29 अगस्त की सुबह इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड ने दिल्ली में कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) की कीमत 3.89 रुपये प्रति किलो बढ़ा दी. इस साल यह पांचवीं बार हुआ है. यह बदलाव ईंधन और आने-जाने के खर्च में एक और छोटी बढ़ोतरी जैसा लग सकता है, लेकिन इस पर गहराई से विचार करने की ज़रूरत है.
सीएनजी की कीमत में बढ़ोतरी पिछले सात महीनों में ईंधन संकट के बाद सरकार की बनाई गई एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है. सरकार के मुख्य आंकड़े बताते हैं कि कीमतों में चुनिंदा तरीके से बढ़ोतरी की गई. इससे सरकार की प्राथमिकताओं और फैसले लेने के तरीके को समझने में मदद मिलती है.
वह झटका जिसने शुरुआत की
इस कहानी की शुरुआत दिल्ली से नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया से होती है. इंडियन बास्केट कच्चे तेल की कीमत, जो भारत के आयात किए गए कच्चे तेल पर होने वाले वास्तविक खर्च का आधार है, जनवरी और फरवरी 2026 में 63 से 69 डॉलर प्रति बैरल के बीच स्थिर रही, लेकिन सिर्फ एक महीने के अंदर यह 64 प्रतिशत बढ़कर 113 डॉलर प्रति बैरल हो गई. इसी दौरान इलाके में फिर से संघर्ष शुरू होने के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से आने-जाने में रुकावट आई. अप्रैल में कीमत करीब 114 डॉलर के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई. तनाव कम होने के साथ जून और जुलाई में कीमत घट गई और अगस्त तक फिर बढ़ने लगी. इसी दौरान दिल्ली में सीएनजी की कीमत में पांचवीं बढ़ोतरी हुई.

विदेश में युद्ध, तेल की कीमतों में झटका और उसके बाद देश में कीमतों का बढ़ना—यह एक जानी-पहचानी कहानी है. ऐसी घटनाओं को अगर अलग-अलग देखा जाए, तो ज़रूरी नहीं कि उन पर बहुत ज्यादा विश्लेषण की ज़रूरत हो. लेकिन असली बात इस झटके पर भारत की प्रतिक्रिया है—इसके असर को हर जगह एक जैसा नहीं पहुंचाया गया और इसकी मात्रा भी साफ तौर पर सामने नहीं आई.
गैस सिलेंडर पर लागू कीमतों में भेदभाव का एक बिल्कुल सही उदाहरण
अर्थशास्त्र में एक ही सामान के लिए अलग-अलग खरीदारों या खरीदारों के अलग-अलग समूहों से अलग कीमत लेना कीमतों में भेदभाव (price discrimination) कहलाता है. अर्थशास्त्री एसी पिगू ने 1920 के दशक में अलग-अलग समूहों के लिए अलग कीमत तय करने की ऐसी रणनीतियों को समझाने के लिए इस विचार को औपचारिक रूप दिया था.
संकट के दौरान भारत ने कीमतों में भेदभाव का एक ऐसा तरीका अपनाया, हालांकि इसे सीधे तौर पर ऐसा नहीं कहा गया.
दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत पूरी अवधि में सिर्फ 10 प्रतिशत बढ़ी. कीमत 853 रुपये से बढ़कर 942 रुपये हुई और यह बढ़ोतरी दो चरणों में की गई. इसके उलट, रेस्टोरेंट, होटल और छोटे कारोबारों के लिए जरूरी कमर्शियल सिलेंडर की कीमत इसी अवधि में 79 प्रतिशत बढ़ गई. इसकी कीमत 1,740 रुपये से बढ़कर 3,114 रुपये हो गई. बाद में वैश्विक कीमतें स्थिर होने पर इसमें थोड़ी कमी आई.

पिगू के अनुसार, कीमतों में भेदभाव के लिए विक्रेता के पास कीमत तय करने की ताकत और खरीदारों के बीच अंतर करने की क्षमता, दोनों होनी चाहिए. भारत की तेल कंपनियों में ये दोनों खूबियां हैं. घरेलू और कमर्शियल एलपीजी की कीमतों के बीच जो अंतर उन्होंने बनाया, वह शुरुआत के बाद भी बना रहा और बाद में इसका असर उनकी बैलेंस शीट पर भी पड़ा.
