दो हफ्ते पहले, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई करते हुए FSSAI को नुकसानदायक पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी वाले लेबल लागू करने में ढिलाई बरतने के लिए फटकार लगाई. इस जनहित याचिका में ऐसे पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर पैकेट के सामने अनिवार्य चेतावनी लेबल लगाने की मांग की गई थी, जिनमें चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा ज्यादा होती है. कोर्ट ने कहा कि नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट की ज्यादा मात्रा वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के लिए चेतावनी लेबल अनिवार्य करने का FSSAI का विरोध इस सवाल को खड़ा करता है कि कहीं वह कॉरपोरेट कंपनियों के दबाव में तो काम नहीं कर रहा.
कोर्ट ने केंद्र सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि दो हफ्ते के अंदर इस मामले में कार्रवाई हो. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर इसका पालन नहीं किया गया, तो उसे इस मामले में सीधे और खास निर्देश जारी करने पड़ सकते हैं. कोर्ट ने नागरिकों, खासकर बढ़ते बच्चों की सेहत को लेकर चिंता जताई. केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि सख्त चेतावनी लेबल लगाने से नमकीन जैसे पारंपरिक भारतीय स्नैक्स पर भी चेतावनी का लाल निशान लग सकता है, क्योंकि उनमें फैट या नमक की मात्रा ज्यादा होती है. इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी चिंताओं की वजह से सरकार को लोगों में इस बात के प्रति जागरूकता बढ़ाने से पीछे नहीं हटना चाहिए कि वे क्या खा-पी रहे हैं.
प्रेस के कुछ हिस्सों में आई खबरों के मुताबिक, 28 अगस्त को FSSAI ने पैकेज्ड खाने और ड्रिंक्स पर पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव दिया है. नियामक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट, मीडिया और चिंतित नागरिकों के दबाव के आगे झुकते हुए यह कदम उठाया है.
चेतावनी के संकेत क्यों जरूरी हैं
भारत में लंबे समय से स्वस्थ और पौष्टिक खाना बनाने और खाने की परंपरा रही है. हमारी पारंपरिक खाने की थाली में आमतौर पर प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों का संतुलित मिश्रण होता है. इसलिए हमारी डाइट ऐतिहासिक रूप से संतुलित रही है. लेकिन हाल के समय में प्रोसेस्ड फूड का सेवन तेजी से बढ़ा है और बाजार अब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से भर गया है.
खास बात यह है कि बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा बनाए जाने वाले इन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ने बाजार का एक बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया है. वैज्ञानिकों का साफ मानना है कि ये अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कैंसर समेत कई गैर-संचारी बीमारियों (NCDs) को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं. इसके अलावा, कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने और बच्चों को अपने उत्पादों का आदी बनाने के लिए चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की बहुत ज्यादा मात्रा का इस्तेमाल करती हैं.
भारत में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी और लिवर की बीमारियां तेजी से आम हो रही हैं, क्योंकि हमारी डाइट में चीनी, सोडियम और सैचुरेटेड फैट की मात्रा बहुत ज्यादा है. लोगों में पोषण से जुड़ी जागरूकता की कमी और खाने के पैकेट पर चेतावनी लेबल न होने के कारण लोग अनजाने में इन नुकसानदायक चीजों का सेवन करते हैं. यही वजह है कि इन बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं. इन्हें अक्सर “लाइफस्टाइल डिजीज” कहा जाता है.
अगर ऐसे नुकसानदायक खाद्य पदार्थों पर यह चेतावनी लिखी हो कि उनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा तय की गई सीमा से ज्यादा है और वे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हैं, तो ग्राहकों को इनके संभावित नुकसान के बारे में पता चलेगा. वे खाना खरीदते समय सोच-समझकर फैसला कर सकेंगे. यह सच है कि ऐसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की बिक्री कम हो सकती है, क्योंकि ग्राहक उनके अस्वस्थ उत्पादों को खरीदना छोड़ देंगे. लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इसके परिणामस्वरूप लोगों की सेहत बेहतर होगी. खाने की चीजों पर चेतावनी लेबल न लगाना मुनाफे को लोगों की सेहत से ऊपर रखने का साफ मामला है.
