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Monday, 21 September, 2026
होममत-विमतशाह बानो से वक़्फ़ तक: कैसे मुस्लिम राजनीति ने बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि सिर्फ बिचौलिए पैदा किए हैं

शाह बानो से वक़्फ़ तक: कैसे मुस्लिम राजनीति ने बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि सिर्फ बिचौलिए पैदा किए हैं

भारतीय मुसलमानों के पास नेता, वकील और नौकरशाह हैं, लेकिन उनमें आत्म-आलोचना की संस्कृति का अभाव है.

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अधिकतर भारतीय मुसलमान पिछड़ेपन का तमगा दिखाना पसंद करते हैं. यह एक राजनीतिक कहानी है, जिसका मकसद भारत पर उन्हें पीछे रखने का आरोप लगाना है. वे अपने आरोपों को सही साबित करने के लिए सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हैं.

यह बात अलग है कि यह पिछड़ापन सच है या सिर्फ एक बनाई हुई धारणा है और क्या मुसलमानों का हर वर्ग हिंदू समाज के बराबर वाले वर्ग से पीछे है. लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहां उनका पिछड़ापन सबसे ज्यादा दिखाई देता है, और सबसे कम पहचाना जाता है: बौद्धिक पिछड़ापन. मुस्लिम समुदाय के पास कोई बौद्धिक वर्ग नहीं है. करीब 20 करोड़ की आबादी वाले समुदाय की साक्षरता दर 79.5 प्रतिशत हो, फिर भी उसके पास नाम लेने लायक कोई बुद्धिजीवी वर्ग न हो और कुछ ही ऐसे बुद्धिजीवी हों जिनमें वास्तविक क्षमता हो, तो कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह हैरान करने वाली बात है.

उनके बीच बौद्धिक वर्ग के न होने का सबसे साफ सबूत यह है कि सार्वजनिक बहस में वामपंथी-उदारवादी हिंदू उनकी तरफ से बोलते हैं. अगर वे अपनी बात खुद रख सकते हैं, तो उन्हें वकीलों की जरूरत क्यों पड़ेगी, जो इसी प्रक्रिया में मेज पर उनकी जगह खुद ले लेते हैं और उन्हें हमेशा के लिए बातचीत से बाहर रखते हैं? वामपंथी-उदारवादियों के लिए मुसलमान वे मशहूर “मूक करोड़ों” लोग हैं, जो अपनी बात खुद नहीं कह सकते और इसलिए उनकी तरफ से इन्हें बोलना पड़ता है.

दार्शनिक गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक ने अपने प्रसिद्ध लेख में सवाल किया था: “क्या सबऑल्टर्न बोल सकता है?” वामपंथी-उदारवादी बुद्धिजीवियों के बारे में कहा जा सकता है कि वे पूछ रहे हैं, “क्या मुसलमान बोल सकता है?” और जिस तरह स्पिवाक ने इस सवाल का जवाब दिया था, “नहीं, सबऑल्टर्न बोल नहीं सकता”, उसी तरह वामपंथी-उदारवादियों ने भी उतनी ही साफ भाषा में इसका जवाब दिया: “नहीं, मुसलमान बोल नहीं सकता, इसलिए उसकी तरफ से बोलना चाहिए.”

उनके विचार में मुसलमानों के पास धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक बहस के लिए जरूरी मूल्य, विचार और भाषा नहीं है. इसलिए मुस्लिम समुदाय की सार्वजनिक बहस में प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी उन्हीं की है. यह उनका विशेष अधिकार है.

हालांकि, यह भी कहा जा सकता है कि समुदाय के अंदर एक खास समूह है जो खुद को मुसलमानों का स्वाभाविक बुद्धिजीवी वर्ग मानता है. यह समूह पूर्व नौकरशाहों का है. 1979 में IFS अधिकारी सैयद शाहाबुद्दीन (1935-2017) ने कूटनीति से इस्तीफा देकर राजनीति में कदम रखा और गणराज्य की नैतिकता की परवाह किए बिना मुस्लिम लीग की बंद कमरे वाली राजनीति को खुले में ले आए. तब से कई मुस्लिम नौकरशाहों का सपना रहा है कि वे ऐसे लोगों को बौद्धिक नेतृत्व दें जो अपने अगले कायदे का इंतिजार कर रहे हैं.

