रोहिणी बख्शी का लेख ‘‘मनुस्मृति’ स्त्री-पुरुष दोनों के लिए सख्त है, इसे जलाने से पहले पढ़ तो लीजिए’ खासकर ऊंची जातियों, द्विज पुरुषों के प्रायश्चित के तौर पर मृत्युदंड की पीड़ा को सामने रखता है. बख्शी ने अपने लेख में पुरुषवाद का जोरदार बचाव किया है. विद्वान ए.एच. सालुंखे के शब्दों में कहें तो उन्होंने इस ग्रंथ के चुनिंदा हिस्सों का इस्तेमाल करके इसका बचाव करने की कोशिश की है, लेकिन वे इस ग्रंथ के मुख्य विचारों और अनुशासन के तरीकों से जुड़े मूल तर्कों को सही तरह से नहीं समझ पाई हैं. वे कुछ खास शर्तों को उठा लेती हैं और पूरे ग्रंथ के असली नतीजों को नहीं समझ पातीं.
बख्शी के लेख की मूल दिशा भटक गई है. उन्होंने ‘मनुस्मृति’ के श्लोक 11.91-92 में ऊंची जातियों के पुरुषों के लिए बताए गए कड़े दंड गिनाए हैं. वे ऐसे ही दिलचस्प अंशों का हवाला देती हैं, जिनमें पुरुषों, खासकर ऊंचे वर्ग के पुरुषों के यौन गलत कामों के लिए बेहद कड़े दंड बताए गए हैं. बख्शी की शिकायत है कि कोई इन सबकी बात नहीं करता.
दंड के प्रावधान का अर्थ समानता नहीं है
इसका जवाब बाबासाहब आंबेडकर की किताबों, ‘Castes in India’ और ‘Philosophy of Hinduism’, में मिल सकता है. आंबेडकर मानते थे कि ये ग्रंथ ऊंच-नीच पर आधारित और व्यवस्था में मौजूद असमानताओं को पूरी तरह लागू करते हैं. ऊंची जातियों की ‘शुद्धता’ बनाए रखना ही इनका मुख्य मकसद है और इसकी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर डाल दी गई है. इसलिए आंबेडकर का कहना है कि जिसने जाति व्यवस्था को वास्तव में झेला है, वह जानता है कि ब्राह्मण पुरुष के लिए कड़े नियम उसके शोषण के संकेत नहीं हैं.
आंबेडकर के अनुसार, इतिहास बताता है कि ब्राह्मण वर्ग जाति व्यवस्था की शुद्धता की विचारधारा की रखवाली करता रहा है. अगर रखवाला ही अशुद्ध हो जाता है, तो नीचे के लोगों के शोषण को सही ठहराने का धार्मिक बहाना खत्म हो जाता है. जब ऊंचे वर्ग के किसी व्यक्ति या किसी ब्राह्मण को दंड दिया जाता है, तब भी यह समझना चाहिए कि किसी ब्राह्मण महिला या निचली जातियों के पुरुषों के मुकाबले उसकी मूल सामाजिक हैसियत पर कोई असर नहीं पड़ता. मनुस्मृति में शूद्रों के लिए यह कहा गया है—
“किसी ब्राह्मण को बदनाम करने वाले क्षत्रिय को 100 पण का दंड भरना पड़ेगा, वैश्य को 150 या 200 पण का, लेकिन किसी शूद्र को इसके लिए शारीरिक दंड दिया जाएगा.” (मनुस्मृति, 8.267)
“अगर कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देकर अपमानित करता है तो उसकी जीभ काट डालनी चाहिए, क्योंकि वह नीच कुल का है.” (मनुस्मृति, 8.270)
“यदि शूद्र अहंकार में द्विजों को धर्म की शिक्षा दे तो राजा को उसके मुंह और कानों में गरम तेल डलवा देना चाहिए.” (मनुस्मृति, 8.272)
मुझे लगता है कि बख्शी वर्ण व्यवस्था में निचले स्तर पर रहने वालों को दिए जाने वाले दंड को शासक वर्ग के लिए बताए गए प्रतिबंधों के बराबर दिखाना चाहती हैं. पहरेदार वर्ग के लिए यह आचार संहिता है, लेकिन महिलाओं और शूद्रों के लिए यह आतंक का हमला है.
