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Monday, 14 September, 2026
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भारतीय डिफेंस को चाहिए जमीनी हकीकत की खुराक, और ड्रोन की बड़ी खेप

पिछले दशक में एक मसला यह उभरा कि सरकार को ज्यादा उदार रक्षा बजट बनाना संभव नहीं लगा, बावजूद इसके कि सुरक्षा की स्थिति खराब रही है.

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अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने हाल में अपने एक भाषण में तीन सिद्धांत प्रस्तुत किए : “जो देश अपनी जरूरत की चीजें नहीं उत्पादित करता वह सच्चे अर्थों में सुरक्षित नहीं हो सकता. जो देश महत्वपूर्ण ‘इनपुट्स’ के लिए प्रतिद्वंद्वी देशों पर निर्भर रहता है वह कभी संप्रभु नहीं हो सकता. और जो देश अपनी अर्थव्यवस्था को केवल उपभोग में सीमित कर देता है, वह वास्तव में समृद्ध नहीं हो सकता.”

बेसेंट के सामने वह दुनिया है जिसका निर्माण करने में दूसरे किसी देश से ज्यादा उनके अपने देश ने भूमिका निभाई है. यह वो दुनिया है जिसमें, थुसीडाइड्स के मुताबिक, ताकतवर जो चाहे वह कर सकता है और कमजोर के हिस्से में तकलीफ झेलना ही बदा है; जिसमें गठबंधनों की उपेक्षा की जा सकती है, मित्रता बेमानी हो जाती है, और बाजारों में अप्रत्याशित उथलपुथल होती है.

इस नई दुनिया को अगर किसी मुहावरे में बताना हो तो यह है— ‘परस्पर निर्भरता बना हथियार’. इस हथियार का इस्तेमाल वे ही आसानी से करते हैं जो विश्व अर्थव्यवस्था की मुख्य चाबियों को अपनी मुट्ठी में रखते हैं, और यह उन्हें दूसरों पर दबाव डालने की ताकत देता है. इसे ‘पैनोप्टिकोन’ वाली स्थिति (सर्वव्यापी निगरानी के जरिए नियंत्रण हासिल करना) कहा जा सकता है. यह कुछ वैसा ही है जैसे गोलाकार जेल में एक ही गार्ड सभी कैदियों पर नजर रखता है. बैंकों के बीच जो संचार सिस्टम ‘SWIFT‘ काम करती है उसके बारे में भी सोच सकते हैं. इसके साथ ही यह स्थिति दबाव बनाने वाली कुंजियां भी उपलब्ध करा सकती हैं. ये कुंजियां दूसरों को कमजोर करने का साधन भी बन सकती हैं. पनडुब्बियों के केबल के बारे में सोचिए, जिन्हें काट कर दुश्मन को कुछ समय के लिए पंगु बनाया जा सकता है.

इस तरह की दुनिया भारत जैसी मझोली ताकत के लिए ज्यादा जटिल हो जाती है, और कई नई चुनौतियां पेश करती है, और केवल कच्चे जवाब या समाधान प्रस्तुत करती है. ‘आत्मनिर्भरता’ के जोश में, क्या भारत ऐसी दुनिया में अपनी जरूरत की हर चीज का उत्पादन करके अपने लिए सुरक्षा और संप्रभुता की व्यवस्था कर सकता है, जैसा कि बेसेंट ने कहा है? या वह महत्वपूर्ण ‘इनपुट्स’ के लिए दूसरों पर निर्भर न करे, जबकि बड़ी महाशक्तियां भी ऐसा करने की कोशिश नहीं करतीं?

