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सेना की प्रतीकात्मक तस्वीर | वसीम अंद्राबी/हिंदुस्तान टाइम्स वाया गेटी इमेजेज
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असम के तिनसुकिया ज़िले के डांगारी में हुई हत्याओं के लिए सात रिटायर्ड फ़ौजियों को आजीवन क़ैद की सज़ा सुनाई गई. पर क्या ये आरोपियों और भारतीय सेना के बीच कोई गुपचुप समझौता है?

असम के तिनसुकिया ज़िले के डांगारी गांव में एक शवदाह स्थल पर लगाए गए पत्थर पर लिखा है- ‘हम पांच बेकसूर, निहत्थे युवक- प्रबीन, अखिल, प्रदीप, देबजीत, और भबेन- यहां भारतीय राज्य-व्यवस्था के बर्बर अत्याचारों के गवाह के रूप में चिरनिद्रा में सो रहे हैं. आप यहां से लौटने के बाद हरेक व्यक्ति को बताइए कि भारतीय सेना कितनी बर्बर है’. इस स्मृतिशिला को उत्तर-पूर्व से लेकर जम्मू-कश्मीर और ‘रेड कॉरिडोर’ तक हर जगह सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए आतंकवादियों/बाग़ियों/उग्रवादियों के रिश्तेदारों, तथा समर्थकों की ओर से लगाई गई ऐसी अनेक स्मृतिशिलाओं में ही एक माना जा सकता है.

लेकिन इस मामले में शिला पर लिखे शब्दों को घटना के 24 साल बाद 16 से 27 जुलाई 2018 को हुए ‘समरी जनरल कोर्ट मार्शल’ (एसजीसीएम) में सही पाया गया. 13 अक्टूबर को एसजीसीएम ने सात रिटायर्ड फौजियों को आजीवन कैद की सज़ा सुना दी, जिसे उपयुक्त महकमे की पुष्टि के बाद लागू कर दिया जाएगा.

इन सात रिटायर्ड फौजियों में एक मेजर जनरल, दो कर्नल, दो मानद कैप्टन और दो नॉन कमीशन्ड अफसर शामिल हैं. यह सज़ा उन्हें 22/23 फरवरी 1994 की रात तिनसुकिया ज़िले में पांच लोगों की गैरन्यायिक हत्या के लिए दी गई. इस मामले में ‘अंतिम विकल्प’ के तौर पर जानबूझकर मानवाधिकार के उल्लंघन से भी बुरी बात यह हुई कि इन फ़ौजियों ने राज्यतंत्र की साठगांठ से इस अपराध की व्यवस्थित लीपापोती की.

मामला क्या था

17/18 फरवरी 1994 की रात ढोला में तैनात 18 पंजाब बटालियन ने तिनसुकिया ज़िले के तलप इलाके में विभिन्न जगहों से ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के नौ सदस्यों को उठा लिया. इन पर शक था कि ये लोग 15 फरवरी को असम फ़्रंटियर टी एस्टेट के जनरल मैनेजर रामेश्वर सिंह की हत्या के मामले में शामिल थे.

22 फरवरी को गुवाहाटी हाइकोर्ट में एक बंदी-प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई, जिसमें मांग की गई कि सेना इन नौ लोगों को किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष या सबसे करीब के पुलिस थाने में पेश करे. हाइकोर्ट के आदेश का पालन करने की जगह 18 पंजाब ने इनमें से चार लोगों को 23 फरवरी को अलग-अलग स्थानों पर रिहा कर दिया, और यह खबर दे दी कि उल्फ़ा के पांच सदस्य डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क में उग्रवादी कैंप लगाने के दौरान मुठभेड़ में मारे गए.


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उनके शवों पर यातना देने और घोर बर्बरता के निशान थे. रिहा किए गए चार लोगों को भी यातनाएं दी गई थीं. इन लोगों ने ढोला कैंप में उक्त पांच लोगों की मौजूदगी की पुष्टि की. जिस नाविक ने 18 पंजाब के सैनिकों और मारे गए लोगों को मुठभेड़ स्थल तक पहुंचाया था वह रहस्यमय रूप से गायब हो गया, लेकिन बाद में उसने सीबीआई के समक्ष गवाही दी.

एक साथ दो जांच की गई- एक सेना ने की, दूसरी पुलिस ने की. ये दोनों जांच परस्पर विरोधी नतीजों पर पहुंची. सेना ने इसे वैध मुठभेड़ बताया, तो पुलिस ने इसे नृशंस गैरन्यायिक हत्या कहा. हाइकोर्ट ने 2001 में सीबीआई जांच का आदेश दे दिया, जिसने कमांडिंग अफसर कर्नल ए.के. लाल, दो अन्य अधिकारियों तथा दूसरे रैंक के चार फ़ौजियों को पांच लोगों की हत्या का दोषी ठहराया. उनके खिलाफ़ 30 मई 2002 को आरोपपत्र दायर किया गया.

मुकदमा आगे नहीं बढ़ सका क्योंकि सेना ने ‘अफस्पा’ लागू कर दिया. अंततः सुप्रीम कोर्ट ने 1 मई 2012 को मामले की सुनवाई की, और सेना को दो विकल्प दिए- या तो वह कोर्ट मार्शल से मुकदमा चलाए या ‘अफस्पा’ की धारा 6 के तहत केंद्र सरकार से ज़रूरी मंज़ूरी लेकर क्रिमिनल/सीबीआई अदालत में मुकदमा चलाए.