एलपीजी की अंडर-रिकवरी, यानी ईंधन की असली लागत और उसे बेचने की कीमत के बीच का अंतर, मई तक करीब 22,000 करोड़ रुपये पहुंच गया था. Crisil के अनुमान के मुताबिक जुलाई के अंत तक यह 59,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो गया था. सरकार ने संसद में जो आंकड़ा दिया, उसके मुताबिक तिमाही के दौरान सभी संवेदनशील ईंधनों की कुल अंडर-रिकवरी 2.19 लाख करोड़ रुपये थी.
यह स्थिति एक दूसरे और कम दिखाई देने वाले विचार को भी दिखाती है, जिसे फिस्कल इल्यूजन कहा जाता है. इसका मतलब है कि कोई असली खर्च उस समय सरकारी खर्च के रूप में दिखाई नहीं देता, जब वह हो रहा होता है क्योंकि इसका बोझ सरकार के बजट में दर्ज होने के बजाय किसी सरकारी कंपनी पर पड़ता है. इसका नतीजा यह होता है कि आम घरेलू ग्राहक को कीमतें स्थिर लगती हैं, जबकि सरकारी खजाने पर तुरंत कोई असर नहीं दिखता. आर्थिक जिम्मेदारी मौजूद रहती है, लेकिन जनता से छिपी रहती है. आखिरकार इसी जनता को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है, जब सरकारी कंपनी में नई पूंजी डालने, कीमत बढ़ाने या अचानक सब्सिडी देने की जरूरत पड़ती है.
बाज़ार की तरह नहीं, कैलेंडर की तरह बदलती कीमतें
पेट्रोल और डीजल इस कहानी में एक और पहलू जोड़ते हैं: कीमतें किस तरह बदली गईं.
एक सामान्य प्रतिस्पर्धी बाज़ार में उम्मीद होती है कि लागत में बदलाव के साथ कीमतें भी लगातार बदलेंगी, लेकिन दिल्ली में पेट्रोल की कीमत चार महीने तक 94.77 रुपये पर स्थिर रही. इसके बाद मई में सिर्फ 10 दिनों के अंदर चार बार कीमत बढ़ाई गई और यह 102.12 रुपये तक पहुंच गई. इसके बाद वैश्विक तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद तीन महीने से पेट्रोल की कीमत नहीं बदली है. इसी 10 दिन की अवधि में डीजल की कीमत में भी यही पैटर्न दिखा और इसकी कीमत 8.6 प्रतिशत बढ़कर 95.20 रुपये हो गई.

एक ही सरकारी रिटेलर द्वारा बेचे जाने वाले दो ईंधनों की कीमतें एक छोटी-सी अवधि में एक साथ बदली गईं और उसके बाद इस बात की परवाह किए बिना स्थिर रखी गईं कि आगे चलकर उस सामान की अंतरराष्ट्रीय कीमत में क्या बदलाव हुआ. यह बाजार में कीमत के अपने आप सही स्तर पर पहुंचने जैसा नहीं है. यह सरकार द्वारा तय की गई कीमत है, जिसे बाज़ार की लगातार गतिविधियों के बजाय समय-समय पर लिए गए फैसले के आधार पर बदला जाता है. यह कुछ हद तक उन सरकारी सेवाओं की तय कीमतों जैसा है, जिनकी दरें नियंत्रित होती हैं, लेकिन इनके मामले में आम तौर पर जिस तरह सार्वजनिक रूप से दर तय करने की प्रक्रिया होती है, यहां वैसी प्रक्रिया नहीं है.
समझा जाता है कि उस तिमाही की अंडर-रिकवरी में किसी एक ईंधन का सबसे बड़ा हिस्सा अकेले डीजल का था. यह हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि डीजल से माल और बसें चलती हैं और देश में लगभग हर चीज़ को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का खर्च भी इससे जुड़ा है.
असली मुद्दा पारदर्शिता
अब, इनमें से किसी भी बात का मतलब यह नहीं है कि सरकार का मूल फैसला गलत या बचाव के लायक नहीं है. जब युद्ध दुनिया की तेल और गैस की सप्लाई के पांचवें हिस्से को प्रभावित कर रहा हो, तब आम परिवारों को दुनिया भर में बढ़ी लागत के झटके से बचाना सरकार के लिए सही फैसला हो सकता है. ऐसी स्थिति का सामना करने वाली ज्यादातर सरकारें भी इसी तरह के कदम उठाती हैं.
