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Tuesday, 8 September, 2026
होममत-विमत'मनुस्मृति' स्त्री-पुरुष दोनों के लिए सख्त है, इसे जलाने से पहले पढ़ तो लीजिए 

‘मनुस्मृति’ स्त्री-पुरुष दोनों के लिए सख्त है, इसे जलाने से पहले पढ़ तो लीजिए 

1927 में जिस दिन बाबासाहब आंबेडकर ने सार्वजनिक तौर पर पहली बार ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई थी उसके बाद से यह रूढ़िवादियों और उदारवादियों, दोनों के लिए सुरक्षा यंत्र जैसा बन गया.

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दिल पर हाथ रखकर सोचिए, हममें से कितने ऐसे होंगे जिन्होंने ‘मनुस्मृति’ पहले से आखिरी पन्ने तक पढ़ी होगी. मूल, संस्कृत वाली को तो छोड़िए, अनुवादित ग्रंथ को भी कितनों ने सरसरी तौर पर भी पढ़ा होगा? फिर भी, उस पर फैसले सुनाने में हमें कोई मुश्किल नहीं होती. हमने सुना है कि उसमें नारी से द्वेष, और जाति-आधारित दमन की बातें लिखी हैं.

गूगल पर इसके बारे में सर्च कीजिए तो इस ग्रंथ का वह कुख्यात श्लोक आपके सामने आ जाएगा जिसमें कहा गया है कि अपने पति से बेवफाई करने वाली स्त्री को सार्वजनिक स्थान पर कुत्ते से नुचवाना चाहिए. कोई यह नहीं बताता कि इसके बाद अगले श्लोक में यह कहा गया है कि वह स्त्री जिस पुरुष के कारण पति से बेवफाई करती है उस पुरुष को लोहे के गरम बिस्तर पर सुला देना चाहिए, ‘उस व्यभिचारी पर लकड़ी के कुंदे रखकर उसे जला देना चाहिए’ (‘मनुस्मृति’, 8.372)

पाठ में व्यभिचारी पुरुषों के लिए उतने ही कड़े, बल्कि ज्यादा कड़े दंड देने की बात कही गई है.

धर्मशास्त्र की परंपरा का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ मूलतः पुरुष केंद्रित मानकीय पाठ है, जो मानक तय करता है कि द्विजों को आर्य समाज के सदस्य होने के नाते किस तरह का व्यवहार करना चाहिए. यह निर्देश देता है कि पुरुषों को वैदिक पाठशाला में प्रवेश से लेकर मृत्यु तक किस तरह का आचरण करना चाहिए.

इस पूरे पाठ का अध्ययन करने की मेहनत जो भी करेगा वह पाएगा कि बालक जब से शिक्षा लेना शुरू करता है, तभी से यह ग्रंथ उसके लिए किस तरह का अनुशासित और दक्ष आचरण निर्धारित कर देता है. यह तय कर देता है कि उसे अपने गुरु, गुरु के परिवार, और सहपाठियों के प्रति किस तरह का व्यवहार करना जरूरी है. यह कहता है कि सूर्योदय या सूर्यास्त के समय उसे कभी सोते नहीं रहना चाहिए (‘मनुस्मृति’, 2.219). यह ग्रंथ कहता है कि उसे कभी लेटी हुई या बैठी हुई अवस्था में या भोजन करते हुए या गुरु की ओर देखे बिना उनसे बात नहीं करनी चाहिए (‘मनुस्मृति’, 2.196-198). वह कभी गुरु के आसन से ऊंचे आसन पर न बैठे. इस तरह का उपदेशवाद पुरुष के पूरे जीवन भर उसका पीछा करता है. जीवन का हर क्षण नियमों के अनुसार चलेगा, चाहे उसने अध्ययन समाप्त करके गृहस्थ आश्रम में क्यों न प्रवेश कर लिया हो. इस चरण में उसे अपने माता-पिता, पत्नी, परिवार का पालन करना है. उसे अतिथियों का सम्मान करना ही है, और पांच बड़े त्याग करने हैं. इस शास्त्र का अंतिम लक्ष्य एक इकाई के रूप में परिवार, समाज में समरसता स्थापित करना और वेदों का संरक्षण तथा प्रसार करना है.