परस्पर विरोधी रुख

असम के मुख्यमंत्री सरबानन्द सोनोवाल और वरिष्ठ पदाधिकारी जगदीश भूयान पहले ‘आसू’ और फिर असम गण परिषद के हिस्से के तौर पर पीड़ितों को न्याय दिलाने के लंबे संघर्ष में अग्रणी रहे. दोनों नेताओं ने फैसले का स्वागत किया है और सेना की तारीफ की है. मानवाधिकारवादियों ने फैसले को मील का पत्थर बताया और कहा कि सेना ने अपनी गलती सुधारी है. मीडिया ने भी एसजीसीएम के फैसले का स्वागत किया है.

लेकिन नेताओं, सेना, और मीडिया का यह रुख जम्मू-कश्मीर में होने वाले ऐसे ही मामलों के प्रति उनके रुख के एकदम विपरीत है. इस मामले में किसी ने भी ‘पीड़ित फ़ौजियों’ का समर्थन नहीं किया, जिनका दावा है कि वे तो बस अपना फर्ज़ निभा रहे थे.


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पथरीबल मामले में सेना का रुख गौरतलब है. डांगारी और पथरीबल, दोनों मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने 1 मई 2012 को की थी. सुप्रीम कोर्ट ने सेना को दो विकल्प दिए थे- या तो वह आरोपियों पर कोर्ट मार्शल से मुकदमा चलाए या ‘अफस्पा’ की धारा 6 के तहत केंद्र सरकार से ज़रूरी मंज़ूरी लेकर क्रिमिनल/सीबीआई अदालत को उनके बारे में फैसला सुनाने को कहे.

पथरीबल मामले को 24 जनवरी 2014 को कमांडिंग अफसर ने सुनवाई के स्तर पर ही बंद कर दिया, क्योंकि उनके मुताबिक प्रथम दृष्ट्या मामला बनाने के लायक सबूत नहीं थे. डांगारी मामले में 1 मई 2012 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पाने के बाद छह साल तक टालमटोल करने के बाद सेना ने अचानक एसजीसीएम क्यों कराने का फैसला किया यह समझ पाना मुश्किल है. मामला एकदम अलग किस्म का तो है मगर सेना मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर क्षेत्रीय, राजनीतिक, या जनसांख्यिकीय आधार पर कोई रुख अपनाती है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

क्या डांगारी मामला बंद होने के कगार पर पहुंच गया है? मेरा ख्याल है, नहीं. आरोपियों को फैसले के खिलाफ़ सेना के ट्रिब्यूनल में सीओएएस/केंद्र सरकार के आगे, और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है.

एक फरेब

इससे ज़्यादा, इसके साथ एक कानूनी मुद्दा जुड़ा है, जो उन्हें बरी करवा सकता है. आर्मी एक्ट 1950 की धारा 122 स्पष्ट रूप से कहती है कि इस एक्ट के दायरे में आने वाले व्यक्ति पर इन हालात में कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता- अगर अपराध की तारीख से तीन साल बीत गए हों; या पीड़ित व्यक्ति अथवा कार्यवाही करने वाले सक्षम अधिकारी को जिस दिन पहली बार अपराध का पता चला हो उसके बाद तीन साल बीत गए हों; या आरोपी की पहली बार पहचान होने की तारीख से तीन साल बीत गए हों.

आर्मी एक्ट 1950 संसद से पारित कानून है और धारा 122 के प्रावधान निरंकुश हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट कई बार आरोपी के पक्ष में जायज़ ठहरा चुका है. इसलिए एसजीसीएम कानूनी तौर पर बेमानी हो जाता है. मुकदमा क्रिमिनल कोर्ट में चलाया जाना चाहिए था, जिसके लिए केंद्र सरकार की मंज़ूरी कानूनी तौर पर ज़रूरी है क्योंकि मामला ‘अफस्पा’ के अंतर्गत आता था.


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आश्चर्य की बात है कि मई 2012 में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं या बचाव पक्ष इसे सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में नहीं लाया. रहस्यमय बात यह भी है कि न तो मामला दायर करने वाले महकमे ने और न ही एसजीसीएम की कोर्ट ने भी इस पहलू पर गौर किया. आरोपी ने इस मुद्दे को इसलिए नहीं उठाया होगा कि उसे पता था कि अपील के स्तर पर उसका पक्ष मज़बूत है.

अगर सेना और आरोपियों ने न्याय व्यवस्था को बेमानी बनाने के लिए कोई गुप्त समझौता किया तो यह शर्मनाक ही है. मेरे विचार में, डांगारी एसजीसीएम एक फरेब ही था, जहां इंसाफ में न केवल देर की गयी बल्कि इंसाफ किया ही नहीं गया.

(ले.जन. एच.एस. पनाग पीवीएसएम, एवीएसम (आर) ने भारतीय सेना को 40 साल तक अपनी सेवाएं दीं. वे उत्तरी तथा सेंट्रल कमान के जीओसी एन सी रहे. सेवानिवृत्त होने के बाद वे आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के सदस्य थे.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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