भारत में बिना किसी झिझक के अपने जैसा होना भी मौत की सज़ा बन सकता है.
यह समझना मुश्किल है कि एलजीबीटी मेकअप आर्टिस्ट और इन्फ्लुएंसर मैड संधू से आखिर किसे इतनी ज्यादा ठेस पहुंची थी कि उनकी जान ले ली गई. तीन अक्टूबर को अमृतसर में मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने 30 साल के संधू की हत्या कर दी. अपनी ज़िंदगी के आखिरी 15 दिनों में संधू का इंस्टाग्राम फीड किसी टियर-2 शहर के आम कारोबारी की डायरी जैसा था: लिप-सिंक वीडियो, शहर में उनके चलाए यूनिसेक्स सैलून ‘मैनलेन’ के लिए हाइड्राफेशियल ऑफर और “GRWMAD” वीडियो.
इनसे इस खुशमिजाज़ युवा की ज़िंदगी की थोड़ी झलक मिलती है. कुछ दिन पहले, ढीले-ढाले सलवार-कमीज पहने मैड संधू, जिनका असली नाम मधुसूदन था, ने “गुत्त फड़ू कोई दलेर गबरू” गाने पर एक रील पोस्ट की थी. इसमें एक बहादुर पंजाबी युवक को उनकी चोटी पकड़ने की चुनौती दी गई थी. 23,000 लोगों द्वारा लाइक किए गए इस वीडियो में वह अपनी थार के आसपास अदाएं दिखाते हुए चलते हैं. यह ऐसी गाड़ी थी, जिस पर उन्हें बहुत गर्व था. कुछ महीने पहले जब संधू ने यह कार खरीदी थी, तो इसने किसी तरह पंजाब के मजबूत शरीर वाले युवाओं को तुरंत मर्दानगी के संकट में डाल दिया था. एक व्यक्ति ने तो महिंद्रा डीलरशिप पर फोन करके हैरानी जताई और कहा, “आपने उसे यह कार कैसे बेच दी? अब मैं इसे ‘मर्दों की कार’ नहीं कहूंगा, यह गे कार है. फिट्टे मुंह.”
इस विवाद का संधू पर कोई खास असर नहीं पड़ा. उनकी आखिरी रील्स में भी यह कार दिखाई देती है. एक और वीडियो में उन्होंने थार के अंदर मेकअप चेक करते हुए वीडियो बनाया. इसमें कुलविंदर बिल्ला का एक गाना चल रहा था, जिसकी लाइन्स थीं, “ओह रख हौंसला, वे जट्टा रख हौंसला, फिकरां ना कर मुटियार दियां”. एक हफ्ते बाद, जब संधू लोहारका रोड पर एक कार वॉश से अपनी थार लेने गए, तो उन्हें बहुत करीब से गोली मार दी गई. फोर्टिस अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई.
संस्कृति के ठेकेदार
संधू पिछले 16 महीनों में पंजाब में मारे गए तीसरे इन्फ्लुएंसर हैं. इस साल जुलाई में खरड़ की 28 साल की इन्फ्लुएंसर मनजीत कौर के साथ उनके जान-पहचान के लोगों ने मारपीट की और उन्हें पेड़ से बांध दिया. इसके बाद उन्होंने उन्हें आग के हवाले कर दिया. दो महीने बाद चंडीगढ़ में चोटों के कारण कौर की मौत हो गई. तब तक पुलिस उनका बयान भी दर्ज नहीं कर पाई थी.
जून 2025 में कंचन कुमारी, जिन्हें कमल कौर भाभी के नाम से जाना जाता था, उनकी कथित तौर पर अमृतपाल सिंह मेहरों ने गला घोंटकर हत्या कर दी थी. मेहरों खुद को कट्टरपंथी नेता बताता था और खुद को “निहंग” सिख कहता था. मेहरों काफी समय से कुमारी को उनके आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर धमका रहा था. उनकी मौत के बाद उसने कहा था कि उसे इसके नतीजों की कोई परवाह नहीं है और इसके बाद वह गिरफ्तारी से बचने के लिए बहादुरी से यूएई भाग गया. इसके बाद कई जानी-मानी हस्तियों ने जिनमें गायक मीका सिंह और एक निहंग नेता भी शामिल थे—सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की नैतिक निगरानी और उन्हें निशाना बनाए जाने पर सवाल उठाए थे.
