क्रांतिकारी लैटिन अमेरिका में राजनीतिक बदलाव हो रहा है. लंबे समय से इस महाद्वीप के बाहर के लोग भी यहां की क्रांति की तारीफ करते रहे हैं. चे ग्वेरा का चेहरा क्रांति से कहीं ज्यादा दूर तक पहुंचा. वह विश्वविद्यालयों की दीवारों, टी-शर्ट, सिनेमा, थिएटर और राजनीतिक कला का हिस्सा बन गया. फिदेल कास्त्रो की सैनिक वर्दी, ला मोनेडा से सल्वाडोर अलेंदे का आखिरी रेडियो संदेश, निकारागुआ के सैंडिनिस्टा, पाब्लो नेरुदा की हमेशा बनी रहने वाली उदासी, ऑक्टावियो पाज की कविता का जादू और विक्टर जारा के गीत, ये सब लैटिन अमेरिका की राजनीति से कहीं बड़ी पहचान का हिस्सा बन गए.
कई पीढ़ियों तक लैटिन अमेरिका में क्रांति के साथ एक रोमांटिक रिश्ता बना रहा. इस रिश्ते में किसान और गुरिल्ला लड़ाके, साम्राज्यवाद का विरोध, अमीर और ताकतवर लोगों के दबदबे के खिलाफ संघर्ष और ज्यादा बराबरी वाले समाज का सपना शामिल था.
जमीनी हालात बदलते गए, लेकिन क्रांति के प्रति यह आकर्षण बना रहा. आज लैटिन अमेरिका के राजनीतिक नक्शे पर एक नजर डालने से पता चलता है कि अब तस्वीर लगभग उलटती हुई दिखाई दे रही है.
अर्जेंटीना में जेवियर मिलेई सरकार चला रहे हैं. जोस एंटोनियो कास्ट ने चिली को दक्षिणपंथ की ओर मोड़ दिया है. बोलीविया में मूवमेंट टुवर्ड सोशलिज्म (Movement Toward Socialism) ने सत्ता खो दी है. कोलंबिया और पेरू में दक्षिणपंथ की वापसी हुई है. अब ब्राजील में चल रहे चुनाव, जो लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा देश है और जिसकी अर्थव्यवस्था और मतदाता संख्या भी इस महाद्वीप में सबसे बड़ी है, पूरे क्षेत्र में फैल रही दक्षिणपंथी लहर को और मजबूत कर सकते हैं.
4 अक्टूबर को ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में पूर्व राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो के सबसे बड़े बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो को 47.03 प्रतिशत वोट यानी 5,61,04,268 वोट मिले. राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा को 45.16 प्रतिशत वोट यानी 5,38,76,617 वोट मिले. पहले दौर में जीतने के लिए जरूरी बहुमत किसी भी उम्मीदवार को नहीं मिला. इसलिए ब्राजील में 25 अक्टूबर को फिर से मतदान होगा.
हैरानी की बात यह है कि चुनाव से ठीक पहले हुए सर्वे में आम तौर पर लूला को थोड़ी बढ़त दिखाई गई थी. 3 अक्टूबर को रॉयटर्स ने कई सर्वे का हवाला देते हुए बताया था कि मतदान से पहले लूला फ्लावियो से थोड़े आगे चल रहे थे. लेकिन आधिकारिक नतीजों में तस्वीर उलट गई.
अगर पुराने राजनीतिक नजरिए से देखें, तो ऐसा लगता है कि लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारियों की जगह अब क्रांति के विरोधी ले रहे हैं. हालांकि, पूरे क्षेत्र के बारे में एक जैसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा, क्योंकि यहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज काफी जटिल हैं और इस विशाल क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों के हालात भी अलग हैं.
लैटिन अमेरिका को अक्सर गुलाबी और नीले रंग के नक्शों के जरिए समझा जाता है. लेकिन अनजाने में ये नक्शे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक रोमांटिक सोच का हिस्सा बन गए हैं. इनसे ऐसा लगता है कि अलग-अलग विचारधाराओं वाले राजनीतिक आंदोलन वास्तविकता से कहीं ज्यादा एकजुट हैं और चुनाव भी अक्सर वास्तविकता से कहीं ज्यादा विचारधारा पर आधारित होते हैं.
