नई दिल्ली: राजनीति के मैदान से लेकर अदालत तक, ग्वालियर के पूर्व शाही मराठा सिंधिया राजघराने के सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआएं वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ रहे, लेकिन 2020-21 में राजनीति और कानूनी लड़ाई, दोनों में हालात बदल गए.
मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गए. इसी पार्टी में उनकी बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे पहले से थीं. इसके बाद जनवरी 2021 में चार दशक पुराने संपत्ति विवाद में समझौते के पहले संकेत दिखने लगे. इस विवाद में ज्योतिरादित्य के साथ उनकी बुआ वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे, उषा राजे और दिवंगत पद्मावती राजे (जिनकी ओर से उनकी बेटियां पक्षकार हैं) शामिल हैं.
पिछले 40 साल में इन मामलों की अपनी अलग कहानी रही है. कई मूल वादी और प्रतिवादी अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी जगह उनके बेटे-बेटियां अदालत में पक्षकार बने हैं. इन सभी मामलों में करोड़ों रुपये की संपत्ति शामिल है. कुछ अनुमान के मुताबिक विवादित संपत्ति की कीमत हज़ारों करोड़ रुपये है.
ये मामले ग्वालियर से लेकर मुंबई तक देश की अलग-अलग अदालतों में चल रहे हैं. चार दशक से जारी इस कानूनी लड़ाई में किसी शाही परिवार की ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ जैसी कहानी दिखाई देती है. इसमें एक बेटे ने अपने पिता के जीवित रहते अपनी दादी पर संपत्ति के अधिकार के लिए मुकदमा किया. वहीं पिता की बहनों (बुआओं) ने अपने भतीजे के खिलाफ मुकदमा दायर कर शाही विरासत में अपना हिस्सा मांगा. इस पूरे विवाद में दो वसीयतें भी शामिल हैं.
अब इन सभी मामलों का आखिरकार अंत होने की उम्मीद है.
इस मामले से जुड़े एक वकील ने दिप्रिंट को बताया कि समझौते को कानूनी मान्यता दिलाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. ग्वालियर की जिला अदालत में बुधवार को होने वाली सुनवाई इस मामले में काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. इस कहानी की शुरुआत 1961 में हुई, जब महाराजा जीवाजीराव सिंधिया का निधन हो गया. उनके बाद उनकी पत्नी विजया राजे सिंधिया, बेटे माधवराव सिंधिया, बहू माधवी राजे सिंधिया और बेटियां उषा राजे, वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और पद्मावती राजे परिवार में रहीं.
सिंधिया परिवार की सबसे बड़ी बेटी पद्मावती राजे ‘अक्कासाहेब’ बर्मन का 1964 में निधन हो गया था. अब इस मामले में उनकी बेटियां कनिका देवी देव बर्मन और प्रतिमा देवी राणे बर्मन उनकी ओर से पक्षकार हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया का जन्म 1971 में हुआ था. उन्होंने 20 साल की उम्र पूरी होने से पहले ही अपनी दादी और पिता के खिलाफ मुकदमा दायर कर खुद को सिंधिया परिवार की संपत्ति का एकमात्र वारिस बताया था. इसके बाद अलग-अलग अदालतों में कई और मुकदमे दायर हुए.
इस विवाद में ऐसी संपत्तियां शामिल हैं जिनकी कीमत बहुत बड़ी मानी जाती है. इनमें ग्वालियर का भव्य जय विलास पैलेस, सख्या विलास, सुसेरा कोठी, कुलेथ कोठी, कॉटेज हिल और टेकनपुर रिट्रीट शामिल हैं. इंडिया टुडे की 2010 की एक रिपोर्ट के अनुसार, शिवपुरी का माधव विलास पैलेस, हैप्पी विलास, जॉर्ज कैसल और उज्जैन का कालियादेह पैलेस भी इस सूची में शामिल हैं. इसी रिपोर्ट के मुताबिक परिवार के पास दिल्ली में ग्वालियर हाउस और सिंधिया विला, मुंबई के समुद्र महल में एक फ्लैट, पुणे का पद्मा विलास पैलेस और वाराणसी का सिंधिया घाट भी था.
