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Friday, 10 July, 2026
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इंडियन अंकल्स का मज़ाक उड़ाइए, लेकिन उन्हें भारत की पूरी तस्वीर मत मानिए

हाल ही में इकोनॉमिस्ट के एक आर्टिकल, ‘इंडियाज़ रिपब्लिक ऑफ अंकल्स’ में दिक्कत यह है कि एक चालाक मेट्रोपॉलिटन कैरिकेचर को सिविलाइज़ेशनल डायग्नोसिस समझने की पुरानी आदत है.

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इंडियन अंकल्स का अक्सर मज़ाक उड़ाया जाता है और इसकी वजह भी होती है. उन्हें आपकी डिग्री, सैलरी, शादी, मोबाइल, आपके पॉस्चर और शायद आपके डाइजेशन तक पर राय देनी होती है. उनकी सलाह लगभग हमेशा एक जैसी होती है—“बेटा, मेरी बात सुनो”, “और मेहनत करो”, “फोन दूर रखो” और “सुबह पांच भीगे हुए बादाम ज़रूर खाओ”. उन्हें लगता है कि बिना पूछे सलाह देना कोई बड़ी बात नहीं है.

तो हां, इतना मज़ाक तो चलता है. हाल का एक उदाहरण द इकोनॉमिस्ट का लेख ‘India’s republic of uncles’ है, जो “कॉकरोच” मीम और इंडिया की कथित तौर पर जेरोन्टोक्रेटिक थिंकिंग (भारत में बुजुर्गों के प्रभाव वाली सोच) पर एक मज़ेदार लेख है और यहां तक कि इसमें भीगे हुए बादाम तक का ज़िक्र किया गया है. लेख तेज़, मजेदार और चुटीला है, लेकिन साथ ही बहुत सतही भी है. समस्या यह नहीं है कि भारत पर कौन लिख रहा है. असली समस्या यह पुरानी आदत है कि महानगरों में बनी एक मजाकिया छवि को पूरे भारतीय समाज और उसकी सभ्यता की सच्ची तस्वीर मान लिया जाता है.

इंडियन अंकल्स का मज़ाक उड़ाया जा सकता है, वह इसे झेल भी सकते हैं, लेकिन उन्हें भारत की हर समस्या का एक ही कारण बना देना ठीक नहीं है. न्यायपालिका का अहंकार, परीक्षा में गड़बड़ियां, मोबाइल पर पाबंदी, कंपनियों की सीख, पॉलिटिकल अथॉरिटी और युवाओं की फ्रस्ट्रेशन—इन सबको एक ही हेडिंग देना “अंकल” सही नहीं है.

अच्छा सटायर, आलसी सोशियोलॉजी

जिस चीज़ का मज़ाक उड़ाकर उसे “अंकल कल्चर” कहा जाता है, वह असल में आम भारतीयों की मोरल कॉमन सेंस के ज्यादा करीब है. प्यू रिसर्च के एक बड़े सर्वे में पाया गया कि लगभग 10 में से 9 भारतीय, यानी 88 प्रतिशत लोग, मानते हैं कि बड़ों का सम्मान करना “सच्चा भारतीय” होने के लिए बहुत जरूरी है. धर्म, क्षेत्र, जाति या उम्र के आधार पर इस सोच में बहुत कम फर्क देखने को मिला. प्यू के सर्वे में यह भी सामने आया कि भारत के लगभग सभी बड़े धार्मिक समुदायों में बड़ों का सम्मान करना धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का एक अहम हिस्सा माना जाता है.

इसका मतलब यह नहीं है कि हर बुजुर्ग हमेशा समझदार ही होता है, लेकिन इसका यह ज़रूर मतलब है कि इंडियन अंकल्स कोई ऐसा अजीब या पुराना किरदार नहीं है, जिसे आधुनिक समय पीछे छोड़ चुका हो. वह भारत की मोरल थिंकिंग का एक पार्ट हैं. सलाह देना, पीढ़ियों के बीच सम्मान, संयम, परिवार की जिम्मेदारी, बचत की आदत, फर्ज़ और अनुभव की अहमियत—ये सभी बातें उसी सोच का हिस्सा हैं. ये मूल्य कई बार लोगों के लिए बोझ या घुटन की वजह बन सकते हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए कि ये पुरानी पीढ़ियों से चले आ रहे हैं, इन्हें अपने आप बेवकूफी या गलत नहीं कहा जा सकता.

