इस महीने जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान एक दिलचस्प पल देखने को मिला. सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में मोदी इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ इंस्टाग्राम को लेकर उत्साह से बात करते सुनाई दिए. जवाब में मेलोनी ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “हम इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा फेमस हैं.”
यह बातचीत भारतीय मीडिया के कुछ हिस्सों द्वारा “मेलोडी” फेनोमेनन का ताज़ा उदाहरण थी. यह सोशल मीडिया पर सावधानी से बनाई गई दोस्ती है, जो सेल्फी, रील्स और वायरल पलों पर आधारित है.
इटली की अपनी पिछली यात्रा के दौरान मोदी और मेलोनी ने साथ में मेलोडी चॉकलेट के साथ तस्वीर खिंचवाई थी. यह उनके सरनेम को जोड़कर बने शब्द “मेलोडी” का मजाकिया संदर्भ था, जिसने तुरंत सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज़ हासिल कर लिए थे.
ये वायरल पल कोई अकेली घटनाएं नहीं हैं. 2017 में मोदी ने अमेरिकी पत्रकार मेगिन केली से मशहूर तौर पर कहा था, “मैंने आपको ट्विटर पर छतरी के साथ देखा है.”
पिछले साल भी जी-7 सम्मेलन के दौरान मोदी ने फिर ट्विटर का ज़िक्र किया था, जब उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से उनकी पत्नी द्वारा चेहरे पर हल्का थप्पड़ मारने वाले वायरल वीडियो को लेकर मज़ाक किया था. हाल ही में मुख्यधारा के मीडिया ने भी बड़े उत्साह के साथ एक तस्वीर प्रसारित की, जिसमें मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ओर उंगली से इशारा करते दिखाई दे रहे थे, मानो वह कोई बड़ी कूटनीतिक जीत का क्षण हो.
इन्फ्लुएंसर स्ट्रैटेजी
मोदी के हर विदेश दौरे के साथ “वायरल मोमेंट्स” की एक फेहरिस्त चलती है—ध्यान से बनाए गए फोटो ऑप्स, कोरियोग्राफ्ड इंटरेक्शन और सोशल-मीडिया-फ्रेंडली साउंडबाइट्स जो ज़्यादा से ज़्यादा वायरल होने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं.
अगर यह सिर्फ पब्लिक रिलेशंस तक सीमित होता तो शायद कोई समस्या नहीं थी. परेशानी यह है कि यह कहीं ज्यादा चिंताजनक बात की ओर इशारा करता है: भारत की विदेश नीति का धीरे-धीरे सतहीपन और सोशल मीडिया प्रदर्शन में बदल जाना.
फ्रांस के एवियन में G-7 में ट्रंप के साथ मोदी की मीटिंग के दौरान एक पल इसे बताता है, जब ट्रंप, होर्मुज स्ट्रेट्स में अमेरिकी मिलिट्री स्ट्राइक में तीन भारतीय नाविकों के मारे जाने के बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए, यूं ही कह रहे थे कि “यह एक मुश्किल प्रोफेशन है”, तब मोदी उनके बगल में बैठे चुपचाप मुस्कुराते रहे.
ये तस्वीरें शायद मोदी सरकार के दौर की भारत की विदेश नीति की पहचान बन जाएं—बहुत ज्यादा दिखाई देने वाली, बेहद व्यक्तिगत, लगातार प्रचारित की जाने वाली, लेकिन दुर्भाग्य से उस नैतिक स्पष्टता, ठोस दृष्टि और रणनीतिक आत्मविश्वास से खाली, जिसने कभी विश्व मामलों में भारत की आवाज को अलग पहचान दी थी.
इसकी तुलना भारत के कूटनीतिक इतिहास के एक और यादगार पल से कीजिए. 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अमेरिका गई थीं और उस समय के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से मिली थीं. निक्सन के विरोधी रवैये का सामना करते हुए उन्होंने अपने अंदाज़ में उन्हें नज़रअंदाज़ किया. एक राजकीय भोज के दौरान वह आंखें बंद करके बैठीं रहीं और उनके सवालों का जवाब बहुत छोटे शब्दों में दिया.
बांग्लादेश युद्ध के दौरान अमेरिकी दबाव के बावजूद उन्होंने गरजते हुए कहा था, “हम पीछे नहीं हटेंगे,” “हम एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे.”
