नई दिल्ली: 63 साल की सुमित्रा ने आखिरकार वह लड़ाई जीत ली है, जो उन्होंने 1990 में शुरू की थी, जब करनाल में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में उन्हें नौकरी देने से इसलिए मना कर दिया गया था क्योंकि वह एक औरत थीं. लेकिन करीब चार दशक की कानूनी लड़ाई के बाद और उनके काम करने के साल खत्म होने के बाद मिली इस जीत में जश्न जैसा कुछ खास नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने अब उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि उन्हें उनके जेंडर की वजह से नौकरी नहीं दी गई थी, और उन्हें 12 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया. सुमित्रा के लिए यह आदेश उस भेदभाव की मान्यता है जिससे वह दशकों तक लड़ती रहीं, लेकिन मुआवज़े से उन्हें ज़्यादा तसल्ली नहीं मिलती.
“मैं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की इज़्ज़त करती हूं और शुक्रगुज़ार हूं कि कोर्ट ने मेरे साथ हुए भेदभाव को माना. लेकिन मैं यह नहीं कह सकती कि मैं मिले हुए मुआवज़े से पूरी तरह संतुष्ट हूं,” सुमित्रा ने पानीपत में अपने घर से फ़ोन पर दिप्रिंट को बताया.
उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था पर उनका भरोसा ही था जिसने उन्हें इतने सालों तक आगे बढ़ाए रखा. “देरी और झटकों के बावजूद, मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी कि आखिर में इंसाफ़ होगा. इसी भरोसे ने मुझे लड़ाई जारी रखने और सबसे बड़ी अदालत तक पहुँचने की हिम्मत दी,” उन्होंने आगे कहा.
मामला 1989 में शुरू हुआ, जब IOC ने करनाल के अपने एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नियुक्तियों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की, जिसमें 34 रुपये की दैनिक मज़दूरी दी जानी थी. सुमित्रा ने एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज में रजिस्ट्रेशन कराया और चुनाव के लिए छांटे गए 49 उम्मीदवारों में वह भी थीं. इंटरव्यू के बाद उन्हें बताया गया कि उन्हें नियुक्ति पत्र दिया जाएगा. वह कभी नहीं आया.
सुमित्रा का कहना है कि उन्होंने चयन प्रक्रिया पूरी कर ली थी, उनकी योग्यताएं इंटरव्यू में शामिल लोगों में सबसे अच्छी योग्यताओं में से थीं और उन्हें उपायुक्त की सिफ़ारिश भी मिली थी. फिर भी उनका नाम आखिरी सूची से बाहर रहा.
उनका आरोप है कि इसकी वजह न तो काबिलियत थी, न योग्यता, न पात्रता और न ही सिफ़ारिश की कमी, बल्कि सिर्फ़ यह थी कि वह एक औरत थीं. सबसे अहम बात यह है कि नियुक्तियाँ होने से पहले उम्मीदवारों को यह नहीं बताया गया था कि बॉटलिंग प्लांट में औरतों को नौकरी नहीं दी जाएगी.
कार्यवाही के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि हो सकता है अधिकारियों को सुमित्रा इसलिए उपयुक्त न लगी हों, क्योंकि काम में हाथ से एलपीजी सिलेंडर उठाना और रात की शिफ़्टें शामिल थीं. गुरुवार को जस्टिस अरविंद कुमार की अगुवाई वाली बेंच ने इस तर्क को खारिज कर दिया.
“आपने उन्हें सिर्फ़ इसलिए नियुक्ति देने से मना कर दिया क्योंकि वह एक महिला हैं? यह नारीत्व का अपमान है… हम भारत से हैं, और हर रोज़ हम कहते हैं कि हम औरतों की इज़्ज़त करते हैं और वह देवी है… रोज़ाना वे अपने घर में गैस सिलेंडर उठाती हैं. जब मर्द नहीं होते, तो वही गैस सिलेंडर बदलती है,” कोर्ट ने कहा.
कोर्ट ने रोज़गार देने से इनकार को एक सरकारी उपक्रम की तरफ़ से “नारीत्व का अपमान” बताया और IOC के वकील की उस माँग को ठुकरा दिया जिसमें मामले को मध्यस्थता से निपटाने को कहा गया था. चूंकि सुमित्रा रिटायरमेंट की उम्र तक पहुँच चुकी हैं, जिससे नौकरी के रूप में उपाय देना व्यावहारिक नहीं रहा, इसलिए बेंच ने भेदभाव और दशकों लंबी कानूनी लड़ाई के लिए उन्हें 12 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया.
“यह लड़ाई 1989 में शुरू हुई थी और अब जाकर खत्म हुई है, करीब चार दशक बाद. आज मैं रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच चुकी हूं, और जो करियर मैंने हक़ से कमाया था, उसे बनाने का मौका खो चुकी हूं. सालों की मुश्किलों और जो मौके मुझसे छीने गए, उन्हें देखते हुए मुझे उम्मीद थी कि मुआवज़े की रकम ज़्यादा होगी, या कम से कम रिटायरमेंट के उन फ़ायदों पर कुछ विचार किया जाएगा जो मुझे मिलते, अगर मुझे सेवा करने दी जाती,” सुमित्रा ने दिप्रिंट से कहा.