महल, सोना, चांदी के सिगरेट केस
2021 में वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई की किताब ‘द हाउस ऑफ सिंधियाज: ए सागा ऑफ पावर, पॉलिटिक्स एंड इंट्रीग’ में भोपाल के पत्रकार राकेश दीक्षित के हवाले से कहा गया है कि सिर्फ ग्वालियर का विशाल जय विलास पैलेस और उससे जुड़ी दूसरी संपत्तियों की कीमत 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है.
ज्योतिरादित्य सिंधिया के संपत्ति और देनदारियों के हलफनामे में 30 जून 2024 तक जीवाजीराव सिंधिया हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा दिया गया है.
हलफनामे के मुताबिक, जय विलास परिसर की खुली ज़मीन, जिसमें साझा सड़क भी शामिल है, की कीमत 198 करोड़ रुपये है. रानी महल की कीमत 32.72 करोड़ रुपये, हिरणवन कोठी की 28.63 करोड़ रुपये, शांति निकेतन की बाज़ार में कीमत 20.45 करोड़ रुपये और विजय भवन की बाज़ार में कीमत 22.49 करोड़ रुपये बताई गई है.
इन संपत्तियों में रैकेट कोर्ट, छोटी विश्रांति, पिकनिक स्थल, रेलवे कैरिज या घंटी घर, बिजली घर (रोशनी घर) और अस्तबल भी शामिल हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र के श्रीगोंडा में 31.79 लाख रुपये की ज़मीन और लिम्पेनगांव में 88.27 लाख रुपये की एक और ज़मीन भी है, जो फिलहाल ज्योतिरादित्य सिंधिया के कब्ज़े में नहीं है.
सिर्फ इन विरासत या पैतृक रिहायशी संपत्तियों की कुल बाजार कीमत 326 करोड़ रुपये बताई गई है.
हालांकि, ज्योतिरादित्य सिंधिया के हलफनामे में इन HUF की अचल संपत्तियों को लेकर एक डिस्क्लेमर भी दिया गया है. इसमें कहा गया है कि इस जानकारी को ग्वालियर, पुणे और मुंबई में चल रहे मामलों सहित किसी भी लंबित मुकदमे में किए गए दावों को छोड़ने के रूप में नहीं माना जाएगा.
यह अस्वीकरण सिर्फ HUF की अचल संपत्तियों पर लागू होता है. वहीं, HUF की चल संपत्तियां भी 26.57 करोड़ रुपये की हैं. इनमें 17.10 करोड़ रुपये के सोने के गहने, 1.13 करोड़ रुपये का 9 कैरेट सोने का कप, 6.88 करोड़ रुपये के चांदी के बर्तन और 20,000 रुपये कीमत के चांदी के सिगरेट केस भी शामिल हैं.
अपनी निजी संपत्तियों में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मुंबई के समुद्र महल में दो फ्लैट भी बताए हैं, जिनमें से एक उन्हें विरासत में मिला है. 3,553 वर्ग फुट के इन फ्लैटों की बाज़ार में कीमत 35.53 करोड़ रुपये बताई गई है.
इसके अलावा 15 ट्रस्ट भी हैं, जिन्हें पूर्व महाराजा की पत्नी विजया राजे सिंधिया ने बनाया था. इन ट्रस्टों में परिवार के अलग-अलग सदस्य ट्रस्टी हैं. इनमें जय विलास ट्रस्ट, ज्योतिरादित्य ट्रस्ट, मन्नू महल ट्रस्ट, मन्नू राजे ट्रस्ट, रंग महल ट्रस्ट, गोरखी ट्रस्ट, महादजी ट्रस्ट, जनकोजी राव ट्रस्ट, रानी उषा राजे चैरिटेबल ट्रस्ट, चिंकू राजे ट्रस्ट, पद्मा राजे चैरिटेबल ट्रस्ट, यशोधरा राजे ट्रस्ट, कमला राजे ट्रस्ट और वसुंधरा राजे चैरिटेबल ट्रस्ट शामिल हैं.
क्या किसे मिलेगा
सिंधिया परिवार के बीच जारी विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि शाही परिवार की संपत्ति का बंटवारा किस नियम के अनुसार होना चाहिए.
