नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के कथित मीडिया सेल प्रमुख मंसूर असगर पीरभॉय को जमानत देने से इनकार कर दिया. उस पर 2008 के दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के दौरान आतंक फैलाने वाले ईमेल भेजने का आरोप है. अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता और आतंकी साजिश में पीरभॉय की कथित अहम भूमिका उसके 17 साल जेल में रहने की अवधि से ज्यादा महत्वपूर्ण है.
अदालत ने यह भी कहा कि पहली नजर में पीरभॉय के खिलाफ मामला बनता है और मुकदमे के इस अंतिम चरण में उसे रिहा करने से सुनवाई पर बुरा असर पड़ सकता है.
सॉफ्टवेयर इंजीनियर पीरभॉय ने ट्रायल कोर्ट से तीसरी बार जमानत खारिज होने के बाद हाई कोर्ट में जमानत की अर्जी लगाई थी.
पीरभॉय ने लंबे समय से जेल में रहने का हवाला देकर जमानत मांगी थी, लेकिन जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा से जुड़े मामलों में इन हितों को व्यक्तिगत आजादी से ऊपर रखा जाना चाहिए.
ब्लास्ट के 18 साल बाद भी इस मामले में फिलहाल अभियोजन पक्ष के सबूत दर्ज किए जा रहे हैं.
दिप्रिंट के विश्लेषण के अनुसार, जून 2016 से इस मामले में पटियाला हाउस कोर्ट के 629 आदेशों से पता चलता है कि सबूत दर्ज करने और गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया एक दशक से ज्यादा समय तक खिंच गई है.
सुप्रीम कोर्ट के मुकदमे में तेजी लाने के आदेश और दिल्ली हाई कोर्ट के ट्रायल कोर्ट को हफ्ते में दो दिन सुनवाई करने के निर्देश के बाद भी मामला लगातार टलता रहा. इसकी मुख्य वजह अभियोजन पक्ष के गवाहों का अदालत में पेश न होना रही. ज्यादातर पुलिस अधिकारी, यहां तक कि रिटायर अधिकारी भी, गवाही देने नहीं पहुंचे. उन्होंने कभी सरकारी कार्यक्रमों का हवाला दिया तो कभी बुद्ध पूर्णिमा के दौरान कानून व्यवस्था संभालने में व्यस्त होने की बात कही.
कुछ सुनवाई के दौरान अभियोजन या बचाव पक्ष के वकील भी अदालत में नहीं पहुंचे और कई बार जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा भी काम नहीं कर रही थी.
2008 में क्या हुआ था
13 सितंबर 2008 को दिल्ली में आधे घंटे के भीतर पांच जगहों पर हुए सिलसिलेवार धमाकों में 26 लोगों की मौत हो गई थी और 135 लोग घायल हुए थे. इसके अलावा तीन जिंदा बम भी मिले थे. एक कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में, एक रीगल सिनेमा के पास और एक इंडिया गेट के चिल्ड्रन पार्क में.
धमाकों के समय, शाम करीब 6.25 बजे, “इंडियन मुजाहिदीन” नाम के संगठन ने ‘al_arbi_delhiatyahoodotcom’ ईमेल आईडी से भारत, पाकिस्तान और दूसरे देशों के कई इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया संस्थानों को ईमेल भेजकर हमले की जिम्मेदारी ली थी.
‘MESSAGE OF DEATH’ विषय वाले इस ईमेल में लिखा था. “अल्लाह के नाम पर, इंडियन मुजाहिदीन एक बार फिर हमला करेगा. अब से 5 मिनट के भीतर. इस बार मौत का संदेश लेकर. तुम्हारे गुनाहों के लिए तुम्हें भयानक तरीके से आतंकित करते हुए. और इस तरह हमारा वादा पूरा होगा, इंशाअल्लाह. जो करना है कर लो और अगर रोक सकते हो तो रोक लो. सिर्फ इंडियन मुजाहिदीन की तरफ से. और यह रहा इसका सबूत.”
इस ईमेल में राजस्थान और गुजरात के पहले हुए बम धमाकों की तस्वीरें और 13 पन्नों का एक PDF दस्तावेज भी था. उस PDF का शीर्षक था. “EYE FOR AN EYE, THE DUST WILL NEVER SETTLE DOWN” (आंख के बदले आंख, धूल कभी नहीं बैठेगी).