इसका मतलब यह नहीं है कि लैटिन अमेरिका दक्षिणपंथ की ओर नहीं बढ़ रहा है. ब्राजील भी इस दिशा में जाता है या नहीं, इसका फैसला 25 अक्टूबर को होगा. फिलहाल, इस क्षेत्र की समस्याओं और ताकतों को गहराई से समझने की जरूरत है. इसमें समाजवाद के उन वादों को भी समझना शामिल है, जो दशकों तक पूरे नहीं हुए और जिनके कमजोर पड़ने के बाद कुछ जगहों पर नशीले पदार्थों के कारोबार से चलने वाले राज्य और अंदर से खोखली तानाशाही व्यवस्थाएं उभरीं. इस क्षेत्र को बाहर से देखने वालों को इससे एक अहम सबक फिर से सीखना चाहिए: असली ताकत वहां के लोगों के हाथ में है.
ब्राजील अभी दक्षिणपंथी खेमे में नहीं गया है
ब्राजील में राष्ट्रपति का चुनाव दो-दौर वाली बहुमत प्रणाली के तहत होता है. अगर पहले दौर में किसी उम्मीदवार को कुल वैध वोटों में से आधे से ज्यादा वोट नहीं मिलते, तो सबसे ज्यादा वोट पाने वाले दो उम्मीदवारों के बीच दूसरे दौर का मुकाबला होता है. खाली छोड़े गए मतपत्रों और अमान्य वोटों को वैध वोटों की गिनती में शामिल नहीं किया जाता है.
यह समझना जरूरी है कि पहले दौर के आंकड़ों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि 25 अक्टूबर को क्या नतीजा आएगा. पहले दौर में ब्राजील में 3.3 करोड़ से ज्यादा लोगों ने वोट नहीं डाला. इसके अलावा, लाखों मतदाताओं ने उन उम्मीदवारों को वोट दिया जो पहले दौर के बाद चुनाव से बाहर हो गए.
विश्लेषकों का कहना है कि वोट नहीं डालने वाले लोगों की बड़ी संख्या और आखिरी समय में फ्लावियो के पक्ष में हुए उस बदलाव ने, जिसमें मतदाताओं ने जीतने की ज्यादा संभावना वाले उम्मीदवार को वोट देना बेहतर समझा, उन्हें अंतिम सर्वे की उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की.
पहले दौर के बाद डेटाफ़ोल्हा का पहला बड़ा सर्वे 8 अक्टूबर को जारी हुआ. इसके मुताबिक, फ्लावियो की बढ़त अभी भी बनी हुई है. सभी मतदाताओं के बीच वह लूला से 49 प्रतिशत के मुकाबले 45 प्रतिशत से आगे हैं. केवल वैध वोटों को देखें, तो यह अंतर 52 प्रतिशत के मुकाबले 48 प्रतिशत हो जाता है.
यह पहले दौर से पहले दूसरे दौर के मुकाबले को लेकर हुए आखिरी सर्वे से अलग है, जिसमें लूला थोड़े आगे थे. इससे 4 अक्टूबर के नतीजों से पैदा हुआ आश्चर्य भी और साफ होता है, क्योंकि चुनाव से पहले हुए सर्वे में फ्लावियो के प्रदर्शन का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सका था.
इसके अलावा, तीसरे स्थान पर रहे ऑगस्टो क्यूरी ने फ्लावियो बोल्सोनारो का समर्थन किया है. इससे उनके पक्ष में रूढ़िवादी मतदाताओं के एकजुट होने की प्रक्रिया को और मजबूती मिली है.
अभी इतना जरूर कहा जा सकता है कि ब्राजील में दक्षिणपंथी खेमे ने उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है. और यह बात सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव पर लागू नहीं होती. इस मामले में दो मुख्य बातों पर ध्यान देना जरूरी है.
पहली और ज्यादा अहम बात यह है कि बोल्सोनारो खेमे के लिए सबसे बड़ी सफलता संसद में मिल सकती है. संसदीय चुनावों में दक्षिणपंथी लिबरल पार्टी दोनों सदनों में सबसे ज्यादा सीटों वाली पार्टी बनकर उभरी है. रॉयटर्स के मुताबिक, सीनेट में उसकी सीटें 15 से बढ़कर 28 हो गई हैं. वहीं, 513 सदस्यों वाले चैंबर ऑफ डेप्युटीज में उसकी सीटें 98 से बढ़कर 121 होने का अनुमान है.
