Friday, 30 September, 2022
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भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आरसीईपी से बाहर रहना नहीं बल्कि अपनी प्रतिस्पर्धा बढ़ाना उपाय है

अपने किसानों और डेयरी उद्योग के हितों को देखते हुए भारत ने फिलहाल आरसीईपी से बाहर रहने का फैसला किया है. लेकिन क्या ये कदम अपने उद्योग को बचाने के लिए सही है.

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अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना अच्छी बात है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरात्मा की सुनी और बैंकॉक में ऐलान कर दिया कि भारत दुनिया के सबसे बड़े व्यापार समूह का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है. 16 देशों का ये समूह जिसे आरसीईपी (RCEP) के नाम से जाना जाता है. आसियान के 10 सदस्यों के अलावा इसमें एशिया प्रशांत इलाके के छह और बड़े देश शामिल होने थे. भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड. भारत के इनकार के बाद अब ये 15 ही देश रहेंगे. उन्होंने भी ऐलान कर दिया है कि अब वो बिना भारत के ही आगे बढ़ रहे हैं. हालांकि अभी भारत के इस संगठन में शामिल होने के रास्ते बंद नहीं हुए हैं. अगले साल सारी औपचारिकताएं पूरी होने तक भी अगर शर्तों में बदलाव के साथ भारत राजी हो गया तो वो संगठन में शामिल हो सकेगा.

प्रधानमंत्री और सरकार की तरफ से लगातार ऐसे संकेत थे जिनसे लग रहा था कि भारत आरसीईपी यानी रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप का हिस्सा बनना चाहता है. यानी सरकार समझौते पर दस्तखत की तरफ बढ़ रही है. इसी चक्कर में तमाम विरोधी दल और मजदूर, किसान, व्यापारी संगठन जमकर विरोध में जुटे थे.


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विरोधियों का तर्क भी वही था जो अब सरकार ने सामने रखा है. देश के किसानों और व्यापारियों को भारी नुकसान का डर. ऐसे में पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश के विचारों पर नजर डालना जरूरी है. उनका कहना है कि इस वक्त समझौते पर दस्तखत करना कतई भारत के हित में नहीं है. इस हद तक कि उनका कहना है कि ये उद्योगों और किसानों की कमर तोड़ देगा, जो नोटबंदी और जीएसटी की गड़बड़ियों की वजह से पहले ही दर्दनाक हाल में है. लेकिन साथ ही वो ये भी कह रहे हैं कि हम हमेशा खुद को अलग-थलग नहीं रख सकते. हमें खुद को तैयार करना होगा. फायदे नुकसान का हिसाब लगाना होगा और नुकसान को कम से कम करने का इंतजाम करना होगा.

जयराम ये भी मानते हैं कि अगर मोल-तोल की भाषा में देखें तो भारत कच्चा खेल नहीं खेल रहा है. हमारे पत्ते खासे मजबूत हैं और हमें पूरे दम खम के साथ मोल-भाव करना चाहिए. एकदम ऐसी ही बात पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार कह रहे हैं. उनका कहना है कि बातचीत छोड़कर नहीं आना चाहिए. अपनी शर्तों को मनवाने के लिए दबाव बनाते रहना चाहिए.

ये मानने के पर्याप्त कारण हैं कि प्रधानमंत्री मोदी इतना दबाव बना आए हैं. तभी 15 देशों के साझा बयान में ये कहा गया है कि भारत के लिए रास्ते अभी खुले हैं और सभी आशंकाएं दूर करने की कोशिश भी जारी है.

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लेकिन ये सिक्के का सिर्फ एक पहलू है. और सच कहें तो यहां कोई सिक्का भी नहीं है, जिसकी एक तरफ जीत और दूसरी तरफ हार हो.

हरि अनंत हरि कथा अनंता. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कूटनीति और घरेलू राजनीति को एक साथ साधने का प्रयास ऐसी ही किसी कथा को लिखने की कोशिश है. यहां घरेलू उद्योग, किसान, कामगार को बचाना है लेकिन साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अपना माल बेचने का मौका भी नहीे गंवाना है. अशोक सज्जनहार का कहना है कि रणनीतिक दृष्टि से भी ये एक बहुत बड़ा जोखिम है कि हमारे पड़ोस में एक इतना बड़ा व्यापार समूह बन रहा हो और हम उससे अलग रहें. उनका ये भी मानना है कि ऐसा करके दरअसल भारत चीन के जाल में फंसेगा. चीन हालांकि लगातार ये दिखा रहा है, कह रहा है कि वो भारत को इसमें साथ लेना ज़रूरी मानता है. लेकिन शायद अंदरखाने वो ये हिसाब जोड़ रहा हो कि भारत के न होने पर इस संगठन से उसे कितना फायदा हो सकता है. और याद रखिए चीन का फायदा सिर्फ आर्थिक फायदा ही नहीं होता.

