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Wednesday, 23 September, 2026
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वॉशिंगटन और बीजिंग दोनों के बीच बैलेंस बनाने के लिए भारत को BRICS की ज़रूरत क्यों है?

BRICS के संस्थापक सदस्य के तौर पर भारत के पास दुश्मनी वाले आम सहमति के फैसलों को रोकने और ग्लोबल साउथ में चीन के दबदबे को संतुलित करने के लिए एक अहम वीटो है.

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भारत में ऐसे समय में BRICS शिखर सम्मेलन हुआ है, जब दुनिया में आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत के समीकरणों में बड़ा बदलाव हो रहा है. इसके बाद कुछ टिप्पणीकारों ने सवाल उठाया है कि भारत के लिए इस संगठन में बने रहने का आखिर क्या फायदा है. BRICS अलग-अलग देशों का एक ऐसा समूह है, जो अलग-अलग और कभी-कभी एक-दूसरे से टकराने वाले हितों के साथ बना है. इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार 2001 की Goldman Sachs की एक रिपोर्ट में किया गया था. इसमें कहा गया था कि दुनिया की आर्थिक वृद्धि ब्राजील, रूस, भारत और चीन से आ सकती है. इन चारों देशों से मिलकर BRICs बना था. आज BRICS में 11 सदस्य हैं, जिनमें दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, ईरान, यूएई, इथियोपिया, इंडोनेशिया और मिस्र भी शामिल हैं.

यह आलोचना कुछ हद तक सही है, क्योंकि BRICS देश किसी खास तरह के मूल्यों को नहीं मानते और न ही आर्थिक रूप से एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं. हालांकि, मुख्य आलोचना यह है कि चीन के बिना इस संगठन का बहुत कम मतलब रह जाएगा. अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला का कहना है कि BRICS का आर्थिक प्रदर्शन काफी हद तक चीन का प्रदर्शन है. चीन को इसमें से हटा दें तो BRICS कहीं से भी आर्थिक वृद्धि का इंजन नहीं दिखता. हालांकि, यह भी कहना होगा कि हाल के वर्षों में भारत ने भी कुछ हद तक इस दिशा में कदम बढ़ाया है. भल्ला यह भी कहते हैं कि भारत का भविष्य BRICS के साथ नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप के साथ है. इसमें कोई शक नहीं है कि हमें यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाने की ज़रूरत है, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप जिस तरह भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं और अमेरिकी कांग्रेस ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए भारतीय निर्यात पर शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है, उसे देखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका को कभी भरोसेमंद साझेदार माना जा सकता है. खासकर तब, जब अमेरिका के डीप स्टेट की सोच अब भारत की तेजी से बढ़ने की रफ्तार को धीमा करने और भारत को नियंत्रण में रखने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करने के पक्ष में है. चीन भी ऐसा ही मानता है, हालांकि वह सार्वजनिक तौर पर ऐसा नहीं कहेगा. बड़ी बात यह है कि अमेरिका को सहयोगी नहीं, बल्कि ऐसे देश चाहिए जो उसकी बात मानें. यह बात वह कनाडा और यूरोप के सामने भी साफ कर चुका है.

भारत एशिया में है और चीन इस समय इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत और मैन्युफैक्चरिंग का सुपरपावर है. क्या चीन की भागीदारी बढ़ाए बिना भारतीय मैन्युफैक्चरिंग आगे बढ़ सकती है? क्या अमेरिका हमें पहले जैसी बाजार तक पहुंच देगा, जब वह चीन के खिलाफ एक मजबूत दीवार के तौर पर भारत को तैयार कर रहा था? भारत को चीन और अमेरिका, दोनों बड़ी ताकतों के साथ रास्ता निकालना होगा. उसे दोनों के साथ अपने राष्ट्रीय हित से गंभीर समझौता किए बिना जितने अच्छे सौदे हो सकते हैं, करने होंगे. BRICS में बने रहना ऐसा करने का एक तरीका है.

