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Thursday, 11 June, 2026
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ममता बनर्जी का कांग्रेस में शामिल होना क्यों एक बहुत खराब विचार होगा

कांग्रेस को बीजेपी के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखने वाली नई उदारवादी सोच ने ममता बनर्जी के कांग्रेस में शामिल होने की कल्पना को हवा दी है.

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कभी-कभी सबसे अच्छी नीयत रखने वाले लोग ही सबसे खराब सुझाव दे देते हैं. पिछले कुछ दिनों से, खासकर ममता बनर्जी के INDIA गठबंधन की बैठक के लिए दिल्ली आने के बाद—कांग्रेस को बीजेपी के बड़े राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखने की एक नई उदारवादी सोच सामने आई है.

कई उदारवादियों के मुताबिक आगे बढ़ने का सबसे अच्छा रास्ता यह होगा कि क्षेत्रीय पार्टियां खुद को कांग्रेस में मिला लें, क्योंकि आखिरकार कांग्रेस ही कई क्षेत्रीय दलों की मूल पार्टी रही है. इस सोच के अनुसार पहला कदम यह होना चाहिए कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस में विलय कर ले और अपने पुराने घर लौट आए.

मैं इस विचार के पीछे की भावनात्मक ताकत को समझ सकता हूं. यह भी समझ सकता हूं कि यह धर्मनिरपेक्षता की रक्षा, उदारवादी मूल्यों की लड़ाई, बीजेपी का मुकाबला करने या भारत को फिर महान बनाने (जो भी विकल्प चुन लें) के लिए आकर्षक क्यों लगता है.

लेकिन भावनाएं हमेशा रणनीति या तर्क का विकल्प नहीं होतीं. जिन नदियों से धाराएं निकली थीं, उनका वापस उसी नदी में मिल जाना सुनने में अच्छा लगता है.

लेकिन राजनीति में यह बहुत खराब विचार साबित हो सकता है.

ममता-कांग्रेस वाला विचार

आइए तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में लौटने की बात पर विचार करें. सिर्फ पांच मिनट तक तर्कसंगत तरीके से सोचिए, आपको समझ आ जाएगा कि यह कितना खराब विचार है. इसके कारण एक-एक करके समझिए.

पहला, कांग्रेस को तृणमूल कांग्रेस से कोई खास फायदा नहीं मिलेगा. ममता बनर्जी शायद आज जितनी अलोकप्रिय हैं, पहले कभी नहीं रही हैं. मैं यह नहीं कहता कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत में चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं थी, लेकिन अब ममता विरोधी भावना की गहराई को देखकर साफ लगता है कि तृणमूल शायद वैसे भी चुनाव हार जाती.

तो कांग्रेस एक नई शुरुआत करके बीजेपी विरोधी राजनीतिक जगह में अपनी हिस्सेदारी बनाने की कोशिश क्यों न करे? वह ममता की अलोकप्रियता से खुद को क्यों जोड़े?

दूसरा, क्या कोई भी पार्टी ममता बनर्जी के साथ सफलतापूर्वक तालमेल बैठा सकती है? एक नेता के रूप में उनकी सबसे बड़ी ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है. वह अपने आप में एक शक्ति केंद्र हैं और कभी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं रही हैं.

जब वह कांग्रेस में थीं, तब भी सब से लड़ती थीं. जब बीजेपी के साथ रहीं, तब भी वहां लोगों से टकराव हुआ और जब कांग्रेस के साथ गठबंधन में लौटीं, तब उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को टीएमसी में शामिल होने के लिए प्रेरित करके बंगाल कांग्रेस को कमजोर कर दिया.

तीसरा, मान लीजिए कि ममता बनर्जी एक ऐसी नेता होतीं जिनसे सबकी अच्छी बनती, न कि एक लड़ाकू और अप्रत्याशित व्यक्तित्व वाली नेता. तब भी क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जो महिला तीन कार्यकाल तक अपने राज्य की सर्वोच्च नेता रही हो, वह स्वेच्छा से पार्टी अनुशासन मानेगी और कांग्रेस अध्यक्ष की बात सुनेगी?

कांग्रेस में शायद सिर्फ एक व्यक्ति हैं जिनके लिए उनके मन में सम्मान है—सोनिया गांधी, लेकिन जब टीएमसी और कांग्रेस सहयोगी थे, तब भी सोनिया गांधी का उन पर ज्यादा प्रभाव नहीं था. निर्णायक समय आने पर ममता किसी की नहीं सुनतीं.

