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प्रतीकात्मक तस्वीर : फ्लिकर
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पुलवामा मुठभेड़ से स्पष्ट है कि कश्मीर में एक त्रासदी जारी है, पर राष्ट्रवादी जोश से भरे सत्ता में बैठे लोग इस सोच में मगन हैं कि ‘बलप्रयोग’ की उनकी नीति कामयाब हो रही है और इससे समस्या हल हो जाएगी.

जम्मू कश्मीर में आज सबसे बड़ी चुनौती अलग-थलग पड़े वे युवा हैं जो कि मौत से भी नहीं डरते. पुलवामा ज़िले के सिरनू गांव में 15 दिसंबर को हुई मुठभेड़, जिसमें एक सैनिक, तीन आतंकवादियों और सात प्रदर्शनकारियों की मौत हुई और करीब दो दर्जन प्रदर्शनकारी घायल हुए, राज्य में 2016 से ही स्पष्ट इस प्रवृत्ति का एक आम उदाहरण है.


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सुरक्षा बल आतंकवादियों को ख़त्म कर सकते हैं, सीमित बलप्रयोग कर क्रोधित लोगों की सामान्य भीड़ को नियंत्रित कर सकते हैं, पर वे मौत का भी खौफ़ नहीं रखने वाले युवा प्रदर्शनकारियों को काबू नहीं कर सकते. अक्सर परिस्थितिवश या घबराहट में बेहिसाब ‘अंधाधुंध गोलीबारी’ की जाती है जिसमें बड़ी संख्या में लोग मरते हैं, जो घाटी और शेष भारत के विभाजन को बढ़ाने का काम करता है.

बेशक, जम्मू कश्मीर हमेशा देश का अभिन्न हिस्सा रहेगा. पर सवाल ये है कि क्या हम एक इलाक़े को वहां की आबादी की परवाह किए बिना नियंत्रण में रखने को लेकर निश्चिंत हो गए हैं?

आतंकवादरोधी अभियानों का पैटर्न

जम्मू कश्मीर में आज अधिकांश आतंकवादी स्थानीय लोग हैं और वे, ख़ासकर सर्दियों में, गांवों से अपनी गतिविधियां चलाते हैं. सेना, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और जम्मू कश्मीर पुलिस (जेकेपी) विशिष्ट सूचनाओं के आधार पर संयुक्त आतंकवादरोधी अभियान चलाते हैं. सीआरपीएफ और जेकेपी प्रदर्शनकारियों को दूर रखने के लिए पुलिसिया तरीकों से बाहरी घेरा बनाती हैं, जबकि भीतरी घेरा बनाकर आतंकवादियों को ख़त्म करने का ज़िम्मा सेना पर होता है. लक्ष्य जितना जल्दी हो सके ऑपरेशन को पूरा करने और भीड़ जुटने से पहले इलाक़े से बाहर निकलने का होता है.

आतंकवादियों के युवा समर्थक बेहद संगठित हैं. वे सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए स्पॉटर्स तैनात रखते हैं और सुरक्षा अभियान से पहले ही या फायरिंग की आवाज़ सुनते ही सोशल मीडिया या मस्जिदों के लाउडस्पीकरों की सहायता से आतंकवादियों को सावधान कर देते हैं. पत्थरों की बोरी लिए लड़के चारों ओर से मुठभेड़ स्थल तक पहुंचकर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में बाधा डालते हैं. ऐसा करते हुए वे आतंकवादियों के लिए भागने का मौक़ा उपलब्ध कराते हैं या फिर फुर्ती से मृतकों की लाशें उठा ले जाते हैं, जिन्हें प्रदर्शित कर बाद में भीड़ जुटाई जाती है. सामूहिक जनाज़े निकाले जाते हैं और लाशों को दफ़नाए जाते समय आतंकवादी बंदूकों से सलामी देते हैं.


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आतंकवादियों की रणनीति सुरक्षा बलों को बेहिसाब बलप्रयोग के लिए उकसाने की होती है ताकि ‘कश्मीर में सेना द्वारा दमन’ का दुष्प्रचार फैलाया जाए, और युवाओं को आतंकी गुटों से जोड़ने के लिए प्रेरित किया जा सके.

भीड़ से सामना होने पर सीआरपीएफ/जेकेपी के जवान पुलिसिया तरीकों के अनुरूप चेतावनी के लिए फायरिंग करते हैं, ताकि प्रदर्शनकारियों को दूर रखा जा सके, और ज़रूरत पड़ने पर न्यूनतम बलप्रयोग करते हैं. कई बार अकेले सैनिक या छोटे सैनिक दस्ते को भीड़ घेर लेती है. भीड़ के हाथों लिंचिंग का खतरा देख उन्हें फायरिंग करनी पड़ती है, और इस तनावपूर्ण माहौल में बेहिसाब बलप्रयोग होने की परिस्थिति बन सकती है. ऐसी परिस्थितियों में प्रशिक्षण, अनुशासन, तय नियमों का पालन या भीड़ को काबू में रखने के आधुनिक तरीके भी गलतियों की गुंजाइश भर कम सकते हैं, और कुछ नहीं.