1982 में शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका की अपनी ऐतिहासिक यात्रा में जब उनसे पूछा गया कि भारत किसी एक गुट की ओर झुका हुआ है या नहीं, तो उन्होंने मशहूर जवाब दिया था, “भारत सीधा खड़ा है.” यह राष्ट्रीय आत्मविश्वास का ऐसा मजबूत बयान था, जिसे किसी मीडिया मसाज की ज़रूरत नहीं थी.
यह आत्मविश्वास उस विदेश नीति की परंपरा से आया था, जो मानती थी कि भारत सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने से कहीं बड़े उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करता है. जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नॉन-अलाइनड मूवमेंट) को आकार देने में मदद की, 1955 के बांडुंग सम्मेलन का आयोजन किया ताकि पूर्व औपनिवेशिक शक्तियों के नव-साम्राज्यवाद का विरोध किया जा सके, चीन के साथ पंचशील समझौते यानी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को सामने रखा और नई आज़ादी पाने वाले देशों को महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से बंटी दुनिया में आवाज देने की कोशिश की.
इंदिरा गांधी ने 1971 में असाधारण रणनीतिक साहस दिखाया. उन्होंने अमेरिकी दबाव का विरोध किया और बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हां, नेहरू ने चीन को लेकर गलत आकलन किया था और 1962 में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, लेकिन तब भी भारत न्याय और उस समय जिसे “तीसरी दुनिया” कहा जाता था, उसके सम्मान के प्रति नैतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक बना हुआ था.
गायब होती विदेश नीति
आज भारत आखिर किस बात के लिए खड़ा है?
जब 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब भारत ने संतुलन की भाषा बोली, लेकिन सशस्त्र आक्रमण की निंदा करने जैसे सिद्धांत आधारित रुख से बचता रहा. जब गाज़ा तबाह हो रहा था, तब भी भारत हिचकिचाता दिखाई दिया. 2023 और 2024 के बीच भारत ने गज़ा में तत्काल युद्धविराम की मांग करने वाले संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर चार बार मतदान से दूरी बनाई.
जब युद्ध का खतरा ईरान और पूरे पश्चिम एशिया को अपनी चपेट में लेने लगा, तब नई दिल्ली इतनी सतर्क रही कि लगभग अदृश्य और लगभग पूरी तरह चुप नजर आई. जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की अमेरिका के नेतृत्व में किए गए एक लक्षित हमले में हत्या हुई, तब भारत की नैतिक कायरता और भी स्पष्ट हो गई. मोदी ने शोक संवेदना तक व्यक्त नहीं की. अंतरराष्ट्रीय नियमों और स्थिरता के समर्थन में भारत कोई स्पष्ट आवाज बनकर सामने नहीं आया.
कुछ लोगों ने तर्क दिया कि रणनीतिक अस्पष्टता ज़रूरी होती है, लेकिन यथार्थवाद (रियलिज्म) और निष्क्रियता एक ही चीज़ नहीं हैं. और रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब हर कठिन मुद्दे पर कोई रुख लेने से बचना भी नहीं है.
दरअसल, भारत की पारंपरिक विदेश नीति का पूरा उद्देश्य राष्ट्रीय हितों को वैश्विक व्यवस्था की एक व्यापक दृष्टि के साथ जोड़ना था. भारत हमेशा केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उन्हें दिशा देने की कोशिश करता रहा है, लेकिन मोदी सरकार की कूटनीति कई बार सिर्फ घटनाओं का मंचन करने तक सीमित दिखाई देती है. विदेश यात्राओं के दौरान बार-बार वही परिचित दृश्य दोहराए जाते हैं.
हर विदेश यात्रा लगभग एक जैसी पटकथा का पालन करती है. मोदी की प्रशंसा करने वाली प्रवासी भारतीयों की भीड़. योजनाबद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रम. अंतहीन दृश्य सामग्री. प्रधानमंत्री के गले मिलते हुए दृश्य. सोशल मीडिया पर प्रचार. ड्रोन शॉट्स. सावधानी से संपादित वीडियो. तस्वीरें और दृश्य तो वायरल हो जाते हैं, लेकिन उनके नतीजे अक्सर दिखाई नहीं देते.
हाल ही में ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर भारत में अमेरिका के राजदूत का एक बयान दोबारा साझा किया, जिसमें कहा गया था कि भारतीय कंपनियां अमेरिका में 20.5 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही हैं, लेकिन मोदी की विदेश यात्राओं के बाद भारत में निवेश को लेकर ऐसे ही ठोस बयानों के बारे में हम क्यों नहीं सुनते?