हालांकि, यह संसद में पूर्ण बहुमत नहीं है. ब्राजील में भारत या यूरोप की तरह संसदीय व्यवस्था नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति प्रणाली है. इसलिए यहां गठबंधन सरकार का मतलब वैसा नहीं है जैसा भारत या यूरोप में होता है. राष्ट्रपति और संसद, दोनों को अलग-अलग चुनावों के जरिए जनता से अपना अधिकार मिलता है.
लेकिन राजनीतिक हकीकत यह है कि ब्राजील के राष्ट्रपतियों को कानून बनाने और सरकार चलाने के लिए आम तौर पर संसद में कई पार्टियों का समर्थन लेना पड़ता है.
इसलिए दक्षिणपंथी खेमे की बढ़ी हुई ताकत इस बात से अलग भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रपति कौन बनता है. अगर लूला जीतते हैं, तब भी उन्हें पहले से ज्यादा मजबूत दक्षिणपंथी संसद का सामना करना पड़ेगा. लेकिन अगर फ्लावियो जीतते हैं, तो उनके पास राष्ट्रपति पद के साथ-साथ पहले से काफी मजबूत लिबरल पार्टी और संसद में एक बड़ा रूढ़िवादी गठबंधन भी होगा.
इसलिए 25 अक्टूबर से पहले ही एक अहम मायने में ब्राजील की राजनीति दक्षिणपंथ की ओर बढ़ रही है.

दूसरी बात है, बोल्सोनारो सीनियर के बिना भी बोल्सोनारो की राजनीतिक विचारधारा का बने रहना.
पहले दौर के नतीजों पर ध्यान देने की एक और वजह है. जैर बोल्सोनारो खुद चुनाव नहीं लड़ रहे थे. इसके बावजूद, उनके इर्द-गिर्द बना राजनीतिक आंदोलन चुनावी राजनीति से उन्हें बाहर किए जाने के बाद भी अपनी ताकत बनाए रखने में कामयाब रहा है.
राजनीति के विशेषज्ञ लुसियो रेनो ने 2026 में प्रकाशित कैम्ब्रिज की किताब The Far Right in Latin America (लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी) में बोल्सोनारिस्मो को सिर्फ एक लोकप्रिय नेता के प्रति व्यक्तिगत वफादारी के रूप में नहीं देखा है. उनके मुताबिक, यह एक ऐसा दक्षिणपंथी राजनीतिक आंदोलन है, जिसकी चुनाव जीतने की ताकत लंबे समय तक बनी रह सकती है. 2026 के चुनाव इस अंतर को समझने के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इससे पता चलता है कि जमीन पर यह आंदोलन किस तरह काम करता है.
इवेंजेलिकल ईसाई संगठनों के नेटवर्क, सामाजिक रूप से रूढ़िवादी लोग, कृषि कारोबार से जुड़े कुछ वर्ग, सुरक्षा के मामले में सख्त रुख रखने वाले मतदाता, वर्कर्स पार्टी के प्रति विरोध और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को बड़े पैमाने पर जोड़ने की मजबूत व्यवस्था ने मिलकर ऐसा मतदाता वर्ग तैयार किया है, जो आसानी से पिता बोल्सोनारो से बेटे बोल्सोनारो की ओर जा सकता है और शायद भविष्य में किसी दूसरे नेता का भी समर्थन कर सकता है.
25 अक्टूबर को फ्लावियो जीतें या हारें, बोल्सोनारिस्मो ने पहले ही दिखा दिया है कि वह जैर बोल्सोनारो के बिना भी खुद को फिर से मजबूत कर सकता है.
