मैंने पहले लिखा था कि जनगणना 2027 लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीटों पर लगी रोक हटाने की वजह बन सकती है. यह कॉलम इस बात पर गौर कर रहा है कि 1971 में इन्हें पहली बार क्यों फ्रीज किया गया और ये आंकड़े इतने सटीक क्यों मान लिए गए.
इसे समझने के लिए 1960 के दशक की उस माल्थसवादी सोच को फिर से देखना होगा, जो उस समय विकास से जुड़ी बहस पर हावी थी. दुनिया की लगातार बढ़ती आबादी धरती के सीमित संसाधनों को खत्म कर देगी—इस सोच को संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और रॉकफेलर, फोर्ड तथा क्लब ऑफ रोम जैसे प्रभावशाली फाउंडेशनों का समर्थन मिला.
आबादी विशेषज्ञ अशोक बोस जैसे लोग जिन्होंने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे चार हिंदी भाषी राज्यों के लिए विवादित रूप से ‘बिमारू’ शब्द गढ़ा—का तर्क था कि इस क्षेत्र में बेकाबू जनसंख्या वृद्धि विकास के गले में लटका हुआ बोझ है. इस तर्क को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी कैबिनेट ने स्वीकार किया.
आपातकाल के दो वर्षों (1975-77) के दौरान, उनके बेटे संजय गांधी, जो निर्वाचित नहीं थे, फिर भी वास्तविक सत्ता का इस्तेमाल करते थे, क्योंकि वे प्रधानमंत्री के घरेलू तंत्र (पीएनएच) का प्रभावशाली हिस्सा थे, जिसने प्रधानमंत्री सचिवालय को भी पीछे छोड़ते हुए देश का सबसे असरदार शक्ति केंद्र बन गया था. इस दौर में उनके द्वारा बड़े पैमाने पर करवाई गई नसबंदी की मुहिम अच्छी तरह दर्ज है.
हालांकि, यह भी दर्ज किया जाना चाहिए कि योजना आयोग और स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इसी सोच का पालन किया.
जनसांख्यिकीय संक्रमण
यह हमें जनसांख्यिकीय संक्रमण की अवधारणा तक ले जाता है—यानी अधिक जन्म दर और अधिक मृत्यु दर से कम जन्म दर और कम मृत्यु दर की ओर बढ़ना. इसके पहले चरण में, जन्म और मृत्यु दर के बीच समय के अंतर के कारण आबादी में तेज़ बढ़ोतरी होती है.
इतिहासकार रवि के मिश्रा ने अपनी महत्वपूर्ण किताब Demography, Representation, Delimitation: The North-South Divide in India (2025) में दिखाया है कि अगर भारत की जनसंख्या संरचना को लंबे समय के नज़रिये से देखें—1881 से 1971 तक नौ दशकों की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर, तो 1971 तक दक्षिण भारत में आबादी की दशकवार वृद्धि दर उत्तर की तुलना में अधिक थी. इसके बाद उत्तर भारतीय राज्यों की जनसंख्या दक्षिण से तेज़ी से बढ़ने लगी.
हमें यह भी पता चलता है कि केरल की जनसंख्या 1931 तक दोगुनी हो गई थी—“1881 में करीब 50 लाख से बढ़कर लगभग एक करोड़ तक पहुंच गई थी.” 1931 से 1971 के बीच केरल की आबादी फिर से दोगुनी हुई और उसके बाद इसकी रफ्तार धीमी पड़ने लगी. भारत की कुल आबादी में केरल का हिस्सा 1881 में 2.5 प्रतिशत से भी कम था, जो बढ़कर 3.89 प्रतिशत हुआ, और फिर 1971 के बाद घटने लगा. 2011 में यह 2.76 प्रतिशत रह गया, क्योंकि केरल ऐसा पहला भारतीय राज्य बना जहां जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई.
तमिलनाडु में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिलता है, जहां 1971 तक ही जनसांख्यिकीय लाभ मिल चुका था. इसलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व छीने जाने के दावे बिल्कुल भी सही नहीं लगते.
इस तरह, जहां बिहार का राष्ट्रीय जनसंख्या में हिस्सा 1901 में 8.9 प्रतिशत से घटकर 1971 में 7.7 प्रतिशत हो गया, वहीं उसी अवधि में केरल का हिस्सा लगभग 2.7 प्रतिशत से बढ़कर 3.9 प्रतिशत हो गया. 1971 से 2011 के बीच के चार दशकों के आंकड़े बताते हैं कि बिहार का हिस्सा 8.6 प्रतिशत रहा, जबकि केरल में हल्की बढ़त के साथ यह 2.8 प्रतिशत दर्ज किया गया. फिर भी, कुल और तुलनात्मक दोनों ही रूपों में उत्तर भारत की जनसंख्या में उछाल अधिक स्पष्ट रहा है.
पिछले दो दशकों में राज्यों की स्थिति कैसी रही है, यह 2027 की आने वाली जनगणना से सांख्यिकीय रूप से स्पष्ट हो जाएगा, लेकिन यह साफ है कि पूरे देश में 0-14 आयु वर्ग का हिस्सा 1971 में 41.2 प्रतिशत से घटकर 2021 में 24.8 प्रतिशत हो गया है, जो जन्म दर में गिरावट का साफ संकेत है.
इसी अवधि में कामकाजी उम्र (15-59 वर्ष) की आबादी 53.4 प्रतिशत से बढ़कर 66.2 प्रतिशत हो गई है. इससे संकेत मिलता है कि देश इस समय जनसांख्यिकीय लाभ के दौर में है, जहां कामकाजी आबादी का अनुपात आश्रित आबादी से अधिक है.