मनुस्मृति में महिलाओं पर पुरुषों की ओर से ‘सुरक्षा के बोझ’ के नाम पर जो भारी नियंत्रण थोपा गया है, उसे नए रूप में पेश करने के लिए बख्शी उन श्लोकों का हवाला देती हैं जिनमें पुरुषों को अपनी पत्नी पर नज़र रखने का निर्देश दिया गया है. नारीवादी विदुषी उमा चक्रवर्ती ने बताया है कि यह ‘सुरक्षा’ असल में महिलाओं पर नज़र रखने का एक तरीका है. उन्होंने कहा है कि जाति व्यवस्था पर आधारित समाज में महिला की यौन पसंद को पूरी तरह दबा दिया जाता है. यह सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि शादियां केवल एक ही जाति के दायरे में हों. इसकी वजह वंश की रक्तशुद्धता बनाए रखना भी है. इसके पीछे यह सोच भी है कि भौतिक संपत्ति ऊंची जातियों के पितृसत्तात्मक परिवारों में ही बनी रहे. कुछ अंश यहां दिए जा रहे हैं—
“बचपन में बालिका पिता की आज्ञा में, जवानी में पति की आज्ञा में, पति की मृत्यु के बाद पुत्र की आज्ञा में रहे, परंतु स्वतंत्रता का भोग कभी न करे.” (मनुस्मृति, 5.148)
“दिन-रात स्त्री को अपने परिवार पर निर्भर रखना चाहिए… बचपन में उसका पिता, जवानी में उसका पति, और वृद्धावस्था में उसका पुत्र उसकी सुरक्षा करे; स्त्री को कभी स्वतंत्र नहीं रहने दिया जाए.” (मनुस्मृति, 9.2-3)
पितृसत्तात्मक नियंत्रण
बख्शी जिसे पुरुष के लिए ‘बोझ’ कहती हैं, उसे मैं एक पुरुष होने के नाते इतना ही समझ पाया हूं कि वह एक संपत्ति की निगरानी कर रहे मालिक की चिंता है. यह चिंता ऊंची जातियों के पुरुषों को अपनी पत्नी पर नज़र रखने के लिए मजबूर करती है. एक आंबेडकरवादी और नारीवादी की शैक्षिक समझ यह साबित करती है कि इस नियंत्रण के टूटने से परिवार की सामाजिक हैसियत खराब होती है.
यही ग्रंथ खुलकर महिलाओं की तुलना गुलामों से करता है, जिन्हें कोई कानूनी या वित्तीय अधिकार नहीं होता: “एक पत्नी, एक पुत्र, और एक दास, तीनों की घोषित रूप से कोई संपत्ति नहीं होती; वे जो धन कमाते हैं वह उनके लिए होती है जिनके अधीन वे रहते हैं.” (मनुस्मृति, 8.416)
समर्थक लोग जिन प्रसिद्ध श्लोकों, मसलन ‘मनुस्मृति, 3.56’ (‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’) का हवाला देना पसंद करते हैं, उसके साथ भी क्रूर शर्तें जुड़ी हुई हैं.
स्त्री की प्रशंसा तभी की जाती है जब वह पति द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बावजूद उसके आगे पूरी तरह समर्पण कर देती है.
“पति में चाहे कोई गुण न हो, वह कहीं और सुख भोगता हो, उसमें कोई सद्गुण न हो, फिर भी एक निष्ठावान पत्नी को अपने पति की सदा पूजा करनी चाहिए.” (मनुस्मृति, 5.154)
बख्शी उन आलोचकों की आलोचना करती हैं जिन्होंने संस्कृत नहीं सीखी है. उनका मानना है कि ‘मनुस्मृति’ के शाब्दिक श्लोकों को उनके मूल रूप में, अलग संदर्भ के साथ पढ़ना उसके साथ अन्याय है. एक दलित नारीवादी के नजरिए से, खासकर शर्मिला रेगे की लेखनी के आधार पर, मुझे लगता है कि बख्शी की यह मांग ऊंची जाति की ब्राह्मणवादी पहरेदारी जैसी है. हकीकत यह है कि यह ग्रंथ महिलाओं और हाशिये पर डाली गई जातियों को इसे पढ़ने से मना करता है. इसका इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि आंबेडकर ने अपनी किताब ‘Waiting for a Visa’ में लिखा है कि उन्हें संस्कृत पढ़ने की इजाजत नहीं दी गई, बल्कि फारसी पढ़ने के लिए मजबूर किया गया.
अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं ये श्लोक उद्धृत कर रहा हूं—
“कोई शूद्र वेद का पाठ सुनता है तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देना चाहिए, अगर वह वेद का पाठ करता है तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए, अगर वह वेद को याद करता है तो उसके शरीर के दो टुकड़े कर देने चाहिए.”