‘मनुस्मृति’ की कठोरता

‘मनुस्मृति’ पर जब चर्चा की जाती है तब इस बात की पूरी अनदेखी कर दी जाती है कि ‘धर्म’ का उल्लंघन करने वाले पुरुषों के लिए इसमें कितने कड़े दंड प्रस्तावित किए गए हैं. सबसे नृशंस अपराध के लिए जो ‘प्रायश्चित’ बताए गए हैं, उन पर नजर डालने पर यह पता चल जाता है. अगर कोई ब्राह्मण शराब पीता है, तो उसका प्रायश्चित उबलती हुई शराब पीना है, जिससे उसका शरीर जल जाए. या वह जीवन भर उबलता हुआ गोमूत्र, पानी, दूध, घी, या पनीला गोबर पिए (‘मनुस्मृति’, 11.91-92). अपने से बड़े व्यक्ति की पत्नी के साथ संभोग करने वाले को अपने अपराध की घोषणा करनी चाहिए, उसे गरम लोहे के बिस्तर पर सुलाना चाहिए या उसे लाल गरम लोहे के सिलिंडर को गले लगाना चाहिए, उसकी शुद्धि उसकी मौत से ही हो सकती है. या वह अपने जननांग और अंडकोष को काट कर अपनी हथेलियों में लेकर सीधे दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर तब तक पैदल चले जब तक वह गिरकर मर नहीं जाता.

‘मनुस्मृति’ पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि कठोरता और तीव्रता धर्मशास्त्रों की विशेषताएं हैं. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.25.11 कहता है कि कोई गैर-ब्राह्मण (भले ही वह द्विज क्यों न हो) किसी ब्राह्मण की हत्या करता है तो उसे अपने शरीर के बालों, चमड़ी, और मांस को आहूति की तरह अग्नि में डालना चाहिए और उसे खुद उस अग्नि में कूद जाना चाहिए.

यहां मंशा उन श्लोकों को दोहराना नहीं है जिनमें ‘मनुस्मृति’ ने स्त्रियों का सम्मान किया है और पतियों को निर्देश दिया है कि वे अपनी पत्नी का सम्मान करें और उन्हें सुरक्षा दें. अगर आप उन श्लोकों को पढ़ना  चाहते हैं तो पाठ के इन अंशों को देखें—3.60.55-62 और 9.26-29. यहां मंशा यह दिखाना है कि ’मनुस्मृति’ ने ‘व्यवहार’ के मामले में बेहद कठोर कसौटियां निश्चित की है.

स्त्रियों और गैर-द्विजों पर अत्याचार

अधिकतर कठोर कर्तव्य और प्रायश्चित पुरुषों के खाते में डाले गए हैं. दूसरी तरह के लिहाज भी हैं जिनका जिक्र कभी नहीं किया जाता. उन उल्लंघनों का क्या, जिनके लिए समान दंड निर्धारित किए गए हैं? ‘मनुस्मृति’ 8.367 कहता है कि जो व्यक्ति किसी कुंवारी लड़की के साथ ज़ोर-जबरदस्ती करता है उसकी दो उंगलियां तुरंत काट दी जाएं. श्लोक 8.370 में साफ कहा गया है कि जो स्त्री किसी कुंवारे के साथ ज़बरदस्ती करे उसकी भी दो उंगलियां तुरंत काट दी जाएं या सिर मूंड़ दिया जाए और उसे गधे पर बैठाकर घुमाया जाए.

