आर्कटिक की सर्दियों के कभी न खत्म होने वाले अंधेरे के बीच, आठ मीटर नीचे गर्म पानी के शॉवर, फ्लश वाले टॉयलेट और एक कैफेटेरिया था जहां स्टेक और आइसक्रीम की दोगुनी मात्रा परोसी जाती थी. 1959 में उत्तरी ग्रीनलैंड की बर्फ़ की चादर में काटी गई 21 सुरंगें बढ़कर 1,25,000 वर्ग किलोमीटर का एक गुप्त शहर बनने वाली थीं, जिसमें सोवियत संघ की तरफ़ तने सैकड़ों परमाणु मिसाइलें रखी जानी थीं. सतह पर 200 किलोमीटर प्रति घंटे से भी तेज़ हवाएं चल रही थीं और तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस से नीचे गिर गया था, तब भी बर्फ़ के इस शहर को बिजली देने वाला पोर्टेबल PM2A परमाणु रिएक्टर यह पक्का करता था कि अंदर हमेशा गर्मी का मौसम रहे.
एक आगंतुक ने दर्ज किया, “एक मील मोटे ग्लेशियर के अंदर की ज़िंदगी अमेरिका, कनाडा या ब्रिटेन के कई छोटे कस्बों की ज़िंदगी से बहुत अलग नहीं है”: भले ही वे कस्बे परमाणु युद्ध में तबाह हो जाएं, सभ्यता बर्फ़ के नीचे ज़िंदा रहेगी.
लेकिन एक छोटी सी अड़चन थी: डेनमार्क के 1957 के चुनाव में जीतने वाले सोशल डेमोक्रेटिक गठबंधन ने लिखित में वादा किया था कि वह अपनी ज़मीन पर परमाणु हथियार तैनात नहीं होने देगा. यह फ़ैसला उसी साल की शुरुआत में सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन की दी गई धमकी के बाद आया था: “डेनमार्क जितने बड़े देशों के लिए, विदेशी ताक़तों को अड्डे बनाने की गुंजाइश देने का मतलब, परमाणु युद्ध छिड़ने की सूरत में, ख़ुदकुशी के बराबर होगा.”
पिछले हफ़्ते, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर महीनों से चल रहे अपने टकराव को एक ऐसे नए समझौते पर इतराते हुए ख़त्म किया, जिसे वे ऐतिहासिक बता रहे हैं, तब यूरोप के नेता उन बहुत बड़े जोखिमों को याद कर रहे थे, जो तब उठाए गए थे जब शीत युद्ध उनकी सरहदों पर उतरना शुरू हुआ था.
इस डर से कि यूरोप में परमाणु हथियारों की तैनाती को लेकर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के उसके साथी देश साथ छोड़ सकते हैं, अमेरिकी विदेश विभाग ने डेनमार्क में अपने राजदूत को प्रधानमंत्री हैंस क्रिश्चियन हैनसन से मिलने का आदेश दिया.
हैनसन ने जवाब दिया कि उन्होंने “ग्रीनलैंड के रक्षा इलाकों में एक ख़ास क़िस्म के गोला-बारूद का सामान रखे जाने की संभावना” के बारे में सुना ज़रूर था, फिर भी डेनमार्क सरकार के सामने कोई ठोस योजना नहीं रखी गई थी और न ही उससे उसका रुख़ पूछा गया था. वैसे भी, अमेरिका अपने अड्डों पर जो भी उपकरण रखना चाहे, उसे “बिना जाँच के ग्रीनलैंड में आने की इजाज़त” थी.
हैनसन दरअसल यह कह रहे थे कि जब तक उन्हें कुछ बताया नहीं जाता, तब तक वे ग्रीनलैंड में अमेरिकी अड्डों पर परमाणु मिसाइलें तैनात होने देने और सोवियत ग़ुस्से का जोखिम उठाने को तैयार थे.
