news on 1971 war
ले.जन. एच.एस. पनाग (बैकग्राउंड इमेज) उस बटालियन का हिस्सा थे जिसने पाकिस्तानी वायुसेना के पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट परवेज़ कुरैशी मेहदी (इनसेट) को पकड़ा था. (फोटो: Twitter/@rwac48/thepakteahouse.blogspot.com)
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बांग्लादेश की मुक्ति का युद्ध शुरू तो हुआ 3 दिसंबर 1971 को, लेकिन भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान की ओर ‘आगे बढ़ने’ की शुरुआत नवंबर के दूसरे सप्ताह में ही कर दी थी. इतिहास के उस शानदार दौर का एक दिलचस्प किस्सा मैं कहना चाहता हूं, जो बेशक आज एक ‘फुटनोट’ बन गया है.

तब मैं सिख रेजीमेंट की चौथी बटालियन (4 सिख) का ‘एड्जुटैंट’ (फौजी कार्रवाई के कामों के लिए जिम्मेदार अधिकारी) था. इस बटालियन ने 11 नवंबर से ही बोयरा नामक स्थान के उत्तर अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास छह किलोमीटर अंदर और आठ किलोमीटर लंबे क्षेत्र पर धीरे-धीरे कब्जा जमा लिया था.

20 नवंबर को हमें आदेश मिला कि जेस्सोर से 15-20 किमी उत्तर-पश्चिम में चौगाचा में काबाड़ाक नदी को पार करने के लिए पुल तैयार करो. दोपहर से पहले टैंकों की अगुआई में हम छोटे-मोटे प्रतिरोधों का सामना करते हुए तेजी से आगे बढ़ते गए. चौगाचा में सेना और टैंकों ने पुल तक पहुंचने की कोशिश की, मगर दुश्मनों ने उसे उड़ा दिया था.


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नदी के उस पार दुश्मन जमा हुआ था और हमने पश्चिमी किनारे पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली तथा नदी पार हमला करने की योजना बनाने लगे.
हम जहां थे वहां से 10 किमी दक्षिण-पश्चिम में 14वीं पंजाब रेजीमेंट ने बिना किसी प्रतिरोध के नदी पार कर ली थी और गरीबपुर गांव के पास अस्थायी पुल भी बना लिया था. इस पुल पर पाकिस्तान की पंजाब रेजीमेंट की छठवीं बटालियन ने 21 नवंबर को तड़के ही गहरे धुंध में हमला कर दिया. जबरदस्त जंग के बाद हमने दुश्मनों को भारी नुकसान पहुंचाते हुए पीछे धकेल दिया.

धुंध छंटते ही पाकिस्तानी वायुसेना (पीएएफ) जोरदार हरकत में आ गई. 21 नवंबर से 22 नवंबर की दोपहर तक उसने मुख्यतः चौथी सिख तथा 14वीं पंजाब बटालियन पर हमले करने के लिए 24 उड़ानें भरीं. हमने हवाई सुरक्षा के लिए कई बार अपील की मगर उसे मंजूरी नहीं मिली क्योंकि तब तक युद्ध की औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी.

22 नवंबर को 3 बजे मैं साजो-सामान के अपने अड्डे से यूनिट मुख्यालय की ओर लौट रहा था, कि मैंने देखा कि तीन पाकिस्तानी सेबर विमान हमारी तरफ आ रहे हैं. शायद वे दिन ढलने से पहले आखिरी हमला करना चाहते हों. ये विमान काफी नीचे आकर हमारे ठिकानों पर हमले कर रहे थे. वे जर्मन स्टूका बमवर्षकों की तरह 2000 फुट तक ऊपर जाते और 500 फुट तक नीचे आकर हमले कर रहे थे. हमारे मीडियम मशीनगन और लाइट मशीनगन इन विमानों से लोहा ले रहे थे.

अचानक, पूरब की दिशा से उनके चार विमानों का एक मिशन उभरा और मेरे सिर के ऊपर एक पेड़ की ऊंचाई पर से गुजर गया. मेरी जीप लहरा गई और मुझे लगा कि पीएएफ ने चौगाचा पर हमारे संभावित हमले को रद्द करवाने के लिए अपना पूरा 14 स्क्वाड्रन झोंक दिया है.


