जम्मू-कश्मीर के पुंछ में तैनात भारतीय सेना का जवान. (फोटो: पीटीआई)
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पिछले एक महीने के दौरान जम्मू कश्मीर में स्नाइपर हमलों में हमारे सुरक्षा बलों के हताहत होने की कई खबरें सामने आई हैं. यों तो नियंत्रण रेखा पर संघर्ष में स्नाइपर हमले पहले से होते रहे हैं, लेकिन कथित स्नाइपर आतंकवादियों ने घाटी में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा सुरक्षा बलों को चौंका दिया है.

खुफिया रिपोर्टों से लगता है कि जैश-ए-मोहम्मद के दो स्नाइपर जोड़े घाटी में घुस आए हैं. सितंबर 2018 से कश्मीर के भीतरी इलाकों में हमलों में हुई तीन मौतों के लिए स्नाइपर आतंकवादियों को ज़िम्मेवार ठहराया गया है.

ये घटनाएं आम चर्चा का मुद्दा बन गई हैं, खासकर इसलिए कि नियंत्रण रेखा पर स्नाइपर हमलों में सुरक्षा बलों के हताहत होने की खबरें पहले से ही आ रही थीं.

स्नाइपर की हर गोली मारक

स्नाइपिंग या दूर से अचूक निशानेबाज़ी सशस्त्र संघर्ष के सबसे सस्ते साधनों में से एक है– सुरक्षा बलों और आतंकवादियों दोनों के लिए.

खुफिया सूचनाओं, टोही मिशन और सतर्क निगरानी के बल पर हमलावर बहुत दूर से मार कर सकते हैं. इससे संबंधित विश्व रिकॉर्ड कनाडा के एक स्नाइपर के नाम है जिसने पिछले साल इराक़ में 3,540 मीटर दूर से अपने ‘शिकार’ को मार गिराया था. निशानेबाज़ बंदूकचियों का इस्तेमाल बंधक वाली स्थिति में लोगों के बीच मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ़ भी किया जाता है, और मुठभेड़ की उन परिस्थितियों में भी जब स्नाइपर निगरानी रखने की स्थिति में हो.

चूंकि स्नाइपर हमलावर बहुत ही कुशल होते हैं, इसलिए उनकी हरेक गोली मारक होती है. जम्मू कश्मीर में एक आतंकवादी को मार गिराने में करीब 5,000 राउंड गोलियों का इस्तेमाल होता है. जबकि स्नाइपर हमलों के संदर्भ में यह औसत मात्र 1.3 राउंड का है.


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एक सफल स्नाइपर के लिए ज़रूरी है कि वह शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से मज़बूत, सैन्य क्षेत्र की रणनीतियों को समझने वाला और अचूक निशाने लगाने वाला हो. वह छुपने की कला में माहिर और दुश्मन को फंसाने में शातिर होगा; और उसमें अपना लक्ष्य निश्चित रूप से हासिल करने का धैर्य होगा. स्नाइपर किस मिट्टी के बने होते हैं इसे ‘एनमी एट द गेट्स’ फिल्म में वैसिली ज़ेयत्सेव (रूसी सेना) और मेजर इर्विन (जर्मन सेना) के बीच स्नाइपिंग मुकाबले के ज़रिए बखूबी चित्रित किया गया है.

एक स्नाइपर निशानेबाज़ को वैज्ञानिक सूझबूझ वाला होना चाहिए जो लंबी दूरी से दागी गई गोली की चाल का अनुमान लगा सके, जो कि गुरुत्व बल, हवा की गति, दिशा और दबाव, ऊंचाई, तापमान, नमी और अपकेंद्री बल जैसे कई कारकों से निर्धारित होती है. लंबी दूरी से स्नाइपर हमले में विपरीत दिशा में बह रही मामूली हवा भी लक्ष्य से हटकर निशाना साधने को अपरिहार्य कर देती है, जो सटीक गणना से ही संभव है.

लंबे समय तक एक खास तरह की ट्रेनिंग और अपेक्षाकृत महंगे उपकरण की ज़रूरत के कारण आतंकवादी संगठन स्नाइपर के इस्तेमाल को प्राथमिकता नहीं देते हैं. आतंकवादी संगठनों के उद्देश्य सैन्य क्षेत्र की रणनीति संबंधी कम अवधि की ट्रेनिंग और कम दूरी के एके-47 जैसे हथियारों के प्रभावी उपयोग से ही पूरे हो जाते हैं.

आतंकवादियों की रणनीति में बदलाव

जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों की रणनीति में बदलाव उनकी घटती संख्या और एक असरदार सुरक्षा जाल को भेदने में उनकी असमर्थता के कारण आया है.

मुझे नहीं लगता वे लंबी दूरी वाली उच्च कोटि की राइफलों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अधिक से अधिक ये हो सकता है कि उन्होंने ऐसे निशानेबाज़ों को भर्ती किया हो जो कि अमेरिकी सेना की एम4 राइफल जैसी कोई सामान्य आधुनिक राइफल काम में ला रहे हों, जिन पर दिन और रात में 500 मीटर दूर से निशाना साधने के लिए एक दूरबीन उपकरण लगा होगा.


