संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA अब एक कूटनीतिक मंच से कम और एक राजनीतिक टीवी कॉमेडी शो जैसी ज्यादा लगने लगी है. देश इसके बनाए नियमों को किनारे कर देते हैं, राजनयिक बहस करते हैं कि यह संस्था खत्म हो चुकी है या नहीं, और देशों के नेता अपने फैसलों और कार्रवाइयों का जोरदार बचाव करते हुए भाषण देते हैं. कूटनीति में गिरावट के बीच UNGA में ड्रामा की कोई कमी नहीं है. इस बार के सत्र में भी इसकी भरपूर झलक देखने को मिली.
गुरुवार को जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने के लिए मंच पर पहुंचे, तो 100 से ज्यादा UN प्रतिनिधि अपनी सीटों से उठकर महासभा के हॉल से बाहर चले गए. लगातार दूसरे साल ऐसा हुआ. उन्होंने उन्हें “नैतिक रूप से कायर” कहा. बाद में उनके भाषण में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी, अमेरिकी-तुर्की राजनीतिक टिप्पणीकार हसन पिकर और लेबनान में बम धमाके करने के लिए इजरायल द्वारा पेजर के इस्तेमाल का भी जिक्र आया. तालियों और समर्थन से ज्यादा हूटिंग सुनाई दी. इससे भी ज्यादा विडंबना यह रही कि पाकिस्तान समेत कुछ प्रतिनिधि बाहर चले गए, लेकिन बाद में किनारे खड़े होकर उनका भाषण सुनते रहे.
सोशल मीडिया पर ईरान ने उन्हें “डार्क लॉर्ड” कहकर दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला बताया. घाना में ईरान के दूतावास के X अकाउंट ने उनकी तुलना “वोल्डेमॉर्ट” से की और भाषण के बीच बाहर चले गए इजरायल के सहयोगी देशों को “डेथ ईटर्स” बताया. एक पत्रकार ने X पर मजाक में लिखा कि UNGA अब मिलेनियल्स जैसा हो गया है.
नेतन्याहू के भाषण के आसपास हुआ यह ड्रामा शायद उस पूरे हफ्ते का सबसे साफ दिखाई देने वाला पल था. यह हफ्ता भाषणों से जितना भरा हुआ था, उतना ही इस बात की याद दिलाने वाला भी था कि यहां जमा हुए देशों के बीच सहमति कितनी कम है.
महासभा का 81वां सत्र इस हफ्ते “भरोसा बहाल करना, बदलाव को संभालना. ऐसी संयुक्त राष्ट्र संस्था जो सभी के लिए काम करे” थीम के साथ शुरू हुआ. इस समय यह वाक्य कुछ उदास सा लगता है, क्योंकि संस्था ठीक उसी चीज को साबित करने में संघर्ष कर रही है कि वह अभी भी कुछ करवा सकती है.
गाजा, यूक्रेन और ईरान में हुए युद्धों ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अंदर मौजूद मतभेदों को सामने ला दिया है. सुरक्षा परिषद अपने सबसे ताकतवर सदस्यों के आपसी हितों और वीटो के कारण सीमित बनी हुई है. महासभा प्रस्ताव पास कर सकती है, लेकिन वे बाध्यकारी नहीं होते. और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस इस साल के अंत में अपना पद छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं.
UNGA में हुई बहसों के इर्द-गिर्द चाहे जितना ड्रामा रहा हो, वह इस हफ्ते दिप्रिंट के “न्यूजमेकर ऑफ द वीक” के तौर पर अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा.
कम कूटनीति, ज्यादा ड्रामा
महासभा ने अपने हिस्से के कई यादगार प्रदर्शन देखे हैं. 2006 में जॉर्ज बुश ने इराक युद्ध और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ती चिंता के बीच भाषण दिया था. अगले दिन वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज मंच पर आए और कहा कि उन्हें अभी भी उस “शैतान” की गंध आ रही है, जो एक दिन पहले वहां बोलकर गया था.
तीन साल बाद मुअम्मर गद्दाफी महासभा में अपना पहला और आखिरी भाषण देने पहुंचे. उन्होंने करीब डेढ़ घंटे तक भाषण दिया, जबकि आम तौर पर भाषण के लिए 15 मिनट की सीमा होती है. आखिरकार दुभाषिए को भी उनके साथ तालमेल बनाए रखने में परेशानी होने लगी.