शाहाबुद्दीन और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने राजीव गांधी, जो उस समय सबसे बड़े जनादेश के साथ प्रधानमंत्री बने थे, को शाह बानो फैसले पर टालमटोल करने, पीछे हटने और आखिरकार झुकने पर मजबूर कर दिया. इसके बाद उन्होंने सलमान रुश्दी की ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर प्रतिबंध भी लगवा दिया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने और दूसरे मुस्लिम नेताओं ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया. इसके अलावा, अपने जर्नल ‘मुस्लिम इंडिया’ के जरिए, जिसका नाम मुस्लिम लीग की शब्दावली से लिया गया था, उन्होंने मुसलमानों में पीड़ित होने की मानसिकता को एक संस्था जैसा रूप दिया और इसे असंतोष की विचारधारा बना दिया. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को मुस्लिम इंडिया की शिकायतों की सूची का सरकारी रूप कहा जा सकता है.

फिर भी, इन नौकरशाहों में अधिकार जताने की भावना इतनी गहरी है कि उन्हें कभी यह समझाने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि नौकरशाही की नौकरी और बौद्धिक भूमिका के बीच क्या संबंध है. इस समूह की प्रासंगिक बने रहने की बेचैनी सबसे दयनीय है और इससे दया, तिरस्कार और घृणा पैदा होती है.

बुद्धिजीवी किसे कहते हैं

बौद्धिक भूमिका सिर्फ बुद्धि रखने की बात नहीं है. इसलिए यह कहना कि मुसलमानों के पास कोई बौद्धिक वर्ग नहीं है, यह कहना नहीं है कि उनमें बहुत तेज दिमाग और विद्वता रखने वाले लोग नहीं हैं. उनमें लाखों वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, कवि, वकील, पॉडकास्टर, राजनेता और नौकरशाह हैं. लेकिन बहुत तेज बुद्धि और अपने पेशे में सफलता किसी व्यक्ति को बुद्धिजीवी नहीं बनाती.

“बुद्धिजीवी” एक खास अर्थ वाला शब्द है. इसका मतलब ऐसे व्यक्ति से है जो अपने समाज के बारे में गहराई से सोचता है, उसके मामलों पर आलोचनात्मक नजर रखता है, सार्वजनिक बहसों में हिस्सा लेता है, रूढ़िवादी सोच और मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाता है, ताकतवर व्यवस्था को चुनौती देता है और संक्षेप में सत्ता के सामने सच बोलता है. सबसे बढ़कर, वह अपने ही समुदाय को लगातार आत्मचिंतन की स्थिति में रखता है.

नव-मार्क्सवादी विचारक एंटोनियो ग्राम्शी ने अपनी किताब ‘प्रिजन नोटबुक्स’ में ऐसे व्यक्ति को ‘ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल’ कहा है. उन्होंने इसे ‘ट्रेडिशनल इंटेलेक्चुअल्स’ से अलग बताया है. इनमें विद्वान, धार्मिक लोग और नौकरशाह जैसे स्थापित वर्ग आते हैं, जो खुद को किसी खास सामाजिक वर्ग से अलग और स्वतंत्र मानते हैं. लेकिन ग्राम्शी के अनुसार, उनकी ऐतिहासिक स्थिति मौजूदा वर्ग संबंधों में ही जड़ें रखती है.

उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांत के संस्थापक एडवर्ड सईद ने ‘रिप्रेजेंटेशंस ऑफ द इंटेलेक्चुअल’ में पेशेवर और गैर-पेशेवर बुद्धिजीवी के बीच अंतर बताया है. वह बौद्धिक जीवन के पेशेवर रूप लेने की आलोचना करते हैं, जहां अकादमिक लोग और तकनीकी विशेषज्ञ दोनों मौजूदा व्यवस्था की सेवा करते हैं. उनके अनुसार, सच्चे बुद्धिजीवी को “अमेच्योर” बने रहना चाहिए, यानी संस्था से मिलने वाले फायदे के बजाय जुनून और नैतिक जिम्मेदारी से काम करना चाहिए. सईद के लिए बुद्धिजीवी की स्वाभाविक स्थिति “रूपकात्मक निर्वासन” की है, यानी रूढ़िवादी सोच से बाहर खड़े रहना और धार्मिक कट्टरता या सांप्रदायिक पहचान के साथ खड़े होने से इनकार करना.

अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि मुसलमानों का कोई नेता नहीं है. इसके बाद लगभग हमेशा इससे भी ज्यादा दुख भरी शिकायत आती है कि उनके पास नेता क्यों नहीं हैं. बड़े दुख और गंभीरता के साथ कहा जाता है कि उनके स्वाभाविक नेता, यानी उत्तर प्रदेश के अशराफ, देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए.

जिस तरह यह बात कही जाती है, उससे एक ऐसी सेना की तस्वीर सामने आती है जिसका अफसर वर्ग चला गया हो और जो बिना व्यवस्था के पड़ी हो. इसका मतलब यह निकाला जाता है कि अगर स्वाभाविक नेता पाकिस्तान नहीं गए होते, तो मुसलमान एक बेहतर युद्ध मशीन बने रहते. यह साफ है कि वे किससे लड़ते, लेकिन हैरानी की बात है कि उन लोगों के खिलाफ गुस्सा और धोखे की भावना नहीं दिखाई देती, जिन्होंने समुदाय को “अनाथ” छोड़ दिया.

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बातचीत हमेशा राजनीतिक नेताओं के बारे में होती है, विचार देने वाले नेताओं के बारे में कभी नहीं. समुदाय में बौद्धिकता के बारे में इतना ही काफी है. विचारों की दुनिया में लगभग कोई चर्चा नहीं होती, सिवाय इस शिकायत और रोने-धोने के कि मुसलमान खुद को पीड़ित मानते हैं, कि वे “फासीवादी बहुसंख्यकवाद” और “नरसंहार करने वाली” सरकार के नीचे दबे हुए हैं. यह सवाल उठता है कि फासीवाद के बीच भी हुकूमत-ए-इलाहिया यानी इस्लामी शासन कायम करने की कोशिश बिना किसी रुकावट के कैसे चलती रहती है.

पीड़ित होने की मानसिकता में डूबे रहना

एक विकसित समाज विचारों की एक बड़ी श्रृंखला को बढ़ावा देता है. उसमें विविधता और जटिलता होती है, जो एक-दूसरे के साथ लगातार टकराव और बहस में रहती है और इसी प्रक्रिया से समाज आगे बढ़ता है. उसमें बीच का विचार होता है, वामपंथ होता है, दक्षिणपंथ होता है, मध्यम-वामपंथ होता है, मध्यम-दक्षिणपंथ होता है, अति-वामपंथ होता है, अति-दक्षिणपंथ होता है और दोनों तरफ के किनारों पर भी अलग-अलग विचार होते हैं. हिंदू समाज में इससे भी ज्यादा व्यापक और अलग-अलग तरह के विचार मौजूद हैं.

इसके दूसरी तरफ, मुस्लिम समुदाय विचारों के मामले में एक ऐसा एक जैसा समूह है जिसमें कोई अलग-अलग सोच नहीं है. उसकी जटिलता धार्मिक है और उसकी विविधता अलग-अलग संप्रदायों में है, जैसे शिया, सुन्नी, देवबंदी, बरेलवी, वहाबी, तबलीगी आदि. उनमें वामपंथ, दक्षिणपंथ, अति-वामपंथ या अति-दक्षिणपंथ जैसी बातें सुनने को नहीं मिलतीं. इसकी वजह यह है कि वहां बीच का कोई विचार भी नहीं है. एक कोशिका वाले जीव की तरह इसमें कोई जटिलता नहीं है. उसकी बौद्धिकता पीड़ित होने की मानसिकता में डूबे रहने से शुरू होती है और वहीं खत्म हो जाती है.

मुस्लिम समाज में बौद्धिक वर्ग न होने की वजह यह है कि वहां नागरिक समाज नहीं है. नागरिक समाज इसलिए नहीं है क्योंकि वह धर्मनिरपेक्षता की उस प्रक्रिया से नहीं गुजरा है, जो ऐसा सार्वजनिक क्षेत्र बनाती है जहां धार्मिक विचारों, कानूनी नियमों और सामाजिक रीति-रिवाजों की तर्क के आधार पर आलोचना की जा सके. इस खास कमी की पहचान सबसे पहले आंबेडकर ने अपनी किताब ‘Pakistan or the Partition of India’ (पाकिस्तान या भारत का विभाजन) में साफ तौर पर की थी.

‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’ में दार्शनिक युर्गेन हाबर्मास ने इस बात पर ध्यान दिया कि नागरिक समाज ने लोकतांत्रिक बहस के लिए जगह कैसे बनाई. वहां एक बौद्धिक वर्ग पैदा हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य किसी वर्ग के हितों की सेवा करना नहीं था, बल्कि बातचीत पर आधारित तर्क को व्यवहार में लाना था. इससे खुली और स्वतंत्र बहस संभव हुई, जहां “बेहतर तर्क की बिना दबाव वाली ताकत” काम करती है. बुद्धिजीवी जटिल सामाजिक मुद्दों को जनता की समझ में लाने में मदद करते हैं, बिना किसी तानाशाही जैसी विचारधारा को थोपे.

धर्मनिरपेक्षता की प्रक्रिया के बिना मुस्लिम सोच की गहरी संरचना अपने कबायली दौर और सैन्य विस्तार के समय से अब तक नहीं बदली है. समुदाय किसी व्यक्ति से उसी तरह व्यवहार की उम्मीद करता है जैसे सेना एक सैनिक से करती है: कोई सवाल नहीं और पूरी तरह एक जैसी सोच. प्रमुख कहानी से कोई भी अलग बात देशद्रोह मानी जाती है और क्योंकि वह सिर्फ धर्म की भाषा में बात करता है, इसलिए ऐसा अलग होना धर्मत्याग बन जाता है, जिसकी सजा मौत हो सकती है.

एक मुस्लिम बुद्धिजीवी समुदाय का विचारक, सुधारक या अंतरात्मा की आवाज नहीं होता. उसे हमेशा कौम के बचाव में वकील की तरह काम करना होता है. समुदाय, या ज्यादा सही तरीके से कहें तो उसकी विचारधारात्मक व्यवस्था, उन लोगों के लिए जो बौद्धिक बातें करना पसंद करते हैं, उनके काम पहले से तय कर देती है:

  1. समुदाय से आने वाले बुद्धिजीवी का सबसे पहला और सबसे जरूरी काम यह है कि वैज्ञानिक खोजों का इस्तेमाल करके इस्लाम की सच्चाई साबित करे.
  2. संवैधानिक आड़ और उदारवादी दिखावे का इस्तेमाल करके मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे.
  3. मार्क्सवादी आर्थिक तर्क का इस्तेमाल करके मुस्लिम शासकों की ऐतिहासिक गलतियों को सही ठहराए.
  4. हिंदू उदारवादियों के साथ मिलकर हिंदू संस्कृति और धर्म की आलोचना करे.
  5. हिंदू उदारवादियों की तरह मुस्लिम सांप्रदायिकता की कभी आलोचना न करे.

जब तक कोई मुस्लिम सांप्रदायिकता पर सवाल नहीं उठाता और पहचान की राजनीति, वोट बैंक, पर्सनल लॉ, वक्फ और कट्टरपंथ के समर्थन में कड़े रुख अपनाता रहता है, तब तक वह “शैतान” के साथ बैठकर खाने और अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने की राजनीति करने के लिए स्वतंत्र है. समुदाय को कट्टर बनाकर वह अपने दिल में ‘दर्द-ए-मिल्लत’, यानी समुदाय का दर्द, रखने का प्रमाण हासिल करता है और सत्ता में बैठे लोगों से सौदे करने के लिए प्रतिनिधि का दर्जा पा लेता है.

इस तरह, “बुद्धिजीवी” उस चीज की तारीफ करना शुरू कर देता है जिसकी वह अब तक निंदा करता आया था, और उसे अपने रुख में आए बदलाव को समझाने की जरा भी जरूरत महसूस नहीं होती. इससे भी बुरा यह है कि वह सुबह दिल्ली में हिंदुत्व की तारीफ कर सकता है और उसी शाम अलीगढ़ में उसकी निंदा कर सकता है.

यह कैसी वफादारी है

इस तरह का अवसरवाद सदियों पुराने शासक वर्ग, यानी अशराफ, की उस स्वाभाविक सोच को दिखाता है जिसमें वे समय के बदलते हालात के बीच भी प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं. क्योंकि अब तक उन्होंने मुस्लिम धर्म, संस्कृति और राजनीति पर नियंत्रण रखा है, इसलिए वे अपने छोटे वर्गीय हितों को पूरे समुदाय की चिंता के रूप में सफलतापूर्वक पेश कर देते हैं. उनका हित ही समुदाय का हित बन जाता है. इसी तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे का विवाद हर भारतीय मुसलमान के लिए जीवन-मरण का मुद्दा बना दिया जाता है.

