बालगंगाधर तिलक/ कॉमंस
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बाल गंगाधर तिलक (23 जुलाई 1856 – 1 अगस्त 1920 ) को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के गरम दल का प्रमुख नेता माना जाता है. उनको लोकमान्य की उपाधि से नवाजा गया था. स्वराज और स्वाधीनता में अंतर होने के बावजूद, उनका नारा – ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ स्वतंत्रता आंदोलन का लोकप्रिय नारा बना.

तिलक के राजनीतिक विचारों के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. इसलिए प्रस्तुत लेख में मेरी कोशिश उनके सामाजिक विचारों को सामने लाने की होगी और ये बताने की होगी कि जिस दौर में महादेव गोविंद रानाडे और गोपाल कृष्ण गोखले से लेकर ज्योतिबा फुले समाज सुधार के लिए काम कर रहे थे, उस समय तिलक किस तरह परंपरावादियों का नेतृत्व कर रहे थे. इस संदर्भ में ये भी देखा जाएगा कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने तिलक को लेकर लगातार आलोचनात्मक लेखन क्यों किया है.

इस पूरे विमर्श को कांग्रेस के अंदर दो धड़ों के संघर्ष के रूप में भी देखा जा सकता है. महिलाओं और जाति के प्रश्न पर कांग्रेस में दो धड़े थे- सुधारवादी और रूढ़िवादी. सुधारवादी धारा के चार मुख्य आधार थे – जातिभेद का उन्मूलन, बालिका विवाह का निषेध, विधवा विवाह का समर्थन और महिला शिक्षा. महादेव गोविन्द रानाडे, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, विष्णु हरि पंडित, और आगे चलकर जी. जी. अगरकर तथा गोपाल कृष्ण गोखले आदि इस पक्ष में थे. दूसरी ओर, विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और तिलक रूढ़िवादी विचार का नेतृत्व कर रहे थे. रुढ़ीवादी खेमे ने आगे चलकर खुद को राष्ट्रवादी खेमे का नाम दे दिया.


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महिलाओं की शिक्षा और तिलक

तिलक ने महिला शिक्षा का पूरी क्षमता के साथ विरोध किया. परिमाला वी. राव ने अपने शोधपत्र में मुख्य रूप से तिलक के अखबार मराठा के हवाले से बताया है कि विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और तिलक के नेतृत्व में कांग्रेस के कट्टरवादी धड़े ने 1881 से 1920 के बीच किस तरह बालिका विद्यालयों की स्थापना और हर समुदाय के लिए शिक्षा देने के प्रयासों का विरोध किया. इस धड़े के विरोध के कारण महाराष्ट् में 11 में से 9 नगरपालिकाओं में हर किसी के लिए शिक्षा देने के प्रस्ताव को हार का सामना करना पड़ा. इस धड़े ने राष्ट्रवादी शिक्षा की वकालत की, जिसमें धर्मशास्त्रों का अध्ययन और हुनर सिखाने पर जोर था.

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तिलक के नेतृत्व में कट्टरवादी धड़े का तर्क था कि पेशवा के शासन के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी थी. तिलक के ये विचार उनके अखबार मराठा के 15 मार्च 1885 के अंक में छपे हैं. महिला शिक्षा के विरोध में तिलक का तर्क था कि महिलाएं कमजोर होती हैं और संतति को आगे बढ़ाना उनका काम है, इसलिए उनको शिक्षित करने से उनको पीड़ा होगी क्योंकि आधुनिक शिक्षा को समझना उनकी शक्ति से बाहर है. उनकी ये बात मराठा अखबार के 31 अगस्त 1884 के अंक में छपी थी.

तिलक का कहना था कि यदि विशेष जरूरत हो, तो महिलाओं को गृह विज्ञान और सफाई कार्य जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. ऐसी महिलाएं ही आगे जाकर निपुण बन सकती है. उसके अनुसार महिलाएं इंग्लिश, गणित, विज्ञान जैसे कठोर विषय पढ़ने के लिए बिलकुल उपयुक्त नहीं है. उसने कहा कि हिन्दू समाज में पुरुष और महिला के कार्य अलग अलग हैं, इसलिए उनको अलग अलग शिक्षा दी जानी चाहिए.

गौर किया जाना चाहिए कि यह वही दौर था जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पहला बालिका विद्यालय खोला था. वहीं, राणाडे के नेतृत्व में कांग्रेस के उदारवादियों ने 1884 में पुणे में लड़कियों का हाई स्कूल खोला. गोखले ने भी तिलक के स्त्री शिक्षा संबंधी विचारों को सही नहीं माना और फर्गुसन कॉलेज में बालिकाओं को पढ़ाए जाने का समर्थन किया.


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विवाह की आयु और तिलक के विचार

उस समय लड़कियों की शादी बहुत छोटी उम्र में कर दी जाती थी, जिससे उन्हें असहनीय यातना से गुजरना पड़ता था. पेशवा राज में ब्राह्मण परिवारों के लिए ये अनिवार्य था कि वे अपनी बच्चियों की शादी 9 साल से कम उम्र में ही कर दें. एक चर्चित मामले में, बच्ची फूलमणि की शादी 11 वर्ष की उम्र में कर दी गयी थी, उसके 35 वर्षीय पति ने उसके साथ जबरदस्ती सेक्स किया, जिससे उसकी मौत हो गयी. ऐसी अनेक घटनाएं थीं जिनमे छोटी बच्चियों के साथ सेक्स करने से वे अपाहिज तक हो गयीं.

