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Friday, 28 August, 2026
होममत-विमतमुंढे की कार्रवाई सिर्फ साफ-सफाई को लेकर है, भारत की फूड सेफ्टी की समस्या इससे कहीं बड़ी है

मुंढे की कार्रवाई सिर्फ साफ-सफाई को लेकर है, भारत की फूड सेफ्टी की समस्या इससे कहीं बड़ी है

बड़ी विदेशी कंपनियां भारत से मुनाफा कमाने में खुश हैं, लेकिन अपने प्रोडक्ट्स पर ज्यादा नमक, चीनी आदि होने की चेतावनी लगाने को तैयार नहीं हैं, जैसी चेतावनी सिगरेट के पैकेट पर होती है.

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महाराष्ट्र के रेस्टोरेंट में गंदगी के खिलाफ तुकाराम मुंढे की मुहिम पर लोगों की प्रतिक्रिया दिखाती है कि भारतीय खाने की सुरक्षा को लेकर कितने चिंतित हैं.

लेकिन महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर की शुरू की गई कार्रवाई, जिसके तहत अब तक 3,000 छापे मारे जा चुके हैं, फूड सेफ्टी के सिर्फ एक पहलू यानी साफ-सफाई से जुड़ी है. इसके अलावा भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि नियमों को लागू करने वाले अधिकारी और नियामक या तो बहुत आलसी हैं, बहुत कमजोर हैं या बहुत भ्रष्ट हैं.

सबसे पहली समस्या खाने में मिलावट और नकली खाना बनाने की है. उदाहरण के लिए, हम सभी ने तथाकथित एनालॉग पनीर के खिलाफ मुंढे की मुहिम की तारीफ की है. यह असल में नकली प्रोडक्ट है, लेकिन हैरानी की बात है कि इसे ‘पनीर’ कहना कानूनी है, अगर उसके साथ ‘एनालॉग’ शब्द का इस्तेमाल किया जाए.

इसके अलावा मैदा, पाम या दूसरे सस्ते तेल, बेकिंग पाउडर, डिटर्जेंट, फेंका हुआ स्किम्ड मिल्क, सोडियम बाइकार्बोनेट और इंडस्ट्रियल सल्फ्यूरिक एसिड से बना नकली और असुरक्षित ‘पनीर’ भी मिलता है. इसे पूरे भारत में छोटी-छोटी वर्कशॉप में बनाया जाता है और भरोसा करने वाले ग्राहकों, रेस्टोरेंट और खाने की दुकानों को असली पनीर बताकर बेचा जाता है.

मुंढे जैसी कार्रवाई उन रेस्टोरेंट को निशाना बनाती है, जो इस ‘पनीर’ को पकाकर बेचते हैं. यह अच्छी बात है, लेकिन यह काफी नहीं है. उन जगहों का क्या, जहां यह पनीर असल में बनाया जाता है? कभी-कभार किसी वर्कशॉप पर छापे की खबर आती है, लेकिन ये छापे कम से कम 95 फीसदी निर्माताओं तक नहीं पहुंचते. आमतौर पर वे स्थानीय अधिकारियों को पैसे दे देते हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती.

यही बात ज्यादातर उन निर्माताओं पर भी लागू होती है, जो खाना पकाने के तेल, दाल और दूसरी जरूरी चीजों में मिलावट करते हैं. इनके खिलाफ कोई बड़ी और लगातार चलने वाली मुहिम नहीं है और वे आराम से अपना काम करते रहते हैं.

जहां तक एनालॉग पनीर की बात है, हमें इसे पूरी तरह बैन करने के बारे में सोचना चाहिए. अगर यह पूरी तरह दूध से नहीं बना है, तो यह किसी भी तरह का पनीर नहीं है. सरकार पहले ही उन लोगों को तथाकथित ‘आइसक्रीम’ को आइसक्रीम कहने से रोक चुकी है, जो इसे वनस्पति तेल से बनाते हैं. तो फिर वनस्पति फैट से बने ‘चीज’ और ‘पनीर’ पर भी यही नियम क्यों लागू नहीं होना चाहिए? ‘एनालॉग’ जैसे बेकार शब्दों से ग्राहकों को भ्रमित क्यों किया जाए?

नुकसान पहुंचाने वाली चीज़ें

एक दूसरी चिंता की बात उस जगह से जुड़ी है, जहां खाना और अच्छी सेहत एक-दूसरे से जुड़ते हैं. इसमें ऐसे प्रोडक्ट शामिल हैं, जो खुद ज़हरीले नहीं होते, लेकिन उनमें ऐसी चीज़ें होती हैं, जिन्हें ज्यादा मात्रा में खाने से नुकसान हो सकता है.

रॉयटर्स की इस हफ्ते जारी की गई आदित्य कालरा और रिचा नायडू की बहुत बारीकी से की गई जांच से पता चलता है कि हम भले ही यह सोचते हों कि हम बड़ी विदेशी कंपनियों के बनाए दुनिया भर में बिकने वाले खाने-पीने के प्रोडक्ट इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन भारत में बिकने वाले प्रोडक्ट दूसरे देशों में बिकने वाले उन्हीं प्रोडक्ट से अलग और ज्यादा अस्वास्थ्यकर हो सकते हैं, भले ही उन पर वही अंतरराष्ट्रीय ब्रांड नाम हो.