कांग्रेस में उनकी मौजूदगी हर हफ्ते नए विवाद और नियमित संकट पैदा करेगी. ममता के व्यक्तित्व को देखते हुए ऐसा कोई विलय सफल नहीं हो सकता.

चौथा, उदारवादी लोग मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की बात करके बड़ी गलती कर रहे हैं. इसी तरह की राजनीति ने कई उदारवादी हिंदुओं को भी ममता बनर्जी के खिलाफ कर दिया. उन्हें लगा कि यह खुली सांप्रदायिक और पक्षपातपूर्ण राजनीति है.

चूंकि शुभेंदु अधिकारी शायद ही कभी हिंदू बनाम मुस्लिम एजेंडा उठाए बिना बोलते हों, इसलिए साफ है कि आने वाले महीनों में बीजेपी राज्य के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को और ज्यादा नाराज़ करेगी. ऐसे में किसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी को मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए अलग से प्रयास करने की जरूरत नहीं है. बीजेपी खुद उन वोटों को उस पार्टी की ओर धकेल देगी जो उसे हराने में सबसे सक्षम दिखेगी.

सबसे खराब बात यह होगी कि कोई पार्टी खुलकर मुस्लिम समर्थक राजनीति करे. क्योंकि ऐसा करते ही उसे इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि जब बीजेपी के खुद को हिंदू समर्थक बताने की आलोचना की जाती है, तो फिर खुद को मुस्लिम समर्थक बताना कैसे सही हो सकता है?

ममता बनर्जी की धर्मनिरपेक्ष राजनीति की अपनी एक सोच रही है. उसी सोच ने तृणमूल कांग्रेस को आज की स्थिति तक पहुंचाया है. कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़ी गलती होगी कि वह धर्मनिरपेक्षता के अपने अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण को छोड़कर ममता के मॉडल को अपनाए.

इससे कहीं बेहतर होगा कि कांग्रेस अच्छी शासन व्यवस्था और सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार का वादा करे, बजाय इसके कि वह “मुस्लिम मेरे वोटर हैं” वाली रणनीति अपनाए.

गठबंधन का क्या होगा?

ये तर्क पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू होते हैं. कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन से काफी फायदा हो सकता है. यही रणनीति सोनिया गांधी ने यूपीए बनाने के लिए अपनाई थी और इसी के सहारे सरकार ने दो कार्यकाल पूरे किए थे. लेकिन ज्यादातर विलय (मर्जर) असफल ही होंगे. आखिर कोई क्षेत्रीय नेता, जो पहले से अपनी पार्टी का सर्वेसर्वा है, कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनकर मल्लिकार्जुन खड़गे या राहुल गांधी के निर्देश क्यों मानेगा?

गैर-बीजेपी गठबंधन तभी सफल हो सकता है, जब वह यूपीए की तरह काम करे, जहां हर पार्टी के नेता को बराबरी के दर्जे वाले मंत्रिमंडल के सदस्य की तरह माना जाए. उन पुराने कांग्रेस नेताओं को वापस लाने की कोशिश की जा सकती है, जिन्हें लगता है कि पार्टी के भीतर विरोधियों या नेतृत्व के गलत फैसलों की वजह से उन्हें बाहर होना पड़ा—जैसे अमरिंदर सिंह.

लेकिन सच यह है कि मौजूदा समय में कांग्रेस कोई ऐसी मशीन नहीं है जो अपने दम पर चुनाव जितवा सके. कोई भी क्षेत्रीय पार्टी उससे विलय करके खास फायदा नहीं उठाएगी, जब तक कि वह पार्टी पूरी तरह कमजोर और मजबूर न हो जाए.

आप कह सकते हैं कि इस समय तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कुछ ऐसी ही है, लेकिन ममता बनर्जी अपने उदारवादी शुभचिंतकों से ज्यादा समझदार हैं. वह जानती हैं कि विलय इसका समाधान नहीं है.

ममता के लिए आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है कि वह फिर से जमीनी संघर्ष करने वाली नेता की अपनी पुरानी छवि में लौटें और अपनी लोकप्रियता वापस हासिल करें. 1977 में जब इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गई थीं और उनकी पार्टी के कई नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया था, तब उन्होंने अकेले संघर्ष करके अपना खोया हुआ जनसमर्थन वापस पाया था. यह आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने कर दिखाया था.

ममता के सामने भी यही एक रास्ता है.

और हां, वह इंदिरा गांधी नहीं हैं. लेकिन केवल मूर्ख ही उन्हें राजनीति से बाहर मान लेगा.

वीर सांघवी प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. ये उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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