महाद्वीप के बदलते राजनीतिक रंग
ब्राजील कोई अकेला उदाहरण नहीं है. अर्जेंटीना ने 2023 में जेवियर मिलेई को चुना. इक्वाडोर में 2025 में डैनियल नोबोआ फिर से सत्ता में आए. बोलीविया में रोड्रिगो पाज ने करीब दो दशक से चल रहे MAS के शासन को खत्म कर दिया. जोस एंटोनियो कास्ट ने 2025 में दूसरे दौर के चुनाव में 58 प्रतिशत वोट हासिल करके चिली के राष्ट्रपति का चुनाव जीता. 2026 में अबेलार्डो दे ला एस्प्रिएला ने कोलंबिया का राष्ट्रपति चुनाव जीता, जबकि पेरू में केइको फुजीमोरी के नेतृत्व में राजनीति दक्षिणपंथ की ओर बढ़ी. संक्षेप में कहें तो कोलंबिया और पेरू को उस बड़े बदलाव का हिस्सा बताया गया है, जिसमें अर्जेंटीना, चिली, इक्वाडोर, बोलीविया और पनामा भी शामिल हैं. इन देशों में राजनीति दक्षिणपंथ की ओर बढ़ी है.
लेकिन घटनाओं का यही सिलसिला यह भी दिखाता है कि देशों को एक तय रंग में बांटकर देखना काफी नहीं है. बोलीविया के रोड्रिगो पाज मध्यमार्गी नेता हैं. उन्होंने अपने से ज्यादा रूढ़िवादी सोच वाले प्रतिद्वंद्वी को हराया और धीरे-धीरे बदलाव लाने का वादा किया. साथ ही, उन्होंने सामाजिक कल्याण की योजनाएं जारी रखने की बात भी कही. चिली में कास्ट की रूढ़िवादी राजनीति, मिलेई की आर्थिक आजादी पर आधारित सोच, नोबोआ की सुरक्षा पर केंद्रित तकनीकी और प्रशासनिक नीतियां और बोल्सोनारिस्मो, ये सभी एक जैसे नहीं हैं और न ही इन्हें एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है.
इन सभी को ‘दक्षिणपंथ’ कहना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन सिर्फ इतना कहना काफी नहीं है. इसी तरह, लैटिन अमेरिका की बदलती राजनीति को समझने के लिए ‘गुलाबी लहर’ भी कभी एक ही रंग का नाम नहीं थी.

वामपंथी नेता लूला के नेतृत्व वाला ब्राजील भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों और निजी पूंजी से गहराई से जुड़ा हुआ है. उरुग्वे के यामांडू ओर्सी को मध्यमार्गी वामपंथी ब्रॉड फ्रंट से चुना गया था. उन्होंने अपने राजनीतिक कार्यक्रम को ‘आधुनिक वामपंथ’ बताया. उन्होंने आर्थिक विकास का वादा किया, लेकिन ऐसे टैक्स बढ़ाने से इनकार किया जिनसे निवेशक परेशान हो सकते थे.
मेक्सिको इसका और भी साफ उदाहरण है. राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम मोरेना पार्टी के जरिए सरकार चला रही हैं. उनकी नीतियों में आम लोगों तक आर्थिक लाभ पहुंचाना, सरकारी निवेश बढ़ाना और जरूरी क्षेत्रों में सरकार की भूमिका मजबूत करना शामिल है. इसके साथ ही, मेक्सिको की अर्थव्यवस्था उत्तरी अमेरिका के विनिर्माण और व्यापार से गहराई से जुड़ी हुई है.
आज के लैटिन अमेरिका में वामपंथ अक्सर मिली-जुली आर्थिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है. इसमें लोगों के कल्याण की योजनाएं और जरूरी क्षेत्रों में सरकार का दखल, बाजार, निजी कारोबार, विदेशी निवेश और व्यापार समझौतों के साथ-साथ चलते हैं.
इसलिए ‘Pink tide’ (गुलाबी लहर) भी लगभग उतनी ही बातें छिपा देती है, जितनी ‘blue tide‘ (नीली लहर). चुनावी नक्शे बनाने के लिए इन रंगों का इस्तेमाल उपयोगी है, लेकिन सरकारों को समझने और यह जानने के लिए कि वे कैसे काम करती हैं, ये रंग उतने उपयोगी नहीं हैं.
मतदाताओं को दक्षिणपंथ की ओर क्या ले जा रहा है?
अगर लैटिन अमेरिका के मतदाताओं की विचारधारा में अचानक बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं आया है, तो चुनावों में दिख रहे इस बदलाव की कोई दूसरी वजह जरूर होनी चाहिए.
