लॉज़ान (स्विट्जरलैंड): इस साल मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जिसे जेवर एयरपोर्ट भी कहा जाता है, का उद्घाटन किया. इस नए एयरपोर्ट को आधुनिक तकनीक, बेहतर संचालन और पर्यावरण के अनुकूल डिजाइन वाला बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बताया गया, लेकिन ग्रेटर नोएडा में बने इस भारतीय एयरपोर्ट का एक स्विट्जरलैंड से भी खास संबंध है.
यह एयरपोर्ट 67-वर्षीय मटेरियल केमिस्ट करेन स्क्रिवेनर की कई वर्षों की मेहनत का नतीजा भी है. कैरेन स्क्रिवेनर स्विट्जरलैंड के इकोल पॉलीटेक्निक फेडेराल डी लॉज़ान (EPFL) में प्रोफेसर हैं. वह उन वैज्ञानिकों में शामिल हैं, जिन्होंने लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले सीमेंट (LC3) विकसित किया. यह कम कार्बन वाला और पर्यावरण के लिए बेहतर सीमेंट है, जिसका पहली बार इस्तेमाल जेवर एयरपोर्ट में किया गया.
दिप्रिंट से EPFL में अपनी लैब में बातचीत के दौरान स्क्रिवेनर ने कहा, “जेवर एयरपोर्ट में पहली बार बड़े स्तर पर LC3 का इस्तेमाल हुआ. यह एक बड़ी उपलब्धि थी. इससे पता चलता है कि भारत कम कार्बन वाले विकल्प अपनाने के लिए प्रतिबद्ध है.”
LC3 एक तरह का कंपोजिट सीमेंट है. इसमें पोर्टलैंड क्लिंकर, कैल्साइंड क्ले और लाइमस्टोन मिलाए जाते हैं. पोर्टलैंड क्लिंकर एक खास तरह का पदार्थ होता है, जिसे चूना पत्थर और मिट्टी को लगभग 1450 डिग्री सेल्सियस तापमान पर एक रोटरी भट्टी में गर्म करके बनाया जाता है.
अध्ययनों में पाया गया है कि इस नए सीमेंट के इस्तेमाल से साधारण पोर्टलैंड सीमेंट की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन 40% तक कम किया जा सकता है. इससे देशों को अपने पर्यावरण और टिकाऊ विकास (सस्टेनेबिलिटी) के लक्ष्य हासिल करने में मदद मिल सकती है. इस सीमेंट की एक और खास बात यह है कि इसे बनाना आसान है और इसकी लागत भी कम है.

सस्टेनेबिलिटी का सपना
EPFL की व्यस्त लैब में प्रोफेसर कैरेन स्क्रिवेनर एक साथ कई काम करती हैं. वह लैब में रिसर्च करती हैं, छात्रों को उनके प्रोजेक्ट में मदद करती हैं और अपनी क्लास व वैज्ञानिकों के साथ होने वाली चर्चाओं की तैयारी भी करती हैं. उनका पूरा दिन व्यस्त रहता है. लेकिन LC3 और दुनिया भर में उसे मिल रही पहचान के बारे में बात करने के लिए वह हमेशा समय निकालती हैं.
स्क्रिवेनर ने कहा, “यह निश्चित रूप से ऐसी उपलब्धि है, जिस पर मुझे गर्व है.”
LC3 को हाल के वर्षों में सीमेंट उद्योग का सबसे बड़ा प्रयोग माना जाता है. उनके छात्र और साथी वैज्ञानिक कहते हैं कि स्क्रिवेनर चाहतीं तो इसका पेटेंट कराकर बहुत पैसा कमा सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
EPFL में उनकी छात्रा मेहनाज धार ने कहा, “वह इस काम को लेकर बहुत जुनूनी हैं. वह अपने काम से बहुत पैसा कमा सकती थीं, लेकिन वह चाहती थीं कि पूरी दुनिया के पास कम कार्बन वाला ऐसा सीमेंट हो, जो आसानी से और कम कीमत में मिल सके.” इसकी शुरुआत करीब 2004 में हुई, जब स्क्रिवेनर और क्यूबा की UCLV यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फर्नांडो मार्टिरेना ने कैल्साइंड क्ले के इस्तेमाल पर चर्चा की.
कैल्साइंड क्ले का इस्तेमाल पोज़ोलान के रूप में किया जाता है. यह ऐसा पदार्थ होता है, जो नमी की मौजूदगी में कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करके मजबूत जोड़ (बॉन्ड) बनाता है. करीब एक साल बाद दोनों ने मिलकर उस रिसर्च प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसे आज LC3 के नाम से जाना जाता है. इस प्रोजेक्ट को स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन (SNSF) और स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन (SDC) का समर्थन मिला. रिसर्च का पहला चरण 2005 से 2008 तक चला.
2014 में भारत के प्रमुख संस्थान आईआईटी-दिल्ली और आईआईटी-मद्रास भी इस रिसर्च प्रोजेक्ट से जुड़ गए.