ज्योतिरादित्य सिंधिया का कहना है कि महाराजा जीवाजीराव सिंधिया ने अपनी मौत से पहले 1960-61 के लिए अपना वेल्थ टैक्स रिटर्न एक व्यक्ति (Individual) के रूप में भरा था, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के रूप में नहीं.
अपने जीवनकाल में महाराजा ने चार अलग-अलग ट्रस्ट बनाए थे और अपनी चारों बेटियों के लिए हर ट्रस्ट में 5-5 लाख रुपये जमा किए थे, ताकि वे बालिग होने पर इसका इस्तेमाल कर सकें. 1955 में महाराजा ने अपनी बेटी यशोधरा राजे को ग्वालियर के लश्कर स्थित सख्या विलास नाम की संपत्ति भी गिफ्ट डीड के जरिए दे दी थी.
महाराजा की मौत के बाद सरकार ने एक प्रमाण पत्र जारी कर उनके बेटे माधवराव सिंधिया को उनकी सभी चल और अचल निजी संपत्तियों का एकमात्र उत्तराधिकारी माना था.
हालांकि, ज्योतिरादित्य का दावा है कि उनके पिता को मिली संपत्ति ‘रूल ऑफ प्राइमोजेनिचर’ (ज्येष्ठाधिकार) के नियम के तहत मिली थी. इस नियम के अनुसार माता-पिता की मौत के बाद उनकी पूरी संपत्ति सबसे बड़े वैध बेटे को मिलती है. यह नियम पहले शाही और राजघरानों में लागू होता था, ताकि पूरी संपत्ति और सत्ता एक ही परिवार की लाइन में बनी रहे.
इस नियम को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(ii) में भी मान्यता दी गई है. इसमें कहा गया है कि यह कानून उन संपत्तियों पर लागू नहीं होगा, जो किसी भारतीय रियासत के शासक और भारत सरकार के बीच हुए समझौते के तहत सिर्फ एक ही उत्तराधिकारी को मिलती हैं. ज्योतिरादित्य का कहना है कि विवादित संपत्तियों पर भी उनका अधिकार इसी नियम के आधार पर है.
वहीं, अपने पति की मौत के बाद विजया राजे सिंधिया ने कई बंटवारा दस्तावेज (पार्टिशन डीड) तैयार किए और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए कई ट्रस्ट बनाए.
ज्योतिरादित्य का आरोप है कि उनकी दादी ने जानबूझकर ट्रस्ट और बंटवारे के दस्तावेज इस तरह तैयार कराए, ताकि संपत्तियों को HUF की संपत्ति दिखाया जा सके. उनका कहना है कि अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो उनकी दादी को सिर्फ भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का अधिकार मिलता.
दूसरी ओर, जीवाजीराव सिंधिया की बेटियों का कहना है कि उनकी मौत 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के बाद हुई थी, इसलिए यह कानून उन पर भी लागू होता है. उनका कहना है कि वे क्लास-1 उत्तराधिकारी हैं, इसलिए विवादित संपत्तियों में उनका भी हिस्सा बनता है.
300 पन्नों की संपत्तियों की सूची
1984 में, जब उनके बेटे माधवराव सिंधिया ज़िंदा थे, तब विजया राजे सिंधिया ने बॉम्बे हाई कोर्ट में HUF की चल संपत्तियों के बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया.
विवादित चल संपत्तियों की सूची 300 पन्नों की थी. इसमें ऐतिहासिक पेंटिंग्स, 623 किलो सोना, 332 किलो चांदी और 9वीं से 14वीं सदी तक की प्राचीन पेंटिंग्स शामिल थीं.
मुकदमा चलने के दौरान ही विजया राजे सिंधिया का निधन हो गया. इसके बाद उनके पूर्व निजी सचिव सरदार संभाजी आंग्रे को उनकी संपत्ति की ओर से अदालत में पेश होने की जिम्मेदारी दी गई. आंग्रे की मौत के बाद, उनकी वसीयत के अनुसार स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक उनकी संपत्ति की ओर से एकमात्र वादी बने.