जहां कांग्रेस पार्टी, दूसरे विरोधी दल, यूनियनें और किसान संगठन इस समझौते का जमकर विरोध कर रहे थे वहीं देश के सबसे बड़े और तेज-तर्रार उद्योग संगठन सीआईआई ने समझौते के पक्ष में बयान दे डाला. उनका कहना है कि ये समझौता नहीं किया तो देश में आने वाले निवेश पर भी उलटा असर पड़ेगा. चीन से डंपिंग की चिंता पर सीआईआई के प्रेसिडेंट अतुल किर्लोस्कर का तो कहना है कि इतने बड़े व्यापार समझौते का फैसला किसी एक देश को नजर में रखकर नहीं किया जा सकता. और हमें इसके दसियों साल बाद होने वाले फायदे नुकसान का हिसाब लगाना चाहिए न कि तात्कालिक असर का.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर आज किसान, मज़दूर और कामगारों के हितों के नाम पर भारत इस बड़ी साझेदारी से पीछे हट रहा है, तो इन तबकों को मजबूत और मुकाबले के लायक बनाने के लिए उसके पास क्या योजना है? आज सवाल पूछना जल्दबाजी लग सकती है. लेकिन इस सवाल का जवाब तो चाहिए कि किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे के साथ सत्ता में आई सरकार ने अब तक किसानों की उपज का दाम कितना बढ़ा दिया? और इस देश में जहां सारी चुनावी राजनीति प्याज और चीनी की महंगाई पर सिमट जाती है. प्याज का दाम बढ़ते ही सरकारों को बुखार आने लगता है. वहां ये उम्मीद कैसे और किससे की जाए कि वो किसानों को उपज का सही दाम दिलवा देगा ?

ऐसी ही दूसरी बड़ी चिंता. ज्यादातर जानकारों का कहना है कि इस वक्त यानी आर्थिक मंदी के बीच अगर ये समझौता हो गया तो चीन का माल भारत के बाजारों में पट जाएगा और घरेलू उद्योग धंधों की कमर टूट जाएगी. उनका कहना है कि पहले ही भारत चीन के साथ जो व्यापार करता है उसमें हमें 60 अरब डॉलर का सालाना घाटा होने लगा है. उनका और आरसीईपी के सारे देश जोड़ लें तो ये घाटा 105 अरब डॉलर तक पहुंच जाता है. ये भारत के कुल व्यापार घाटे का 65 फीसदी हिस्सा होता है. तो अब ये कौन बताएगा कि ये मंदी टूटेगी कैसे, क्या एक्सपोर्ट के बिना सिर्फ भारत में इतना माल बिकने लगेगा कि आर्थिक विकास फुल स्पीड पर आ जाए? और अगर एक्सपोर्ट होना है तो इतने बड़े समूह से दूर रहना कितनी समझदारी है?


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इसी तरह की एक चिंता है कि न्यूज़ीलैंड बड़े पैमाने पर डेरी प्रोडक्ट भारत के बाज़ारों में झोंक देगा. 50 लाख से कम आबादी वाला देश है. 50 हज़ार करोड़ डॉलर की जीडीपी का 10 परसेंट डेरी सेक्टर से आता है. क्या हम अपने देश में गाय भैंस पालने वालों को इस हाल में ला सकते हैं कि वो इस इंडस्ट्री से मुकाबला कर सकें? या दरवाज़े बंद करके बैठना ही एक उपाय है. और लाखों गायें देशभर में आवारा घूम रही हैं. जिन इलाकों में घूम रही हैं वहां के विधायकों, सांसदों और मंत्रियों से पूछिए – RCEP का मतलब जानते हैं?

ऐसे में किस भरोसे ये उम्मीद की जाए कि समझौते पर दस्तखत करने के लिए ये सही वक्त नहीं है. कब आएगा वो सही वक्त, और कौन लाएगा?

(लेखक सीएनबीसी आवाज़ के पूर्व संपादक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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