समुदाय को इस तरह तैयार कर दिया गया है कि वह ऐसे “बुद्धिजीवी” की ऊंची मेज से कुछ टुकड़े पाने के लिए की जाने वाली झूठी चालों को सहन करता रहे. अगर वह संसद की सीट, किसी आयोग की अध्यक्षता, किसी यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर की कुर्सी या किसी राज्य का राज्यपाल जैसा कोई पद हासिल कर लेता है, तो पूरा समुदाय उसकी मिली हुई इज्जत पर गर्व करता है.

उनकी सार्वजनिक नैतिकता में इस तरह के चालाक व्यवहार के लिए काफी सफाई मौजूद है. इसे “मसलहत” कहा जाता है. यह फिक्ह का एक शब्द है, जिसका मूल मतलब “जनकल्याण” था, लेकिन सभ्य भाषा में इसे “रणनीतिक समझदारी” कहना बेहतर होगा और सीधी भाषा में इसे “मक्कारी” यानी धोखा कहा जाएगा.

दुख की बात यह है कि समुदाय को यह बात भी बुरी नहीं लगती कि उसकी अपनी जरूरत ही नहीं समझी जा रही. एक उर्दू शेर, जो उनकी बहसों में अक्सर सुनाई देता है, अपने ही लोगों को बेच देने के प्रति मुस्लिम रवैये को अच्छी तरह बताता है:

अगर बिकना ही था तो ऊंची कीमत पर बिकते हम; लेकिन हमारे रहबर हमें बहुत सस्ते में बेचकर आए हैं.

मुस्लिम विचार देने वाले नेताओं ने समुदाय की अंतरात्मा को इस तरह उलझा दिया है कि उसे अपने ही लोगों के बिक जाने से कोई समस्या नहीं है. उसे सिर्फ अच्छी कीमत चाहिए, अपने लिए नहीं बल्कि अपने नेताओं के लिए. नेता को फायदा मिल जाए तो पूरा समुदाय संतुष्ट हो जाता है और यही तुष्टिकरण की राजनीति का मूल था. असल में इससे मुस्लिम आम लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन वे अपने नेताओं को मिली ताकत और मिले सम्मान से खुश होते रहे.

धर्मनिरपेक्ष राज के दौरान ऐसे नेताओं का तरीका बहुत जाना-पहचाना था. वे समुदाय को एक के बाद एक ऐसे मुद्दों पर लगातार बेचैन रखते थे जिनका असल में कोई बड़ा महत्व नहीं होता था और अगर राज्य उनकी मनमानी मांग पूरी नहीं करता, तो भीड़ को छोड़ देने की धमकी देकर राज्य पर दबाव बनाते थे, ताकि उन्हें अपना हिस्सा मिल सके.

लेकिन 2014 के बाद की स्थिति में, जब अब वे विरोधी रवैया अपनाकर राज्य को डराने की आजादी नहीं रखते, तो वे खुद को सरकार और मुस्लिम समुदाय के बीच पुल के रूप में पेश कर रहे हैं. लेकिन सच यह है कि असली खाई भी वही हैं. उनकी ताकत जितनी ज्यादा होती है, यह खाई उतनी ही चौड़ी होती जाती है. वे धोखेबाज और अपने स्वार्थ के लिए काम करने वाले लोग हैं, जिनकी वफादारी न देश के प्रति है और न ही समुदाय के प्रति.

जब तक खुद को प्रतिनिधि बताने वाले इन बिचौलियों को हटाया नहीं जाता, तब तक भारतीय मुसलमान भारतीय राष्ट्र के साथ अपनी पहचान को इस सवाल में फंसे बिना तय नहीं कर सकते कि वे पहले भारतीय हैं या पहले मुसलमान.

इब्न खल्दून भारती इस्लाम के जानकार हैं और इस्लामी इतिहास को भारतीय नज़रिए से देखते हैं. वे @IbnKhaldunIndic पर ट्वीट करते हैं. उनसे ibn.khaldun.bharati@gmail.com पर ईमेल के ज़रिए संपर्क किया जा सकता है. विचार निजी हैं.

नोट: हम लेखक को अच्छी तरह जानते हैं और केवल तभी छद्म नाम (pseudonym) का इस्तेमाल करने देते हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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