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की अगुवाई में की जा रही राजनीतिक आलोचना काफी सतही है. चिदंबरम का कहना है कि भारत के BRICS, SCO (Shanghai Cooperation Organisation) या QUAD का हिस्सा होने से कोई ठोस फायदा नहीं हुआ है. उनके हवाले से कहा गया है: “हम BRICS का हिस्सा हैं, हम SCO का हिस्सा हैं, हम G20 का हिस्सा हैं और हम QUAD का हिस्सा हैं. हमें इससे क्या फायदा मिल रहा है? मुझे दिखाई नहीं देता. पिछले दो या तीन शिखर सम्मेलनों में मुझे कोई फायदा नहीं दिखा. इससे पहले BRICS शिखर सम्मेलनों से कुछ ठोस फायदे हुए थे.” (इस पर बहस हो सकती है, क्योंकि एकमात्र ठोस फायदा जुलाई 2014 में New Development Bank का बनना है. यह आगे भी बढ़ता रह सकता है).

आइए इन दोनों आलोचनाओं को लें और देखें कि ये कितनी सही और प्रासंगिक हैं.

पहला भल्ला की बात. इतिहास में संगठनों में किसी एक देश का राजनीतिक या आर्थिक रूप से हावी होना कोई असामान्य बात नहीं है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरुआती वर्षों में गैर-कम्युनिस्ट गुट में अमेरिका ही एकमात्र ऐसा देश था जिसकी सबसे ज्यादा अहमियत थी. पूरा यूरोप और जापान उसके अधीन थे. आज भी अमेरिका सैन्य गठबंधन NATO पर हावी है. इसलिए सिर्फ यह तथ्य कि BRICS में चीन का दबदबा है, इतना बड़ा तर्क नहीं है कि इसकी अहमियत कम कर दी जाए. BRICS चीन को सिर्फ अपने सीमित हितों से आगे सोचने के लिए मजबूर करता है.

दूसरा, जैसे-जैसे चीन की रफ्तार धीमी होगी और उसका निर्यात का इंजन बाकी सभी देशों के लिए समस्या बनेगा, उसके पास व्यापार को संतुलित करने और दूसरे देशों को अपेक्षाकृत आगे बढ़ने का मौका देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. जब अमेरिका व्यापार पर रोक बढ़ा रहा है, तब दुनिया चीन से लगातार आयात नहीं करती रह सकती. चीन को अपने देश में वित्तीय दबाव कम करना होगा और आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के लिए घरेलू खपत बढ़ानी होगी. ऐसे समय में भारत जैसे देश चीन की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ना शुरू कर सकते हैं. हालांकि, चीन का विशाल आधार होने की वजह से अगले एक दशक या उससे ज्यादा समय तक उसकी कुल आर्थिक वृद्धि का आकार भारत से बड़ा हो सकता है. BRICS में भारत की मौजूदगी ही संगठन को SCO जैसे चीन के दबदबे वाले मंच से अलग बनाती है. भविष्य में BRICS को ज्यादा प्रासंगिक बनाने के लिए भारत को अपने पत्ते अच्छी तरह से खेलने होंगे, लेकिन यह धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रिया होगी.

तीसरा, कभी-कभी किसी संगठन में इसलिए भी शामिल हुआ जाता है ताकि उसे किसी खतरे में बदलने से रोका जा सके. अगर भारत BRICS में नहीं होता तो पाकिस्तान को इसमें आसानी से जगह मिल जाती और एक बार ऐसा होने के बाद भारत के बिना आम सहमति बनाना आसान होता. मौजूदा वैश्विक स्थिति में, भले ही ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे विरोधी देशों के बीच BRICS में जगह है, फिर भी हम किसी तरह की आम सहमति वाली घोषणा कर पाने में सफल रहे हैं. पाकिस्तान के अंदर होने पर यह काम ज्यादा मुश्किल होता, क्योंकि पाकिस्तान का अस्तित्व ही भारत के खिलाफ खड़े होने के उद्देश्य पर टिका है. अब BRICS के संस्थापक सदस्य के तौर पर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि पाकिस्तान को जितना संभव हो सके, उतने लंबे समय तक इससे बाहर रखा जाए.