समाज सुधारको की ओर से ऐसी मांग थी कि शादी और सहमति से सेक्स की उम्र को बढ़ाया जाए. इसलिए ब्रिटिश सरकार ने एक कानून Age of Consent Act 1891 बनाया जिसके अनुसार 12 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ, चाहे वह विवाहित है या अविवाहित, सेक्स करना बलात्कार की श्रेणी में आएगा. कांग्रेस के सुधारवादी लोग भी इस बिल के पक्ष में थे, किन्तु तिलक ने इस मामले में ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप का विरोध किया. उन्होंने कहा – ‘हो सकता है कि इस सरकार का ये कानून सही हो और उपयोगी हो, फिर भी हम नहीं चाहते हैं कि सरकार हमारी सामाजिक परंपराओं और जीवन शैली में हस्तक्षेप करे.’


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गैर-ब्राह्मणों के बारे में तिलक के विचार

तिलक वर्ण व्यवस्था में दृढ विश्वास रखते था. इसका मानना था कि ब्राह्मण जाति शुद्ध है तथा जाति व्यवस्था का बने रहना देश और समाज के लाभ में है. इसने कहा था कि जाति का ह्रास होने का अर्थ राष्ट्रीयता का ह्रास होना है. इसका मानना था कि जाति हिन्दू समाज का आधार है और जाति के नष्ट होने का अर्थ हिन्दू समाज का नष्ट होना है.

जब तिलक यह विचार दे रहा थे, उससे पहले महाराष्ट्र में ही ज्योतिबा फुले ने जाति के आधार असमानता का विरोध किया था. जब ज्योतिबा फुले ने अनिवार्य शिक्षा का कार्यक्रम चलाया तो इसका तिलक ने विरोध किया था. तिलक का मानना था कि प्रत्येक बच्चे को इतिहास, भूगोल, गणित पढ़ाये जाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उनके जीवन में इनका इस्तेमाल नहीं है. तिलक का कहना था कि कुनबी जाति के बच्चों को इतिहास, भूगोल या गणित की शिक्षा देने से उनका नुकसान होगा क्योंकि वे अपना जातीय हुनर भूल जाएंगे. उसने कहा कि कुनबी जाति के बच्चों को अपना परम्परागत किसान का पेशा करना चाहिए, और शिक्षा से दूर रहना चाहिए. जिस समय तिलक यह विचार दे रहा था, उसी समय ब्रिटिश सरकार स्कूल खोल रही थी, और उसमें सभी जाति के बच्चों को पढ़ने का अधिकार दे रही थी.

तिलक ने इसे ब्रिटिश सरकार की गंभीर गलती बताया. सार्वजिनक स्कूल में महार और मांग जाति के बच्चों को प्रवेश देने पर तिलक ने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि महार-मांग बच्चों के ब्राह्मणो बच्चों के साथ बैठने से हिन्दू धर्म सुरक्षित नहीं रह पायेगा.

तिलक के बारे में डॉ. आंबेडकर

तिलक उस समय कांग्रेस पार्टी में कार्य कर रहे थे. कांग्रेस के अंदर ही एक संगठन – सोशल कांफ्रेंस था जो समाज सुधार के लिए कार्य करता था. 1895 में जब कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था, कुछ लोगों ने कहा कि यदि कांग्रेस के अंदर सोशल कांफ्रेंस ने समाज सुधार का कार्य किया तो हम कांग्रेस के पंडाल को जला देंगे. ऐसे लोगों का वैचरिक नेतृत्व तिलक ने किया था. अंत में तय हुआ कि कांग्रेस समाज सुधार के किसी कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं रखेगी, चाहे वह कितना भी जरूरी क्यों नहीं हो. इस प्रकार कांग्रेस केवल एक राजनीतिक प्लेटफार्म बन कर गयी, उसने समाज सुधार के कार्यक्रम बिलकुल बंद कर दिए.

इसका जिक्र डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी किताब कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या किया में विस्तार से किया है. अपनी एक और किताब राणाडे, गांधी और जिन्ना में वे लिखते हैं – ‘बुद्धिजीवियों का एक समूह कट्टरवादी और अराजनैतिक और दूसरा समूह प्रगतिशील और राजनीति है. पहले समूह का नेतृत्व पहले चिपलूणकर और बाद में तिलक ने किया. इन दोनों ने राणाडे के लिए हर तरह की मुसीबत खड़ी की. इससे न सिर्फ समाज सुधार के कामों को नुकसान हुआ बल्कि अनुभव बताते हैं कि इस वजह से राजनीतिक सुधारों की भी सबसे अधिक हानि हुई.’

तिलक और राणाडे की तुलना करते हुए आंबेडकर ये भी लिखते हैं कि तिलक बेशक जेल में रहे, लेकिन राणाडे की लड़ाई ज्यादा मुश्किल थी. राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले को समाज सिर माथे पर बिठाता है, जबकि समाज सुधार के लिए लड़ने वाला अक्सर अकेला होता है और उसे तमाम तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं.

तिलक की स्पष्ट मान्यता थी कि किसान और कारीगर जातियों को राजनीति में नहीं आना चाहिए. 1918 में जब इन जातियों ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई तो तिलक ने शोलापुर की एक सभा में कहा था कि ‘तेली-तमोली-कुनबी विधानसभा में जाकर क्या करेंगे’. बाबा साहेब के मुताबिक तिलक के हिसाब से इन जातियों के लोगों का काम कानून का पालन करना है और उन्हें कानून बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

कुल मिलाकर देखा जाए तो तिलक के सामाजिक विचारों को वर्तमान भारत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इसका ये भी मतलब है कि सबसे महान मान लिए व्यक्ति को भी समग्रता में ही देखा जाना चाहिए और उन्हें जरूरी हो तो उन्हें संपूर्णता में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहे हैं.यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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