जरा, उन बड़े वेपन प्लेटफॉर्मों और टेक्नोलॉजी के बारे में सोचिए, जिन्हें फिलहाल आयात किया जा रहा है. जब देश अपनी जरूरत का 90 फीसदी तेल और गैस आयात कर रहा है, तब स्वायत्तता कितनी महंगी पड़ेगी यह बिलकुल स्पष्ट है. जब जुर्माने के रूप में टैरिफ थोपे जा रहे हों और व्यापार पर मनमाने प्रतिबंध लगाए जा रहे हों तब सोचिए कि संप्रभुता की कितनी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

जाहिर है, ऐसी दुनिया में लक्ष्य आर्थिक कार्यकुशलता हासिल करना और प्रतिस्पर्द्धी बनना ही हो सकता है, जिसके साथ कमजोर पड़ने का मुद्दा भी जुड़ा हो और उस मुद्दे के असर को कमजोर करने की कोशिश भी जुड़ी हो. और यह सब उस बड़ी कीमत को चुकाए बिना किया जाए जो स्थानीयकरण के साथ अक्सर जुड़ी होती है और प्रतिस्पर्द्धा की क्षमता को प्रभावित करती है. इसलिए, आज घरेलू चिप का उत्पादन करने और डेटा सेंटर्स बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. इसके बावजूद, परस्पर निर्भरता इस परिदृश्य के साथ जुड़ी हुई है और इससे निबटना ही होगा.

यूक्रेन और ईरान में जारी विषम लड़ाइयां अर्थव्यवस्था के सामने अपनी ओर से जरूरी अलग सवाल खड़े कर रही हैं. एक दिन में सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन (आक्रमण और बचाव के लिए) दागे जा रहे हैं, और यह सिलसिला दोनों मोर्चों पर कई दिनों से जारी है. क्या भारत मैन्युफैक्चरिंग के अपने सीमित आधार के बूते ऐसी सप्लाई क्षमता बनाने की उम्मीद कर सकता है? या (अधिक समझदारी भरे विकल्प के रूप में) असैनिक औद्योगिक इकाइयों को तुरंत सैन्य इकाइयों में परिवर्तित कर सकता है?

यूक्रेन ने भी जाहिर कर दिया है कि जमीनी विस्तार को लक्ष्य बनाना असंभव है ताकि ‘किल ज़ोन’ संघर्ष की रेखा को स्थिर कर सके. क्या यह सैन्य ताकत बनाने के पारंपरिक तरीके को बेकार कर देता है, जो डिफेंस बजट के अधिकांश भाग को गटक जाता है? ऑपरेशन सिंदूर ने साफ कर दिया कि युद्ध अब साइबर-भौतिक मोर्चे पर लड़े जाते हैं. ऐसी लड़ाई के लिए कैसी क्षमताएं चाहिए? हमारे पास ऐसी कितनी क्षमता है?

आत्मनिर्भरता की भी सीमा है

समझदारी भरी नीतियां हमेशा समाधान उपलब्ध्ब कराती हैं. उदाहरण के लिए, भारत तेल के लिए निर्भरता को कम करने के लिए चीन की नकल करके ‘इलेक्ट्रो-स्टेट’ बन सकता है और सप्लाइ के मामले में झटकों से बचने के अपनी भंडारण क्षमता बढ़ा सकता है. चीन चार महीने से ज्यादा के लिए अपनी जरूरत भर का तेल जमा करके रख सकता है, जबकि भारत केवल 10 दिनों के लिए भंडारण कर सकता है. जब खेती के लिए बेहद जरूरी खाद जैसे इनपुट की उपलब्धता ही उनकी कीमत तय कर सकती है, तब समझदारी भरी नीति ऐसी चीज का घरेलू उत्पादन बढ़ा सकती है जिसके लिए किसी रॉकेट विज्ञान की जरूरत नहीं है.

