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Saturday, 6 June, 2026
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असम UCC को विधानसभा से ज्यादा अदालत में क्यों झेलने पड़ सकते हैं सवाल

असम का UCC किसी अंतिम समाधान से ज्यादा एक कानूनी बहस की शुरुआत जैसा है.

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पिछले हफ्ते असम विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) 2026 पास होने के बाद एक सवाल उठता है, जो राजनीतिक बहस और शोर-शराबे से आगे जाता है: क्या यह कानून कानूनी रूप से मजबूत है? अगर बिल को ध्यान से देखा जाए, तो यह कई विरोधाभासों से भरा दिखाई देता है. इसके घोषित लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी और प्रगतिशील हैं, लेकिन इसकी संरचना उन्हीं छूटों और मान्यताओं से कमजोर होती दिखती है, जिन पर यह आधारित है.

इतने व्यापक असर वाले कानून को ध्यान से पढ़ने की जरूरत है. बिल का गहराई से अध्ययन कई ऐसे सवाल उठाता है, जो विधानसभा से निकलकर अदालत तक पहुंचने पर और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे.

सरकार ने इस बिल का आधार संविधान के अनुच्छेद 44 को बनाया है, जो राज्य को यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में काम करने का निर्देश देता है. प्रतीकात्मक रूप से यह सही आधार लगता है, लेकिन अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है. इसका मतलब है कि अदालतें इसके पालन को अनिवार्य नहीं बना सकतीं और केवल इसके आधार पर ऐसे कानून को सही नहीं ठहरा सकतीं, जिसका संबंध मौलिक अधिकारों से हो. असली सवाल यह है कि क्या यह कानून संविधान के भाग-3 के तहत जांच में खरा उतर पाएगा?

इसके साथ एक और कानूनी जटिलता भी है. इस विषय पर राज्य की कानून बनाने की शक्ति समवर्ती सूची की एंट्री 5 से आती है, जिसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषय शामिल हैं, लेकिन संविधान का अनुच्छेद 254 कहता है कि अगर किसी विषय पर पहले से केंद्रीय कानून मौजूद है और राज्य का कानून उससे टकराता है, तो राज्य का कानून प्रभावहीन हो सकता है.

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 इसी क्षेत्र से जुड़े केंद्रीय कानून हैं. ऐसे में, अगर इस बिल को इन कानूनों पर प्राथमिकता देने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली है, तो इसके रोजमर्रा के लागू होने की कानूनी स्थिति पर सवाल खड़े हो सकते हैं.

लिव-इन रजिस्ट्रेशन का प्रावधान

लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन इस कानून का सबसे ज्यादा चर्चा और कानूनी जांच का विषय बना है. जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक फैसले के बाद, निजता (प्राइवेसी) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है. ऐसे में किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में दखल देने से पहले सरकार को यह साबित करना होता है कि उसका कदम कानूनी, जरूरी और अनुपातिक (प्रोपोर्शनल) है.

यहीं पर इस बिल की स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है. लिव-इन रिलेशनशिप अपनी प्रकृति में दो वयस्कों के बीच का एक निजी संबंध होता है. इसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाने के लिए सरकार को यह दिखाना होगा कि इससे जुड़ा कोई ऐसा सार्वजनिक हित है, जिसे किसी कम दखल देने वाले तरीके से पूरा नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट पहले ही एस. खुशबू बनाम कन्नीअम्मल (2010) मामले में मान चुका है कि ऐसे रिश्ते व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं. अनिवार्य रजिस्ट्रेशन इस स्वतंत्रता को एक तरह से लाइसेंस प्राप्त स्थिति जैसा बना देता है और अदालतें इस अंतर को हल्के में नहीं लेंगी. इस प्रावधान को अदालत में चुनौती दिए जाने की पूरी संभावना है. सरकार इस नियम को अनुपातिकता (प्रोपोर्शनैलिटी) के आधार पर कितना बचा पाएगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है.

असम के अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय को इस कानून से पूरी तरह बाहर रखना संवैधानिक रूप से सही माना जा सकता है, लेकिन केवल अलग से देखने पर. अनुच्छेद 342 और पांचवीं व छठी अनुसूची आदिवासी परंपरागत कानूनों को विशेष सुरक्षा देती हैं, और सरकार का इसे स्वीकार करना उचित है.

लेकिन समस्या यह है कि यह छूट बिल के उस घोषित उद्देश्य से मेल नहीं खाती, जिसमें कहा गया है कि “सभी नागरिकों के लिए एक कानून” बनाया जाएगा. जब कोई कानून राज्य के हर आठ में से एक व्यक्ति पर लागू ही नहीं होता, तो एक सीधा सवाल उठता है.

इससे भी बड़ा सवाल समानता का है. अनुच्छेद 14 सिर्फ यह नहीं कहता कि समान मामलों में समान व्यवहार हो, बल्कि यह भी ज़रूरी है कि किसी भी वर्गीकरण का कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध हो. अगर कानून का उद्देश्य लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) और कानूनी समानता है, तो आदिवासी महिलाओं को इन सुरक्षा प्रावधानों से बाहर रखने के लिए सिर्फ राजनीतिक कारण पर्याप्त नहीं माने जा सकते.

अदालत यह सवाल पूछ सकती है कि यह छूट आदिवासी महिलाओं की रक्षा कर रही है या फिर उन्हें सुधार के दायरे से बाहर छोड़ रही है. सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह इस सवाल का जवाब पहले से तैयार रखे.

जहां बिल की स्थिति ज्यादा मजबूत है

बहुविवाह (पॉलीगैमी) पर रोक और इसके लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत सजा का प्रावधान पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर आधारित है.

सुप्रीम कोर्ट ने सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995) और लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000) मामलों में साफ कहा था कि इस मामले में धार्मिक व्यक्तिगत कानून किसी को आपराधिक कार्रवाई से छूट नहीं देते. यह बिल का वह हिस्सा है जो संवैधानिक चुनौती के बावजूद सबसे ज्यादा टिकने की संभावना रखता है. कई मायनों में यह बिल का सबसे मजबूत कानूनी प्रावधान है.

इसी तरह अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर चुनौतियां आना लगभग तय है, लेकिन उन्हें साबित करना आसान नहीं होगा.

स्थापित कानूनी सिद्धांत यह अंतर करता है कि क्या वास्तव में धार्मिक प्रथा है और क्या धार्मिक समारोहों के नागरिक प्रभाव हैं. विवाह का रजिस्ट्रेशन और उत्तराधिकार के नियम अदालतों की नजर में आम तौर पर आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का हिस्सा नहीं माने जाते. असम का UCC किसी अंतिम निष्कर्ष से ज्यादा एक कानूनी बहस की शुरुआत जैसा है.

बहुविवाह पर रोक वाला प्रावधान मजबूत है. लेकिन लिव-इन रजिस्ट्रेशन, अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट और अनुच्छेद 254 से जुड़े अनसुलझे सवाल यह दिखाते हैं कि यह कानून अभी भी कई मायनों में अधूरा है.

अगर इसे अदालत में चुनौती दी जाती है, तो अंतिम फैसला अदालतों के हाथ में होगा. और फिलहाल संकेत यही हैं कि अदालतों के पास इस पर कहने के लिए काफी कुछ हो सकता है.

लेखक वकील हैं और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में पूर्व सहायक प्रोफेसर रह चुके हैं. वह ‘चिकन-नेक’ पॉडकास्ट के होस्ट भी हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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