सलाह प्रॉब्लम नहीं बल्कि वीटो पावर

“मेरे अनुभव पर ध्यान दो” कहना एक बात है. लेकिन “तुम्हारा फैसला मैं करूंगा” कहना बिल्कुल दूसरी बात है. इंडियन अंकल्स की आलोचना करने वाले कई लोग इन दोनों बातों में फर्क नहीं करते क्योंकि ऐसा करने से उनका बनाया हुआ मज़ाक कमजोर पड़ जाता है.

शादी का उदाहरण ही लीजिए. परिवार अपने बड़े हो चुके बच्चों की शादी को लेकर अपनी राय रख सकते हैं. वे असहमति जता सकते हैं, सलाह दे सकते हैं, चेतावनी दे सकते हैं, समझा सकते हैं या मुश्किल सवाल पूछ सकते हैं. भारत में शादी सिर्फ दो लोगों के बीच का निजी समझौता नहीं होती. इससे दो परिवार, उनकी आदतें, उम्मीदें और सामाजिक रिश्ते भी जुड़ते हैं. इसलिए माता-पिता की राय नैतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है.

लेकिन अगर माता-पिता की मंजूरी को कानूनी तौर पर शादी की ज़रूरी शर्त बना दिया जाए, तो यह बिल्कुल अलग बात है. यह सलाह नहीं, बल्कि बड़े हो चुके लोगों को बच्चे की तरह मानना है.

यही बात उम्र के आधार पर बनाए गए नियमों पर भी लागू होती है. कॉलेज के सभी वयस्क छात्रों के लिए एक जैसा नियम सही है या गलत, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इसे इंस्टीट्यूट के अनुशासन के आधार पर सही या गलत ठहराया जाना चाहिए, न कि इसे माता-पिता के अधिकार के नाम पर लागू किया जाए.

दिल्ली में शराब पीने की कानूनी उम्र 25 साल है. इस पर भी बहस हो सकती है. बात यह नहीं है कि उम्र के आधार पर बने हर नियम गलत हैं, लेकिन हर नियम के पीछे अलग तर्क होना चाहिए. आसान तरीका यह है कि इन सभी नियमों को एक ही टोकरी में डालकर उस पर “अंकल” का लेबल लगा दिया जाए.

मोबाइल फोन और सोशल मीडिया भी इसका अच्छा उदाहरण हैं. अगर भारतीय माता-पिता स्मार्टफोन को लेकर चिंता करते हैं, तो उसे बुजुर्गों की बेवजह घबराहट कहा जाता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में अब तय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए यह ज़रूरी किया गया है कि वे 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनने से रोकने के लिए उचित कदम उठाएं. वहीं न्यूजीलैंड में छात्रों को स्कूल के टाइमिंग, यहां तक कि लंच और ब्रेक के दौरान भी, फोन दूर रखने का नियम है.

इन नियमों का विरोध किया जा सकता है. इन्हें लागू करने, निजता और ज़रूरत से ज्यादा दखल जैसे कई सही सवाल भी हैं और हां, 21 साल की उम्र तक सोशल मीडिया पर रोक लगाना, 16 साल से कम उम्र के बच्चों की सुरक्षा के नियम से कहीं ज्यादा सख्त कदम होगा.

लेकिन किशोरों का ध्यान भटकने, नशे जैसी लत लगने और डिजिटल दुनिया से होने वाले नुकसान को लेकर चिंता सिर्फ किसी इंडियन अंकल की व्हाट्सऐप पर फैली कल्पना नहीं है. आज यह दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों की आम सरकारी नीति का हिस्सा बन चुकी है. लगता है कि जब यही सोच विकसित देशों से आती है, तो उसे “बच्चों की सुरक्षा” कहा जाता है, लेकिन भारत में वही बात “अंकलगिरी” बन जाती है.