इस नए सीमेंट की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसे बनाने में करीब 25% कम खर्च आता था. इसे बनाने में कम ऊर्जा लगती थी और इसमें कम गुणवत्ता वाले लेकिन आसानी से मिलने वाले चूना पत्थर और मिट्टी का इस्तेमाल होता था. 2020 में इस तकनीक की सभी जांच पूरी हो गईं और इसे व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के लिए तैयार कर दिया गया. यानी, दो वैज्ञानिकों के बीच हुई एक बातचीत से लेकर इस तकनीक के तैयार होने तक करीब 16 साल लग गए. स्क्रिवेनर और उनकी टीम का कहना है कि इसका नतीजा इतने लंबे इंतजार के लायक था.

स्विट्जरलैंड की लैब से यूपी के रनवे तक
LC3 सीमेंट का इस्तेमाल जेवर एयरपोर्ट के रनवे और एक बिल्डिंग कॉम्प्लेक्स के निर्माण में किया गया.
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NIA) के मुख्य विकास अधिकारी निकोलस शेंक ने कहा कि भारत में पहली बार LC3 का इस्तेमाल प्रयोग (एक्सपेरिमेंट) से आगे बढ़कर इतने बड़े स्तर पर किया गया है.
उन्होंने कहा, “भारत में बड़े स्तर पर LC3 सीमेंट इस्तेमाल करने वाला हम पहला प्रोजेक्ट हैं. NIA अब एक ऐसा उदाहरण बन गया है, जिसे आगे कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अपना सकते हैं.”
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जो दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को देश के दूसरे बड़े शहरों से जोड़ता है, खुद को विश्वस्तरीय एयरपोर्ट बताता है. एयरपोर्ट का लक्ष्य नेट-जीरो उत्सर्जन के साथ काम करना है.

इस प्रोजेक्ट के विकास, निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी यमुना इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (YIAPL) को दी गई है, जो ज्यूरिख इंटरनेशनल एयरपोर्ट की एक सहयोगी (सब्सिडियरी) कंपनी है. NIA के मुताबिक, इस परियोजना की कंसेशन अवधि अक्टूबर 2021 में शुरू हुई थी और यह 40 साल तक चलेगी.
भारत के सीमेंट इंडस्ट्री की संस्था सीमेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CMA) ने अपने बयान में कहा कि जेके सीमेंट, जेके लक्ष्मी और अल्ट्राटेक जैसी कई बड़ी कंपनियां अब LC3 सीमेंट का व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर चुकी हैं.
नया शुरू हुआ नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर | एएनआई
CMA ने कहा, “सीमेंट उद्योग अब तेजी से ऐसे विकल्पों की ओर बढ़ रहा है, जो पर्यावरण के लिए बेहतर और लंबे समय तक टिकाऊ हों. LC3 ऐसा ही एक विकल्प है, जिसे कई कंपनियां अपना रही हैं.”
विशेषज्ञ भी इस बदलाव का स्वागत कर रहे हैं. डॉयचे गेसलशाफ्ट फ्यूर इंटरनेशनल ज़ुसामेनआर्बाइट (GIZ) में जलवायु परिवर्तन और सर्कुलर इकोनॉमी पर काम करने वाले वरिष्ठ तकनीकी सलाहकार वैभव राठी ने कहा कि पानी के बाद सीमेंट दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पदार्थ है. इसका मतलब है कि सीमेंट सिर्फ विकास के लिए ही नहीं, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के लिए भी जरूरी है.
उन्होंने कहा कि दुनिया सीमेंट का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं कर सकती, भले ही इससे ग्रीनहाउस गैस (GHG) का उत्सर्जन होता हो.
राठी ने कहा, “अगर हमें इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाना है और पर्यावरण को होने वाला नुकसान भी कम करना है, तो हमें ऐसा सीमेंट बनाना होगा, जिससे कम कार्बन निकले और कम संसाधनों का इस्तेमाल हो.”
यहीं पर LC3 जैसी नई तकनीकें काम आती हैं.
भविष्य की संभावनाएं
कैरेन स्क्रिवेनर का मानना है कि भारत LC3 सीमेंट के लिए बहुत बड़ा बाजार बन सकता है. उन्होंने कहा कि भारत में तेज़ी से इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है और यहां कम गुणवत्ता वाला चूना पत्थर और मिट्टी भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध है, जो LC3 बनाने के लिए ज़रूरी कच्चा माल है.
उन्होंने कहा, “इस तकनीक की क्षमता को परखने के लिए भारत सबसे सही जगह है. मैं यह देखने के लिए बहुत उत्साहित हूं कि वहां का उद्योग इसे किस तरह अपनाता है.”
स्क्रिवेनर को पूरा भरोसा है कि LC3 पुराने सीमेंट की तुलना में ज्यादा मजबूत और ज्यादा टिकाऊ साबित होगा. इंडस्ट्री में इस्तेमाल की मंजूरी मिलने से पहले इस पर कई लैब टेस्ट और सुरक्षा जांच की गई हैं.
उन्होंने कहा, “मैं यह देखने का इंतजार नहीं कर सकती कि भारत में यह उद्योग आगे कैसे बढ़ता है.”
हज़ारों किलोमीटर दूर स्थित उनकी लैब ने भारत के सतत विकास के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया है.
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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