इस मामले में प्रतिवादी भी समय-समय पर बदलते रहे. शुरुआत में पहले प्रतिवादी माधवराव सिंधिया थे, जबकि दूसरी प्रतिवादी उनकी पत्नी माधवी राजे सिंधिया थीं. तीसरी, चौथी और पांचवीं प्रतिवादी विजया राजे और जीवाजीराव सिंधिया की बेटियां उषा राजे राणा, वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे थीं. छठी और सातवीं प्रतिवादी उनकी सबसे बड़ी बेटी पद्मावती राजे ‘अक्कासाहेब’ देव बर्मन की बेटियां कनिका देवी देव बर्मन और प्रतिमा देवी राणे बर्मन थीं. माधवराव सिंधिया की मौत के बाद उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया और बेटी चित्रांगदा राजे सिंधिया पहले प्रतिवादी के रूप में इस मुकदमे में शामिल हुए.
यह मुकदमा दायर होने के 34 साल बाद, यानी 2018 में पहली बार उन मुद्दों को तय करने की प्रक्रिया तक पहुंचा, जिन पर सुनवाई होनी थी. जनवरी 2021 में पहली बार बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया गया कि दोनों पक्ष समझौते की कोशिश कर रहे हैं.
इसके तीन साल बाद, जनवरी 2024 में हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के लिए समय-सीमा तय कर दी. अदालत ने कहा कि यह मुकदमा कई सालों से लंबित है और अभी भी प्रतिवादी के सबूतों वाले हलफनामे की प्रक्रिया में ही अटका हुआ है.
जब पक्षों ने अदालत को बताया कि वे आपसी समझौते की कोशिश कर रहे हैं, तो अदालत ने कहा कि “अगर पक्ष समझौता नहीं कर पा रहे हैं या इसमें बहुत ज्यादा समय लगा रहे हैं, तो इस अदालत में चल रही कार्यवाही को अनिश्चित समय तक रोका नहीं जा सकता.”
इसके बाद अदालत ने दोनों पक्षों को आठ हफ्ते के भीतर समझौते की शर्तें अदालत में पेश करने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि अगर तय समय में समझौते की शर्तें पेश नहीं की गईं, तो वह इस मुकदमे की नियमित सुनवाई आगे बढ़ाएगी.
दशकों पुराने मुकदमे
इस मामले का एक अहम मुकदमा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 20 साल की उम्र पूरी होने से पहले ही ग्वालियर की जिला अदालत में अपनी दादी विजया राजे सिंधिया और पिता माधवराव सिंधिया के खिलाफ दायर किया था.
माधवराव सिंधिया, स्वर्गीय जीवाजीराव सिंधिया और विजया राजे सिंधिया के इकलौते बेटे थे. जीवाजीराव की मौत के बाद मुंबई के वकील डी.एम. हरीश को एकमात्र मध्यस्थ (सोल आर्बिट्रेटर) बनाया गया. उन्होंने 1 अप्रैल 1980 के मध्यस्थता फैसले (आर्बिट्रल अवॉर्ड) के जरिए मां और बेटे के बीच कुछ संपत्तियों का बंटवारा किया.
विवाद की शुरुआत में ही ज्योतिरादित्य ने अदालत से मांग की कि उनकी दादी को विवादित संपत्तियों के बारे में कोई फैसला लेने से रोका जाए. उनका आरोप था कि विजया राजे पहले ही कई दस्तावेज़ बनाकर विवादित संपत्तियों को दूसरे लोगों को देने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी थीं.
उदाहरण के तौर पर, उन्होंने कहा कि सरोजिनी नगर की एक संपत्ति के लिए विजया राजे ने एक संभावित लीजधारक से 1 लाख रुपये एडवांस ले लिए थे. इसी तरह वसंत विहार और सरोजिनी नगर स्थित कुसुमपुर क्ले माइंस को लेकर भी ऐसे ही इंतज़ाम किए गए थे.
अक्टूबर 1990 में ग्वालियर के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने ज्योतिरादित्य के पक्ष में अंतरिम रोक (टेम्पररी इंजंक्शन) का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि अगर विजया राजे को विवादित संपत्तियों को बेचने, ट्रांसफर करने या किसी और को देने से नहीं रोका गया, तो ज्योतिरादित्य को ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई नहीं हो सकेगी.