नए शब्द, पुरानी जंगें
ग्रीनलैंड के नए समझौते का पाठ जारी नहीं किया गया है, लेकिन अधिकारियों ने कहा है कि इससे अमेरिका को “स्थायी पहुंच, अड्डे बनाने और ऊपर से उड़ान भरने के अधिकार” मिलते हैं, और साथ ही “अतिरिक्त सैन्य ढांचे बनाने की एकतरफ़ा ताक़त” भी. माना जा रहा है कि समझौते में ऐसे प्रावधान भी हैं जो अमेरिका के दुश्मनों, जैसे चीन या रूस, को ग्रीनलैंड में सैनिक तैनात करने या रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश करने से रोकते हैं. ट्रंप ने दावा किया कि इस समझौते से अमेरिका अपनी सुरक्षा की चिंताओं को “अमेरिका को बिना किसी लागत के” दूर कर सकता है.
यह सब एक बड़ी जीत होती, अगर यह 1951 में ही पहले जीती न जा चुकी होती. सोशल मीडिया पर कुछ पल की डींग हांकने के लिए, ट्रंप ने पीढ़ियों में बने भरोसे पर हथौड़ा चला दिया है.
1951 की ग्रीनलैंड रक्षा संधि ने अमेरिका को तय किए गए रक्षा इलाकों के ऊपर हवाई क्षेत्र और जहाज़ों के ठहरने की जगह पर कंट्रोल का हक़ दिया. इस बादशाहत ने अमेरिकी सैन्यकर्मियों पर अपने कानून लागू करने और उनसे टैक्स वसूलने का अपना हक़ भी छोड़ दिया. संधि तब तक लागू रहनी थी जब तक उत्तर अटलांटिक संधि लागू रहती थी, जिसकी कोई ख़त्म होने की तारीख़ नहीं थी. डेनमार्क में विदेशी निवेश की सुरक्षा जांच करने वाले कानून 2021 में लागू किए गए. ग्रीनलैंड ने तीन साल बाद ऐसा ही कानूनी ढांचा बनाने पर काम शुरू किया.
नवंबर 1945 से ही, यानी दूसरे विश्व युद्ध के ख़त्म होने के आठ हफ़्ते बाद, अमेरिकी युद्ध योजनाकारों ने सोवियत सैन्य क्षमताओं के गहरे अध्ययन के हिस्से के तौर पर अपने परमाणु युद्ध के सिद्धांत के पहले मसौदे तैयार करने शुरू कर दिए थे. ये शुरुआती कोशिशें 1946 तक ठोस शक्ल ले चुकी थीं, जब जॉइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ के लिए बनी एक योजना ने, जिसमें अमेरिका के परमाणु भंडार को बढ़ाने की सिफ़ारिश की गई थी, यह नतीजा निकाला कि परमाणु हथियार “किसी भी देश की सैन्य कोशिश को बेअसर कर सकते हैं और उसके सामाजिक और आर्थिक ढांचों को तहस-नहस कर सकते हैं.”
अमेरिका का परमाणु भंडार छोटा था, जो 1945 में नौ वॉरहेड से बढ़कर 1948 में 56 हो गया था, लेकिन देश के नेतृत्व का मानना था कि यह संख्या में पश्चिम की कमी को बराबर करने का एक ज़रिया है. ग्रीनलैंड और आइसलैंड परमाणु डराकर रोकने की ताक़त के अहम हिस्से थे. बहुत कम विमान अटलांटिक पार उड़ सकते थे, और ध्रुवीय रास्तों पर ईंधन भरने के अड्डों की ज़रूरत थी. उन्हीं रास्तों से सोवियत पनडुब्बी बेड़े की निगरानी भी मुमकिन होती थी.
फ़रवरी 1948 में चेकोस्लोवाकिया में हुए तख़्तापलट, और उसके बाद पश्चिमी बर्लिन की नाकेबंदी ने, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन को यक़ीन दिला दिया कि सोवियत संघ का सामना करना ही होगा. उस गर्मी में उन्होंने यूरोप में B-29 बमवर्षक विमान भेजे, जो अमेरिका के साथी देशों की रक्षा के लिए परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की रज़ामंदी का एलान था.