क्या इससे पंजाब के कट्टर सोच वाले लोगों की सोच बदली? क्या इससे “अश्लीलता” के खिलाफ उनके नैतिक अभियानों पर रोक लगी? ऐसा लगता है कि नहीं. कुछ महीने पहले, एक निहंग जत्थेदार ने कथित तौर पर संधू को चेतावनी दी थी कि उनका पहनावा और कंटेंट पंजाब की संस्कृति और युवाओं पर बुरा असर डाल रहा है. इसके बाद संधू ने सफाई देते हुए कहा था कि वह बदल गए हैं और अतीत की गलतियों को दोबारा नहीं दोहराएंगे.
पुलिस अभी यह पता नहीं लगा पाई है कि धार्मिक संगठन की ओर से मिली धमकियों या इसी तरह के मकसद रखने वाले दो अलग-अलग गैंगस्टरों की धमकियों का संधू की हत्या से कोई संबंध है या नहीं, लेकिन हत्या को सही ठहराने के लिए जिस सोच का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह काफी समय से चली आ रही है. पिछले कुछ साल में पंजाब की संस्कृति के ठेकेदारों ने जैसे जंग छेड़ रखी है और उनके हर निशाने पर ऐसा व्यक्ति रहा है, जिसके पास न हथियार था और न सुरक्षा.
संधू के मामले में दुश्मन एक ऐसा क्वीर पुरुष था, जो अपने काम से काम रखता था. उनके पिता के मुताबिक, संधू को अक्टूबर के बाद के हिस्से में बिग बॉस में वाइल्डकार्ड प्रतियोगी के तौर पर शामिल होना था. पिछले साल उन्होंने पंजाब के रखवालों की ओर से उनके लिए तय किए गए रास्ते पर चलने की कोशिश की थी. उन्होंने अमृतसर की प्राइड परेड रद्द करने का समर्थन किया था और एलजीबीटी समुदाय से अपील की थी, “अगर समाज अभी इन चीज़ों को स्वीकार नहीं करना चाहता या अभी इनके लिए तैयार नहीं है, तो हमें इसे जबरदस्ती नहीं करना चाहिए.”
पंजाब के संस्कृति के ठेकेदारों की मंजूरी पाने के लिए संधू शायद कुछ भी नहीं कर सकते थे, क्योंकि उन्हें संधू के होने से ही परेशानी थी. राज्य में अब ऐसे खुद को कौम के रखवाले बताने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो कौम की इज्ज़त बचाने और उसकी रक्षा करने का जिम्मा खुद उठाए हुए हैं. इसमें कौम दे रखे भी है, जिससे मेहरों जुड़ा था. तरना दल 96 करोड़ी भी है, जो जुलाई में लुधियाना के रख बाग पहुंच गया था. वहां उसने जोड़ों और बिना आस्तीन वाले टॉप पहनने वाली महिलाओं को “समझाने” की कोशिश की थी.
इससे कुछ दिन पहले, मनप्रीत सिंह खालसा के नेतृत्व में 20 लोगों की भीड़ लुधियाना में रंजीत कौर के घर में घुस गई थी. उनके फॉलोअर्स उन्हें भाभी चुम्मेवाली के नाम से जानते हैं. कथित तौर पर यही जत्थेदार था, जिसने संधू को धमकी दी थी. भीड़ ने रंजीत कौर और उनके पति से कैमरे पर माफी मंगवाई. बाद में खालसा ने आईटी एक्ट के तहत इस दंपति के खिलाफ अश्लीलता की शिकायत दर्ज कराई. सोशल मीडिया के कई और इन्फ्लुएंसर भी घुटने टेकने के लिए मजबूर हुए हैं: दीपिका लूथरा, जिन्हें 2024 में कृपाण के सामने झुकने के लिए मजबूर किया गया था; प्रीत जट्टी, जिन्हें ज्योतिष के वीडियो को लेकर धमकी दी गई थी.