अपनी मुश्किलों के बावजूद, अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से आने वाली सुमित्रा ने कहा कि बराबरी में उनका यक़ीन भी उनके डटे रहने की एक और वजह था. “आज के दौर में सब बराबर हैं और मर्द और औरत दोनों को बराबर मौके मिलने चाहिए. किसी को भी सिर्फ़ उसके जेंडर की वजह से रोज़गार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. मुझे खुशी है कि फ़ैसला इसी उसूल को फिर से पक्का करता है.”
सालों तक चली कानूनी लड़ाई
सुमित्रा पहली बार 1990 में करनाल की एक निचली अदालत गईं, जहां उन्होंने मामले में इंसाफ़ मांगने के लिए एक दीवानी मुक़दमा दायर किया. जिरह के दौरान यह सामने आया कि भर्ती प्रक्रिया में औरतों को बाहर नहीं रखा गया था. हालांकि, सबूतों से पता चला कि उन्हें नियुक्ति इसलिए नहीं दी गई क्योंकि काम में मर्द कर्मचारियों के साथ बेवक़्त काम करना पड़ता था.
IOC की तरफ़ से पेश किए गए एक गवाह ने यह भी माना कि अगर प्रतिष्ठान में औरत कर्मचारियों की संख्या ज़्यादा होती, तो सुमित्रा को वह पद दे दिया जाता.
1993 में निचली अदालत ने कहा कि रोज़गार से इनकार सिर्फ़ जेंडर के आधार पर किया गया था, और IOC को निर्देश दिया कि वह उन्हें किसी उचित पद पर, जैसे चपरासी या प्रशासनिक पद पर, समायोजित करे.
लेकिन कानूनी लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई. मामला ऊंची अदालतों में गया, और राहत की प्रकृति और दायरा मुख्य मुद्दा बन गया.
उसी साल के आखिर में करनाल के एक ज़िला जज ने दीवानी अदालत का फ़ैसला पलट दिया. उन्होंने कहा कि सिर्फ़ इंटरव्यू हो जाने से सुमित्रा का नियुक्ति पर कोई लागू करवाने लायक हक़ नहीं बनता. कोर्ट ने कहा कि IOC उनकी उपयुक्तता परखने और उनका चयन न करने का फ़ैसला करने के लिए आज़ाद थी. उसने यह भी कहा कि निचली अदालत ने ऐसे पदों पर उनकी नियुक्ति का निर्देश देकर गलती की, जिनके लिए उन्होंने न आवेदन किया था और न राहत मांगी थी.
इसके बाद मामला 1993 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा, जहां यह तीन दशक से ज़्यादा वक़्त तक लंबित रहा.
“जो एक दैनिक मज़दूरी वाले रोज़गार के मौके को लेकर विवाद के रूप में शुरू हुआ था, वह एक लंबी कानूनी लड़ाई बन गया, जिसमें वक़्त बीतने के साथ किसी भी आखिरी राहत की व्यावहारिक कीमत काफ़ी घट गई,” सुमित्रा ने कहा.
पिछले साल अपने आखिरी फ़ैसले में हाई कोर्ट ने उनका दावा खारिज कर दिया. उसने कहा कि उन्हें नियुक्ति का कोई कानूनी हक़ नहीं था और जो काम था, वह किसी मंज़ूर पद पर नहीं, बल्कि दैनिक मज़दूरी के आधार पर था. 30 साल से ज़्यादा की कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने IOC के उन्हें नियुक्त न करने के फ़ैसले में दखल देने से इनकार कर दिया.
मामला आखिरकार इस साल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. तब तक सुमित्रा उस उम्र को पार कर चुकी थीं जिसमें आम तौर पर रोज़गार का उपाय उनसे छिनी हुई चीज़ को सही मायनों में लौटा सकता था. इसलिए कोर्ट के सामने सवाल अब सिर्फ़ यह नहीं रह गया था कि उन्हें नौकरी दी जानी चाहिए थी या नहीं, बल्कि यह था कि करीब चार दशक बाद इंसाफ़ किस रूप में हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार नियुक्ति के बजाय पैसे का मुआवज़ा चुना, जिससे 1990 में शुरू हुई कानूनी लड़ाई खत्म हो गई.
“सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को मानकर मेरी इज़्ज़त लौटा दी है कि मुझे जो मिलना चाहिए था, वह सिर्फ़ इसलिए नहीं मिला क्योंकि मैं एक औरत थी,” सुमित्रा ने कहा. लेकिन उन्होंने आगे कहा कि फ़ैसला उन सालों को वापस नहीं ला सकता जो उन्होंने खो दिए. “लंबी कानूनी लड़ाई की वजह से मैंने बहुत कुछ खोया और यह रकम उस करियर की जगह नहीं ले सकती जो मैंने नाइंसाफ़ी से खो दिया. नौकरी न मिलने का मतलब था दशकों की छूटी हुई कमाई और निजी संतुष्टि,” 63 साल की सुमित्रा ने कहा, जिन्होंने इस कानूनी लड़ाई को भावनाओं के लिहाज़ से एक उलझी हुई यात्रा बताया.
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