यूरोपीय लोग परमाणु डराकर रोकने के उभरते सिद्धांत की समझदारी से हर जगह क़ायल नहीं थे. अमेरिका का मानना था कि NATO के साथी देशों की ज़मीन पर परमाणु हथियार तैनात करने से डराकर रोकने की ताक़त मज़बूत होगी. लेकिन डेनमार्क और नॉर्वे दोनों को यह सच्चा ख़तरा लगता था कि उनकी ज़मीन पर तैनात परमाणु हथियार हमले को न्योता दे सकते हैं. इसके बाद बातचीत का एक पेचीदा सिलसिला चला, जिसमें ग्रीनलैंड में एक अपवाद निकाला गया: डेनमार्क की संप्रभुता की भाषा द्वीप पर अमेरिका के रक्षा इलाकों पर लागू नहीं होगी.
थोक का साम्राज्य
आर्कटिक का यह स्वर्ग दरअसल शीत युद्ध से बहुत पहले ही ख़रीदने की कोशिश का निशाना बन चुका था: एक अड़े हुए ख़रीदार की ब्रोशर में दर्ज था कि यहां का समुद्र “व्हेल, वालरस, सील और शार्क, कॉड, आइवरी-कॉड, सैल्मन, सैल्मन-ट्राउट और हेरिंग; लोमड़ियों, भेड़िये, रेनडियर, भालू, खरगोश, अनगिनत पक्षियों, जिनमें किंग डक, आइडर डक, डॉर्सकिन, पेट्रल, गल, ब्रेंट, बर्गोमास्टर, गूज़, किलीवोक, लोलार्ड और सी स्वैलो शामिल हैं,” से भरा पड़ा था.
ज़्यादातर मार्केटिंग सामग्री की तरह, इस पाठ ने भी हक़ीक़त से थोड़ा आगे दौड़ लगा दी थी: “किलीवोक,” जो शायद किवियाक की ग़लत वर्तनी है, ख़मीर उठाए गए समुद्री पक्षियों से बना एक पकवान था, कोई जंगली जानवर की क़िस्म नहीं. हाँ, यह सच था कि यहां एक व्यापारी बेड़े को चलाने भर का कोयला था और यूरोप से पूर्वी एशिया तक बेरिंग जलडमरूमध्य के पार गर्मियों के रास्ते थे.
ट्रंप और रेयर-अर्थ धातुओं की लॉबी करने वालों के इस विचार को आगे बढ़ाने से बहुत पहले, अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवर्ड ने, जो 72 लाख डॉलर में अलास्का की ख़रीद के पीछे की ताक़त थे, तय कर लिया था कि आइसलैंड और ग्रीनलैंड को अमेरिकी साम्राज्य में जोड़ा जाना चाहिए.
सीवर्ड और दूसरे अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए उनकी दलील अजेय थी, और इसकी वजह वहां के जंगली जानवर नहीं थे. अमेरिकी नौसेना की ताक़त उस इलाके को बगल से घेर सकती थी, जिसे 1868 के एक सरकारी प्रकाशन ने ब्रिटिश अमेरिका कहा था, यानी वह इलाका जो एक साल पहले कनाडा बना था. ट्रंप की तरह सीवर्ड का भी मानना था कि कनाडा के पूर्वी तट से लगे इलाके पर कंट्रोल से उसके लिए “शांति से और ख़ुशी-ख़ुशी अमेरिकी संघ का हिस्सा बनने के प्रलोभन बहुत बढ़ जाएंगे.”
लेकिन अमेरिका में बहुत कम लोग ख़रीदने को उत्सुक थे. दिक़्क़त यह थी कि अमेरिकी नहीं चाहते थे कि उनके टैक्स का पैसा उस चीज़ को ख़रीदने में लगे, जिसे अख़बार पोलर बेयर गार्डन, आइस-बॉक्स, या उससे भी बेरहमी से सीवर्ड की मूर्खता कहने लगे थे. अलास्का में सोने और तेल की खोज अभी दशकों दूर थी.
