Wednesday, 1 February, 2023
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मोहन भागवत सही हैं, हिंदुओं को ‘काफिर’ से ज्यादा किसी शब्द ने चोट नहीं पहुंचाई

दक्षिण अफ्रीका में ‘काफिर’ शब्द, जिसे पहले बड़े अपमानजनक रूप से अश्वेतों के लिए प्रयुक्त किया जाता था, को अब गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है. अब समय आ गया है कि भारत में भी ‘काफिर' शब्द पर बंदिश लगाई जाए.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत और पांच मुसलमानों- दोस्तों के एक मिले-जुले समूह के बीच करीब एक महीने पहले हुई एक बैठक के बारे में बहुप्रतीक्षित रहस्योद्घाटन ने मीडिया- प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और सबसे महत्वपूर्ण रूप से सोशल मीडिया में बहुत अधिक रोमांच पैदा कर दिया है. इस वार्तालाप में शामिल मुस्लिम सदस्यों के प्रतिनिधित्व वाले चरित्र और बातचीत के विवरण, जिसे उन्होंने आम जनता के साथ साझा करने के लायक समझा, के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है.

हालांकि ‘मुस्लिम समुदाय की असुरक्षा के बारे में उसकी चिंताओं’ और उन्हें कैसे दूर किया जाए, इस पर काफी जोर-शोर से चर्चा की गई, मगर हमेशा की तरह हिंदुओं की चिंताओं पर बहुत कम ध्यान दिया गया.

उक्त मुलाकात के दौरान भागवत ने दो मुद्दों के बारे में अपनी गहरी चिंता व्यक्त की थी और यह भी बताया था कि आम हिंदू मानस के लिए वे कितने हानिकारक हैं: पहला था, गोहत्या और दूसरा, ‘काफिर’ की उपाधि दिया जाना. पहले वाले के बारे में पहले ही कई अन्य लोग चर्चा कर चुके हैं, इसलिए मैं अपना ध्यान दूसरे वाले मुद्दे पर केंद्रित करूंगा.

मुस्लिम सदस्यों द्वारा पेश किये गए ‘माफीनामे’ में यह कहा गया कि ‘काफिर’ नास्तिकों (खुदा में ‘यकीन न रखने वालों), यानी कि सभी गैर-मुसलमानों के लिए इस्तेमाल में लाये जाने वाला लफ्ज है और इसलिए, हिंदुओं का इस बारे में बुरा मानना गलत है. उन्होंने समझाया कि इब्राहिम धर्मों में, ऐसे कुछ लफ्ज हैं जो स्पष्टता से परे हैं. सरासर गलत.

‘काफिर’ केवल एक गैर-मुस्लिम के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द नहीं है और यह एक ‘अब्राहमिक समस्या’ भी नहीं है. सबसे पुराने अब्राहमिक धर्म, यहूदी धर्म में भी गैर-यहूदियों के लिए एक शब्द है- जेंटाइल. लेकिन यह कोई अपमानजनक शब्द नहीं है. कम से कम, अब नहीं और निश्चित रूप से आम बोलचाल में उपयोग में नहीं आता है.

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गैर-ईसाईयों के लिए भी इसा तरह का कोई शब्द नहीं है. पैगन (बुतपरस्त), हेथेन (असभ्य व्यक्ति) या इनफिडेल (विधर्मी) आदि शब्द उस तरह से किसी ईसाई के ठीक विपरीत नहीं माने जाते हैं, जैसे कि ‘काफिर’ को मुसलमान के एकदम खिलाफ माना जाता है. इसी तरह, गैर-अब्राहमिक धर्मों में भी (गैर धर्मियों के लिए) कोई विपरीत शब्द नहीं है. न ही भारतीय धर्मों में गैर-हिंदू, गैर-बौद्ध, गैर-जैन या गैर-सिख के लिए कोई एक खास शब्द है.