ऐसा ही नज़रिया कुछ समय पहले नारायण मूर्ति के 70 घंटे काम करने वाले बयान पर भी देखने को मिला. इसे भी उसी पुराने ढर्रे में रख दिया गया—एक बुजुर्ग अरबपति युवाओं से ज्यादा काम करने को कह रहा है.

इस आलोचना की अपनी वजह थी. कोई देश कर्मचारियों से जरूरत से ज्यादा काम करवाकर आगे नहीं बढ़ सकता. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के शोध में भी कहा गया है कि हफ्ते में 55 घंटे या उससे ज्यादा काम करने से स्ट्रोक और दिल की गंभीर बीमारी से मौत का खतरा बढ़ जाता है.

लेकिन नारायण मूर्ति की बात सिर्फ यह नहीं थी कि “युवाओं को ज्यादा परेशान किया जाए.” उनका तर्क मेहनत, काम की क्षमता और देश की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने से जुड़ा था. यह तर्क भले ही बहुत सरल या अधूरा हो, लेकिन इसे सिर्फ इसलिए बूढ़े व्यक्ति की बेकार बात नहीं कहा जा सकता.

भारत को बेहतर स्किल, बेहतर मैनेजर, बेहतर प्रोत्साहन और बेहतर संस्थानों की ज़रूरत है, लेकिन यह कहना कि मेहनत करने की आदत, ध्यान भटकना और काम की क्षमता जैसी समस्याएं सिर्फ बुजुर्ग अरबपतियों की बनाई हुई बातें हैं, गंभीर सोच नहीं है.

जब मज़ाक बगावत को महिमामंडित करने लगे

सबसे बड़ी समस्या तब होती है, जब इंडियन अंकल्स का मज़ाक उड़ाना धीरे-धीरे बगावत की तारीफ में बदल जाता है. द इकोनॉमिस्ट लिखता है कि नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के युवाओं ने अपने बुजुर्ग नेताओं के खिलाफ ज्यादा “सख्त” रुख अपनाया. लेख में यह भी कहा गया कि यह “छोटा चमत्कार” है कि भारत के युवाओं ने सिर्फ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसा एक मजाकिया मीम बनाया.

यह बात पढ़ने में हल्की-फुल्की लग सकती है, लेकिन यह गैर-जिम्मेदाराना है. यह लगभग ऐसा लगता है जैसे एक चमकदार पत्रिका यह कह रही हो—“तुम्हारे पड़ोस के देशों के युवाओं ने सरकारें गिरा दीं और तुम सिर्फ मजाक बना रहे हो?”

यह तुलना बहुत सतही है.

बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में युवाओं के आंदोलन आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार, दमन और हिंसा जैसी गंभीर परिस्थितियों में हुए थे. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने बांग्लादेश में प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई को क्रूर और योजनाबद्ध बताया था. नेपाल में भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर रोक के खिलाफ जेन-ज़ी के आंदोलन में कम से कम 19 लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए. श्रीलंका का अरगलाया आंदोलन भारी आर्थिक संकट और ज़रूरी सामान की कमी के बीच शुरू हुआ था. बाद में इस आंदोलन का देश की राजनीति पर भी बड़ा असर पड़ा. रॉयटर्स ने 2022 के इस आंदोलन को ऐसी ताकत बताया था, जिसने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया.

इन आंदोलनों में बहादुरी की कहानियां ज़रूर थीं, लेकिन उनके साथ दर्द, अस्थिरता और खून-खराबा भी था.

किसी युवा नागरिक को अपनी बात साबित करने के लिए राजमहल पर हमला नहीं करना चाहिए, सरकारी इमारतें नहीं जलानी चाहिए या गोलियां नहीं खानी चाहिए. तभी जाकर कोई पत्रिका यह माने कि उसकी अपनी सोच और ताकत है. अराजक स्थिति और अपनी राजनीतिक ताकत, दोनों एक जैसी चीज़ें नहीं हैं.