उदाहरण के लिए, भारत में बिकने वाली Fanta में ब्रिटेन वाली Fanta के मुकाबले तीन गुना ज्यादा चीनी है. भारत में बिकने वाली Kit Kat में ऑस्ट्रेलिया वाली Kit Kat के मुकाबले बहुत कम कोको है. भारत में बिकने वाली Maggi में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, जिसमें सैचुरेटेड फैट ज्यादा होता है, जबकि ब्रिटेन में बिकने वाली Maggi में ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक सूरजमुखी के तेल का इस्तेमाल होता है ऐसे और कईं उदाहरण हैं.

अरबों डॉलर की ये बड़ी विदेशी कंपनियां अपने कुछ फैसलों का बचाव कीमत का हवाला देकर करती हैं और हां, जब वे कहती हैं कि ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक चीज़ों का इस्तेमाल करने पर लागत बढ़ जाएगी, तो वे सही कहती हैं. इसके कारण उनके प्रोडक्ट की कीमत बढ़ जाएगी और बिक्री कम हो जाएगी, लेकिन क्या यह इतनी बुरी बात है? इन बड़ी कंपनियों और उनके मुनाफे के लिए शायद, लेकिन हमारे देश की सेहत के लिए? मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता.

मैं इस आधार पर खाने की चीज़ों पर बैन लगाने के पक्ष में नहीं हूं कि उन्हें ज्यादा खाने से नुकसान हो सकता है. बड़ी कंपनियों को बस इतना करना है कि वे अपने प्रोडक्ट पर ज्यादा मात्रा में नमक, चीनी आदि होने को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी लिखें.

लेकिन बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए इतना करना भी बहुत ज्यादा साबित हुआ है. वे भारत से मुनाफा कमाने में खुश हैं, लेकिन अपने प्रोडक्ट के लेबल पर सिगरेट के पैकेट जैसी चेतावनी लगाने को तैयार नहीं हैं. रॉयटर्स की जांच से पता चलता है कि भारत में बड़ी विदेशी फूड कंपनियों ने नियामकों की कोशिशों को सफलतापूर्वक रोक दिया है, जबकि दूसरे देशों के बाज़ारों में उन्होंने लेबल में बदलाव को मंजूरी दी है. एक तर्क यह दिया गया कि अगर नमक, फैट और चीनी की ज्यादा मात्रा वाले खाने के प्रोडक्ट पर लाल रंग की चेतावनी लगानी पड़ेगी, तो पैकेजिंग पूरी तरह लाल हो जाएगी, क्योंकि पैकेज्ड फूड के 80 फीसदी तक प्रोडक्ट इस कैटेगरी में आ सकते हैं.

जाहिर है, इस मामले में कुछ करने की ज़रूरत है और अब यह मामला अदालतों के सामने है.

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड

इन सब बातों को लेकर चिंता है, लेकिन चिंता की तीसरी वजह भी है. पूरी दुनिया में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) के खिलाफ मुहिम बढ़ रही है. फैक्ट्रियों में मशीनों और केमिकल की मदद से बनाए जाने वाले खाने से सेहत को होने वाले कई तरह के नुकसान सामने आए हैं. भारत में भी UPF के खिलाफ मुहिम बढ़ रही है और जल्द ही यह आम लोगों के बीच भी पहुंच जाएगी.

विदेशों में बड़ी फूड कंपनियों के लिए UPF के खिलाफ चल रही मुहिम एक बड़ी चिंता बन गई है. कई कंपनियों ने यह बताने के लिए काफी कोशिश की है कि वे अपनी बनाने की प्रक्रिया को आसान कर रही हैं और कम केमिकल का इस्तेमाल कर रही हैं.

मैं UPF के खिलाफ चल रही मुहिम का पूरी तरह समर्थक नहीं हूं, हालांकि अब यह मानने से इनकार करना मुश्किल है कि इसका मुख्य संदेश सही है. बड़ी विदेशी फूड इंडस्ट्री के लंबे समय के भविष्य को लेकर भी आशावादी होना मुश्किल है.

इसकी तुलना कुछ हद तक सिगरेट इंडस्ट्री से की जा सकती है. उदाहरण के लिए, अमेरिका में पिछले 10 साल में सिगरेट की बिक्री 40 फीसदी से ज्यादा कम हो गई है. हो सकता है कि UPF के मामले में भी ऐसी ही गिरावट शुरू हो रही हो. अमेरिका में कई साल तक बिक्री बढ़ने के बाद अब इसमें गिरावट आई है या यह लगभग एक जैसी बनी हुई है. यही वजह है कि भारत बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए एक बेहद जरूरी बाजार है, क्योंकि यहां UPF के खिलाफ मुहिम अभी बड़े स्तर पर शुरू नहीं हुई है. अपने बचाव के लिए बड़ी फूड कंपनियां चीनी, नमक और फैट की मात्रा के बारे में लेबल पर चेतावनी लगाने के खिलाफ फिलहाल मजबूती से खड़ी हैं. हालांकि भारतीय नियामकों ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है, लेकिन एक राय यह है कि सरकार अमेरिका से इतना डरती है कि वह लेबल से जुड़े इस मुद्दे पर कोई बड़ा कदम नहीं उठा रही है.

मुझे नहीं पता कि यह बात सही है या नहीं, लेकिन फूड सेफ्टी और सेहत को लेकर लोगों में जिस तरह गुस्सा है, उसे देखते हुए जो भी सरकार इन मुद्दों को नजरअंदाज करेगी, उसे इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है. किसी भी देश को चुप बैठकर अपने लोगों को जहर खाने देने की स्थिति में नहीं रहना चाहिए और किसी भी सरकार को ऐसा होने नहीं देना चाहिए.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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