सबसे पहले अपराध को देखें. संगठित अपराध करने वाले गिरोहों ने पूरे महाद्वीप की राजनीति को बदल दिया है. नशीले पदार्थों की तस्करी के रास्ते, ड्रग कार्टेल और कई देशों में फैले आपराधिक गिरोह बढ़े हैं. वहीं, जबरन वसूली, अपहरण और हत्याएं उन समाजों तक पहुंच गई हैं, जो पहले खुद को इन खतरों से काफी हद तक सुरक्षित मानते थे.
इक्वाडोर इसका शायद सबसे स्पष्ट उदाहरण है. चिली और कोलंबिया में भी सुरक्षा और कानून-व्यवस्था चुनाव के सबसे अहम मुद्दे बन गए.
इसके बाद अर्थव्यवस्था की बात आती है. आज लैटिन अमेरिका की समस्या हर जगह बेकाबू महंगाई या बड़े पैमाने पर गरीबी नहीं है. समस्या धीरे-धीरे बढ़ने वाली और राजनीति को नुकसान पहुंचाने वाली है. आर्थिक विकास की रफ्तार ठहर गई है, काम करने की क्षमता और उत्पादकता कमजोर है, अनौपचारिक और गैरकानूनी अर्थव्यवस्था का दायरा बहुत बड़ा है, निवेश की कमी है और सुरक्षित रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं.
सरकार कागजों पर आर्थिक आंकड़े बेहतर दिखा सकती है, लेकिन आम परिवारों को फिर भी लग सकता है कि उनकी जिंदगी पहले से ज्यादा मुश्किल हो गई है.
अपराध और आर्थिक परेशानियों के नीचे एक और ऐसी समस्या है, जिसका पूरे क्षेत्र पर शायद सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है. वह है मौजूदा सरकारों के खिलाफ लोगों की नाराजगी, यानी सत्ता में बैठे लोगों को हटाने की प्रवृत्ति.
राजनीति के विशेषज्ञ जुआन पाब्लो लूना और क्रिस्टोबाल रोविरा काल्टवासर ने चेतावनी दी है कि लैटिन अमेरिका में चुनावी बदलावों को सीधे-सीधे विचारधारा में बदलाव मानना सही नहीं है. इस क्षेत्र में पहले आए ‘दक्षिणपंथी बदलाव’ पर उनके शोध में बताया गया है कि सत्ता का एक पार्टी से दूसरी पार्टी के पास जाना और मौजूदा सरकार को सजा देने के लिए वोट करना, विचारधारा में बड़े बदलाव जैसा दिख सकता है. जबकि असल में इसके पीछे कई अस्थायी और बदलते कारण हो सकते हैं.
यह बात काफी उपयोगी है. जब असमानता, समाज से बाहर रखा जाना और अमीर व ताकतवर लोगों को मिलने वाली खास सुविधाएं राजनीति पर हावी हो जाती हैं, तो मतदाता वामपंथ की ओर जा सकते हैं. लेकिन यही मतदाता तब वामपंथी सरकार को भी सत्ता से हटा सकते हैं, जब आर्थिक विकास रुक जाए, अपराध बढ़ जाए या सरकार थकी हुई और कमजोर नजर आने लगे. इसके बाद वे दक्षिणपंथ को चुन सकते हैं.
और अगर दक्षिणपंथी सरकार भी सुरक्षा, रोजगार और आर्थिक तरक्की के अवसर देने में नाकाम रहती है, तो उसे भी सत्ता से हटाया जा सकता है. बेशक, यह उन देशों में संभव है जहां चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष बने रहते हैं.
वेनेजुएला जैसे मामलों में, जहां अब सत्ता से हटाए जा चुके निकोलस मादुरो के शासन में चुनावों में धांधली एक आम बात बन गई थी, वहां वामपंथ और दक्षिणपंथ की बहस में कई दूसरे पहलू भी जुड़ जाते हैं.
इतना कहना काफी है कि आज नीली लहर का फिर से उभरना एक वास्तविक बदलाव है, लेकिन इसका हमेशा बने रहना जरूरी नहीं है.
भारत को आगे देखना चाहिए
नई दिल्ली के लिए इस क्षेत्र पर ध्यान देने की एक और वजह है. भारत की रणनीतिक सोच में पारंपरिक रूप से लैटिन अमेरिका को बहुत कम जगह मिली है, जबकि दोनों के बीच व्यापार और कारोबार राजनयिक संबंधों से भी आगे बढ़ने लगा है.