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यह एक सस्ता विकल्प होगा, क्योंकि अभी तक एके-47 से हमलों में आतंकवादी 20-50 मीटर तक ही मार कर पा रहे थे. हो सकता है पाकिस्तानी सेना के स्पेशल सर्विस ग्रुप के कुछ सदस्यों को भी लगाया गया हो जिनके पास अत्याधुनिक स्नाइपर राइफल हों. राज्य में जारी छद्म युद्ध में निशानेबाज़ों और स्नाइपर बंदूकचियों का इस्तेमाल गेम-चेंजर साबित हो सकता है. इस नए खतरे के असर को कम करने के लिए सुरक्षा बलों को अतिरिक्त ऐहतियाती उपाय करने होंगे.

संघर्ष के इस नया आयाम के मद्देनज़र भारतीय सेना को अपने स्नाइपर जवानों की ज़्यादा प्रभावी ढंग से तैनाती पर विचार करना होगा, जो दुश्मन के निशानेबाज़ों और स्नाइपर हमलावरों के खिलाफ़ सर्वाधिक असरदार विकल्प हैं. जहां तक मेरी जानकारी है, हमने अब तक स्नाइपर हमले में किसी आतंकवादी को नहीं मारा है. नियंत्रण रेखा पर भी स्थिति कोई अलग नहीं है.

हमारे पास कोई 5,000 ड्रैगुनोफ़ स्नाइपर राइफल हैं जो 1,300 मीटर तक असरदार ढंग से मार कर सकती हैं. यह संख्या इन्फैंट्री/विशेष बल/असम राइफल्स/राष्ट्रीय राइफल्स की प्रति बटालियन 10 की बैठती है. हाल ही में ऐसी खबरें सामने आई हैं कि भारतीय सेना ड्रैगुनोफ़ स्नाइपर राइफलों को बदलने के लिए 982 करोड़ रुपये की लागत पर 5,000-6,000 आधुनिक स्नाइपर राइफल आयात करने की प्रक्रिया आरंभ कर रही है. हैरत की बात है कि अब भी 1,500 मीटर से ऊपर की रेंज वाली विशेष स्नाइपर राइफलों को शामिल करने की कोई योजना नज़र नहीं आ रही है.

हमारे स्नाइपर कहां हैं?

तो हमारे स्नाइपर हैं कहां? क्यों हम उनका प्रभावी इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं? इन सवालों का जवाब इस प्रसिद्ध कहावत में है- असल दम बंदूक में नहीं बल्कि बंदूकची में होता है. हम अपने स्नाइपर निशानेबाज़ों में ज़रूरी कुशलता विकसित कर पाने में नाकाम रहे हैं. वे एक ‘निशानेबाज़’ मात्र हैं, किसी आम सैनिक से बेहतर पर निश्चय ही कुशल स्नाइपर नहीं.

‘स्नाइपर’ की कोई विशिष्ट कोटि नहीं है, बस औसत से बेहतर किसी भी सैनिक को थोड़ा प्रशिक्षण देकर स्नाइपर राइफल थमा दी जाती है. उनके पास विशेष पोशाक और उपकरण नहीं होते हैं. उनके प्रशिक्षण के लिए न तो सिम्युलेटर हैं और न ही पर्याप्त कारतूस दिए जाते हैं. इन्फैंट्री स्कूल में संचालित स्नाइपर कोर्स में गुणवत्ता का अभाव है.

हमारे स्नाइपरों में कुछ ही स्नाइपर बनने की सर्वमान्य कसौटी पर खरा उतर सकते हैं, जिसमें पहली ही बार में 600 मीटर दूर से ‘हेड शॉट’ और 1,000 मीटर से ‘बॉडी शॉट’ लगाना होता है. यदि कोई स्नाइपर इस परीक्षा में पास नहीं होता हो, उसे स्नाइपर का तमगा नहीं मिलता और वह महज़ निशानेबाज़ भर रह जाता है.


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ऐसे में समाधान क्या है? मेरे हिसाब से स्नाइपर सैनिकों के प्रशिक्षण को सिरे से बदलना होगा. सैनिकों की एक विशिष्ट ‘स्नाइपर’ कोटि बनानी होगी. हमें अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर चयनित 100 शुरुआती स्नाइपरों को पश्चिमी देशों की सेनाओं के स्नाइपर प्रशिक्षण केंद्रों में ट्रेनिंग दिलानी होगी ताकि कुशल स्नाइपर प्रशिक्षकों का एक दल तैयार हो सके. सामान्य स्नाइपर राइफलों के अलावा हमें अपने ‘सुपर स्नाइपर’ दस्ते के लिए लंबी दूरी तक मार करने वाली विशिष्ट स्नाइपर राइफलों का भी आयात करना होगा. साथ ही हमें अपने स्नाइपरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की पोशाकों और उपकरणों से भी सुसज्जित करना होगा.

इन सुधारों को कार्यान्वित किए बगैर, चाहे जिस किस्म की राइफल आयात कर लें, हम मात्र निशानेबाज़ ही पैदा करते रहेंगे न कि असल स्नाइपर, और जम्मू कश्मीर के बदले हालात में हम चोट खाते रहेंगे.

(ले.जन. एच.एस. पनाग पीवीएसएम, एवीएसम (आर) ने भारतीय सेना को 40 साल तक अपनी सेवाएं दीं. वे उत्तरी तथा सेंट्रल कमान के जीओसी एन सी रहे. सेवानिवृत्त होने के बाद वे आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के सदस्य थे.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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