लोगों की सबसे अच्छी तरह से पहचान उनके स्वयं के द्वारा दिए गए नामों से होती है. दूसरों द्वारा दिए गए नाम शायद ही कभी व्यक्ति को पसंद आते हैं. सभी धर्म दूसरों को विरोधी और दुश्मन के रूप में पहचाने बिना भी शांति से और समान शर्तों पर सह-अस्तित्व में रह सकते हैं. यही बहुलवाद का सार है- एक ऐसा मोडस विवेन्डी (भिन्न धर्मों या संस्थानों के बीच झगड़े का निपटारा होने तक की गई व्यवस्था) है जिसमें भारतीय मुसलमानों की हिस्सेदारी दूसरों की तुलना में अधिक है.


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इस्लाम के शीर्ष काल की उपज है यह शब्द

इस्लामी धर्मशास्त्र के ‘काफिर’ और कुरान में वर्णित ‘काफिर’ की एक-दूसरे से कोई समानता नहीं हैं. इस्लामी धर्मशास्त्र इस धर्म के शाही शीर्ष काल की एक उपज है और काफी हद तक इसके साम्राज्यवादी और सर्वोच्चतावादी चरित्र को दर्शाता है. अपने प्रारंभिक चरण के समाप्त होने से पहले ही इस्लाम ने एक साम्राज्य का स्वरूप धारण कर लिया. निश्चित रूप से इसकी शुरुआत में ही इसका राजनीतिकरण हो गया और यह जो कुछ भी हासिल कर सकता था, उसे जीतने के लिए तैयार हो गया. साथ ही, इसने उन अवधारणाओं और श्रेणियों को विकसित किया जो इसके सर्वोच्चतावादी और साम्राज्यवादी एजेंडे को आगे बढ़ाते.

‘काफिर’ शब्द भी ऐसी ही एक अवधारणा है. किसी भी अन्य शब्द ने भारतीय मनोभाव को इस कदर घायल नहीं किया है. मुस्लिम शासन के लगभग 300 वर्षों के बाद भी यदि हिंदुओं को ‘काफिर’ कहे जाने पर इतना दुख होता है, तो यह कल्पना करना कठिन नहीं होना चाहिए कि उनकी चोटिल भावना कितनी गहरी होगी.

मौखिक परिपाटियों और लोककथाओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोयी गयी ऐतिहासिक यादों की सामूहिक चेतना में गूंज इतिहास की किताबों में सुगठित (क्यूरेटेड) तथ्यों और वैचारिक व्याख्याओं की तुलना में कहीं अधिक होती है. हिंदुओं की इस चिंता को यह कहकर खारिज करना कि यदि वे इस शब्द के ‘शब्दकोषीय अर्थ’ को जानते होते, तो उन्हें इस उपाधि पर कोई आपत्ति नहीं होगी, हास्यास्पद और लापरवाही भरा दोनों ही होगा.


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बहिष्कृत, अपमानित करना और नीचा दिखाना

भारतीय इतिहास में ‘काफिर’ शब्द अपमान, बहिष्कार, शत्रुतापूर्ण रूप से पराया बनाये जाने, नस्लवादी भेदभाव और इन सबसे भी कहीं बढ़कर, अमानवीयकरण और अधिकारों से बेदखल किये जाने वाला शब्द रहा है. मुस्लिम शासनकाल के दौरान राज्य सत्ता इस्लामी सिद्धांतों द्वारा शासित होती थी. किसी भी गैर-मुस्लिम- एक हिंदू, एक ‘काफिर’ का सत्ता में वैध रूप से हिस्सा नहीं हो सकता था. एक ‘काफिर’ के पास कोई मूल अधिकार नहीं होते थे और वह पीड़ा के साथ जीता था.

मुस्लिम-काफिर बाइनरी (दोहरा विचार) अरब कबायली व्यवस्था का बड़े पैमाने पर किया गए एक पुनर्निरूपण है, जिसमें जनजाति से बहिष्कृत किसी भी व्यक्ति को जीवन का भी अधिकार नहीं होता था. अरब आदिवासीपन के इस लोकाचार ने इस्लामी मानदंडों को काफी गहराई से प्रभावित किया है.

