नेपाल की दुखद घटना दुनिया भर के लोगों के मन, जगहों और टाइम ज़ोन में गूंज रही है. इसका पैमाना सिर्फ हिमालय में आई बाढ़, ग्लेशियर टूटने या हज़ारों लोगों के मरने और लापता होने से कहीं ज़्यादा बड़ा है. यह एक बहुत बड़ी ग्लोबल समस्या का सबसे नया संकेत है, जो वक्त-वक्त पर अपनी मौजूदगी महसूस कराती है, खासकर पानी से जुड़ी घटनाओं के जरिए. अजीब बात है क्योंकि गर्म होती धरती के डर से सभी महाद्वीपों में पानी की कमी होने वाली है और भी अजीब बात है कि इतनी भयानक त्रासदी के बावजूद, इंसानी बुरे काम दोहराए जा रहे हैं, नेपाल में भी.
बचाव और लोगों को सुरक्षित निकालने की कई बहादुरी भरी कहानियों के बावजूद, ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि लोग मृतकों के गहने और दूसरी कीमती चीजें चुरा रहे हैं. हालांकि, यह कोई नई बात नहीं है, कम से कम दुनियाभर के संदर्भ में तो नहीं. नेपाल पर नज़र रखने वाले एक व्यक्ति ने इस “नैतिक पतन” के लिए सीधे तौर पर सशस्त्र संघर्ष और ऐसी विचारधारा को जिम्मेदार ठहराया, जो इंसानियत के बुनियादी सिद्धांतों से भटक गई है. उन्होंने एक्स पर लिखा: “इस लेवल की बेरहमी माओवादी ‘पीपुल्स वॉर’ ने सिखाई थी.”
नेपाल एक दशक से ज्यादा समय तक एक क्रूर माओवादी विद्रोह की चपेट में रहा और इस दौरान अत्याचार किए गए. इस पोस्ट में सुरक्षा बलों पर घात लगाकर किए गए हमलों से जुड़ी दो भयानक घटनाओं का ज़िक्र किया गया.
28 फरवरी 2006 को पश्चिमी पाल्पा जिले के छहारा टिंगिरे इलाके में हथियारबंद माओवादी लड़ाकों ने रॉयल नेपाल आर्मी की एक टुकड़ी पर घात लगाकर हमला किया. इस कार्रवाई में सेना के कई जवान मारे गए और कई माओवादी भी मारे गए. इसके कुछ महीने बाद, पूर्वी नेपाल में एक और घात लगाकर किए गए हमले में कई और जवानों की जान चली गई. 5 अप्रैल 2006 को झापा जिले के सुरंगा में सुरक्षा बलों पर हमला करने के लिए एक देसी बम का इस्तेमाल किया गया था. यह टुकड़ी स्कूल की परीक्षा के प्रश्नपत्र लेकर जा रही थी. 2006 में माओवादियों के घात लगाकर किए गए हमलों के बाद जो हुआ, उसका 2026 में एक दोहराव देखने को मिलता है.
‘आज़ादी’ की लड़ाई नहीं
नेपाल में माओवादी विद्रोह के दौरान, ऐसे मामले सामने आए थे, जिनमें मारे गए सैनिकों के शवों के साथ जानबूझकर बेहद क्रूर तरीके से बर्बरता की गई. बाद में भारत के जंगलों में उनके साथी विचारधारा वाले लोगों ने भी ऐसा ही किया.
मिसाल के तौर पर, 29 जून 2010 को माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में CRPF की एक गश्ती टीम पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें 27 जवान मारे गए. जवानों को सिर्फ गोली ही नहीं मारी गई, बल्कि कुछ के शवों के साथ बेहद क्रूर तरीके से बर्बरता भी की गई. कुछ दिनों बाद, माओवादियों ने मारे गए पुलिस मुखबिरों के शवों के नीचे प्रेशर बम भी लगाए, ताकि उनके शवों को निकालना भी मौत का जाल बन जाए.
ऐसी बर्बरता सिर्फ माओवादी विचारधारा से प्रभावित हथियारबंद समूहों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इसके मामले सामने आए हैं, खासकर पश्चिम एशिया में.