2024-25 में भारत का लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों के साथ कुल व्यापार 39.19 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इसमें भारत का निर्यात 15.17 अरब डॉलर और आयात 24.02 अरब डॉलर था.
इस क्षेत्र में ब्राजील भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. ब्रासीलिया स्थित भारतीय दूतावास के मुताबिक, 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार 25 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 15.21 अरब डॉलर हो गया. 2026 के पहले छह महीनों में यह 8.774 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 37 प्रतिशत ज्यादा था.
दोनों पक्षों के बीच सहयोग का दायरा भी बढ़ रहा है. सितंबर 2026 में भारत और मर्कोसुर समूह ने अपने तरजीही व्यापार समझौते का दायरा बढ़ाने के लिए औपचारिक रूप से बातचीत शुरू की. भारत चिली और पेरू के साथ भी व्यापार समझौतों पर बातचीत आगे बढ़ा रहा है. इन चर्चाओं में जरूरी खनिजों से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं.
वेनेजुएला का तेल भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए फिर से बेहद अहम हो गया है. मादुरो के शासन के दौरान अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वेनेजुएला से तेल की आपूर्ति काफी समय तक बंद रही थी. रॉयटर्स के मुताबिक, सितंबर 2026 में वेनेजुएला से भारत आने वाले तेल की मात्रा करीब 2,53,000 बैरल प्रतिदिन थी और इसके आगे और बढ़ने की संभावना थी.
इसके बाद संसाधनों से जुड़ा भू-राजनीतिक महत्व भी है. लैटिन अमेरिका में लिथियम और तांबे के बड़े भंडार हैं. यहां कृषि उत्पादन की भी बहुत क्षमता है. इसके अलावा, तेल, लौह अयस्क और कई दूसरे जरूरी संसाधनों की बड़ी मात्रा उपलब्ध है. ये सभी चीजें भारत के लिए आपूर्ति के अलग-अलग स्रोत विकसित करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश में अहम हैं.
भारत कई सालों से BRICS के जरिए ब्राजील के साथ सहयोग करता रहा है. लेकिन अब सहयोग के अवसर इससे कहीं ज्यादा व्यापक हैं. इनमें मर्कोसुर से लेकर चिली, पेरू, मेक्सिको और प्रशांत महासागर के किनारे स्थित क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं.
भारत और लैटिन अमेरिका के संबंधों में एक ऐसा पहलू है, जिस पर शायद सबसे कम ध्यान दिया गया है. वह है समुद्री व्यापार के रास्तों को जोड़ना.
अर्जेंटीना से आने वाले जहाज लगभग सीधे रास्ते से आ सकते हैं और एक ही यात्रा में होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर और मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने की जरूरत से बच सकते हैं. ऐसा तब है, जब सभी पक्ष व्यापार में एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करने, वैकल्पिक रास्ते तैयार करने और आपूर्ति व्यवस्था को झटकों के बावजूद मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.
कई पीढ़ियों तक दूसरे देशों के लोगों ने लैटिन अमेरिका को चे, कास्त्रो, अलेंदे, नेरुदा और क्रांति की धरती के रूप में रोमांटिक नजरिए से देखा. लेकिन करीब से देखने पर विचारधारा के ये साफ-सुथरे रंग धुंधले पड़ जाते हैं. उनकी जगह अपराध और वर्ग का अंतर, धर्म और महंगाई, पलायन और बेरोजगारी, संस्थाओं पर अविश्वास और राजनीतिक यादें, करिश्माई नेता और अधीर मतदाता जैसे कई पहलू सामने आते हैं.
हालांकि, ये सभी बदलाव वहां के लोगों को एक बेहतर जिंदगी के लिए अपनी ताकत और अपने फैसले लेने के अधिकार को फिर से मजबूती से सामने रखने के लिए एकजुट भी कर रहे हैं.
स्वस्ति राव ‘दिप्रिंट’ में कंसल्टिंग एडिटर (इंटरनेशनल और स्ट्रैटेजिक अफेयर्स) हैं. वह @swasrao पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.
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