यहां तक कि आज भी, किसी को ‘काफिर’ घोषित करके बहिष्कृत किये जाने की यह परिपाटी भारत और पूरे विश्व के स्तर पर मुस्लिम समुदाय में व्याप्त है. यह किसी मामूली वाद-विवाद पर किसी छोटे-मोटे सैद्धांतिक झगड़े के बाद भी किया जा सकता है.

‘काफिर’ घोषित होने से बड़ा कोई अपमान और खतरा नहीं है. वह शख्स न केवल अपने सभी हुकूक खो देता है बल्कि अपनी जिंदगी भी खो देता है. यदि अपने पाले के भीतर ही किसी के साथ ऐसा हो सकता है, तो एक पराजित समुदाय की दुर्दशा के बारे में कोई भी बस कल्पना ही कर सकता है. पराधीनता और अपमान की यह पीढ़ीगत स्मृति ही वह चीज है जो हिंदुओं को इस कदर सताती रहती है.

मुसलमान कम-से-कम यह तो कर ही सकते हैं कि वे अपने बिरादर-ए-वतन, अपने हमवतन के प्रति कुछ सहानुभूति दिखाएं और इस आपत्तिजनक शब्द के इस्तेमाल से दूर रहें. यदि वे ऐसा करते हैं, तो वे एक ठोस सैद्धांतिक आधार पर खड़े होंगे क्योंकि भले ही वे शाही इस्लामी धर्मशास्त्र से अलग हो गए हों लेकिन वे कुरान में लिखे के करीब होंगे.


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‘काफिर’ शब्द की जड़ों की पड़ताल

‘काफिर’ की मूल क्रिया और क्रियार्थक संज्ञा, कुफ्र एक त्रिपक्षीय उच्चारण- के-एफ-आर (कफ़ारा) है, जिसका अर्थ होता है ‘उसने (किसी चीज़) को ढका. मूल रूप से, यह किसानों द्वारा जमीन में बीज बोने की क्रिया को वर्णित करता था.

कुरान के सूरा 57, आयत 20 में ‘काफिर’ शब्द का उपयोग एक किसान के लिए किया गया जो बोए गए बीज को मिट्टी से ढक देता है. अरबी कवि रात के अंधेरे को ‘काफिर’ कहते हैं. वैचारिक रूप से, इसका तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो सत्य को छिपाता या ढकता है. इस शब्द का यही अर्थ है जो कुरान उन लोगों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल करता है जो इसके संदेश के प्रति सक्रिय रूप से दुश्मनी दिखाते हैं.

कुरान में इस शब्द का एक और अर्थपूर्ण प्रयोग उस कृतघ्न व्यक्ति के लिए किया गया है, जो ईश्वर की कृपा (खुदा की रहमत) के प्रति कृतघ्नता दिखाता है. कुरान में दर्शाया गया है कि कैसे फ़िरऔन अपने अधिकार को चुनौती देने के लिए मूसा के खिलाफ भड़क उठा था, उसे एक ‘काफिर’ कहा था क्योंकि मूसा की परवरिश उसके (फ़िरऔन के) शाही घराने में हुई थी (सूरा 26, आयत 18-19).

इन दो अर्थों के अलावा, कुरान ‘कुफ्र’ के रूप में कुछ खास व्यवहार संबंधी गुणों की पहचान करता है जैसे कि एन-वर्ड (4:37, इत्यादि ), अत्यधिक सूदखोरी या ब्याज की उच्च दर (3:130), धर्मार्थ कार्य का अश्लील प्रदर्शन (2: 264) , भौतिक लाभ के लिए धर्म का उपयोग करना (5:44) और अहंकार (2:34). हालांकि, कंजूस या सूदखोर होना चाहे कितना भी गुनाह भर हो, पर यह किसी व्यक्ति को अपने आप में ‘काफिर’ नहीं बना देता है. कुफ्र के ये लक्षण उसकी आस्था और समुदाय की परवाह किए बिना सार्वभौमिक माने गए हैं.