कट्टरपंथी विचारधारा अलग-अलग हथियारबंद समूहों को प्रेरित करती है, लेकिन इनमें से कुछ समूहों को अलग करने वाली बात यह है कि वे आधुनिक अर्थ में मौजूद मौजूदा राज्य व्यवस्था को पूरी तरह खारिज करते हैं. यह सिर्फ भारत संघ को चुनौती देने की बात नहीं है, जैसा कि कश्मीरी या नागा उग्रवादियों के मामले में है, बल्कि काम कर रही पूरी राज्य व्यवस्था को खत्म कर उसकी जगह नई व्यवस्था बनाने की बात है. आजादी उनकी इच्छा नहीं है; राज्य को नष्ट करना और समाज पर अपना कब्ज़ा जमाना ही उनका मकसद है.
टेढ़ी-मेढ़ी विचारधाराओं का लंबा असर
नेपाल और भारत में माओवादी-नक्सली हिंसा और बर्बरता के बाद, विचारधारा की लड़ाई में एक और ताकत सामने आई, जिसने राज्य और समाज की जगह अपनी तरह की काल्पनिक आदर्श व्यवस्था लाने की कोशिश की, जहां वामपंथी उग्रवाद का खतरा ज्यादातर भारत-नेपाल की समस्या बना रहा, वहीं इस कथित आदर्श व्यवस्था के नए रूप ने पूरी दुनिया के लिए एक सीधा और बड़ा खतरा पैदा कर दिया.
2014 में रमज़ान के पहले दिन, इस्लामिक स्टेट ने इराक और सीरिया में खिलाफत की घोषणा की. दुनिया के इस खास हिस्से में यह एक असाधारण घटना थी. इसके बाद बड़े पैमाने पर हत्याओं, नरसंहार और गुलामी का दौर शुरू हुआ और बाद में दुनिया के कई देशों के गठबंधन ने इसे खत्म किया. यह सब अब अच्छी तरह जाना-पहचाना है.
ISIS या अरबी में जिस ग्रुप को दाएश (Daesh) कहा जाता है, उसने अपने करीब एक दशक लंबे हिंसा के दौर में सशस्त्र बलों से जुड़े विरोधियों के साथ खास तौर पर बेहद क्रूर व्यवहार किया. माओवादी-नक्सलियों द्वारा की गई बर्बरता को स्वीकार करने में हिचकिचाहट के बिल्कुल उलट, दाएश की बर्बरता इस मायने में भी बेहद खतरनाक थी कि उसे दुनियाभर में खुले तौर पर टीवी पर दिखाया गया और बहुत साफ तरीके से साझा किया गया. इनमें सबसे ज्यादा भयावह घटना 3 जनवरी 2015 को जॉर्डन की वायुसेना के पायलट मुआथ सफी यूसुफ अल-कसासबेह को पिंजरे में बंद करके ज़िंदा जलाना था. खुद को इस्लामवादी बताने वाले एक समूह की ओर से की गई इस इस्लाम-विरोधी हरकत ने पूरी दुनिया में, खासकर जाने-माने अरब धर्मविदों के बीच, भारी गुस्सा पैदा किया. यह घटना पश्चिम समेत कुछ युवाओं के लिए एक तरह का आकर्षण भी बन गई.
डिजिटल कम्युनिकेशन के दौर में, जहां असली और नकली जानकारी किसी साफ तौर पर कही गई बात से भी ज्यादा तेज़ी से फैलती है, विचारधारा से प्रेरित हिंसा का आकर्षण ऐसी वास्तविकता से बचने का आसान रास्ता बन जाता है, जो हमेशा मन के मुताबिक नहीं होती. माओवादी हो या इस्लामवादी, ऐसी काल्पनिक आदर्श व्यवस्था समय के साथ ऐसे लोगों को अपना शिकार बनाकर उन्हें अपने साथ जोड़ने या उनकी सोच बदलने की कोशिश करती है.
हालांकि, दोनों विचारधाराएं अब अपने अंतिम दौर में हैं, फिर भी समाज पर उनका असर लंबे समय तक रहने वाली समस्या है, जिससे राज्य और समाज को निपटना होगा. इंसानियत खो चुके और सामाजिक जिम्मेदारी से दूर दिमाग चिंता की बात हैं. सशस्त्र बलों के खिलाफ किए गए अतिरेक से पैदा हुए ऐसे लोग लगातार दूसरों को अपना शिकार बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं.
मानवेंद्र सिंह BJP नेता, डिफेंस एंड सिक्योरिटी अलर्ट के एडिटर-इन-चीफ और राजस्थान में सोल्जर वेलफेयर एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन हैं. उनका एक्स हैंडल @ManvendraJasol है. यह लेखक के निजी विचार हैं.
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