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Monday, 21 September, 2026
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भारत में असहमति जताने वाले मुसलमानों को सुरक्षा की ज़रूरत है, गणराज्य सिर्फ कौम को दोष नहीं दे सकता

इब्न खल्दून भारती शाह बानो के मामले में सही हैं, लेकिन 20 करोड़ भारतीयों के मामले में गलत. ब्रोकर काउंटर पर बनता है, मस्जिद में नहीं.

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मुझे असहमति जताने से पहले अपनी स्थिति साफ कर देनी चाहिए. 17 मार्च 2023 को मैंने तर्क दिया था कि गणराज्य एक “लगभग धर्मनिरपेक्ष” राज्य बन गया है. 1986 का वह कानून, जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो फैसले को पलट दिया था, हज सब्सिडी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आरक्षण, ये सब बराबर दूरी रखने के सिद्धांत से मेल नहीं खाते थे, और 2014 के बाद इनमें से काफी चीजों को ठीक किया जा रहा था. मैंने अपनी कही एक भी बात वापस नहीं ली है. इसलिए जब इब्न खलदून भारती ने शाह बानो से लेकर वक्फ तक की गड़बड़ी को जोड़ा, तो मुझे लगा कि मैं उनकी बात से सहमत हो जाऊंगा.

मैं करीब चार पैराग्राफ तक सहमत रहा. फिर लेख मुस्लिम राजनीति के बारे में रहना बंद हो गया और मुसलमानों पर फैसला सुनाने लगा. करीब 20 करोड़ लोगों की एक पूरी आबादी को एक ही तरह का समूह बताया गया, जिसकी सोच उसके कबायली दौर से अब तक नहीं बदली है, और जिसकी सार्वजनिक व्यवहार की समझ, मसलहत, को धोखे के रूप में बताया गया. एक सैयद शाहाबुद्दीन पर फैसला देने के लिए शाहाबुद्दीन के बारे में सबूत चाहिए. 20 करोड़ लोगों पर फैसला देने के लिए इससे बहुत ज्यादा सबूत चाहिए.

भारती मुझे उन दो श्रेणियों में रखेंगे जिनका वह मजाक उड़ाते हैं: वह गैर-मुस्लिम जो मुसलमानों के बारे में बोलने की कोशिश करता है, मेरे मामले में एक पगड़ी पहनने वाला, धार्मिक आचरण करने वाला सिख, और पूर्व नौकरशाह. मैं किसी की तरफ से नहीं बोल रहा हूं, सिर्फ उस जगह से बोल रहा हूं जहां मैं खुद हूं.

मैंने अपने स्कूल जाने से पहले के चार साल, 1962 से 1966 तक, पंजाब के मालेरकोटला में बिताए. यह पंजाब का एकमात्र मुस्लिम बहुल शहर है. मेरे दिवंगत पिता PCS अधिकारी थे और वहां मुख्य राजस्व और प्रशासनिक अधिकारी के रूप में तैनात थे. मुस्लिम पड़ोसी मेरी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे, किसी सेमिनार का विषय नहीं.

एक सिख के लिए इस शहर की सबसे खास याद एक ऐसे मुस्लिम व्यक्ति की है, जिसने सत्ता के सामने सच बोला था: नवाब शेर मोहम्मद खान ने गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों को सरहिंद में जिंदा दीवार में चुनवा देने के बेहद गलत प्रस्ताव का साफ तौर पर विरोध किया था.

वह रुख सिखों की सामूहिक याद में आज भी मौजूद है. हर दिसंबर फतेहगढ़ साहिब में होने वाले शहीदी जोर मेले में इसे दोहराया जाता है, और सिखों की याद में यह माना जाता है कि 1947 में जब पंजाब जल रहा था, तब मालेरकोटला इसी वजह से बचा रहा.