करीब एक सदी पहले अर्थशास्त्री फ्रैंक नाइट ने जोखिम (risk) और अनिश्चितता (uncertainty) में अंतर बताया था. जोखिम की कीमत तय की जा सकती है और उसका बीमा भी कराया जा सकता है, जबकि अनिश्चितता का आकार और यह कितने समय तक रहेगी, यह पता नहीं होता. नाइट की सोच के अनुसार, कितने समय तक चलेगा यह पता न होने वाला युद्ध अनिश्चितता का उदाहरण है. इससे अपने नागरिकों को बचाने की सरकार की कोशिश गलत नहीं है.
लेकिन जिस चीज़ से बचा जा सकता है, वह है पारदर्शिता की कमी. बजट में दिखाई देने वाली सब्सिडी की जांच होती है, उस पर संसद में बहस होती है और अगर वह उचित नहीं रह जाती, तो बाद में उसमें बदलाव किया जा सकता है. इसके उलट, अगर किसी सरकारी कंपनी की किताबों में अंडर-रिकवरी धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और उसे सब्सिडी की तरह साफ तौर पर नहीं दिखाया जाता, तो उस पर तब तक ठीक से जांच नहीं होती, जब तक रकम इतनी बड़ी न हो जाए कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो. उस समय ज़रूरी सुधार अक्सर उससे कहीं ज्यादा बड़ा होता है, जितना वह होता अगर असली लागत शुरुआत से ही साफ दिखाई देती.
ईमानदारी कैसी दिखेगी
इस समस्या का हल यह नहीं है कि आम परिवारों को बचाने के फैसले को वापस ले लिया जाए. जरूरत सिर्फ इतनी है कि इस फैसले की लागत को उसी समय साफ-साफ दिखाया जाए, जब वह खर्च हो रही है, न कि कई महीने बाद संसद में दिए गए बयान या रेटिंग एजेंसी के अनुमान के जरिए.
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) पहले से ही रोजाना रिटेल कीमतें जारी करता है, जैसा कि Figure 1 और 3 में दिखाया गया है. इसी तरह तेल कंपनियों (OMCs) की अंडर-रिकवरी के आंकड़े भी हर महीने एक तय तरीके से जारी किए जा सकते हैं, बजाय इसके कि इन्हें कभी-कभी और मंत्रियों की इच्छा के अनुसार जारी किया जाए.
पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लंबे समय तक स्थिर रखने जैसी स्थिति, जैसा कि मई से अभी तक कीमतों को स्थिर रखा गया है, में यह भी बताया जा सकता है कि अगर कीमतें अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के हिसाब से तय होतीं, तो उनकी अनुमानित कीमत क्या होती. इससे कीमतों के बीच का अंतर उसी समय साफ दिखाई देगा, बजाय इसके कि बाद में पुराने आंकड़ों को देखकर उसका अंदाजा लगाया जाए. इसके अलावा, डीजल का सरकारी खर्च पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है, इसलिए इसके लिए अलग से आंकड़ा जारी करना चाहिए. इसे पेट्रोल-डीजल-एलपीजी के एक साथ दिए गए आंकड़े में शामिल नहीं कर देना चाहिए.
जिस सरकार ने उस संघर्ष से अपने नागरिकों को बचाया, जिसे उसने शुरू नहीं किया था, उसका फैसला सही ठहराया जा सकता है. लेकिन अगर वही सरकार अपने नागरिकों को यह समझने का मौका भी दे कि जिस संकट से उन्हें बचाया जा रहा है, उसकी असली कीमत कितनी है, तो यह और ज्यादा मजबूत फैसला होगा.
अभी इस संकट की असली कीमत जानने का एकमात्र तरीका यह है कि PPAC के पुराने रिकॉर्ड से हर ईंधन के आंकड़े अलग-अलग निकालकर खुद पूरा हिसाब बनाया जाए. इस विश्लेषण में दिए गए तीन आंकड़ों के लिए भी यही करना पड़ा. जिस आंकड़े को समझने के लिए लोगों को खुद पुराने रिकॉर्ड खंगालकर हिसाब लगाना पड़े, ऐसा लगता है कि उसे शुरुआत से ही जनता के सामने साफ तौर पर दिखाने का इरादा नहीं था.
बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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