इन प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने वाली महिलाओं और निचली जातियों के लोगों को मृत्युदंड देने का निर्देश दिया गया है, ऐसे में बख्शी का यह कहना एक विरोधाभास ही है कि इस ग्रंथ के मूल संदेश को समझने के लिए इसे पढ़ना चाहिए. वे आग्रह करती हैं कि संस्कृत नहीं, तो इसके अंग्रेज़ी एडिशन को जरूर पढ़ना चाहिए, लेकिन यह उनकी मूल मांग पर लीपापोती करने जैसा लगता है.
पुरुषवादी विचारों का खुलासा
विचारक रोलैंड बार्थेस ने कहा है: “किसी ग्रंथ का असली अर्थ उसके लेखक के पास नहीं होता, बल्कि उस समाज के पास होता है जो उसके साथ जीता है.” हमें इस तथ्य को समझने की ज़रूरत है कि ‘मनुस्मृति’ ऐसी पीड़ादायक दंड संहिता के रूप में लागू थी, जो छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथा, समुदायों के बहिष्कार और सबसे महत्वपूर्ण, इन समुदायों को पूरी तरह एक वस्तु समझने और उनकी पूरी गुलामी को सही ठहराती थी. बख्शी के तर्क महिलाओं और जातियों के उस संबंध से अनजान हैं, जिसे आंबेडकर ने अपनी शुरुआती किताब ‘Castes in India’ में बहुत अच्छी तरह सामने रखा है.
अंत में बख्शी ने ‘वाल्मीकि रामायण’, शूद्र शंबूक के वध और ‘बृहदारण्यक उपनिषद’ का ज़िक्र किया है, जो पति को सेक्स से इनकार करने वाली पत्नी की पिटाई करने का अधिकार देता है. बख्शी कहती हैं कि ‘मनुस्मृति’ को गलत तरीके से निशाना बनाया जा रहा है. लेकिन यह तुलना इस बात को नजरअंदाज करती है कि एक महाकाव्य और एक संहिता में साफ अंतर है. मानहानि के लिए कानूनन जुर्माना तय करने या संपत्ति के विवाद का कानूनी फैसला करने के लिए ‘रामायण’ से सलाह नहीं ली जाती, उसे एक महाकाव्य ही माना जाता है.
दूसरी ओर, ‘मनुस्मृति’ को दंड संहिता का मूल कानूनी ग्रंथ माना जाता है. राम ने शंबूक का वध ‘मनुस्मृति’ के श्लोक 8.270-272 में बताए गए नियम के अनुसार किया था. ‘उपनिषद’ में जिस हिंसा का उल्लेख किया गया है, वह ‘मनुस्मृति’ के श्लोक 8.416 में संपत्ति को लेकर विवाद से जुड़े नियम को लागू करने का परिणाम थी.
बख्शी के तर्क मनु को निर्दोष साबित नहीं करते, बल्कि मुझे तो यह लगता है कि बख्शी पूरी संहिता पर उसी भेदभाव वाले तर्क को लागू कर रही हैं. अपने लेख में उन्होंने ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाने के लिए ‘संकीर्ण सोच’ को जिम्मेदार बताया है. इस पर मुझे ऐसा ही लगा, मानो दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद विरोधी कार्यकर्ताओं को वहां के ‘ग्रुप एरिया एक्ट’ को निशाना बनाने के लिए दोषी ठहराया जा रहा हो, जबकि वहां लिखी गई हर पूर्वाग्रह वाली कविता को निशाना बनाया जाना चाहिए था.
जहां तक आंबेडकर द्वारा ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाने की बात है, तो यह मालूम होना चाहिए कि उन्होंने इसके बारे में बहुत विस्तार से लिखा है और उस पर खूब बहस भी हो चुकी है. उस सबको यहां पेश करने की जरूरत नहीं है. बेहतर यही होगा कि उनके लेखन और भाषणों को पढ़ा जाए. मेरे लिए, बख्शी का लेख कानूनी बारीकियों, अनुवाद पर बहसों और साहित्यिक ग्रंथों का इस्तेमाल करके पितृसत्ता के बचाव की पुरानी, सूक्ष्म ब्राह्मणवादी रणनीति का हिस्सा नजर आता है.
इसका इस्तेमाल जमीनी सच्चाइयों को छिपाने के लिए किया जाता रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि भारत और पूरी दुनिया में नारीवादी आंदोलनों ने बहुत सारे कचरे की सफाई कर दी है; पुरुषवादी विचारों का जिस तरह खुलासा हो चुका है, उसे अब शब्दों की कोई बाजीगरी, कोई लफ्फाजी बदल या छिपा नहीं सकती.
निखिल संजय-रेखा अडसुले वकील हैं. वह TISS के पूर्व छात्र, अमेरिका में Creighton Peden Scholar और IIT-दिल्ली में Senior Scholar हैं. उनका एक्स हैंडल @Surajya_Raje_ है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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