जनगणना 2027: देश की खुद से बात
जनगणना 2027 (देश की 16वीं जनगणना और आज़ादी के बाद आठवीं) कराने और इसमें जाति को गणना की श्रेणी में शामिल करने का फैसला 30 अप्रैल 2025 को कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स ने लिया था.
कहने की ज़रूरत नहीं कि मौजूदा जनगणना गांव, कस्बा और वार्ड स्तर पर जनसांख्यिकीय प्राथमिक आंकड़ों का सबसे बड़ा स्रोत होगी. इससे आवास की स्थिति, सुविधाएं और संपत्तियां, धर्म, जाति, भाषा, साक्षरता और शिक्षा, आर्थिक गतिविधि, प्रवासन और प्रजनन जैसे कई पहलुओं पर भरोसेमंद जानकारी मिलेगी.
जनगणना के काम दो चरणों में होंगे. पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच सभी इमारतों की गिनती से शुरू होगा. इसमें हर तरह का आवास शामिल होगा—पूर्व महाराजाओं के महलों से लेकर लुटियंस दिल्ली के बंगलों, हाउसिंग अपार्टमेंट्स, ईडब्ल्यूएस कॉलोनियों, जेजे क्लस्टरों, अनौपचारिक बस्तियों, फुटपाथ पर रहने वालों के आश्रयों, जेलों, किशोर गृहों और बाल देखभाल केंद्रों तक. एक ही पते पर एक से अधिक परिवार भी रह सकते हैं.
हर परिवार से 34 बिंदुओं पर पूरी जानकारी ली जाएगी—छत की स्थिति (पक्की या कच्ची) से लेकर पानी की आपूर्ति, मीटर वाला बिजली कनेक्शन, शौचालय और सोक पिट तक. इससे शहरी आवास और ग्रामीण विकास विभागों के लिए सबसे बेहतर आंकड़ों का सेट तैयार होगा.
लोगों की वास्तविक गिनती 9 से 28 फरवरी 2027 के बीच की जाएगी. गणनाकर्मी लोगों की गिनती उस स्थान पर करेंगे जहां वे मौजूद होंगे, सिवाय लेह और हिमाचल के बर्फीले इलाकों के. इससे कुछ चुनौतियां भी आएंगी क्योंकि यही समय कुंभ का भी होगा, जब लाखों लोग हरिद्वार में जुटते हैं. ऐसे मामलों में लोगों को यह विकल्प मिलेगा कि वे हरिद्वार में गिने जाएं या अपने घर पर. घर के मुखिया से परिवार के हर सदस्य की जानकारी ली जाएगी.
गणनाकर्मी उम्र, लिंग, प्रजनन, शिक्षा, आय, प्रवासन (काम या विवाह के लिए), धर्म, पेशा (बेरोज़गारी सहित), ज्ञात भाषाएं (मातृभाषा और बोली-समझी जाने वाली भाषाएं) और जाति की स्थिति (एससी, एसटी, ओबीसी या सामान्य) जैसी जानकारियां जुटाएंगे.
अब जबकि जनगणना डिजिटल हो गई है, यह जानकारी राष्ट्रीय, राज्य, ज़िला और उप-ज़िला स्तर पर उपलब्ध कराई जा सकेगी. हालांकि, कितनी जानकारी साझा की जाएगी, कब की जाएगी और किस स्तर तक विवरण दिया जाएगा—यह राजनीतिक निर्णय पर निर्भर करेगा.
दुनिया की यह सबसे बड़ी प्रशासनिक और सांख्यिकीय कवायद सरकारी खजाने पर लगभग 12,000 करोड़ रुपये का खर्च डालेगी. तीन मिलियन से अधिक फील्ड कर्मचारी मोबाइल ऐप के ज़रिये डेटा इकट्ठा करेंगे, जो जनगणना प्रबंधन और निगरानी प्रणाली (CMMS) से जुड़ा होगा. यह एक खास पोर्टल है, जिसे पूरी प्रक्रिया को रियल टाइम में संभालने और देखने के लिए बनाया गया है. मंत्रालयों और विभागों ने अपनी नीतियों के लिए सबसे ज़रूरी डेटा पहले ही चिन्हित कर लिया है और Census-as-a-Service (CaaS) इस डेटा को साफ, मशीन-रीडेबल और उपयोगी रूप में उपलब्ध कराएगा.
संसद को बताया गया है कि जनगणना 2027 के शुरुआती नतीजे कुछ ही हफ्तों में उपलब्ध हो जाएंगे, क्योंकि सारा डेटा डिजिटल रूप से इकट्ठा किया जा रहा है. हालांकि, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी सहित कई विशेषज्ञ इस पर संदेह जताते हैं. पूर्व सीईसी का कहना है कि परिसीमन आयोग के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए, 2027 की जनगणना के आधार पर 2029 के चुनाव कराना “गणितीय रूप से असंभव” है.
अपने अगले कॉलम में, मैं प्रवासन जैसे कुछ ऐसे मुद्दों पर चर्चा करूंगा, जो राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए जनगणना आंकड़ों के इस्तेमाल को और जटिल बना देते हैं.
(यह भारत में जनगणना पर चार-पार्ट की सीरीज़ का दूसरा लेख है, जो NUJS कोलकाता में वार्षिक न्यायिक सम्मेलन में दिए गए की-नोट भाषण पर आधारित है.)
संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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