इसलिए यह बेहद जरूरी है कि ग्राहकों को बताया जाए कि जो पैकेज्ड खाना वे खा रहे हैं, वह उनकी सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है. दूसरे देशों में, चाहे वहां ऐसे खास चेतावनी लेबल अनिवार्य हों या नहीं, कंपनियों पर ग्राहकों की जागरूकता और नियामक संस्थाओं की सतर्कता और निष्पक्षता के कारण दबाव रहता है. जबकि FSSAI चेतावनी लेबल लागू करने का विरोध करता रहा, स्वतंत्र मीडिया की रिपोर्टों से पता चलता है कि यही कंपनियां दूसरे देशों में अपने उत्पादों के कम नुकसानदायक वर्जन बेचती हैं.
उदाहरण के लिए, रॉयटर्स के मुताबिक, भारत में बिकने वाली Fanta (फैंटा) नाम की सॉफ्ट ड्रिंक में दूसरे देशों में बिकने वाले इसी उत्पाद के मुकाबले तीन गुना ज्यादा चीनी होती है. हाल ही में यह भी सामने आया है कि Nestle की Maggi (मैगी) ब्रिटेन में ज्यादा नमक होने के कारण लाल संकेत के साथ बेची जाती है, जबकि यही उत्पाद यहां बिना ऐसी किसी चेतावनी के बेचा जा रहा है. यह साफ है कि माता-पिता में जागरूकता की कमी के कारण भारत में बच्चे ऐसे खाद्य पदार्थ खाकर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.
यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए FSSAI को फटकार लगाई और सवाल किया कि नागरिकों, खासकर बच्चों की सेहत को लेकर वह इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है.
स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिसर्च साफ तौर पर बताती है कि नुकसानदायक पैकेज्ड फूड के बढ़ते सेवन और गैर-संचारी बीमारियों के बढ़ने के बीच सीधा संबंध है. यह संबंध भारत और दुनिया, दोनों जगह देखा जा रहा है. इन बीमारियों को रोकने का एकमात्र तरीका नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट का जरूरत से ज्यादा सेवन करने से बचना है. लेकिन जब बड़ी और जानी-मानी कंपनियों के ऐसे उत्पाद, जिनमें इन नुकसानदायक चीजों की मात्रा ज्यादा है, बिना किसी चेतावनी के बेचे जाते हैं, तो इन बीमारियों को रोकने की कोशिश में रुकावट पैदा होती है.
FSSAI का HSR पर जोर
चिंतित नागरिकों, वैज्ञानिकों और पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञों की साफ आवाजों को नजरअंदाज करते हुए FSSAI लगातार इस गंभीर स्थिति के प्रति असंवेदनशील बना रहा. अस्वस्थ खाद्य पदार्थों, खासकर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की ज्यादा मात्रा वाले खाद्य पदार्थों (HSSF) पर चेतावनी लेबल लगाने के बजाय, उसने 4 अक्टूबर 2019 को ऑस्ट्रेलिया के हेल्थ स्टार रेटिंग (HSR) मॉडल की जांच शुरू कर दी.
सितंबर 2021 में FSSAI ने 1 से 5 स्टार वाले HSR सिस्टम और उसके पोषण से जुड़े एल्गोरिदम की जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसके बाद नियामक संस्था ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, अहमदाबाद (IIM-A) के साथ एक MoU साइन किया. इसके तहत 15 फरवरी 2022 को भारतीय आबादी के बीच पैकेज्ड फूड के अलग-अलग Front-of-Pack Labels (पैकेट के सामने वाले लेबल) को लेकर उपभोक्ताओं की राय पर एक स्टडी कराई गई, जिसका नाम था Consumer Perceptions of Different Front-of-Pack Labels for Packaged Food among the Indian Population (भारतीय आबादी के बीच पैक्ड फ़ूड के लिए अलग-अलग ‘फ्रंट-ऑफ़-पैक’ लेबल के बारे में उपभोक्ताओं की सोच). बाद में IIM-A ने FSSAI की stakeholders’ meeting में इस स्टडी के नतीजे पेश किए.