1989-90 में बटाला पुलिस जिले के जिला मजिस्ट्रेट के रूप में मेरी तैनाती ने मुझे कादियान के अहमदिया समुदाय से परिचित कराया. कादियान उनके आंदोलन का जन्मस्थान और आध्यात्मिक केंद्र है. वे अपनी नजर में मुसलमान हैं, लेकिन 1974 में पाकिस्तान के संविधान ने उन्हें मुसलमान मानने से इनकार कर दिया था, जबकि भारत का संविधान उन्हें अपने धर्म का पालन करने की सुरक्षा देता है. 3 जुलाई 2023 को मैंने सदियों से चली आ रही सिख-मुस्लिम एकता के बारे में लिखा था, भले ही इसके लिए मुझे अपने ही समुदाय के लोगों की आलोचना झेलनी पड़ी.

भूमि-राजस्व की ट्रेनिंग से मुझे कामचलाऊ उर्दू आती थी. यह पुराने जमाबंदियों की भाषा थी, यानी पंजाब में जमीन के अधिकारों का समय-समय पर बनाया जाने वाला रिकॉर्ड. उर्दू में मसलहत का मतलब समझदारी या सावधानी है, ज्यादा से ज्यादा इसे स्वार्थ के हिसाब से रास्ता निकालना कहा जा सकता है. मैंने जिन फाइलों पर कभी टिप्पणी लिखी, उनमें इसका थोड़ा-बहुत हिस्सा हमेशा रहता था. मक्कारी एक अलग शब्द है.

तहसील के गेट पर दलाल

जो भी व्यक्ति डिप्टी कमिश्नर की कुर्सी पर बैठा है, वह समझता है कि तहसील के गेट पर दलाल इसलिए मौजूद है क्योंकि तहसील उसे मौजूद रहने देती है. वह गांव के आदमी की कम समझ का नतीजा नहीं है, बल्कि उस काउंटर का नतीजा है जो गांव वाले से सीधे बात नहीं करना चाहता. बगल की खिड़की बंद कर दीजिए और दलाल दूसरे काम की तलाश में निकल जाएगा.

भारती का मुस्लिम बिचौलिया भी इसी तरह का व्यक्ति है, और जिस काउंटर ने उसे दशकों तक पाल-पोसकर रखा, वह भारतीय राज्य था. 400 से ज्यादा लोकसभा सीटों वाली राजीव गांधी सरकार को किसी ने मजबूर नहीं किया था कि वह शाह बानो मामले के आसपास कानून बनाए. उसने खुद AIMPLB यानी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को पूरे समुदाय की अधिकृत आवाज मानने का फैसला किया, क्योंकि 20 करोड़ नागरिकों को संतुष्ट करने की तुलना में एक प्रतिनिधि को संतुष्ट करना सस्ता था. शाह बानो खुद उस मेज पर मौजूद नहीं थीं. 2023 के एक लेख ने इस समझौते के लिए राज्य को जिम्मेदार ठहराया था. भारती उन लोगों को दोष देते हैं जिनके ऊपर यह समझौता किया गया था. किसी दलाल को काम देने वाला खरीदार भी होता है. खरीदार को भी जिम्मेदार ठहराइए.

यह बड़ा दावा कि कोई बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है और कोई आत्म-आलोचना नहीं है, नामों की पूरी सूची देखने पर टिकता नहीं है. 18 अप्रैल 1966 को हमीद दलवाई तीन तलाक से तलाक दी गई सात मुस्लिम महिलाओं को लेकर बंबई के मंत्रालय पहुंचे थे. 1970 में उन्होंने मुस्लिम सत्यशोधक मंडल की स्थापना की और अपनी मृत्यु तक, 44 साल की उम्र में, समान नागरिक संहिता की मांग करते रहे. आरिफ मोहम्मद खान ने 1986 में शाह बानो फैसले को पलटने का बचाव करने के बजाय राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा दे दिया. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने तुरंत तीन तलाक के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में खत्म कर दिया. और पसमांदा आंदोलन अशरफ अभिजात वर्ग से यह कहता रहा है कि उनके हित पूरे समुदाय के हित नहीं हैं. भारती के अपने शब्दों में यही लोग खलनायक हैं. यह अंदर से किया गया वर्ग आधारित विरोध है, यानी वही अंतर जिसे भारती कहते हैं कि मौजूद ही नहीं है.

