आज के राजनीतिक माहौल में राहुल गांधी अपने विरोधियों और समर्थकों के बीच चर्चा का सबसे अहम विषय बने हुए हैं. उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर दो दिलचस्प बातें सामने आती हैं, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.
एक तरफ, राहुल के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल के समर्थकों की राय में काफी अंतर है. दूसरी तरफ, राहुल और उनके समर्थक इस मुद्दे पर पूरी तरह एकमत हैं.
भाजपा समर्थक राहुल को लगातार खारिज करते रहे हैं. उनके लिए राहुल ‘पप्पू’ हैं, यानी मजाक का पात्र. भाजपा के बड़े नेता भी अक्सर दावा करते हैं कि राहुल उनके लिए कोई खतरा नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत हैं, लेकिन मोदी हमेशा इसके उलट सोचते रहे हैं. वे राहुल और गांधी परिवार को ही सबसे बड़ा खतरा मानते हैं.
इसी वजह से मोदी की राजनीतिक मुहिम राहुल का विरोध करने पर केंद्रित रहती है. यहां तक कि जिन राज्यों में कांग्रेस की कोई खास मौजूदगी नहीं होती, वहां के चुनावों में भी मोदी राहुल पर ही निशाना साधते हैं. इस हफ्ते उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के ‘चाणक्य’ माने जाने वाले अमित शाह को राहुल पर तीखा हमला करने के लिए आगे कर दिया. मोदी के समर्थक भले ही राहुल का मजाक उड़ाते हों, लेकिन भाजपा के बड़े नेताओं को पता है कि असली खतरा किससे है. किसी नेता और उसके समर्थकों की सोच में इतना अंतर शायद ही देखने को मिलता है.
कांग्रेस में राहुल और उनके समर्थक इस बात पर एकमत हैं कि सत्ता उनकी ही है और उन्हें सत्ता में आना ही है, बशर्ते चुनाव निष्पक्ष तरीके से हों. इस सोच में यह आरोप भी शामिल है कि 2019 के बाद से भाजपा ने सभी चुनाव चोरी करके जीते हैं. पहले बड़े पैमाने पर ईवीएम में गड़बड़ी करके और अब मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार तथा उनके ‘एसआईआर’ के मेल से. उनका मानना है कि अगर इन सब चीज़ों को ठीक कर दिया जाए, तो चुनाव में उनकी जीत पक्की है.
अपने समर्थकों के उलट मोदी और शाह राहुल को लेकर वास्तविकता को समझते हैं क्योंकि वे राजनीति को अच्छी तरह जानते हैं. राहुल के समर्थक और मोदी एक बात पर सहमत दिखाई देते हैं और दोनों की बात सही भी है. राहुल भले ही शुरुआत में लगातार लड़खड़ाए हों, लेकिन उनके नेतृत्व में कांग्रेस ही भाजपा को विश्वसनीय चुनौती दे सकती है.
इसे इस तरह समझिए. 2014 में कांग्रेस लोकसभा चुनाव में केवल 44 सीटें जीती थी और अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी. 2019 में उसे 52 और 2024 में 99 सीटें मिलीं, लेकिन इन चुनावों में उसका वोट प्रतिशत लगातार 19 से 21 प्रतिशत के बीच बना रहा. इसका मतलब है कि औसतन हर पांच में से एक भारतीय मतदाता कांग्रेस के चुनाव चिह्न ‘हाथ’ का बटन दबाता रहा है.
अगर 1996, 1998, 1999 से लेकर 2009 तक के आंकड़ों को देखें, तो पता चलता है कि भाजपा का वोट प्रतिशत मोटे तौर पर 25 प्रतिशत के आसपास बना रहा. यानी औसतन हर चार में से एक मतदाता भाजपा को वोट देता रहा. उस समय गठबंधन की राजनीति का दौर था.
मोदी ने 2014 में इस समीकरण को बदल दिया. इसके बाद भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 37 से 40 प्रतिशत के बीच पहुंच गया. पहले के मुकाबले 12 से 15 प्रतिशत अंक की यह बढ़ोतरी बहुत बड़ी है और बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था के लिए नुकसान पहुंचाने वाली है. इस बढ़ोतरी को हम आसानी से मोदी के नाम पर मिलने वाले वोट कह सकते हैं.
यह सोचना वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा होगा कि राहुल निकट भविष्य में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ाकर 37 प्रतिशत कर देंगे, लेकिन अगर वे कांग्रेस के पक्के वोट प्रतिशत में 5 से 6 प्रतिशत की भी बढ़ोतरी कर देते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति बदल जाएगी.
