वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की जयराम रमेश की मांग का जवाब गंभीरता से दिया जाना चाहिए, न कि तुरंत खारिज कर देना चाहिए. वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संचार प्रभारी महासचिव हैं और आज के भारत के सबसे संवैधानिक रूप से समझ रखने वाले नेताओं में से एक माने जाते हैं, लेकिन इसका जवाब वह नहीं है जिसकी उन्हें उम्मीद है.
इस तर्क की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है. जब अप्रैल 1947 में संविधान सभा की मौलिक अधिकारों संबंधी सलाहकार समिति की बैठक हुई थी, तब इस बात पर गंभीर बहस हुई थी कि मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल किया जाए या नहीं. डॉ. भीमराव आंबेडकर और जगजीवन राम इसके पक्ष में थे. वहीं सरदार पटेल, सी. राजगोपालाचारी और कुछ अन्य नेताओं ने इसे स्पष्ट रूप से शामिल करने का विरोध किया था. इसका एक व्यावहारिक कारण यह भी था कि उस समय रियासतों का भारत में पूरी तरह विलय नहीं हुआ था और वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को संवैधानिक अनिवार्यता के रूप में स्वीकार करने से हिचक सकती थीं, लेकिन पटेल ने यह भी माना था कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपने आप में एक अप्रत्यक्ष मौलिक अधिकार है. यही विचार संविधान के अनुच्छेद 326 में दिखाई देता है, जिसमें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराने का प्रावधान किया गया है. संविधान निर्माताओं ने इस विचार को खारिज नहीं किया था, बल्कि इसे एक अलग तरीके से संविधान में शामिल किया था.
अब सवाल यह है कि सात दशक बाद क्या इस अप्रत्यक्ष स्थिति को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार बना दिया जाना चाहिए? इसका जवाब देने के लिए हमें उन तीन अलग-अलग बातों को समझना होगा जिन्हें मौजूदा बहस में एक साथ मिला दिया गया है—वोट देने का अधिकार एक वैधानिक (स्टैच्यूटरी) अधिकार के रूप में, एक मौलिक अधिकार के रूप में, और संविधान के मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) के एक तत्व के रूप में.
मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) का तर्क
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को जो सबसे मजबूत संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है, वह संविधान के भाग-III से नहीं आती, जिसमें मौलिक अधिकार शामिल हैं, बल्कि बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत से आती है. सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975) मामले में फैसला दिया था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं. इसका मतलब है कि संसद संविधान संशोधन के जरिए भी इसे खत्म नहीं कर सकती.
अनुच्छेद 326 के तहत दिया गया सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार इसी सिद्धांत से जुड़ा हुआ है और इसलिए इसे पहले से ही ऐसी सुरक्षा प्राप्त है, जो किसी सामान्य मौलिक अधिकार को भी नहीं मिलती. मौलिक अधिकारों पर अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान उन्हें निलंबित किया जा सकता है, और संसद उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सीमाओं के भीतर विनियमित कर सकती है. लेकिन संविधान के मूल ढांचे को बिल्कुल भी नहीं छुआ जा सकता. विडंबना यह है कि जयराम रमेश का प्रस्ताव मतदान के अधिकार को उस स्तर से नीचे ले जाएगा, जहां सरदार पटेल की अप्रत्यक्ष समझ पहले ही उसे स्थापित कर चुकी थी.
असल संवैधानिक लड़ाई यह होनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट रूप से यह घोषित करे कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं, भेदभावपूर्ण तरीके से नाम हटाने, या चुनावी व्यवस्था पर नियंत्रण के जरिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को व्यवस्थित रूप से कमजोर करना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है. यह भाग-III की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत सुरक्षा होगी.
SIR के सवाल पर
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के लिए पहले से तय नियम और अपील की व्यवस्था मौजूद है. जो शिकायतें सामने आई हैं—खासकर पश्चिम बंगाल में—वे इस बात को लेकर हैं कि अपील की व्यवस्था समय पर लागू नहीं की गई, न कि इस बात को लेकर कि पूरी प्रक्रिया संवैधानिक रूप से गलत है. यह एक प्रोसीजरल विफलता है, जिसे उच्च न्यायालयों में अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती दी जा सकती है. अगर मतदाता सूची से नाम हटाने में क्षेत्र, धर्म या समुदाय के आधार पर भेदभाव दिखाई देता है, तो इसे अनुच्छेद 14 के आधार पर भी चुनौती दी जा सकती है.
वोट देने का मौलिक अधिकार बना देने से इस मौजूदा कानूनी व्यवस्था में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आएगा. कानूनी उपाय पहले से मौजूद हैं. जो कमी है, वह संवैधानिक श्रेणी की नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाली व्यवस्था की है. इसमें नाम हटाने से पहले अनिवार्य नोटिस देना और जवाब देने के लिए निश्चित समय देना, अपीलों की तुरंत सुनवाई के लिए एक स्थायी न्यायिक अधिकारी नियुक्त करना, और अंतिम फैसला आने तक नाम हटाने की प्रक्रिया पर स्वतः रोक लगाना शामिल है. ये सभी सुधार जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत किए जा सकते हैं. इसके लिए संविधान संशोधन नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत है.
