हमें वीडियो की टाइमस्टैम्प से पता है कि बच्चों के कथित यौन शोषण का वीडियो 2019 का था. लेकिन ऐसा लगता है कि यह सबूत सिर्फ सह-आरोपी एम शांति और उनके पति महेंद्र सिम्हन के पास था. दोनों चेन्नई के ताकतवर रुपये अरबपति से जुड़े हुए लोग हैं और कथित तौर पर इस अपराध में उनके साथी हैं. शांति के पास यह वीडियो क्यों था और इसे लीक क्यों किया गया, इसे लेकर कई तरह की बातें हैं, लेकिन इसका पता न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही चल सकता है.
हमें यह भी पता है कि 2024 के आखिर में राज्य की मशीनरी को इस मामले की जानकारी दी गई थी. उस समय तमिलनाडु कांग्रेस नेता रंजन कुमार ने पुलिस को लिखित शिकायत और वीडियो दिया था. उन्होंने पुलिस को बताया कि शांति ने अपने घर पर उन्हें यह वीडियो दिखाया था और उन्होंने अपने मोबाइल फोन से उसकी रिकॉर्डिंग की थी.
चुप्पी और मामले को दबाने की शुरुआत यहीं से होती है. पुलिस ने POCSO के तहत FIR दर्ज नहीं की. हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस नेता ने भी अपनी शिकायत को आगे नहीं बढ़ाया. उन्होंने द न्यूज़ मिनट से कहा कि यह बात ईमानदारी से कहूं तो गलत थी, लेकिन उन्होंने सफाई नहीं दी जा सकती ऐसी वजह बताई. उनका कहना था कि राजनीतिक रूप से जुड़े एक बड़े कारोबारी के खिलाफ आवाज उठाने से 2026 का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिलने की उनकी संभावना खराब हो सकती थी.
वीरमणि के सत्तारूढ़ DMK के साथ पारिवारिक और वैचारिक संबंधों को देखते हुए, जो कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी, यह सोचना समझ में आता था. लेकिन आखिर में उन्हें टिकट मिला ही नहीं. उनकी शिकायत की वजह से उन्हें टिकट नहीं मिला या नहीं, यह शायद कभी पता नहीं चलेगा.
खुल्लम-खुल्ला मामला दबाना
तमिलनाडु पुलिस ने रंजन कुमार की शिकायत को दबा दिया, इसे वीरमणि के पद और प्रभाव से जोड़कर देखा जाना कोई हैरानी की बात नहीं है. भारत के करोड़ों डॉलर वाले ग्रेनाइट उद्योग के शुरुआती बड़े कारोबारियों में से एक वीरमणि FICCI जैसे बड़े कारोबारी संगठनों में भी नजर आते रहे हैं. वह एक ऐसे बड़े कारोबारी साम्राज्य के प्रमुख हैं, जिसका कारोबार दुनिया के कई देशों तक फैला हुआ है और जिसके कई देशों में काम और ऑफिस हैं.
करीब एक साल बाद इस शिकायत को फिर से सामने लाया गया. एक NGO के प्रतिनिधि ने एक पेन ड्राइव में मौजूद आपत्तिजनक वीडियो पुलिस को दिया. यह पेन ड्राइव उसे एक गुमनाम कूरियर के जरिए मिली थी. अक्टूबर 2025 में FIR दर्ज की गई. यह बात सार्वजनिक नहीं की गई, जो आम तौर पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के मुताबिक था. पुलिस शिकायत करने वालों को FIR सार्वजनिक करने से काफी रोकती है. पुलिस का कहना है कि इससे पीड़ित की पहचान सामने आ सकती है और जांच भी खराब हो सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि POCSO और दूसरे यौन अपराधों से जुड़ी FIR को पुलिस की वेबसाइट पर डालना जरूरी नहीं है. इसका मकसद, जाहिर तौर पर, पीड़ित की पहचान की रक्षा करना है, न कि आरोपी को बचाना या मामले को छिपाना.
इसके बाद मामला एक बेहद अजीब मोड़ लेता है. चार महीने चली जांच के बाद फरवरी 2026 में एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई. इस रिपोर्ट में बहुत ही गैर-पेशेवर तरीके और खुले तौर पर मामले को दबाने की कोशिश जैसी बातें नजर आती हैं.
इसके पीछे तीन मुख्य वजहें बताई गईं. पहली, नाबालिग पीड़िता का पता नहीं लगाया जा सका. लेकिन फिर आगे की जांच के बाद वह इतनी जल्दी कैसे मिल गई? दूसरी, आरोपी वीरमणि, शांति और उनके पति ने इस शोषण के बारे में किसी भी जानकारी से इनकार किया. क्या वे कुछ और कहते? तीसरी, सड़क पर काम करने वाले दो लोगों ने कहा कि शांति के घर में किसी बाहरी व्यक्ति को जाने की इजाजत नहीं थी, जहां यह वीडियो बनाए जाने की बात कही गई थी. इनमें एक टायर रिपेयर की दुकान का मालिक और एक आंखों के अस्पताल का प्रतिनिधि था. लेकिन इसे किसी भी तरह से मामले के पक्ष में सबूत कैसे माना जा सकता है?