भूरे रंग का चोगा पहने और छाती पर अफ्रीका का एक बड़ा काला नक्शा लगाए गद्दाफी ने अपने भाषण में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में मौजूद असमानताओं पर हमला किया, जैसा कि वह उन्हें देखते थे.
चेहरे और व्यक्तित्व बदल गए हैं. लेकिन माहौल साफ तौर पर नहीं बदला है. ट्रंप ने जिस दिन भाषण दिया, उस दिन सुर्खियों पर उनका दबदबा रहा. उन्होंने धमकी दी कि अगर ईरान वॉशिंगटन के साथ समझौता करने में नाकाम रहा तो उसका “पूरी तरह विनाश” कर दिया जाएगा.
वेनेजुएला की बात करते हुए उन्होंने “जीतने वाले को लूट का माल मिलता है” वाला मुहावरा भी इस्तेमाल किया. जनवरी में उन्होंने वेनेजुएला के नेता का अपहरण किया था. उनकी यह भाषा उस संस्था के मूल उद्देश्य के बिल्कुल उलट थी. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में दो विश्व युद्धों के बाद हुई थी. इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें अंतरराष्ट्रीय विवादों को केवल सैन्य ताकत के जरिए नहीं, बल्कि सामूहिक नियमों के जरिए संभाला जा सके.
लेकिन महासभा के अंदर जिस दुनिया का प्रतिनिधित्व होता है, वह अब तेजी से ऐसी दुनिया बनती जा रही है जहां ये नियम ताकतवर देशों के हितों से टकराते हैं.
क्या UN खत्म हो चुका है
संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. लेकिन ट्रंप के दौर में वॉशिंगटन और इस संस्था के रिश्ते लगातार मुश्किल होते गए हैं. UN में ट्रंप की पहली मौजूदगी के दौरान 2.0 में खराब एस्केलेटर और टेलीप्रॉम्प्टर की समस्याओं को लेकर शिकायतें सामने आई थीं.
अब यह पूछने के बजाय कि UN क्या कर सकता है, बहस तेजी से इस सवाल की तरफ जा रही है. क्या UN खत्म हो चुका है. 2026 के एक भाषण में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी मार्क मैलॉक-ब्राउन ने कहा कि यह संस्था “जिंदा लाश” की तरह है. उनका तर्क था कि ताकतवर देश अक्सर संयुक्त राष्ट्र को किनारे कर देते हैं और उसके अधिकार की परवाह किए बिना काम करते हैं.
फिर दक्षिण एशिया की बात आती है. नेपाल के अलग तरह के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने अपने भाषण में भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा से हुई तबाही का जिक्र किया और इसे हिमालयी क्षेत्र की कमजोर स्थिति से जोड़ा. रैपर से प्रधानमंत्री बने शाह ने कहा, “हमने युद्ध के लिए बेहतरीन लॉजिस्टिक्स वाली दुनिया बनाई है और खाने के लिए टूटी हुई लॉजिस्टिक्स वाली दुनिया.” अपने देश में उन्होंने अभी तक कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है और न ही संसद में भाषण दिया है.
बांग्लादेश के तारिक रहमान ने बांग्ला में भाषण दिया. उन्होंने कहा कि उनका देश 2024 में उस चीज से आजाद हुआ जिसे उन्होंने “फासीवादी शासन” कहा और अब “रिकवरी, रिस्टोरेशन और रिकंस्ट्रक्शन” यानी सुधार, बहाली और पुनर्निर्माण की तीन हिस्सों वाली रणनीति पर काम कर रहा है.
इन सबके बीच UN अब उन्हीं MUN यानी Model United Nations सिमुलेशन जैसा लगता है, जिन्हें उसने खुद बनाया था. बहुत सारी बातें और कोई ठोस काम नहीं.
यह संस्था अब भी युद्ध, विस्थापन, जलवायु परिवर्तन, गरीबी और मानवाधिकारों पर चर्चा करने के लिए दुनिया की सबसे दिखाई देने वाली जगह है. लेकिन संकट जितना बड़ा होता जा रहा है, इसकी व्यवस्था की सीमाएं उतनी ही साफ दिखाई दे रही हैं.
नतीजा एक तरह का कूटनीतिक चक्कर है. हर कोई बोल रहा है, हर कोई देख रहा है, लेकिन खुद यह संस्था तेजी से उन सबसे महत्वपूर्ण पक्षों को एक राय पर लाने में असमर्थ दिखाई दे रही है, जिनके फैसलों का सबसे ज्यादा असर पड़ता है.
विचार निजी हैं.
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