इस आदेश को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के अंतरिम आदेश को सही माना. 2001 में विजया राजे की मौत के बाद यह विवाद और जटिल हो गया.
संभाजी आंग्रे ने 1985 में लिखी गई एक हस्तलिखित वसीयत पेश की. रशीद किदवई की किताब के अनुसार, इस वसीयत में विजया राजे ने अपने बेटे और पोते को संपत्ति से बाहर कर दिया था. उन्होंने अपनी दो-तिहाई संपत्ति बेटियों के नाम और एक-तिहाई संपत्ति एक ट्रस्ट के जरिए दान करने की बात लिखी थी. यह ट्रस्ट पहले से बनाए गए 15 ट्रस्टों को भी शामिल करता था. इस वसीयत के एग्जीक्यूटर संभाजी आंग्रे और गुरुमूर्ति थे.
आंग्रे ने 2001 में दिल्ली हाई कोर्ट में वसीयत को कानूनी मंजूरी (प्रोबेट) दिलाने की याचिका दायर की, जो अब भी लंबित है. प्रोबेट एक कानूनी दस्तावेज़ होता है, जिससे साबित होता है कि वसीयत असली है और उसके आधार पर संपत्ति और पैसे का प्रबंधन किया जा सकता है.
लेकिन 2001 में ही विजया राजे की बेटियों उषा राजे, वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक अलग याचिका दायर की. उनका दावा था कि विजया राजे ने फरवरी 2001 में एक नई वसीयत बनाई थी, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति सिर्फ अपनी तीनों बेटियों के नाम की थी.
पिछले साल सितंबर में अदालत को बताया गया कि परिवार के लोग आपसी समझौते पर सहमत हो गए हैं. साथ ही ज्योतिरादित्य और चित्रांगदा ने अपनी बुआओं के पक्ष में प्रोबेट जारी करने पर अपनी आपत्तियां वापस ले ली हैं.
इस साल फरवरी में अदालत ने उनकी याचिका मंजूर कर ली. अदालत ने कहा कि विजया राजे की सभी बेटियों, पोतियों और पोते ने उनकी तीनों बेटियों के पक्ष में सहमति दे दी है.
इसके बाद अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि यह जांचने के बाद कि कहीं कोई दूसरी याचिका या आपत्ति (केविएट) तो दाखिल नहीं हुई है, प्रोबेट जारी किया जाए.
‘180 डिग्री पलटना’
सिंधिया परिवार का एक और मुकदमा 1985 में पुणे की सिविल कोर्ट में विजया राजे सिंधिया ने दायर किया था. इसमें उन्होंने संपत्तियों के बंटवारे और अपने हिस्से की आधी संपत्ति अलग देने की मांग की थी.
उन्होंने अदालत से कहा था कि उनके बेटे माधवराव सिंधिया के पास संपत्ति का दूसरा आधा हिस्सा है, जबकि उनकी बेटियां उषा राजे राणा, वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और दिवंगत पद्मावती राजे देव बर्मन (जिनका प्रतिनिधित्व उनकी बेटियां कनिका देवी देव बर्मन और प्रतिमा देवी राणे बर्मन कर रही थीं) का इन संपत्तियों में कोई हिस्सा नहीं है.
1999 की वसीयत ने इस मुकदमे में बेटियों की स्थिति बदल दी.
इसके बाद 2012 में बेटियां इस मुकदमे में वादी (प्लेंटिफ) बन गईं और माधवराव सिंधिया की जगह उनके कानूनी उत्तराधिकारी शामिल हुए.
लेकिन 2016 में बेटियों ने अदालत से कहा कि उन्हें वादी बनाने वाला संशोधित मुकदमा (अमेंडेड प्लेंट) बिना उनकी अनुमति और बिना उनके हस्ताक्षर के सिर्फ औपचारिक तरीके से दाखिल कर दिया गया था.
समस्या यह थी कि इस संशोधित मुकदमे में उन्हें विजया राजे सिंधिया का कानूनी उत्तराधिकारी दिखाया गया था, जबकि विजया राजे का कहना था कि बेटियों का संपत्तियों में कोई हिस्सा नहीं है.