वह जवाब दे सकते हैं कि ये आवाजें सुनसान जगह में उठने वाली आवाजें थीं. यह बात कुछ हद तक सही है. लेकिन किसी सुधारक की आवाज का न सुना जाना, उसके मौजूद न होने के बराबर नहीं है. दिल्ली ने उनकी बात इसलिए नहीं सुनी क्योंकि उसने बोर्ड की बात सुनना चुना.

दो धर्मनिरपेक्षताएं, एक ही नाम

इस लेख की सबसे बड़ी व्याख्या यह है कि मुसलमानों में नागरिक समाज इसलिए नहीं है क्योंकि उन्होंने कभी धर्मनिरपेक्षता की प्रक्रिया से गुजरना ही नहीं सीखा. इससे एक ही शब्द के दो अलग-अलग मतलब हो जाते हैं. हाबर्मास के अर्थ में धर्मनिरपेक्षता वह प्रक्रिया है जो कोई समाज अपनी मान्यताओं के साथ खुद करता है, अपने कॉफी हाउसों में. धर्मनिरपेक्षता, जैसा कि मैंने तर्क दिया था, वह चीज है जो राज्य को हर धर्म के साथ करनी चाहिए: सक्रिय और समान दूरी रखना, जिसमें किसी भी समुदाय का गणराज्य पर अधिकार न हो. पहली चीज का आदेश देकर पालन नहीं कराया जा सकता. दूसरी चीज राज्य को करनी ही चाहिए.

और पहली चीज शायद ही कभी दूसरी चीज के बिना आती है. हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में सुधार किसी अपने आप पैदा हुए सार्वजनिक विमर्श के कारण नहीं हुआ था, बल्कि संसद ने 1955-56 के हिंदू कोड एक्ट्स के जरिए किया था, और इसका सामना रूढ़िवादी विरोध से हुआ था. मेरे अपने समुदाय ने 1920 से 1925 के बीच आंदोलन, शहादत और आखिर में कानून के जरिए अपने गुरुद्वारों को वंशानुगत महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराया. भारती बी. आर. आंबेडकर की किताब ‘Pakistan or the Partition of India’ (पाकिस्तान या भारत का विभाजन) का हवाला देते हैं. उसी व्यक्ति ने ‘Annihilation of Caste’ (जाति का विनाश) भी लिखी थी. उनका संघर्ष रूढ़िवाद के खिलाफ था, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम.

भारती अंत में मांग करते हैं कि खुद को प्रतिनिधि बताने वाले बिचौलियों को हटा दिया जाए. इससे मैं सहमत हूं, लेकिन दलाल को सिर्फ काउंटर ही हटा सकता है. 2018 में हज सब्सिडी खत्म करना ऐसा ही एक सुधार था और मैंने इसका स्वागत किया था. लेकिन इसके बाद जो होना चाहिए, वह यह है कि राज्य को मुस्लिम नागरिकों से उसी तरह सीधे और उनके नाम से बात करनी चाहिए, जैसे वह हर दूसरे नागरिक से करता है. उसे एक तरह के बिचौलियों को हटाकर उनकी जगह सरकार के हिसाब से ज्यादा पसंद आने वाले दूसरे बिचौलियों को नहीं लाना चाहिए.

एक ऐसा लेख, जिसमें शिकायत की गई है कि मुसलमान अपनी आवाज में सत्ता के सामने सच नहीं बोलते, वह 14वीं सदी के ट्यूनिस में पैदा हुए एक इतिहासकार के नाम से लिखा गया है. मैं नाम चुनने पर कोई आपत्ति नहीं करता. मैं इसके पीछे की कीमत का अंदाजा लगा सकता हूं. लेकिन यह उपनाम ही इस लेख में सबसे मजबूत सबूत है कि हमारे सार्वजनिक जीवन में मुस्लिम असंतुष्टों को आज भी अपनी पहचान छिपाने के लिए किसी सहारे की जरूरत पड़ती है. यह गणराज्य की भी समस्या है और कौम की भी.

केबीएस सिद्धू एक रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं, जो पंजाब सरकार में स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे. वे ‘दि केबीएस क्रॉनिकल’ के फाउंडर-एडिटर हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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