उस दिन पांच धमाके हुए थे. एक करोल बाग के गफ्फार मार्केट में, दो कनॉट प्लेस में और दो ग्रेटर कैलाश के एम-ब्लॉक मार्केट में. पुलिस ने पांच FIR दर्ज कीं और इंस्पेक्टर एम.सी. शर्मा की निगरानी में आरोपियों को पकड़ने के लिए एक टीम बनाई.
बाद में अहमदाबाद, दिल्ली और मुंबई से कई लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 19 सितंबर को बटला हाउस एनकाउंटर के बाद हुई गिरफ्तारियां भी शामिल थीं.
2008 के बटला हाउस एनकाउंटर के खिलाफ प्रदर्शन.
सेशन कोर्ट ने आरोप तय करने और मुकदमे की सुनवाई के लिए सभी पांच मामलों को एक साथ जोड़ दिया. अदालत ने कहा कि “ये सभी एक ही घटनाक्रम से जुड़े मामले हैं.”
सालों में अदालत के आदेश
2008 में शुरुआती FIR दर्ज होने के बाद जांच तेजी से आगे बढ़ी. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 2008 से 2011 के बीच 14 चार्जशीट दाखिल कीं. 2011 में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आरोप तय किए. इसी आदेश में अदालत ने पांचों FIR की संयुक्त सुनवाई का निर्देश दिया. आरोपों में भारतीय दंड संहिता, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और IT एक्ट की धाराएं शामिल थीं, जिनमें अधिकतम सजा मौत की है.
हालांकि जुलाई 2013 के बाद मुकदमे की रफ्तार काफी धीमी हो गई और अगस्त 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के प्रशासनिक आदेश के तहत पांचों मामले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दया प्रकाश की अदालत में भेज दिए गए.
फिलहाल पटियाला हाउस कोर्ट में संयुक्त सुनवाई के तहत मोहम्मद हाकिम, मुबीन कादर शेख, पीरभॉय, मोहम्मद सादिक, मोहम्मद जीशान अहमद, साकिब निसार, जिया-उर-रहमान, आसिफ बशीरुद्दीन शेख, मोहम्मद सैफ, मोहम्मद शकील, कायमुद्दीन कपाड़िया और अकबर इस्माइल चौधरी पर मुकदमा चल रहा है.
सितंबर 2008 में नई दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए इंस्पेक्टर एम.सी. शर्मा.
फिलहाल अभियोजन पक्ष 303 गवाहों के बयान दर्ज करा चुका है और सिर्फ दो गवाह बाकी हैं, जिनकी गवाही आंशिक रूप से दर्ज हो चुकी है. फरवरी 2023 के एक आदेश के मुताबिक एक आरोपी शहजाद अहमद की मौत हो चुकी है और उसके खिलाफ कार्रवाई समाप्त हो गई है.
2016 में आरोपियों में से तीन तिहाड़ जेल, दिल्ली में थे. पांच गुजरात की साबरमती जेल में बंद थे. तीन नवी मुंबई की तलोजा जेल में थे और दो हैदराबाद की चंचलगुडा जेल में बंद थे.
हालांकि अदालत के दस्तावेजों के अनुसार दिल्ली ब्लास्ट के मुख्य कथित साजिशकर्ता और इंडियन मुजाहिदीन के सदस्य रियाज भटकल और इकबाल भटकल अब भी फरार हैं. बताया जाता है कि दोनों पाकिस्तान में छिपे हुए हैं. उनके साथ अन्य कथित साजिशकर्ता डॉ. शाहनवाज और आमिर रजा खान भी वहीं हैं.
दिप्रिंट के अदालत के आदेशों के विश्लेषण से पता चलता है कि शुरुआत में पांचों संयुक्त मामलों की सुनवाई इसलिए रुकी रही क्योंकि अदालत की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा काम नहीं कर रही थी. इसकी वजह से दिल्ली के बाहर की जेलों में बंद आरोपी सुनवाई में शामिल नहीं हो पा रहे थे.
फौजदारी कानून के तहत आरोपी की मौजूदगी के बिना मुकदमा नहीं चल सकता. आरोपी को अदालत में या तो शारीरिक रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश करना जरूरी होता है.