एक और अछूता पहलू ‘मनुस्मृति’ के खिलाफ अपशब्दों के इस्तेमाल का है. जरा इस पर विचार कीजिए:

राम के दरबार में एक ब्राह्मण पांच साल के अपने बेटे का शव लेकर पहुंच गया. ऐसा माना जाता है कि राम के राज्य में यह असमय मृत्यु ‘धर्म’ के किसी भीषण उल्लंघन के कारण हुई. नारद मुनि जानकारी इकट्ठा करते हैं कि एक शूद्र वेद का पाठ कर रहा था. राम पाते हैं कि एक व्यक्ति उलटा लटका हुआ है और वेद का उच्चारण कर रहा है. राम ‘उत्सुकतावश’ पूछते हैं: ‘कौतुहलात्  त्वाम् पृच्छामि’, तुम कौन हो? शूद्र अपना सच्चा परिचय देता है, वह बोल ही रहा होता है कि राम अपनी तलवार से उसका सिर काट डालते हैं. (‘वाल्मीकि रामायण’, 7.64-67).

एक और ग्रंथ में एक घटना यह है:

पुरुष को एक अति सुंदर महिला को संभोग के लिए आमंत्रित करना चाहिए जब उसके मासिक धर्म की अवधि पूरी हो चुकी हो. अगर वह स्त्री मना करे तो पुरुष उसे घूस दे, अगर वह स्त्री फिर भी मना करे तो पुरुष उसे डंडे या मुट्ठी से पीटे और उसे काबू में करे. (बृहदारण्यक उपनिषद, 6.4.6-7).

क्या आपने उपनिषद या रामायण की किसी प्रति को जलाने की घटना के बारे में कभी सुना? इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

सम्मानित पाठों में जब, आधुनिक मानस के हिसाब से गैर-द्विजों और स्त्रियों पर अत्याचार की बातें दिखती हैं तब हम उनकी ओर से आंखें फेर लेते हैं. लेकिन ‘मनुस्मृति’ के मामले में हमने एकतरफा नजरिया अपना लिया है, और बातों को समग्रता में देखने की बजाय उन्हीं बातों पर गौर करते हैं जिनमें समाज के चुनिंदा तबकों को दबाने का उल्लेख किया गया है. 1927 में जिस दिन महाराष्ट्र के महाड में बाबासाहब आंबेडकर ने एक सार्वजनिक प्रदर्शन में पहली बार ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई थीं उसके बाद से यह रूढ़िवादियों और उदारवादियों के लिए सुरक्षा यंत्र जैसा बन गया. हो सकता है कि इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद भी आप इसे जलाना चाहेंगे, लेकिन सोच-समझकर फैसला कीजिए. पहले इस ग्रंथ को अंग्रेजी, हिंदी या किसी भाषा में पढ़िए. इससे भी बेहतर यह होगा कि इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए संस्कृत ही क्यों न सीख लीजिए?

अनुवाद के लिए निम्न स्रोतों को आधार बनाया गया है:

  • बिबेक देबरॉय, द वाल्मीकि रामायण, खंड 3, अनुवाद, 2017, पेंगुइन बुक्स
  • रॉबर्ट पी. गोल्डमैन और सैली जे. सदरलैंड गोल्डमैन, द रामायण ऑफ वाल्मीकि, 2021, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस
  • पैट्रिक ओलिवेल, द अर्ली उपनिषद्स, ट्रांसलेटेड एंड एनोटेटेड (संस्कृत और अंग्रेजी), 1998, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
  • पैट्रिक ओलिवेल, मनु’स लॉ कोड, क्रिटिकल एडिशन (संस्कृत और अंग्रेजी), 2005, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

रोहिणी बख्शी ने SOAS, यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन से हिंदू स्टडीज़ और संस्कृत में MA किया है. उन्होंने 2015 से 2022 के बीच SOAS लैंग्वेज सेंटर और सिटीलिट, लंदन में संस्कृत पढ़ाई है. उनका X हैंडल @RohiniBakshi है. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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