अलगाव की स्थिति का दोहन

मुश्किल परिस्थितियों से बेहिसाब बलप्रयोग का औचित्य सिद्ध नहीं हो जाता है. ऐसे तमाम मामलों की सुरक्षा बलों से जांच कराई जानी चाहिए और दोषियों से सेना/सीआरपीएफ/जेकेपी के संबंधित प्रावधानों के तहत निबटा जाना चाहिए. ऐसा नहीं होने पर घाटी में अलगाव और बढ़ेगा.

बहुत कम समय बचा है. 1990 के बाद की पीढ़ी का अलगाव तीन दशकों से जारी हिंसा का नतीजा है. इस पीढ़ी ने सामान्य जनजीवन नहीं देखा है. धार्मिक प्रचारक और पाकिस्तान इनकी मानसिकता, निराशा और गुस्से का दोहन कर रहे हैं.

एक समग्र सामाजिक एवं राजनीतिक पहल की अनुपस्थिति विद्रोह के पुनरोदय की परिस्थितियां तैयार कर रही है. आम लोगों के मारे जाने से उपजे गुस्से की लहर घाटी के साथ-साथ एक दशक से शांत रहे पुंछ, राजौरी और डोडा ज़िलों के पीरपंजाल के पश्चिम और दक्षिण स्थित मुस्लिम बहुल इलाक़ों को अपने आगोश में ले रही है.


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आतंकी गुटों से जुड़ने वालों की कमी नहीं है. आतंकी सरगनाओं की समस्या इन नए आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने और उन्हें हथियार और गोला-बारूद से लैस करने की है, जो कि नियंत्रण रेखा पर सख्त घुसपैठरोधी उपायों के कारण आसान नहीं रह गया है.

इन सबके चलते, भविष्य में आतंकवादी ‘अप्रत्यक्ष हमले’ बढ़ा सकते हैं, जिस पर मैं अपने पहले के कॉलम में चर्चा कर चुका हूं. इस परिस्थिति में, अलग-थलग पड़े और मौत से बेखौफ़ युवाओं का आत्मघाती हमलों में इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसाकि तालिबान/आइसिस/एलटीटीई कर चुके हैं. हाजिन में एक अवयस्क आतंकवादी की मौत में हमें भावी पैटर्न के पर्याप्त संकेत मिल चुके हैं.

जोड़ने की कोशिश आवश्यक है

वर्तमान में, स्थिति सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है. उनकी रणनीति घुसपैठरोधी उपायों को अधिक मज़बूत बनाकर और आतंकवादरोधी अभियानों को लगातार जारी रखते हुए विद्रोह के पुनरोदय ना होने देने की रहनी चाहिए.

बेहतर रणनीति, प्रशिक्षण और समन्वय के सहारे मुठभेड़ स्थलों पर आम नागरिकों की मौत से बचा जाना चाहिए. औचक और त्वरित कार्रवाई का फायदा उठाया जाना चाहिए. भीड़ के सुरक्षाबलों की राह में आने पर सुरक्षा अभियान को रद्द करना समझदारी भरा कदम साबित हो सकता है. जनप्रदर्शनों से चतुराई से निबटना और उन्हें समय रहते रोका जाना चाहिए, जैसा कि इस सोमवार ‘बादामी बाग मार्च’ के मामले में किया गया. इस समय बड़ी संख्या में आम लोगों की मौत या मानवाधिकारों का जानबूझकर उल्लंघन हमें वर्षों पीछे धकेल सकता है.

नेताओं, मीडिया और नव-राष्ट्रवादियों को जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप के खेल से बचना चाहिए. यह राष्ट्र और सुरक्षा बलों के हितों के लिए नुकसानदेह है. शासन को जम्मू कश्मीर के लोगों तक पहुंचना चाहिए. एक व्यापक जनसंपर्क अभियान, ख़ास कर कश्मीरी युवाओं के पर केंद्रित, के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैरसरकारी संगठनों की भी सेवाएं ली जानी चाहिए.

सभी राजनीतिक दलों को एक समग्र राजनीतिक पहल में सरकार का साथ देना होगा. जैसा मैंने अपने 6 दिसंबर के कॉलम में लिखा है, 2019 की गर्मियों तक इस पहल के लिए उपयुक्त अवसर बन चुका होगा. यदि हमने इस मौक़े को गंवाया, तो निश्चय ही जम्मू कश्मीर के आतंकवादी और पाकिस्तान इसका इस्तेमाल विद्रोह को हवा देने में करेंगे.

(ले.जन. एच.एस. पनाग पीवीएसएम, एवीएसएम (से.नि.) ने भारतीय सेना को 40 साल तक अपनी सेवाएं दी हैं. वे उत्तरी तथा सेंट्रल कमान के प्रमुख रहे. सेवानिवृत्त होने के बाद वे आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य भी रहे.)

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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