चूंकि गवाही दर्ज करते समय आरोपियों की मौजूदगी के बिना अदालत आगे नहीं बढ़ सकती थी, इसलिए उसने इसी कारण कई बार सुनवाई टाल दी.
जुलाई 2016 में सभी आरोपियों के वकीलों ने अदालत से कहा कि “तेजी से न्याय के हित में वे आरोपियों की मौजूदगी पर जोर नहीं देते और उनकी गैरमौजूदगी में भी गवाही दर्ज की जा सकती है.” लेकिन इसके बावजूद 2016 के आखिर तक अदालत आरोपियों को पेश करने के लिए अलग-अलग जेलों को वारंट जारी करती रही.
फरवरी 2017 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तलोजा जेल के अधीक्षक को अवमानना का नोटिस जारी किया. अदालत ने पूछा कि आरोपी मुबीन कादर शेख, आसिफ बशीरुद्दीन शेख और पीरभॉय को “शारीरिक रूप से अदालत में क्यों पेश नहीं किया गया” और इस लापरवाही के लिए उन पर जुर्माना क्यों न लगाया जाए.
यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि जेल अधीक्षक ने कथित तौर पर अदालत के उस “लगातार और नियमित आदेश” का पालन नहीं किया था, जिसमें हर महीने के तीसरे कार्य शनिवार को दूसरे राज्यों की जेलों में बंद सभी आरोपियों को शारीरिक रूप से पेश करने को कहा गया था. अगली सुनवाई में अदालत ने दर्ज किया कि मुंबई की जेल से इस संबंध में कोई जवाब नहीं मिला. बाद में हालांकि इन तीनों आरोपियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश किया गया.
सुनवाई क्यों टलती रही
जब आखिरकार मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई, तो कई बार अदालत का समय खत्म हो जाने, बचाव पक्ष या अभियोजन पक्ष के वकील के मौजूद न होने और आश्वासन के बावजूद अभियोजन पक्ष के गवाहों के अदालत में पेश न होने जैसी वजहों से सुनवाई टालनी पड़ी.
अदालत में दर्ज कारणों के मुताबिक, अभियोजन पक्ष के गवाह, जो ज्यादातर पुलिस अधिकारी थे और जिनमें कुछ रिटायर अधिकारी भी शामिल थे, उनके पेश न होने की वजहें निजी और सरकारी दोनों तरह की थीं.
कई मौकों पर वे अलग-अलग कारणों से अदालत नहीं आ सके. जैसे त्योहार, पारिवारिक कार्यक्रम, सरकारी बैठकें, राष्ट्रीय अवकाश की ड्यूटी, 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव, कोविड-19 महामारी, मिजोरम जैसे संघर्ष वाले इलाकों में तैनाती, राष्ट्रपति के रूट की ड्यूटी, किसी दूसरे मामले में पेश होना, स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति, ऐसी परिस्थितियां जिन्हें टाला नहीं जा सकता था, कानून व्यवस्था की ड्यूटी, हाई कोर्ट में व्यस्त होना और भारत मंडपम में क्राइम ब्रांच और दिल्ली सरकार के गृह विभाग की ओर से आयोजित नए आपराधिक कानूनों के कार्यक्रम में व्यस्त होना.
2024 में मुबीन कादर शेख की जमानत याचिका खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि जिन 497 गवाहों का नाम दिया गया था, उनमें से 198 को हटाया जा चुका है, 282 की गवाही हो चुकी है और 17 गवाह बाकी हैं. उसी आदेश में हाई कोर्ट ने सेशन कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह हफ्ते में कम से कम दो बार सुनवाई करे, क्योंकि कई आरोपी 2008 से जेल में हैं.
जनवरी 2025 में ट्रायल कोर्ट इस सवाल से जूझ रही थी कि मुकदमे की धीमी रफ्तार की वजह से क्या आरोपियों के जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है.
अदालत ने पीरभॉय के वकील महमूद प्राचा की उस मांग का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस मामले की रोजाना सुनवाई हो और किसी भी पक्ष को तारीख न दी जाए, क्योंकि यह राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम के तहत बनाई गई विशेष अदालत है, जिसका मकसद जल्दी न्याय देना है.