मौलिक अधिकारों को लागू न कर पाने की समस्या
यहां हमें पूरी साफगोई से बात करनी होगी. भारत में जिन मौलिक अधिकारों को बड़े सम्मान के साथ घोषित किया गया है, उन्हें लागू करने का रिकॉर्ड, नरम शब्दों में कहें तो, बहुत असमान रहा है.
पहला, मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार 2009 से मौलिक अधिकार है. 17 साल बाद भी निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान अनुपालन न होने, फीस की भरपाई को लेकर मुकदमों और राज्यों द्वारा नियमों से बचने की कोशिशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है. देश के बड़े हिस्सों में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा न तो पूरी तरह मुफ्त है और न ही वास्तव में अनिवार्य.
दूसरा, निजता का अधिकार (राइट टू प्राइवेसी), जिसे 2017 में पुट्टस्वामी मामले में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने मौलिक अधिकार घोषित किया था, उसके बावजूद निगरानी व्यवस्था लगातार बढ़ी है. डेटा सुरक्षा कानून कई साल देर से आया और वह भी कमजोर रूप में. संचार पर ऐसा दबाव और डर का माहौल बना है, जिसे शायद वही पीठ भी चिंताजनक मानती जिसने यह फैसला दिया था.
तीसरा, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 में सुनिश्चित की गई है. फिर भी कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून मौजूद हैं, जो दो वयस्कों के बीच धार्मिक विचार साझा करने या धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने को दंडनीय बनाते हैं. ये कानून इसलिए नहीं बने हुए हैं क्योंकि अदालतों ने इनके पक्ष में अंतिम फैसला दे दिया है, बल्कि इसलिए कि इनके खिलाफ मौलिक अधिकारों को लागू कराना धीमा, महंगा और अनिश्चित प्रक्रिया है.
तस्वीर लगातार एक जैसी और निराशाजनक रही है: संवैधानिक अधिकारों की घोषणा तो पहले हो जाती है, लेकिन उन्हें लागू करने की क्षमता दशकों बाद आती है—अगर कभी आती भी है. अगर मतदान के अधिकार को भाग-III में जोड़ भी दिया जाए, लेकिन साथ ही उसे लागू करने की मजबूत व्यवस्था न बनाई जाए, तो यह भी उन अधिकारों की लंबी सूची में एक और नाम बन जाएगा जिन्हें नागरिक अपनी जेब में तो रखते हैं, लेकिन आसानी से इस्तेमाल नहीं कर पाते.
असल में क्या मांग की जानी चाहिए
संविधान संशोधन से ज्यादा प्रभावी तीन कदम हो सकते हैं:
पहला, अदालतों के जरिए यह स्पष्ट कराया जाए कि मताधिकार को व्यवस्थित रूप से कमजोर करना—चाहे मतदाता सूची में हेरफेर करके, मनमाने तरीके से नाम हटाकर या चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर नियंत्रण करके—संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है. ऐसे मामलों को सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सके, बिना सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर हुए.
दूसरा, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर मतदाता सूची से नाम हटाने के मामलों के लिए समयबद्ध और न्यायिक निगरानी वाली अपील व्यवस्था बनाई जाए. अंतिम फैसला आने तक नाम हटाने पर स्वतः रोक होनी चाहिए, और यह अपवाद नहीं बल्कि सामान्य नियम होना चाहिए.
तीसरा, और यह ऐसा सुधार है जिसके बिना बाकी सभी अधूरे हैं, 2023 के अनोप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश को लागू किया जाए, जिसमें चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्र नियुक्ति प्रक्रिया की बात कही गई थी.
अगर मतदान का संवैधानिक अधिकार ऐसे चुनाव आयोग द्वारा लागू किया जाए जिसकी स्वतंत्रता पर सवाल हों, तो वह टूटे हुए दरवाजे वाले मजबूत किले जैसा होगा. जयराम रमेश की मूल चिंता सही है: मतदान के अधिकार को आज जितनी सुरक्षा मिल रही है, उससे अधिक मजबूत सुरक्षा की जरूरत है. चुनाव आयोग की संस्थागत कमजोरी को लेकर उनका आकलन भी केवल उनकी पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक सोच रखने वाले कई लोगों की साझा चिंता है, लेकिन मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने का सुझाव, भले ही प्रतीकात्मक रूप से प्रभावशाली लगे, असल समस्या को ठीक से नहीं पहचानता. यह क्षमता की समस्या को श्रेणी की समस्या समझ लेता है.
भारत को कागज़ पर और अधिक अधिकारों की ज़रूरत नहीं है. जरूरत इस बात की है कि जो अधिकार पहले से मौजूद हैं, उन्हें वास्तव में लागू किया जाए. सरदार पटेल की समझ के अनुसार मतदान का अधिकार पहले से ही एक अप्रत्यक्ष मौलिक अधिकार है और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत के तहत ऐसा संवैधानिक वादा है जिसे बदला नहीं जा सकता. इसलिए काम इसे फिर से घोषित करने का नहीं, बल्कि इसे वास्तविक रूप से लागू करने का है.
लेखक पंजाब कैडर (1984 बैच) के रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं, जो पंजाब सरकार में विशेष मुख्य सचिव (स्पेशल चीफ सेक्रेटरी) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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