भारत का रास्ता—बिना अराजकता के अपनी आवाज़

भारत की सबसे अलग बात यह नहीं है कि यहां युवाओं की आवाज़ नहीं है. असली बात यह है कि यहां के युवाओं का लोकतंत्र पर भरोसा अब भी बना हुआ है. भारतीय युवा प्रदर्शन करते हैं, मीम बनाते हैं, वोट डालते हैं, अदालत जाते हैं, संगठन बनाते हैं और बहस करते हैं, लेकिन ज्यादातर युवाओं ने हिंसक या पूरी व्यवस्था को तोड़ने वाली बगावत का रास्ता नहीं चुना है.

2019 के लोकसभा चुनाव में 18 से 25 साल के 41 प्रतिशत युवाओं ने बीजेपी को वोट दिया. यह 2014 के मुकाबले 7 प्रतिशत ज्यादा था और पार्टी के कुल वोट प्रतिशत से भी करीब 4 प्रतिशत ज्यादा था. उसी अध्ययन में यह भी पाया गया कि युवाओं पर सबसे ज्यादा असर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का था. 2024 के चुनाव में युवाओं के वोट के लिए मुकाबला और कड़ा हो गया. 2024 के एक अध्ययन के मुताबिक कोई भी पार्टी युवाओं को पूरी तरह अपने साथ नहीं जोड़ पाई.

भारतीय युवाओं के हर राजनीतिक फैसले से सहमत होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन यह मानना ज़रूरी है कि वे अपने फैसले खुद ले रहे हैं. यह किसी की गुलामी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है.

‘कॉकरोच’ वाला वायरल मीम भी यही दिखाता है. भारतीय युवाओं ने एक अपमानजनक टिप्पणी को मज़ाक में बदल दिया और सत्ता को असहज कर दिया. यही उनकी राजनीतिक ताकत है. सरकार की बेचैनी भी यही दिखाती है कि व्यंग्य बिना हिंसा के भी असर कर सकता है.

भारत में जवाबदेही से बचने वाली ताकत ज़रूर बहुत है. ऐसे माता-पिता हैं, जो चिंता और मालिकाना हक में फर्क नहीं समझते. ऐसे जज हैं, जो अदालत को उपदेश देने की जगह समझ लेते हैं. ऐसे कारोबारी हैं, जो कर्मचारियों से त्याग तो मांगते हैं, लेकिन बदले में कुछ नहीं देना चाहते. और ऐसी सरकारें भी हैं, जो अपनी नाकामी के बाद भी लोगों से सिर्फ आज्ञा मानने की उम्मीद करती हैं.

लेकिन यह सिर्फ उम्र की समस्या नहीं है. यह सत्ता की समस्या है. अगर सिर्फ “अंकल” ही देश चलाएं, तो ऐसा गणराज्य घुटन भरा होगा. अगर सिर्फ हर बात पर आंखें घुमाकर मज़ाक उड़ाने वाले लोग ही हावी हों, तो ऐसा गणराज्य भी परेशान करने वाला होगा और अगर लोगों को यह समझाया जाए कि उथल-पुथल ही असली ताकत है, तो वह उससे भी ज्यादा खतरनाक होगा.

भारत को ऐसे लोगों की संख्या कम करनी है, जो कहते हैं—“बड़ों के सामने जवाब मत दो.” साथ ही, ऐसे टिप्पणीकार भी कम होने चाहिए, जो सीधे या इशारों में यह कहें—“सिर्फ जवाब क्यों दे रहे हो, पड़ोसी देशों की तरह पूरा सिस्टम ही गिरा दो.”

रात के भीगे हुए बादाम खाना है या नहीं, यह आपकी पसंद हो सकती है, लेकिन इसके लिए पूरे गणराज्य को आग लगाने की ज़रूरत नहीं है.

डॉ. ओमकार जोशी यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड, कॉलेज पार्क के सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट और मैरीलैंड पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर में रिसर्च स्कॉलर हैं. यह लेख उनके निजी विचार है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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