यह विचार ग़ायब नहीं हुआ. 1910 में डेनमार्क में अमेरिका के राजदूत मॉरिस ईगन ने इलाकों की अदला-बदली का प्रस्ताव रखा, जिसमें यूरोपीय रियासत श्लेस्विग-होलस्टाइन डेनमार्क को लौटा दी जाती, और बदले में फ़िलीपींस के कुछ द्वीपों का एक समूह, जो अमेरिका जर्मनी को दे देता. फिर 1940 में जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला कर दिया. अमेरिका ने जवाब में ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया और यह दावा किया कि द्वीप मनरो सिद्धांत के दायरे में आता है, जो अमेरिका की वह घोषणा है जो पश्चिमी गोलार्ध में किसी भी विदेशी रणनीतिक मौजूदगी को मना करती है.
20वीं सदी में दुश्मन एक से ज़्यादा बार बदले, लेकिन भूगोल नहीं बदला. सवाल यह था कि अटलांटिक पार के गठबंधन के नेता अपने साझा हितों की रक्षा के लिए आपस में टकराते मक़सदों और मूल्यों में तालमेल कैसे बिठा सकते थे.
दोस्त और प्रेमी
हालांकि भूगोल बदल रहा है, और यही बदलाव ग्रीनलैंड की बढ़ती रणनीतिक अहमियत की बुनियाद है. इस सदी के बीच से पहले ही आर्कटिक के समुद्री रास्ते पूरे साल बर्फ़ से मुक्त हो जाएंगे, जिससे चीन, रूस और अमेरिका के पश्चिमी तट के बंदरगाहों के बीच तेज़ रास्ते खुलेंगे. 1959 में बना बर्फ़ का शहर दो दशकों के अंदर छोड़ देना पड़ा, क्योंकि खिसकती बर्फ़ की चादर के बहुत बड़े दबाव ने सुरंगों को कुचल दिया.
ग्रीनलैंड की बर्फ़ की चादरों के पिघलने से रेयर-अर्थ धातुओं और हाइड्रोकार्बन की खुदाई कारोबारी तौर पर फ़ायदेमंद हो जाएगी. सवाल यह है: क्या अपने हितों की रक्षा करने और नई क्षेत्रीय व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका को ग्रीनलैंड पर संप्रभुता जताना सचमुच ज़रूरी था?
अटलांटिक पार के रिश्ते की कहानी हमें एक सीधा जवाब देती है. पूरे शीत युद्ध के दौरान डेनमार्क के नेतृत्व ने NATO और अमेरिका के साथ अपने रिश्ते को बचाने और पालने के लिए असाधारण हद तक कोशिशें कीं.
1968 में थूले के पास समुद्र में एक B-52 बमवर्षक के गिरने के बाद, जिससे उसके चार परमाणु बमों से रेडियोधर्मी पदार्थ का एक बादल बर्फ़ से घिरे बंदरगाह पर फैल गया, अमेरिका ने ग्रीनलैंड को परमाणु-मुक्त इलाका बनाने की मांगों को मान लिया. इसकी एक वजह यह भी थी कि परमाणु पनडुब्बियों और बैलिस्टिक मिसाइलों ने पारंपरिक बमवर्षकों को बेमतलब बना दिया था. अपनी तरफ़ से डेनमार्क के अधिकारियों ने ऐसी भाषा पर हामी भरी जो कुछ हालात में परमाणु हथियारों को ग्रीनलैंड में वापस आने देती.
वॉशिंगटन और कोपेनहेगन दोनों के नेता समझते थे कि उनका गठबंधन एक बुनियादी हित पर टिका है: सोवियत संघ के ख़िलाफ़ अपनी रक्षा करने की ज़रूरत. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें पेचीदा समझौते करने पड़े, कभी-कभी झूठ और धोखे का सहारा भी लेना पड़ा. फिर भी हल मुश्किल से कमाए भरोसे से निकले, डींगे हांकने या धौंस जमाने से नहीं.
प्रवीण स्वामी ‘दिप्रिंट’ में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
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