10 जनवरी 2025 के आदेश में जज हरदीप कौर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले की जल्द सुनवाई के निर्देश दे चुका है और दिल्ली हाई कोर्ट ने भी हफ्ते में कम से कम दो बार सुनवाई करने का आदेश दिया है. इसलिए इस मामले की सुनवाई हर मंगलवार और शुक्रवार तेजी से की जा रही है.
अदालत ने यह भी कहा कि वह “प्रभावी सुनवाई के लिए हर संभव कोशिश” कर रही है, लेकिन “जमीनी हकीकत” की वजह से ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि उसके सामने कुल 85 मामले लंबित हैं. इनमें 33 UAPA के मामले, 42 दूसरे सेशन केस, 2 PMLA के मामले, बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम के तहत 5 शिकायत वाले मामले, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत 1 मामला और 2 अन्य मामले शामिल हैं.
इन 85 मामलों में अदालत ने कहा कि ज्यादातर मामलों में आरोपी UAPA से जुड़े अपराधों में न्यायिक हिरासत में हैं. ये मामले संवेदनशील हैं और इनमें ज्यादा समय लगता है. इसके बावजूद अदालत “पूरी लगन के साथ इस मामले की हफ्ते में दो बार सुनवाई कर रही है.”
अदालत ने यह भी कहा कि उसे “दूसरे मामलों में मुकदमा झेल रहे ऐसे ही दूसरे कैदियों के अधिकारों का भी ध्यान रखना है.” वरना यह “उन दूसरे कैदियों के जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार को नकारने जैसा होगा.”
हालांकि मामले की सुनवाई हफ्ते में दो बार हो रही थी, लेकिन अभियोजन पक्ष के गवाहों, जो ज्यादातर पुलिस अधिकारी थे, के सरकारी कामकाज का हवाला देकर अदालत में न आने की वजह से सुनवाई बार-बार रुकती रही.
जून 2025 में जब राज्य सरकार ने यह कहते हुए तारीख मांगी कि निरीक्षण रिपोर्ट नहीं मिल रही है, तो आरोपियों के वकीलों ने इसका विरोध किया.
अदालत ने कहा कि “जांच एजेंसी ने निरीक्षण रिपोर्ट ढूंढने की कोई कोशिश नहीं की, जिससे जांच एजेंसी का लापरवाही भरा रवैया साफ दिखाई देता है.”
अदालत ने कहा, “जांच एजेंसी को एक बार फिर निर्देश दिया जाता है कि वह अदालत द्वारा तय की गई तारीखों पर गवाहों को पेश करे और यह भी सुनिश्चित करे कि गवाहों को अदालत में पेश करते समय जरूरी दस्तावेज रिकॉर्ड पर मौजूद हों. अगर इस आदेश का पालन नहीं किया गया तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा.” यह रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है.
फिलहाल अदालत अभियोजन पक्ष के सबूतों की प्रक्रिया पूरी करने के करीब है. अब सिर्फ दो गवाहों की गवाही बाकी है. इसके बाद बचाव पक्ष को अगर कोई सबूत पेश करना होगा तो उसका मौका दिया जाएगा. फिर दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद अदालत 2008 दिल्ली सीरियल ब्लास्ट मामले में अंतिम फैसला सुनाएगी.
पीरभॉय की जमानत पर हाई कोर्ट की टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि ये सीरियल ब्लास्ट कोई सामान्य अपराध नहीं थे, बल्कि एक साथ किया गया आतंकी हमला था. अदालत ने कहा कि पीरभॉय, जो एक प्रशिक्षित कंप्यूटर प्रोफेशनल है, पर आरोप है कि उसने अपनी तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल करते हुए मुंबई की एक कंपनी के वाई-फाई नेटवर्क को हैक किया और धमाकों के दौरान मीडिया संस्थानों को “Message of Death” (मौत का संदेश) नाम का ईमेल भेजा.
अदालत ने कहा कि 12 आरोपियों वाला यह मुकदमा फिलहाल “अपने अंतिम चरण” में है और अब लगभग खत्म होने वाला है. ऐसे समय पर, “जब बाकी बचे दो गवाहों से जिरह अभी पूरी नहीं हुई है”, पीरभॉय को जमानत पर रिहा करने से चल रही सुनवाई पर बुरा असर पड़ सकता है.
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट को भी आदेश दिया कि वह अगले आठ महीने के भीतर इस मुकदमे की सुनवाई पूरी करे.
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