भारत दूसरे देशों पर निर्भरता को लेकर हमेशा सावधान रहा है, खासकर प्रतिरक्षा, अंतरिक्ष, और परमाणु ऊर्जा के मामलों में. वह राष्ट्रीय क्षमताओं का निर्माण करने और आत्मनिर्भर बनने की शुरू से कोशिश करता रहा है. डिफेंस के क्षेत्र में उसने कुछ प्रभावशाली सफलताएं हासिल की हैं : उदाहरण के लिए, परमाणु हथियार से लैस पनडुब्बियां बनाने में (हालांकि इसमें रूसी मदद बेहद महत्वपूर्ण रही है). इसके अलावा, बहुआयामी मिसाइल प्रोग्राम भी है. कई स्तरों वाला एअर डिफेंस सिस्टम भी है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी ताकत दिखाई. ‘आर्मामेंट्स आर-ऐंड-डी स्टेबलिशमेंट’ ने ‘कल्याणी’ और ‘टाटा’ की साझीदारी में सेना के तोपखाने के लिए मोबाइल तोपों का निर्माण किया है. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के लिए भी कुछ क्षमताओं का विकास सफलता की एक और कहानी कहता है.

खतरा यह है कि ज्यादा ऊंचा हाथ मारने की कोशिश में नाकामी न हाथ लगे, या इतनी देर न हो जाए कि वह बर्दाश्त के काबिल न हो (जो कि डिफेंस के मामले में नाकामी ही मानी जाएगी). ऐसी कोशिश बताती है कि डिफेंस के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के कई प्रयास विफल रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि भारत दुनिया में हथियारों का आयात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है (यूक्रेन के बाद). देश को जिन बड़े वेपन प्लेटफॉर्मों की जरूरत है वे आज भी आयात करने पड़ रहे हैं. खरीद की ताजा सूची में द्साल्ट एविएशन के बहुद्देशीय 114 राफेल विमान (कुल कीमत 28 अरब डॉलर), थाइस्सेनकृप्प से छह पारंपरिक पनडुब्बियां (कुल कीमत 8 अरब डॉलर) शामिल हैं. काफी ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले 31 हेवी-ड्यूटी MQ-9B ड्रोन की डेलीवरी का इंतजार हो रहा है. इसका सौदा जनरल एटॉमिक्स से 3.5 अरब डॉलर में किया गया है. इतनी ऊंची कीमत वाले हथियारों की डेलीवरी अगले कुछ वर्षों में की जाएगी, लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस वर्ष डिफेंस पर भारत का कुल पूंजीगत खर्च 23 अरब डॉलर तय किया गया है. आयातित हथियार उनके देसी विकल्पों से कहीं ज्यादा महंगे होते हैं.

इसके अलावा दुनिया सप्लाई की अनिश्चितताओं की समय-समय पर याद दिलाती रहती है. नौसेना के युद्धपोतों को चलाने वाली गैस टर्बाइन इंजिन यूक्रेन से आती रही है, जो खुद युद्ध में उलझा हुआ है. सौभाग्य से, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स मोर्चे पर तैनात युद्धपोतों के लिए गैस टर्बाइन बना रहा है. लेकिन रूस युद्ध में फंसा है, तो S-400 एअर डिफेंस सिस्टम की सप्लाइ बाधित हुई है. हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लि. (एचएएल) वायुसेना की मांग पूरी करने के लिए 180 ‘तेजस’ फाइटर नहीं दे सकती क्योंकि और चीजों के साथ-साथ उसके लिए इंजिन जेनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से आती है, जहां उत्पादान में बाधा आई है क्योंकि कल-पुर्जे देती आ रही साउथ कोरियाई सप्लायर ने यह कारोबार बंद कर दिया है.