क्या नेचुरल है और क्या अननेचुरल?
पंजाबी सोशल मीडिया पर इस समय ऐसा लगता है कि इस धर्म और संस्कृति के नाम पर खुद को सही मानने वाली सेना ने शायद ही कभी किसी चिट्टा बेचने वाली जगह पर छापा मारा हो या यौन शोषण के आरोपियों के खिलाफ उसी तरह गुस्सा दिखाया हो, लेकिन छोटे कंटेंट बनाने वालों खासकर महिलाओं और जेंडर अल्पसंख्यकों को ही इस पंथ का पूरा दबाव झेलना पड़ता है और संस्कृति की कोई भी अस्पष्ट परिभाषा किसी भी पुरुष को किसी की हत्या करने या उसके खिलाफ हिंसा करने का अधिकार देने का बहाना बन जाती है.
‘पंजाब: जर्नीज थ्रू फॉल्ट लाइन्स’ के लेखक अमनदीप संधू को इस तरह की धार्मिकता से बिल्कुल सहमति नहीं है. उन्होंने मुझसे कहा, “पंजाब ड्रग्स, खेती के संकट, बेरोजगारी और युवाओं के दूसरे देशों में जाने से खराब हो रहा है, लेकिन आप किसी को यह नहीं बता सकते कि उसे अपनी ज़िंदगी कैसे जीनी चाहिए. कुछ भी नेचुरल या अननेचुरल नहीं है क्योंकि फिर आपको पूछना होगा कि क्या जाति नेचुरल है? क्या धर्म नेचुरल है?”
संधू कहते हैं कि जो लोग मानते हैं कि क्वीर लोग पंजाब की संस्कृति को “बर्बाद” कर रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि यह ऐसी ज़मीन है जहां कभी समलैंगिकता पर रोक नहीं लगाई गई. उन्होंने कहा, “सिख सोच में अकाल पुरख (शाश्वत, समय से परे सत्ता) को ‘वह’ कहा जाता है और हम सभी उसकी आत्मिक दुल्हनें हैं. ईश्वर हम सभी में मौजूद है. अगर पहले पंज प्यारे देश के अलग-अलग हिस्सों से आ सकते थे, तो फिर कौन यह तय कर सकता है कि कौन यहां का है और कौन नहीं? कौन सा सिख किसी दूसरे इंसान की हत्या को सही मानेगा?”
लेकिन संधू ने कहा कि लोग इतने निराश और गुस्से में हैं कि वे सबसे कमजोर लोगों को निशाना बनाने लगते हैं.
उन्होंने कहा कि जिस पंथ ने कभी कर्मकांड, शुद्धता और ऊंच-नीच की व्यवस्था को खारिज किया था, वह अब इन्हीं सभी चीज़ों पर निगरानी रखने में लगा हुआ है. सिख धर्म की मुख्य शिक्षाओं में से एक है “सरबत दा भला”. यही सोच सेवा के विचार का भी आधार है. मैड संधू ने भी इसी का पालन किया था. अगस्त 2025 में जब पंजाब के 2,000 गांव बाढ़ में डूब गए थे, तब वह ज़मीन पर मौजूद थे, लोगों को मदद पहुंचा रहे थे और अपने सैलून की कमाई का हिस्सा राहत कार्यों के लिए देने का वादा कर रहे थे. यही वह व्यक्ति है, जिस पर राज्य की संस्कृति को खराब करने का आरोप लगाया गया.
मैड संधू को पंजाब से साफ तौर पर बहुत प्यार था. अफसोस, पंजाब उनके प्यार का जवाब नहीं दे सका.
करनजीत कौर पत्रकार हैं, Arré की पूर्व संपादक हैं और TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
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