दबा हुआ मामला
हैरानी की बात यह है कि जून में POCSO कोर्ट द्वारा पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट खारिज किए जाने के बाद भी यह मामला पूरी तरह छिपा रहा. तब तक DMK सरकार चुनाव हार चुकी थी और विजय के नेतृत्व वाली TVK सरकार ने अभी-अभी शपथ ली थी. क्लोजर रिपोर्ट या उसे खारिज किए जाने की खबर देने पर कोई खास रोक नहीं है. POCSO Act की धारा 23 सिर्फ ऐसी जानकारी फैलाने से रोकती है, जैसे बच्चे का पता, स्कूल, परिवार की जानकारी आदि, जिससे पीड़ित बच्चे की पहचान सामने आ सकती है. तो फिर क्लोजर रिपोर्ट और उसे खारिज किए जाने की खबर क्यों नहीं दी गई?
चूंकि POCSO के मुकदमों की सुनवाई बंद कमरे में होती है, इसलिए अदालतों की खबर करने वाले पत्रकार ऐसे मामलों में पूरी तरह पुलिस से मिलने वाली जानकारी पर निर्भर रहने लगते हैं. इसलिए यह संभावना, कि मीडिया को इस मामले के बारे में कभी पता ही नहीं चला, एक सामान्य और निर्दोष वजह हो सकती है. लेकिन इसके बावजूद, यह संभावना बहुत कम है कि पुलिस और कानूनी व्यवस्था से बाहर बिल्कुल किसी को भी इसकी जानकारी नहीं थी. एक ऐसी व्यवस्था में, जहां पुरानी बाल्टी की तरह हर तरफ से खबरें लीक होती रहती हैं, यह मामला असामान्य तरीके से और पूरी तरह बंद रहा.
यह मामला अगस्त के आखिर में ही सार्वजनिक हुआ, जब वीरमणि, शांति और महेंद्र सिम्हन को गिरफ्तार किया गया. इसके बाद जांच का दायरा बढ़ गया है. इसमें और पीड़ितों का पता चलना, एक नया POCSO मामला दर्ज होना, पुलिस ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की, इसका कारण जानने की कोशिश और कई दर्जन करोड़ रुपये के वित्तीय लेन-देन की जांच शामिल है, जिसका इस्तेमाल यौन शोषण के मामले को दबाने के लिए किया गया हो सकता है.
राजनीतिक असर शुरू
बेशक, जांच की सबसे जरूरी प्राथमिकता यह देखना है कि यौन शोषण के मामले में न्याय मिले. लेकिन मुझे लगता है कि आने वाले दिनों में मीडिया का ध्यान व्यवस्था के स्तर पर मामले को दबाने और बड़े नाम वाले लोगों की संभावित भूमिका पर ज्यादा रहेगा.
सत्तारूढ़ TVK ने यह मानने में कोई संकोच नहीं किया है कि उसका मानना है कि अत्याचारों को दबाने में DMK की भूमिका थी. DMK अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे जोरदार तरीके से खारिज किया है. उन्होंने साफ कहा है कि मामले में किसी को बचाने का कोई आदेश नहीं दिया गया था और जो भी आरोपी को बचाने की कोशिश करेगा, उसे अधिकतम सजा मिलनी चाहिए.
स्टालिन ने भले ही साफ तौर पर अपनी बात रखी है, लेकिन इस मामले ने उन्हें एक असहज स्थिति में डाल दिया है. जब FIR दर्ज हुई और क्लोजर रिपोर्ट तैयार की गई, तब गृह विभाग स्टालिन के पास ही था. इसलिए स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है. क्या उन्हें यौन शोषण के आरोपों के बारे में पता था, जांच किस तरह की गई इसकी जानकारी थी और मामले को बंद करने की कोशिश के बारे में भी पता था?
अगर उन्हें पता था, तो अगला स्वाभाविक सवाल है कि उन्होंने प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की. अगर उन्हें पता नहीं था, तो फिर राजनीतिक रूप से इतने जुड़े हुए एक बड़े अरबपति से जुड़ा इतना बड़ा मामला आखिर उनकी नजर से कैसे निकल गया? विकल्प साफ है. या तो कार्रवाई करने में नाकामी हुई या फिर निगरानी रखने में नाकामी हुई.
इस बीच, TVK इस मामले का इस्तेमाल राजनीतिक फायदा लेने के लिए कर रही है. इसके कारण आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह आने वाले दो विधानसभा सीटों, धारापुरम और मदुरंतकम, के उपचुनाव में राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश कर रही है. लेकिन अगर यह राजनीतिक तूफान इन चुनावों के बाद भी तमिलनाडु की राजनीति को गर्म रखे, तो हैरानी मत कीजिए.
इस मामले ने पहले ही अपना दायरा काफी बढ़ा लिया है और इसमें कई लोग शामिल हो चुके हैं. इससे होने वाला राजनीतिक नुकसान इस बात पर निर्भर कर सकता है कि जांच से यह पता चलता है कि किसे क्या पता था, कब पता था और कितनी जानकारी थी. और इस चुप्पी और मामले को दबाने के पूरे सिलसिले में अपनी भूमिका के लिए किन लोगों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.
मुकुंद पद्मनाभन ‘क्रिया यूनिवर्सिटी’ में फ़िलॉसफ़ी के प्रोफ़ेसर और ‘द हिंदू’ के पूर्व एडिटर हैं. वे ‘द ग्रेट फ़्लैप ऑफ़ 1942’ के लेखक हैं, जो भारत और दूसरे विश्व युद्ध का एक ऐतिहासिक वृत्तांत है. वे @muk22 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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