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कुछ ही क्षण बाद दूसरे मिशन के तीन विमान अलग होकर सेबर विमानों की ओर चले गए, जबकि सेबर विमान इससे अनजान, गोता लगाकर हमले करने में जुटे थे. जाहिर था कि हमारे नैट विमान इस लड़ाई में शामिल हो गए थे. मैं जीप रोक कर इंतज़ार करने लगा कि ‘नोकझोंक’ कब शुरू होती है. यह कभी हुई नहीं क्योंकि चार में से तीन नैट ने एक-एक सेबर को निशाना बनाकर उनका पीछा किया और उन पर 20 एमएम के गोले दाग दिए. तीनों सेबर धू-धू कर जलते हुए नीचे आने लगे. सब कुछ तीन मिनट के अंदर हो गया और नैट विमान कलाईकुंडा फौजी हवाईअड्डे की ओर लौट गए.

गिर रहे सेबर विमानों से दो पैराशूट खुले, तीसरा विमान हिचकोले खाता जेस्सोर की ओर लौटा और किसी तरह ढाका पहुंच गया. एक पैराशूट पायलट समेत हमारे सुरक्षा क्षेत्र में पहुंच गया. हमारे सैनिक खाइयों से निकलकर उस पैराशूट की ओर दौड़े. मुझे लगा कि कहीं हमारे सैनिक उस माहौल में उस पाइलट के साथ दुर्व्यवहार न करें, मैं पूरी तेजी से उसकी तरफ दौड़ा.

मैं अभी नजदीक पहुंचा ही था कि मैंने देखा, तीन-चार जवानों ने उसे पटक दिया है और राइफल के कुंदे से उसे मार रहे हैं. और कई जवान उसकी तरफ दौड़ रहे हैं. मैं उन सबको रोकने के लिए चीखा. मुझे खुद उन जवानों से पायलट को छुड़ाने के लिए उसे अपनी ओट में लेना पड़ा. मैंने जवानों को शांत किया और पायलट को सुरक्षा का आश्वासन दिया.
पायलट लंबा-चौड़ा फिट बंदा था; उसके माथे पर घाव था और वह कुछ डरा हुआ था मगर हौसला दिखा रहा था.

कायदे के मुताबिक मैं उसे बटालियन मुख्यालय ले गया. हमारे डॉक्टर ने उसकी मलहमपट्टी की. मैंने उसके लिए चाय मंगवाई और औपचारिक पूछताछ करने लगा. उसका नाम फ्लाइट ले. परवेज़ कुरैशी मेहदी था. वह ढाका में तैनात पीएएफ के 14 स्क्वाड्रन का स्क्वाड्रन कमांडर था. उसे 1964 में पीएएफ अकादमी से सम्मान के तौर पर तलवार भेंट की जा चुकी थी. उसकी जेब में उसकी बीवी की तस्वीर थी. मैंने उसके पास मिली हरेक चीज़ की सूची बनाई- एक घड़ी, 9एमएम की एक पिस्टल, 30 गोलियां, और निजी सुरक्षा किट.

मैंने उससे कहा कि अब वह एक युद्धबंदी है और उसके साथ जेनेवा समझौते के तहत व्यवहार किया जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि उसने अपने विमान की तरफ आ रहे नैट विमान को नहीं देखा था और वह यह मान रहा था कि उसके विमान को नीचे से हमला करके गिराया गया. मार गिराए जाने और युद्धबंदी बनाए जाने के बाद भी वह शांतचित्त और शालीन बना हुआ था.

चौगाचा और गरीबपुर में सैन्य अभियान और ऐतिहासिक हवाई जंग राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बनीं, और अब वे इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं. बाद में हमारे नैट पायलटों तथा एअर ट्राफिक कंट्रोलरों को समुचित रूप से सम्मानित किया गया.

परवेज़ कुरैशी मेहदी 1971 की जंग का पहला युद्धबंदी था और उसे डेढ़ साल तक कैद में रखा गया था. बाद में वह एअर चीफ मार्शल और पीएएफ का अध्यक्ष (1997-2000) भी बना.

(ले.जन. एच.एस. पनाग पीवीएसएम, एवीएसम (आर) ने भारतीय सेना को 40 साल तक अपनी सेवाएं दीं. वे उत्तरी तथा सेंट्रल कमान के जीओसी एन सी रहे. सेवानिवृत्त होने के बाद वे आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के सदस्य भी रहे.)

इस लेख का अंग्रेजी से अनुवाद किया गया है. मूल लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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