FSSAI के दस्तावेजों में कहा गया है कि IIM-A ने HSR की सिफारिश की थी. 20 सितंबर 2022 को FSSAI ने FOPNL यानी Front of Pack Nutrition Labelling (पैकेट के सामने पोषण संबंधी लेबलिंग) को शामिल करते हुए ड्राफ्ट नियम जारी किए.
हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि HSR, IIM-A की स्टडी का नतीजा नहीं था. यह बात ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि बाद में इसी स्टडी का इस्तेमाल HSR के पक्ष में फैसला सही ठहराने के लिए किया गया. उस समय की हितधारकों की बैठकों के रिकॉर्ड के रूप में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जो बताते हैं कि IIM-A को स्टडी का काम दिए जाने से काफी पहले ही FSSAI के नेतृत्व ने HSR शुरू करने का फैसला कर लिया था.
FSSAI ने HSR का प्रस्ताव रखने वाली ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी कीं तो जनता में भारी विरोध हुआ. आलोचकों ने उस समय के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री से संपर्क किया. इस विरोध के कारण HSR लागू करने की प्रक्रिया धीमी हो गई.
इस बीच, मुंबई के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS), जो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था है, ने पांच विकल्पों का परीक्षण किया. इनमें चेतावनी लेबल, HSR और ट्रैफिक-लाइट लेबल शामिल थे. नतीजों में साफ तौर पर यह सामने आया कि अस्वस्थ उत्पादों की पहचान करने के लिए चेतावनी लेबल सबसे बेहतर विकल्प था.
FSSAI की संदिग्ध भूमिका
एक नियामक संस्था के तौर पर FSSAI की जिम्मेदारी है कि वह आम लोगों के हितों की रक्षा करे और उन्हें नुकसानदायक खाने से बचाए. लेकिन उसके असल काम अब तक संतोषजनक नहीं रहे हैं. FSSAI को अच्छी तरह पता था कि कई देशों ने चेतावनी वाले संकेत, ट्रैफिक लाइट लेबल और ऐसी दूसरी व्यवस्थाएं अपनाई हैं, जो ग्राहकों के हितों की रक्षा कर सकती हैं. इसके बावजूद उसने HSR को बढ़ावा देना चुना. लोगों के बीच इस मुद्दे पर काफी बहस होने के बावजूद FSSAI ने चेतावनी वाले लेबल लागू करने का विरोध किया है. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कई शब्दों में FSSAI की भूमिका को संदिग्ध बताया है.
अब जब कोर्ट ने अपना रुख साफ कर दिया है, तो उम्मीद है कि मीडिया के मजबूत दबाव के साथ चेतावनी वाले संकेत अब दूर की बात नहीं रहेंगे. यह भी उम्मीद है कि केंद्र सरकार जनता के हित में कदम उठाएगी और FSSAI के रुख को लेकर फैली गलत जानकारी से आगे बढ़ेगी. यह खास तौर पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के लिए जरूरी है, अगर सरकार यह साबित करना चाहती है कि वह लोगों की सेहत की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है.
दांव बहुत बड़े हैं. अगर अस्वस्थ HSSF खाद्य पदार्थ बिना किसी चेतावनी के बिकते रहे, तो लोगों की सेहत पर गैर-संचारी बीमारियों का बोझ और बढ़ेगा और इसके साथ ही सरकार का पब्लिक हेल्थ पर खर्च भी बढ़ता जाएगा. ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार अब इस मुद्दे पर गंभीर हुई है और उसने FSSAI के विरोध को दरकिनार कर दिया है. अब अगले चरण में FSSAI के अधिकारियों से जवाब मांगा जाना चाहिए कि उन्होंने कॉरपोरेट कंपनियों के हाथों में खेलते हुए जनहित के खिलाफ काम क्यों किया और सरकार की छवि को नुकसान क्यों पहुंचाया?
अश्वनी महाजन स्वदेशी जागरण मंच के नेशनल को-कंवीनर और दिल्ली यूनिवर्सिटी के PGDAV कॉलेज में पहले प्रोफेसर रह चुके हैं. वे @ashwani_mahajan पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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