गया है कि NTA ने “पुरानी और भारी-भरकम फिजिकल चेन ऑफ कस्टडी” पर भरोसा जारी रखा. इसमें लॉजिस्टिक्स का काम निजी ठेकेदारों को दिया गया और प्रश्नपत्रों को ले जाने और रखने के दौरान खतरे में छोड़ दिया गया. याचिका में कहा गया है कि जीपीएस ट्रैकिंग और सिग्नल जैमर जैसे उपाय “सिर्फ दिखावटी” थे, क्योंकि पेपर पहले ही ऑनलाइन लीक हो चुके थे. याचिका में आरोप लगाया गया है कि एजेंसी ने डिजिटल वॉटरमार्किंग और एडवांस डेटा सुरक्षा से जुड़ी सिफारिशों को भी “पूरी तरह नजरअंदाज” किया.

महत्वपूर्ण बात यह है कि याचिका में कहा गया कि इस लीक का पता NTA की अपनी व्यवस्था से नहीं चला, बल्कि राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप ने इसका खुलासा किया. याचिका के मुताबिक इससे साफ होता है कि एजेंसी के भीतर कोई आंतरिक ऑडिट या निगरानी व्यवस्था नहीं है.

याचिका में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का उदाहरण देते हुए कहा गया कि सितंबर 2020 में उसे भंग कर दिया गया था. याचिका में कहा गया, “NTA में बार-बार हो रही डिजिटल गड़बड़ियां और प्रशासनिक विफलता साफ तौर पर उसी तरह के न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करती हैं.”

याचिकाकर्ताओं ने लिखा, “जब कोई प्रशासनिक संस्था इतना बड़ा सार्वजनिक काम संभालते हुए व्यवस्था और ढांचे के स्तर पर पूरी तरह विफल साबित हो, तो अदालत के पास उसकी व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेकर पूरे सिस्टम की पवित्रता बचाने का संवैधानिक अधिकार और उदाहरण मौजूद है.”

सुप्रीम कोर्ट की पृष्ठभूमि

मौजूदा कानूनी मामला एक खास न्यायिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है. वंशिका यादव vs. यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि पेपर लीक कुछ खास इलाकों तक सीमित था और उसने उस साल की परीक्षा रद्द करने से इनकार कर दिया था.

लेकिन अदालत ने चेतावनी दी थी कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी “गलत कदम उठाने, गलत फैसला लेने और बाद में उसे बदलने की गलती नहीं कर सकती.” अदालत ने यह भी कहा था कि “बार-बार फैसले बदलना निष्पक्षता के खिलाफ है.”

अदालत ने स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा, परीक्षा सामग्री के ट्रांसपोर्ट, परीक्षा ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों की निगरानी और ओएमआर शीट जमा करने की समय सीमा को लेकर भी विस्तार से निर्देश दिए थे. इन्हीं निर्देशों के आधार पर राधाकृष्णन समिति बनाई गई थी, जिसने अक्टूबर 2024 में अपनी रिपोर्ट दी थी.

फाइमा की याचिका में कहा गया है कि इन निर्देशों में से कोई भी लागू नहीं किया गया. याचिका के मुताबिक 2026 का लीक कोई अलग घटना नहीं थी, बल्कि 2024 में अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों को नजरअंदाज करने का अनुमानित नतीजा था.

यह रिट याचिका फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने का इंतजार कर रही है.

CBT योजना में देरी क्यों हुई

NEET-UG को कंप्यूटर आधारित टेस्ट यानी CBT में बदलने की योजना पर कई सालों से चर्चा हो रही थी, लेकिन इसे कभी लागू नहीं किया गया. अब 2027 के लिए हुई नई घोषणा के बाद फिर सवाल उठ रहा है कि देरी क्यों हुई.

NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने गुरुवार को हिंदुस्तान टाइम्स से कहा, “अगर स्वास्थ्य मंत्रालय हमें लिखित में कहता है कि परीक्षा CBT मोड में कराई जाए, तो हम इसे CBT मोड में कराएंगे.”

राधाकृष्णन समिति ने डिजिटल परीक्षा की सिफारिश की थी. समिति ने कहा था कि पेन और पेपर वाली परीक्षा में कई ऐसे चरण होते हैं जहां पेपर लीक हो सकता है. लेकिन बदलाव की प्रक्रिया मुख्य रूप से बड़े स्तर की वजह से अटकी रही. 22 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों के कारण NTA को परीक्षा कई शिफ्ट में करानी पड़ती.

हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय एक ही शिफ्ट में परीक्षा चाहता था ताकि निष्पक्षता को लेकर विवाद न हो.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा, “हम नहीं चाहते कि बाद में यह शिकायतें आएं कि एक सेट के सवाल दूसरे से अलग थे या पहले का पेपर आसान था. नॉर्मलाइजेशन से जुड़े विवादों से बचने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने परीक्षा एक ही शिफ्ट में कराने का सुझाव दिया था.”

लेकिन करीब 22 लाख उम्मीदवारों की परीक्षा कराने के लिए लगभग 20 शिफ्ट की जरूरत पड़ती. इससे अलग-अलग सत्रों के अंकों को बराबरी पर लाने के लिए नॉर्मलाइजेशन करना पड़ता, जैसा कि एजेंसी पहले से जेईई मेन में करती है.

हालांकि असली चुनौती बुनियादी ढांचे की है. फिलहाल NTA अपनी CBT परीक्षाओं में हर शिफ्ट में करीब 1.5 लाख छात्रों को ही समायोजित कर पाती है. नीट जैसे बड़े स्तर की परीक्षा के लिए इससे कहीं ज्यादा व्यवस्थाओं की जरूरत होगी.

राधाकृष्णन समिति ने इसके लिए एक व्यावहारिक रोडमैप भी दिया था. समिति ने सिफारिश की थी, “ऐसे परीक्षा केंद्रों को जोड़कर करीब एक साल के भीतर देशभर में 400-500 केंद्रों का नेटवर्क बनाया जा सकता है, जिससे एक सत्र में 2 से 2.5 लाख छात्रों की CBT परीक्षा ली जा सके.”

समिति ने यह भी कहा था, “आगे चलकर देश के हर जिला मुख्यालय में एक मानकीकृत और अच्छी सुविधाओं वाला CBT केंद्र होना चाहिए.”

हालांकि इन सिफारिशों को कभी लागू नहीं किया गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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