कुरान की कोई भी आयत केवल गैर-मुस्लिम होने के लिए किसी को ‘काफिर’ के रूप में वर्णित नहीं करती है. मुस्लिम समुदाय से संबंधित नहीं होने के कारण कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से ‘काफिर’ नहीं बन जाता. जो बात किसी को ‘काफिर’ बनाती है वह है मुसलमानों का उत्पीड़न और उनकी प्रताड़ना, उन्हें उनके मजहब को मानने से रोकने का प्रयास, उन्हें उनके घरों से बाहर निकालना और उनके खिलाफ जंग करना (2:190, 217; 47:1). हिंदुओं ने कभी भी मुसलमानों को उनके मजहब को मानने से नहीं रोका या उन्हें उनके घरों से नहीं निकाल दिया और न ही उन्हें शरणार्थी बनाया या उनके खिलाफ कोई मजहबी जंग छेड़ी. तो फिर वे ‘काफिर’ कैसे हो सकते हैं?

हिंदुओं को ‘काफिर’ की उपाधि इसलिए दी गई क्योंकि इसकी वजह एक गलत समानता थी और उनकी तुलना अरब के मुशरिकीन ( यानी, वे जो अन्य ‘काल्पनिक प्राणियों’ को ईश्वर की एकात्मकता के साथ जोड़ते हैं और इस तरह ‘शिर्क’ का पालन करते हैं) से तुलना की जाती थी. मुशरिकीन पैगंबर मुहम्मद से पहले जहिलिय्याह (अज्ञान) युग में रहने वाले एक आदिम सभ्यता वाले लोग थे. वे उम्मी थे- अनपढ़ और असभ्य. बिना किसी किताब वाले लोग.

दूसरी ओर, हिंदुओं के पास एक उन्नत सभ्यता, गहन आध्यात्मिकता और प्रबुद्ध दार्शनिक प्रणाली थी. मूर्ति पूजा से संबंधित अपने-अपने तरीकों के गलत समीकरण के आधार पर उनकी तुलना मुशरिकीन से करना एक विचारहीन समानता स्थापित करने जैसा था. वैसे तो, मुशरिकीन भी ‘काफिर’ नहीं थे, जैसा कि कुरान 98:1 और 6 से स्पष्ट होता है, जिसमें मुशरिकीन और ‘बिना किताब वाले लोगों’ के बीच में पाए जाने वाले काफिरों का उल्लेख है. इसका अर्थ है कि सभी मुशरिकीन ‘काफिर’ नहीं थे. पैगंबर मुहम्मद के चाचा अबू तालिब को कभी भी ‘काफिर’ नहीं कहा गया, हालांकि वह कभी मुस्लिम नहीं बने.

फिर भी हिंदुओं को एकदम गलत तरीके से ‘काफिर’ कहा जाता है. इस गलती को सुधारने का समय आ गया है. दक्षिण अफ्रीका में ‘काफिर’ शब्द, जिसे अपमानजनक रूप से अश्वेतों के लिए प्रयोग किया जाता था, को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है.

‘काफिर’ ‘गुलामों के कारोबार’ से जुड़ी एक विरासत है, जिसके तहत मुस्लिम गुलाम कारोबारियों ने अश्वेतों पर कब्जा जमा रखा था. तब यह वैध माना जाता था क्योंकि वे मुस्लिम नहीं थे. अमेरिका में, एन-वर्ड को प्रयोग से बाहर होने लायक बना दिया गया है और भारत में, अनुसूचित जाति के लोगों के लिए जातिसूचक नाम का उपयोग करना एक दंडनीय अपराध है.

अब समय आ गया है कि भारत में हिंदुओं और अन्य गैर-मुसलमानों के लिए ‘काफिर’ शब्द के इस्तेमाल को भी गैरकानूनी घोषित कर दिया जाए.

(इब्न खलदुन भारती इस्लाम के छात्र हैं और इस्लामी इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से देखते हैं. उनका ट्विटर हैंडल है @IbnKhaldunIndic. व्यक्त विचार निजी हैं)

संपादकीय टिप्पणी : हम लेखक को अच्छी तरह से जानते हैं और छद्म नामों की अनुमति तभी देते हैं जब हम ऐसा करना जरूरी समझते हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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