महत्वाकांक्षा उतनी ही सफल होती है जितनी वह काम करवाती है. आयात पर निर्भरता इसलिए बनी हुई है क्योंकि कई योजनाएं और कई लक्ष्य पूरे नहीं हुए हैं. ‘तेजस’ के लिए जेनरल इलेक्ट्रिक के इंजिन पर निर्भरता इसलिए है क्योंकि देश में तैयार की गई ‘कावेरी’ इंजिन काम लायक नहीं साबित हुई. लेकिन ‘तेजस’ के साथ दूसरी समस्याएं भी हैं, जैसे मिसाइल फायरिंग और रडार से जुड़ाव की समस्या. थलसेना ने जिस तरह की राइफल की मांग की है (जिसके बैरेल को बदला जा सके ताकि अलग-अलग आकार के बुलेट का इस्तेमाल किया जा सके) वैसी राइफल बना पाना मुश्किल साबित हो रहा है. इसलिए बड़े पैमाने पर आयात किया जा रहा है, लेकिन बैरल बदलने वाली बंदूकों का नहीं. इसके अलावा, अमेरिकी ‘जीपीएस’ (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) सिस्टम की जगह उपग्रह आधारित क्षेत्रीय विकल्प NavIC (नेविगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन) सिस्टम का इस्तेमाल इसलिए नहीं हो पा रहा है कि ओपरेशनल उपग्रह की कमी है और एटमिक क्लॉक नाकाम है. यह स्थिति तब है जब 1999 के करगिल युद्ध के बाद ही ऐसी सिस्टम की जरूरत बताई जा चुकी थी.

ख़्वाहिशें, उनकी कीमत, और सुधार

यह वैसा ही है जैसे बीते युग के साम्राज्य घोड़ों की मांग किया करते थे. नौसेना के डेस्ट्रायर पोतों को ‘टोड-एरेड सोनार’ सिस्टम के बिना कमीशन कर दिया गया है, और पनडुब्बियां हेवी ड्यूटी टॉरपीडो के बिना समुद्र के अंदर गश्त लगा रही हैं. देश के अंदर साजोसामान बनाने के दावों के कारण आयात बंद कर दिया जाता है या अंतरराष्ट्रीय सप्लायरों को ब्लैक लिस्ट कर दिया जाता है (रिश्वतख़ोरी तो डिफेंस इंडस्ट्री का अभिन्न अंग रहा ही है). इसका नतीजा यह होता है कि नौसेना को न तो आयातित सामान मिलता है और न देश में बना विकल्प.

जरूरत यह है कि वास्तविकता को समझा जाए कि देश अपने बूते क्या कुछ कर सकता है (और कम लागत पर समयसीमा के अंदर सामान उपलब्ध करा सकता है), और वह जो नहीं उपलब्ध करा सकता उन्हें अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से हासिल किया जाए. उदाहरण के लिए, भारत अगर रूस के Su-57 स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम का पार्टनर बना रहता तो क्या बेहतर स्थिति में नहीं रहता, खासकर इसलिए कि अब चीन ने अपना J-20 स्टील्थ फाइटर विमान तैयार कर लिया है?

उत्साह बढ़ाने वाली नई बात यह है कि नीतिगत बदलावों से पिछला रेकॉर्ड सुधारेगा. डिफेंस के हार्डवेयर में घरेलू सप्लाइ का अनुपात बढ़ाने के लिए लक्ष्य तय किए गए हैं. निजी क्षेत्र को हथियारों के कारोबार में उतरने का निमंत्रण दिया गया है और विदेशी निवेश के नियम उदार बनाए गए हैं. ऑटोमैटिक रूट के तहत 74 फीसदी विदेशी मालिकाना की इजाजत दी गई है. सरकारी अनुसंधान प्रयोगशालाओं को उत्पादन में निजी क्षेत्र को साझीदार बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जबकि 2018 में शुरू किए गए ‘आइडेक्स’ (इनोवेटर्स फॉर डिफेंस एक्सेलेंस) प्रोग्राम के जरिए स्टार्ट-अप कंपनियों को फंड की पेशकश की जा रही है.