चौथा, चिदंबरम के इस तर्क पर आते हैं कि BRICS में रहने से कोई ठोस फायदा नहीं हुआ. हमें इस बात से सहमत होना होगा, लेकिन एक शर्त के साथ. ऐसी दुनिया में जहां दो अंतहीन युद्धों में ज्यादा से ज्यादा देश शामिल होते जा रहे हैं और वैश्वीकरण पीछे जा रहा है, वहां “ठोस” नतीजे आने में समय लगता है और ये छोटे-छोटे हिस्सों में सामने आ सकते हैं. BRICS के ज्यादातर देश अमेरिका की डॉलर और वैश्विक मंचों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता को कम करना चाहते हैं. हालांकि, कुछ देश, जैसे भारत और ब्राजील, डी-डॉलराइजेशन के पक्ष में नहीं हैं. भारत यह भी नहीं चाहेगा कि डॉलर की जगह युआन की व्यवस्था आ जाए. ठोस बदलाव पहले दो देशों के बीच होंगे, जहां राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार होगा. इसके बाद इसकी जगह संभवत: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की Special Drawing Rights जैसी ज्यादा तटस्थ मुद्रा ले सकती है. कुछ देश युआन की व्यवस्था को भी पसंद कर सकते हैं, जबकि दूसरे सभी तीन विकल्प खुले रखना पसंद कर सकते हैं: डॉलर, युआन या राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार.

मुख्य बात यह समझने की है कि भू-राजनीतिक रूप से भारत को कमजोर स्थिति मिली है और हम इस स्थिति से कैसे निकलते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने पत्ते कैसे खेलते हैं. पश्चिमी गुट वित्त, बाजार तक पहुंच, शुल्क और मानवाधिकारों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करके हमें अपनी बात मानने के लिए मजबूर करना चाहेगा. चीन अपनी मैन्युफैक्चरिंग ताकत और दुर्लभ खनिजों पर नियंत्रण का इस्तेमाल दुनिया को अपनी बात मानने के लिए मजबूर करने के लिए करना चाहेगा. इन गुटों से बाहर दुनिया में दो बड़े वैश्विक धार्मिक समूह हैं, ईसाई और इस्लामी, जो भारत को धर्म परिवर्तन के लिए सबसे बड़ी संभावित आबादी के तौर पर देखते हैं.

इसलिए कई देश धर्म को भी हमारे खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेंगे.

जब भारत के बाजार के लिए व्यापार या धार्मिक विस्तार के मकसद से दूसरे देशों के आक्रामक विचारों के बीच मुकाबला हो रहा हो, तब यह मायने रखता है कि भारत अपने विकल्प बढ़ाने के लिए क्या करता है. अब भारत के सामने देश के भीतर सुधार करने और दुनिया का सामना करने के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक सहमति बनाने के अलावा कोई आसान विकल्प नहीं बचा है.

जैसा कि पहले बताया गया है, भारत मुश्किल भौगोलिक स्थिति में है और उसे खेलने के लिए कमजोर स्थिति मिली है. हमें अपने पत्तों का सबसे अच्छा इस्तेमाल करना होगा. चीन के दबदबे की वजह से BRICS को छोड़ना या उसे नजरअंदाज करना सही कदम नहीं होगा. हमें इसके अंदर बने रहना होगा और चुपचाप अपनी लड़ाइयां लड़नी होंगी, साथ ही अपनी ताकत बढ़ानी होगी.

आर.जगन्नाथन स्वराज्य पत्रिका के संपादक और पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. उनका एक्स हैंडल @TheJaggi है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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