भारत को लेकर ऐसी समान चर्चा कहां है? मोदी की कूटनीतिक गतिविधियों के सीधे परिणाम के रूप में अमेरिका से भारत में कितना नया निवेश आया? कितनी नई विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) नौकरियां बनीं? कितनी तकनीक का हस्तांतरण हुआ? आम भारतीयों को इससे क्या मापे जा सकने वाले लाभ मिले? इसके बजाय हम सुनते हैं कि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारत से पैसा निकाल रहे हैं और शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (नेट एफडीआई) में गिरावट आ रही है.
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता, जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है, उसे “सभी समझौतों की जननी” बताया जा रहा है, लेकिन इस व्यापार समझौते से होने वाले वास्तविक लाभों को लेकर बहुत कम स्पष्टता है.
रील्स और वायरल पलों की भरमार भी ट्रंप को भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क लगाने से नहीं रोक सकी, हालांकि, अब इसमें कुछ कमी आई है. न ही मोदी की रील्स अमेरिकी विदेश विभाग के उस हैरान करने वाले और बेहद उपेक्षापूर्ण बयान को रोक सकीं, जिसमें भारतीय वाणिज्यिक जहाजों को अमेरिकी आदेशों का तुरंत पालन करने को कहा गया और चेतावनी दी गई कि उल्लंघन “बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे.”
मोदी ने 12 वर्षों में 100 विदेश यात्राएं की हैं. क्या इन यात्राओं से भारतीय निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है? क्या इनसे भारत को अधिक बाजार पहुंच मिली है? क्या इनसे चीन की क्षेत्रीय आक्रामकता के खिलाफ भारत की स्थिति मजबूत हुई है? क्या इनसे कोई मापे जा सकने वाले नतीजे निकले हैं? सरकार शायद ही कभी इन सवालों के स्पष्ट जवाब देती है.
ज्यादातर समय हमें केवल रील्स, इंस्टाग्राम के पल और फोटो अवसर ही देखने को मिलते हैं, और किसी भी आलोचना को नकारात्मकता कहकर खारिज कर दिया जाता है.
मई में नॉर्वे में एक पत्रकार द्वारा मोदी से सवाल पूछे जाने और उसके बाद विदेश मंत्रालय की नाराज़गी वाली प्रतिक्रिया ने भी जांच-पड़ताल को लेकर इस असहजता को दिखाया. घरेलू नीति की तरह विदेश नीति भी अब तेज़ी से एक प्रदर्शन, कार्यक्रम प्रबंधन और मोदी के एकतरफा संवाद के रूप में पेश की जा रही है. नागरिकों की ज़रूरतों के प्रति जवाबदेही और संवेदनशीलता की इसमें स्पष्ट कमी दिखाई देती है.
क्या हम विश्वगुरु हैं?
शायद सबसे चिंताजनक बात चीन नीति को लेकर दावों और हकीकत के बीच बढ़ती दूरी है. दशकों तक भारत यह कहता रहा कि क्षेत्रीय संप्रभुता (टेरिटोरियल सॉवरेनिटी) पर कोई समझौता नहीं हो सकता, लेकिन आज, सीमा पर चीनी घुसपैठ और सैन्य तनाव की बार-बार आने वाली खबरों के बाद भी, चीन को लेकर सरकार की भाषा काफी नरम दिखाई देती है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तो यहां तक कहा है: “देखिए, वे एक बड़ी इकॉनमी हैं, क्या एक छोटी इकॉनमी के तौर पर मैं एक बड़ी इकॉनमी से लड़ाई करूंगा?”
भारत की पहले की डिप्लोमैटिक ताकत और आज़ादी की हिम्मत से रक्षा करने की नीति के मुकाबले यह बहुत अलग है.
नेहरू की पीढ़ी के पास भले ही इकॉनमिक ताकत की कमी रही हो, लेकिन वे मकसद वाले दिमागी कॉन्फिडेंस से लैस थे. इंदिरा गांधी का भारत आज के भारत से गरीब था, लेकिन अक्सर उसमें कहीं ज़्यादा स्ट्रेटेजिक आत्मविश्वास और कॉन्फिडेंस दिखता था.
आज मोदी सरकार की कूटनीति कई बार अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति पाने के लिए ज़रूरत से ज्यादा उत्सुक दिखती है. इसमें हाथ पकड़ने, गले मिलने और भावनात्मक दिखने वाले पलों पर ज्यादा जोर दिखाई देता है, मानो विदेश नीति कोई लोकप्रियता प्रतियोगिता हो या मोदी के लिए चलाया जा रहा कोई इन्फ्लुएंसर अभियान, जिसकी सफलता लाइक्स, शेयर, फॉलोअर्स या वायरल क्लिप्स से मापी जाती हो.
लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि आज की भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक है. भारत का राष्ट्रीय आंदोलन मूल रूप से उन लोगों की संप्रभुता और अधिकारों की लड़ाई था, जिन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखा गया था. गांधी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन की नैतिक ताकत ने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों को प्रेरित किया था. इसी कारण स्वतंत्र भारत दुनिया में संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, शांति और देशों की समानता का सबसे मजबूत समर्थक बना.
लेकिन अब वह परंपरा काफी कमजोर होती दिखाई देती है. चाहे गज़ा हो, यूक्रेन हो, ईरान हो या कोई और मुद्दा, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सवालों पर भारत अब स्पष्ट रूप से बोलने से हिचकता हुआ दिखाई देता है.
आज का भारत नेहरू और इंदिरा गांधी के समय की तुलना में कहीं ज्यादा आर्थिक और सैन्य ताकत रखता है. फिर भी मोदी सरकार नैतिक और राजनीतिक नेतृत्व दिखाने के लिए कम इच्छुक नजर आती है. उद्देश्य के बिना शक्ति का प्रभाव कम हो जाता है. और सिद्धांतों के बिना विदेश नीति अंततः सिर्फ जनसंपर्क बनकर रह जाती है. भारत एक ऐसे देश से बदल गया है जिसके पास विदेश नीति का एक दर्शन था, और अब वह ऐसा देश बन गया है जिसकी विदेश नीति सोशल मीडिया मार्केटिंग रणनीति पर आधारित लगती है.
भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान, अपनी कई आंतरिक कमजोरियों के बावजूद, इस समय की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक बातचीत के केंद्र में खुद को स्थापित करने में सफल रहा है. वहीं खुद को विश्वगुरु कहने वाला भारत उस कमरे से लगभग गायब दिखाई देता है.
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर पाकिस्तान की मध्यस्थ और गवाह के रूप में छाप दिखाई देती है. इसमें इस्लामाबाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसी सप्ताह अमेरिका-ईरान वार्ता के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि उनके दो सबसे पसंदीदा दक्षिण एशियाई लोग उनकी पत्नी और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर हैं.
एक ऐसा देश जिसने कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आकार देने में मदद की, उपनिवेशवाद-विरोधी एकजुटता का समर्थन किया और युद्ध व शांति के मुद्दों पर अधिकारपूर्वक अपनी बात रखी, वह आज दर्शक बनकर कैसे रह गया, जबकि दूसरे देश कूटनीति के केंद्र मंच पर खड़े हैं?
यह सवाल इसलिए और असहज है क्योंकि मोदी सरकार ने भारत को “विश्वगुरु” और एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करने में भारी राजनीतिक पूंजी लगाई है. प्रभाव नारों से नहीं मापा जाता. प्रभाव इस बात से मापा जाता है कि संकट के समय देश आपकी सलाह चाहते हैं या नहीं, और बातचीत की मेज पर आपकी मौजूदगी को कितना जरूरी माना जाता है.
आज मोदी तस्वीरों में मौजूद दिखाई देते हैं, गले मिलने और मुस्कुराते हुए हाथ मिलाने में दिखाई देते हैं, लेकिन एक वैश्विक वार्ताकार के रूप में भारत प्रक्रिया से गायब नजर आता है. मोदी ने भारत की विदेश नीति को एक इंस्टाग्राम रील में बदल दिया है. मोदी सोशल मीडिया फीड्स पर छाए रहते हैं, लेकिन जिन महत्वपूर्ण वार्ताओं में फैसले होते हैं, उनमें भारत हाशिये पर दिखाई देता है. मोदी बहुत दिखाई देते हैं, भारत नहीं.
शायद यही मोदी युग का सबसे बड़ा विरोधाभास है. मोदी खुद को विश्व मंच पर जोरदार तरीके से पेश करते हैं. लेकिन उन्हीं के दौर में भारतीय विदेश नीति अनिश्चित, संकोची, झिझकने वाली और दुनिया की घटनाओं को आकार देने में भारत की पारंपरिक भूमिका को लेकर असमंजस में दिखाई देती है.
रील्स, इंस्टाग्राम के पल, एक्स पर वायरल वीडियो और फेसबुक पोस्ट ऐसी ठोस, स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण विदेश नीति का विकल्प नहीं हो सकते, जो लोगों के हित में काम करे, न कि केवल विश्व मंच पर किसी एक व्यक्ति की छवि और व्यक्तित्व के महिमामंडन के लिए.
लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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