इस सबके नतीजे उल्लेखनीय हैं. घरेलू डिफेंस प्रोडक्शन पिछले 12 वर्षों में चार गुना बढ़कर 1.78 ट्रिलियन रुपये के बराबर हो गया है, जिसमें निजी क्षेत्र का आउटपुट एक चौथाई के बराबर है. मुद्रास्फीति का हिसाब करें तो वास्तविक उत्पादन में शायद दोगुना वृद्धि हुई है. डिफेंस एक्सपोर्ट में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो 38,000 करोड़ रु. से कम के बराबर नहीं होगा. डिफेंस एक्सपोर्ट बनाम इम्पोर्ट का अनुपात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर, 1:2 पर पहुंच गया है. वैसे, यह मानना पड़ेगा कि आयातों का अनुमान लगाना मुश्किल है, क्योंकि देसी उत्पादक भी आयातित इनपुट पर निर्भर करते हैं. लेकिन टाटा, अडाणी, कल्याणी, महिंद्रा, गोदरेज और लार्सेन ऐंड टूब्रो जैसे समूहों ने डिफेंस उत्पादन पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है और तोप, ड्रोन, मिसाइलों के पुर्जे, लड़ाकू वाहन, और ट्रांसपोर्ट विमान का उत्पादन करने लगे हैं.

इस सबके बावजूद, सबसे बड़े डिफेंस सप्लायर अभी भी पब्लिक सेक्टर के पुराने खिलाड़ी ही हैं. उनके लंबे अनुभव और स्थापित क्षमताओं के कारण यह तो स्वाभाविक भी है. इसलिए, दुनिया के 100 टॉप डिफेंस उत्पादकों में जिन तीन भारतीय कंपनियों के नाम भी शामिल हैं वे सभी सरकारी कंपनियां ही हैं—हिंदुस्तान एरोनॉटैक्स, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स. दूसरी भारतीय कंपनियां भी महत्वपूर्ण हैं—मिसाइल प्रोग्राम के लिए भारत डाइनामिक्स, जबकि भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स पोतों के गैस टर्बाइन इंजिन बनाती है, और वह पुराने यूक्रेनी सप्लायरों की जगह ले सकती है.

लेकिन अब सब कुछ सरकारी ही नहीं है. लार्सेन ऐंड टूब्रो ने दो शिपयार्डों के अलावा महत्वाकांक्षी शिप डिजाइन सेंटर में भी निवेश किया है. टाटा C295 ट्रांसपोर्ट विमानों को एसेंबल करने के लिए एयरबस कंपनी के साथ साझीदारी कर रही है. गोदरेज एरो-इंजिन बनाने के कठिन काम पर ज़ोर दे रही है. कल्याणी ने तोप बनाने का काम शुरू किया है. नौसेना किर्लोस्कर को मरीन डीजल इंजन बनाने के लिए फंड दे रही है.

उत्पादन के लाइसेंस से असली क्षमता विकास तक

महत्वपूर्ण तो यह है कि किसी और के ब्लूप्रिंट और अहम कल-पुर्जों का इस्तेमाल करके लाइसेंसशुदा उत्पादन (जो कि सीमित स्वायत्तता है) की सीमा पार करके देसी वेपन्स प्लेटफॉर्म तैयार किए जाएं. ‘एचएएल’ ने सैकड़ों सुखोई फाइटर विमान एसेंबल किए लेकिन चीनी कंपनियों की तरह अपना विमान नहीं बना सका. चीन ने सोवियत संघ के साथ साझीदारी से आगे बढ़कर अपना विमान तैयार किया. इसलिए, ‘तेजस’ का प्रोग्राम महत्वपूर्ण है. ‘एचएएल’ वायुसेना की मांग पर विमान नहीं बना पा रहा, इस वजह से फाइटर स्क्वाड्रनों की भारी कमी हो गई है. इस विफलता के कारण कंपनी को उन कंपनियों की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया, जो आधुनिक मीडियम कंबैट विमान बना सकती हैं; इसलिए तीन निजी कंपनियां दौड़ में शामिल हैं. उन्हें पहले से इसका कोई अनुभव नहीं है, इसलिए उन्हें विदेशी साझीदारों पर निर्भर रहना होगा. ऐसे में इसे वास्तव में देसी क्षमता का विकास कहा जाएगा कि नहीं, यह आगे देखा जाएगा, खासकर इसलिए कि अनुसंधान व विकास (R&D) में बड़ा निवेश करना पड़ेगा, जो कि भारतीय उद्योगों की हमेशा एक कमजोरी रही है.