इससे दूसरे मुकदमों में बेटियों के दावों को नुकसान पहुंच सकता था, जहां वे यह कह रही थीं कि उन्हें भी अपने पिता की संपत्ति में अपनी मां और भाई के साथ बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए.
इसी दौरान बेटियों ने 2010 में ग्वालियर की अदालत में संपत्ति के बंटवारे के लिए एक और मुकदमा भी दायर किया था.
इसलिए, विजया राजे का यह पुराना दावा कि बेटियों का पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है, जो संशोधित मुकदमे में भी शामिल था, दूसरे मुकदमों में बेटियों के दावों के खिलाफ माना जा सकता था.
लेकिन 2017 में अदालत ने मुकदमे में संशोधन की उनकी मांग खारिज कर दी.
सुनवाई के दौरान ज्योतिरादित्य और चित्रांगदा राजे के वकीलों ने कहा कि विजया राजे ने जिस राहत की मांग की थी, उसके बिल्कुल उलट जाकर “180 डिग्री पलटी” मारते हुए नया मामला पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, अक्टूबर 2018 से इस मुकदमे की सुनवाई बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के कारण रुकी हुई है.
आखिरकार उम्मीद की किरण
2021 में पहली बार इस विवाद के सुलझने की उम्मीद अदालतों में दिखाई दी. जनवरी 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया गया कि दोनों पक्ष आपसी समझौते की संभावना तलाश रहे हैं.
नवंबर 2021 में जिला अदालत को भी दोनों पक्षों ने बताया कि वे मामले को आपसी सहमति से सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई अनिश्चित समय (साइन डाई) के लिए टाल दी और आदेश दिया कि तब तक अदालत के सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं.
11 जनवरी 2023 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश में भी कहा गया कि दोनों पक्षों के वकीलों ने अदालत को बताया है कि विवाद के सुलझने की “अच्छी संभावना” है.
हालांकि, अदालत को यह भी बताया गया कि यह मामला सबसे पुराने मामलों में शामिल है. इसलिए ट्रायल कोर्ट ने समझौते के लिए सुनवाई टालने से इनकार कर दिया और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 7 रूल 11 के तहत दायर एक आवेदन पर 13 जनवरी 2023 को सुनवाई तय कर दी.
यह आवेदन प्रतिवादी की ओर से इस मांग के लिए दायर किया जाता है कि सिविल मुकदमे को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया जाए. इससे यह भी पता चलता है कि यह मुकदमा तीन दशक से ज्यादा समय तक शुरुआती चरण में ही अटका रहा.
दोनों पक्षों ने हाई कोर्ट से कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट इस आवेदन पर फैसला दे देता है, तो समझौते की प्रक्रिया पर असर पड़ेगा. इसलिए उन्होंने अदालत से कहा कि न्याय के हित में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही कुछ समय के लिए रोक दी जाए, ताकि दोनों पक्ष आपसी समझौते तक पहुंच सकें.
इसके बाद सिंगल जज बेंच ने ट्रायल कोर्ट में चल रहे एक मुकदमे की सुनवाई अगली तारीख तक रोक दी. बाद की सुनवाई में अदालत इस अंतरिम आदेश की समय-सीमा बढ़ाती रही, लेकिन समझौते की लंबी प्रक्रिया से अदालत का धैर्य भी जवाब देने लगा.
मार्च 2025 में अदालत ने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के वकील बार-बार बहस के लिए और समय मांग रहे हैं. अदालत ने कहा कि वकील “मामले को जानबूझकर लंबा खींचने की कोशिश कर रहे हैं. 11 जनवरी 2023 को पहली ही तारीख पर उन्होंने कार्यवाही रुकवा ली थी और समझौते का हवाला देकर अब बहस नहीं करना चाहते.”
अदालत ने इसे “देरी करने की रणनीति” बताया.
हालांकि, एक साल बाद, यानी मार्च 2026 में आखिरकार अदालत को बताया गया कि दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझ गया है और वे ट्रायल कोर्ट में समझौते का दस्तावेज (कम्प्रोमाइज) दाखिल करने वाले हैं.
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