अब तक भाजपा के खिलाफ सीधे मुकाबलों में कांग्रेस दस में से नौ बार हारती रही है. इसलिए यह माना जा सकता है कि राहुल के लिए ज्यादातर अतिरिक्त वोट उन्हीं क्षेत्रों से आएंगे, जहां भाजपा जीतती रही है. 2024 का चुनाव गठबंधन के कारण एक सीमित अपवाद था. विपक्ष के वोट एकजुट हुए, तो भाजपा की जीत की दर घट गई. उस चुनाव में भाजपा कांग्रेस के खिलाफ सीधे मुकाबलों में दस में से केवल सात बार जीत पाई.
32 प्रतिशत वोट मिलने पर भी भाजपा का दबदबा बना रहेगा, लेकिन लोकसभा में उसकी सीटों की संख्या 200 से कुछ ऊपर या नीचे रह सकती है. इसके बावजूद वह सरकार बना सकती है, लेकिन तब वह असल में एनडीए गठबंधन की सरकार होगी, जिसमें नेतृत्व को लेकर समस्याएं होंगी.
मोदी और शाह ने इस खतरे को कभी हल्के में नहीं लिया. वे यह नहीं मानते कि राहुल विपक्ष में उनके लिए सबसे अच्छा विकल्प हैं. वे जानते हैं कि करीब 20 प्रतिशत वोट का आधार होने के कारण कांग्रेस ही उनके लिए एकमात्र बड़ी चुनौती है और आप इसे पसंद करें या नहीं, कांग्रेस गांधी परिवार के बिना एकजुट नहीं रह सकती.
अब असली सवाल यह है कि राहुल इसके आगे कहां तक जाएंगे? फिलहाल उनका पूरा ध्यान सड़कों और गलियों में लोगों को मोदी के खिलाफ खड़ा करने पर है. इसके लिए वे लगभग गैर-राजनीतिक कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके से लेकर कट्टर वामपंथी संगठन ‘आईसा’ की नेहा बोरा तक से हाथ मिलाने को तैयार हैं.
2004 में राजनीति में आने के बाद राहुल कई मुश्किलों का सामना कर चुके हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि भारत में राजनीतिक बदलाव वही लोग लाते हैं, जो चुनाव जीतते हैं या दूसरे दलों से हाथ मिलाकर सत्ताधारी पार्टी को हराते हैं. सड़कों के दम पर सत्ता बदलने का सपना एक खोखला वामपंथी भ्रम है क्योंकि ऐसे लोग चुनाव कभी नहीं जीत सकते.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और लोहियावादियों की सड़कों पर पकड़ थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से ताकत मिलने के बावजूद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले नवनिर्माण आंदोलन और जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व वाली रेलवे हड़ताल की संयुक्त ताकत भी इंदिरा गांधी की सरकार को नहीं गिरा पाई थी. इसके लिए उन्हें 1977 के चुनाव तक इंतज़ार करना पड़ा.
2010 से 2012 के बीच अन्ना आंदोलन और आरएसएस/भाजपा मिलकर भी नाकाम साबित हो चुकी यूपीए सरकार को सत्ता से नहीं हटा पाए थे. इसका फैसला 2014 के चुनाव में ही हो सका.
अब 2029 में जब चुनाव होंगे, तब राहुल अपने राजनीतिक जीवन के 25 साल पूरे कर रहे होंगे. उस समय उनकी उम्र 59 साल होगी. भारतीय राजनीति के हिसाब से तब भी उन्हें युवा ही माना जाएगा.
अगर यह मान लिया जाए कि कांग्रेस और भाजपा को अपने-अपने विचारों से सहमत लोगों के वोट मिलते रहेंगे, तो यह भी कहा जा सकता है कि मोदी के कारण भाजपा को मिलने वाले वोट केवल ऊबकर राहुल के पक्ष में नहीं चले जाएंगे. राहुल को इससे बेहतर, कुछ नया करने वाला और उम्मीद जगाने वाला विकल्प देना होगा.
उन्हें बताना होगा कि अगर वे चुनाव जीतते हैं, तो मोदी और भाजपा से अलग क्या करेंगे? मैं यहां 12 छोटे सवाल रखना चाहता हूं.
1. चुनाव आयुक्तों को चुनने की प्रक्रिया क्या होगी और चुनाव आयोग की निष्पक्षता कैसे बहाल करेंगे? कांग्रेस और यूपीए के दौर की व्यवस्था की वापसी कोई उत्साह बढ़ाने वाली बात नहीं होगी. राहुल के दिवंगत पिता ने 1989 में चुनाव आयोग को तीन सदस्यों वाली संस्था बनाकर उसे कमजोर करने की कोशिश की थी. इसके अलावा, भाजपा जिन्हें घुसपैठिया कहती है, उन्हें मतदाता बनने से रोकने के लिए राहुल क्या व्यवस्था करेंगे?