अधिकतर देशों ने डिफेंस इंडस्ट्री का निर्माण अपने व्यापक औद्योगिक आधार के बूते किया, जिसमें उन्हें टेक्नोलॉजी की अपनी ताकत का सहारा मिला. भारत एक अपवाद रहा है, क्योंकि इसका मैनुफैक्चरिंग सेक्टर अविकसित है, और R&D गिनती के सेक्टरों में सीमित है, ये सेक्टर निजी क्षेत्र में तो न के बराबर हैं. जीडीपी में मैनुफैक्चरिंग का योगदान उसी स्तर पर अटका है जिस स्तर पर यह तीन-चार दशक पहले था, और जो प्रोडक्ट हैं वे प्रायः प्रतियोगिता में आगे नहीं रहने वाले हैं. सॉफ्टवेयर सर्विस देने वाली कंपनियां 30 फीसदी के मुनाफे का मार्जिन उठा रही थीं इसके बावजूद एआइ में निवेश नहीं कर रही थीं, जो आज उनके मूल कारोबार के लिए खतरा बन रही है.

इसलिए, मैनुफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी की व्यापक सीमाओं के साथ अत्याधुनिक डिफेंस मैनुफैक्चरिंग यूनिटों की स्थापना करने की कोशिश अनोखी है, और इसके साथ चुनौतियां जुड़ी हैं. मझगांव को तब तक इंतजार करना पड़ा जब तक स्टील ऑथरिटी ऑफ इंडिया पनडुब्बी के ‘प्रेसर हल्स’ (पतवार) के लिए और ‘कैपिटल’ युद्धपोतों के हल्स के लिए बेहद मजबूत स्टील नहीं तैयार कर पाई. सीमित बजट के कारण प्रोजेक्ट की समयसीमा लंबी हो जाती है और जब तक प्रोडक्ट तैयार होता है तब तक वह प्रायः पुराना पड़ गाया होता है. और, नागरिक दायरे के विपरीत डिफेंस में न तो ‘सेकंड-बेस्ट’ के लिए कोई गुंजाइश होती है और न लड़ाई छिड़ जाने के बाद इंतजार करने का समय रहता है. इन कमियों के ऊपर, जिस हुनर का अभाव दिखता है वह है प्रोजेक्ट का प्रभावी प्रबंधन, जिसमें इन बातों पर ज़ोर दिया जाता है—करने योग्य क्या है, क्या खरीदा जाना चाहिए, और जो काम नहीं कर रहा उस पर रोक लगाने की क्षमता ताकि ज्यादा संसाधन बरबाद न हों.

पिछले दशक में एक मसला यह उभरा कि सरकार को ज्यादा उदार रक्षा बजट बनाना संभव नहीं लगा, बावजूद इसके कि सुरक्षा की स्थिति खराब रही. भारत के पास फाइटर विमानों की प्रकट कमी और पुरानी पड़ती पनडुब्बियों के मद्देनजर आला सेना अधिकारी बताते हैं कि पाकिस्तान और चीन के साथ सैन्य मामलों में संतुलन बनाना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. इसके बावजूद भारत का रक्षा बजट जीडीपी के मात्र 2.1 फीसदी के बराबर है, जबकि वैश्विक औसत 2.5 फीसदी का है, और सुरक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में यह 3 फीसदी के बराबर होना चाहिए. मुश्किल यह है कि सरकार के ‘नॉन-इन्टरेस्ट’ खर्चों में डिफेंस पर खर्च का अनुपात पहले से ही पांचवें हिस्से के बराबर है. तेजी से वृद्धि करती अर्थव्यवस्था के अलावा शायद ही कोई दूसरी चीज है जो रक्षा बजट की मदद कर सकती है.