2. इसी तरह, न्यायपालिका, सीबीआई और दूसरी अहम एजेंसियों के मामले में वे क्या करेंगे?
3. ट्रंप जैसी चुनौती का सामना वे कैसे करेंगे? अमेरिका को लेकर उनकी नीति मोदी की नीति से किस तरह अलग होगी?
4. चीन से निपटने के लिए उनकी नीति क्या होगी? पाकिस्तान के प्रति उनका रुख कैसा रहेगा? वहां से पैदा होने वाले आतंकवाद के मामले में उनकी नीति मोदी से किस तरह अलग होगी? क्या वे मोदी के मुकाबले नरम होंगे या ज्यादा सख्त?
5. पश्चिम एशिया और इज़रायल के प्रति उनका रुख मोदी के रुख से किस तरह अलग होगा?
6. ऊर्जा, पूंजी और सोने की कमी के तीन बड़े संकटों से भारत को बाहर निकालने के लिए उनका क्या नज़रिया है? अब इसमें हम एआई और सॉफ्टवेयर सेवाओं को भी जोड़ सकते हैं. वे भारत को निवेशकों के लिए आकर्षक कैसे बनाएंगे?
7. चारों तरफ ‘छात्रों की गूंज’ सुनाई दे रही है, लेकिन राहुल ज्यादा रोजगार कैसे देंगे? कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए क्या वे मनरेगा को जारी रखेंगे या उसका कोई नया और बेहतर रूप लाएंगे? क्या वे मुफ्त अनाज बांटने की योजना जारी रखेंगे?
8. क्या वे अब भी जाति जनगणना को सामाजिक न्याय का हिस्सा मानते हैं? इससे रोज़गार के ज्यादा अवसर कैसे पैदा होंगे? तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को ही नहीं पता कि उन्होंने जो जाति जनगणना करवाई है, उसके आंकड़ों का क्या करना है. क्या राहुल कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार से कहेंगे कि वे अपने राज्य में हुई जाति जनगणना के आंकड़े जारी करें?
9. शिक्षा व्यवस्था को भ्रष्टाचार और मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति से मुक्त करने, उसमें सुधार लाने और युवाओं को रोजगार के योग्य बनाने के लिए वे किस तरह के बदलाव करना चाहते हैं?
10. वे कहते रहे हैं कि वे कारोबार या पूंजी के खिलाफ नहीं हैं. वे सिर्फ एकाधिकार के खिलाफ हैं और सभी को समान अवसर देना चाहते हैं. तो इसके लिए वे क्या करेंगे? आर्थिक सुधारों को लेकर उनके विचार क्या हैं?
11. राहुल और उनके ‘धर्मनिरपेक्ष’ सहयोगी शिकायत करते हैं कि अल्पसंख्यकों को समाज में किनारे किया जा रहा है. राहुल उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए क्या करेंगे?
12. और आखिर में, उनकी टीम में कौन-कौन शामिल होंगे?
सिर्फ सड़कों पर संघर्ष करने वाले नेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय चुनौती के रूप में सामने आने के लिए राहुल को इन सवालों के जवाब देने होंगे. उन्हें मध्यवर्ग के मतदाताओं के सामने नए विचार भी रखने होंगे.
मोदी ने 2014 से पहले, 2012 के आखिरी दिनों से ही ‘अच्छे दिन’ लाने के वादे करने शुरू कर दिए थे. 2029 का चुनाव भी लगभग इतने ही अंतराल के बाद होना है. ऐसे में राहुल क्या वादा कर रहे हैं?
अगर वे परंपरागत तरीके से हटकर कुछ करना चाहते हैं, तो ब्रिटेन की तरह एक ‘शैडो कैबिनेट’ यानी विपक्षी मंत्रिमंडल बना सकते हैं. तब उनकी टीम के सदस्य अपने-अपने विभागों से जुड़े सवालों के जवाब देना शुरू कर सकते हैं.
बेशक, अगर मैं थोड़ा मजाकिया अंदाज में बात करता, तो कहता कि इन सांकेतिक पदों को लेकर भी आपस में खूब खींचतान हो सकती है. अब राहुल चाहे जो फैसला करें, वे अपने समर्थकों के इस दावे के भरोसे 2029 का चुनाव नहीं लड़ सकते कि मोदी की लोकप्रियता ‘घट’ रही है. ऐसी कोशिश तीन बार नाकाम हो चुकी है.
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