इसके बावजूद, यूक्रेन-रूस और ईरान-अमेरिका के बीच डेविड बनाम गोलियथ वाले बेमेल मुक़ाबले के मद्देनजर बजट की सीमाएं भविष्य में उतनी बड़ी बाधा नहीं बनेंगी जितनी अब तक बनती रही हैं. सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत महंगे प्लेटफॉर्म वेपन्स में निवेश कर सकता है, और कम लागत वाली सस्ती मिसाइलों और ड्रोनों पर कर सकता है जो उन महंगे प्लेटफॉर्मों का जवाब बन सकते हैं? और क्या उनका बड़ी संख्या में उत्पादन किया जा सकता है? आज अगर ड्रोन आधुनिक युद्ध को नई तरह से परिभाषित कर रहे हैं, तो टैंक रेजिमेंट या मोर्चे पर तैनात युद्धपोतों की संख्या में असंतुलन किसी युद्ध के फैसले को कम प्रभावित कर सकता है?

ड्रोन का सवाल

मुश्किल यह है कि ड्रोन अपने साथ कई सवाल लिये हुए हैं. भारत ने जेनरल एटोमिक्स के महंगे MQ-9B रीपर ड्रोनों की खरीद के ऑर्डर दिए हैं, लेकिन ईरान से लड़ाई में अमेरिका ऐसे 45 ड्रोन (हरेक की कीमत करीब 1000 करोड़ रु.) गंवा चुका है. सरकार टाटा और पुणे की नाइब कंपनियों से 840 कमीकेज़ ड्रोन खरीदने का ऑर्डर हाल में ही दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें जैमिंग से या बचाव में किए गए हमले से बचाया जा सकता है? अंत में यही होगा कि हमला करने के लिए लंबी रेंज वाले ड्रोनों समेत हमलावर ड्रोनों का भारी संख्या में इस्तेमाल किया जाएगा ताकि कुछ ड्रोन तो सुरक्षा की दीवार तोड़कर अंदर घुस सकें. इसके साथ बचाव की निर्णायक क्षमता यह बनानी होगी कि हमलावर ड्रोनों की नेविगेशन सिस्टम को जाम किया जा सके और उन्हें हमला करने से पहले नाकाम किया जा सके. यह दरअसल तेजी से विकसित होते इस क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का खेल है, और स्मार्ट बनकर बजट की बाधाओं को पार किया जा सकता है.

क्या इसका मतलब यह है कि भारत को अक्साइ चीन में एलएसी पर बड़ी संख्या में खड़े चीनी टैंकों की ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए? क्या इस बात को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होना चाहिए कि चीन अपने नये स्टील्थ फाइटरों को तैनात कर रहा है? क्या पाकिस्तानी नौसेना की बढ़ती ताकत पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए? इन सवालों का स्वाभाविक जवाब तो यह है कि भारत अपनी पारंपरिक डिफेंस क्षमताओं में इजाफा करते रहना चाहिए. इसके अलावा, उच्च क्षमता वाले वेपन सिस्टम के आगे अपनी कमजोरी को ज्यादा संख्या में तैनाती से और ऐसी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से दूर किया जा सकता है जो ज्यादा ताकतवर सिस्टम को नाकाम कर सकती है, और कमजोर सिस्टम का चतुराई से इस्तेमाल करके भी दूर किया जा सकता है.

सभी तरह के दांवों की काट बनाना अच्छी बात है लेकिन बजट अड़चन बनता है और सोच-समझकर फैसले करने पड़ते हैं. यूक्रेन ने सिखाया है कि वह कितना रचनात्मक हो सकता है और दुनिया को हैरत में डाल सकता है. अंत में, बात इस पर टिकेगी कि भारत ने ड्रोन और मिसाइल युद्ध में कितनी महारत हासिल की है, और वह युद्ध के पारंपरिक हथियारों की कमजोरी की भरपाई करने के लिए चतुराई और टेक्नोलॉजी में कितना प्रभावी मेल करा सकता है.

टीएन नायनन ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के पूर्व संपादक हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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