हाल के सालों में, विद्वान और आम लोग एक राजनीतिक विरोधाभास को लेकर उलझन में रहे हैं. जहां बड़ी संख्या में भारतीय लोकतंत्र का मजबूत समर्थन करते हैं, वहीं कई लोग ऐसे “मजबूत नेता” के विचार का भी समर्थन करते हैं, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की पाबंदियों के बिना फैसले ले सके. ये देखने में एक-दूसरे के उलट विचार एक साथ कैसे हो सकते हैं? क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत इस बात में धीरे-धीरे बदलाव देख रहा है कि उसके नागरिक लोकतंत्र और सत्ता को किस तरह देखते हैं?
हमारी हाल की स्टडी में इन सवालों को समझने की कोशिश की गई है. इसके लिए 2020 से 2024 के बीच जुटाए गए चार डेटा सेट का इस्तेमाल किया गया, जिनमें राष्ट्रीय और राज्यों, दोनों स्तरों की जानकारी शामिल है. इनमें 2020 के बिहार और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, 2024 के लोकसभा चुनाव और वर्ल्ड वैल्यूज सर्वे शामिल हैं. इन सभी आंकड़ों से यह समझने में मदद मिलती है कि संस्थाओं पर भरोसा और मीडिया का इस्तेमाल भारत में लोगों के लोकतंत्र और तानाशाही को लेकर विचारों को किस तरह प्रभावित करता है.
लोकतंत्र को लेकर अलग-अलग तस्वीर
हमारी रिसर्च से सामने आई सबसे बड़ी बातों में से एक यह है कि भारत में लोकतंत्र का समर्थन अभी भी मजबूत है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग समय में इसमें काफी अंतर दिखाई देता है. राष्ट्रीय स्तर पर, वर्ल्ड वैल्यूज सर्वे (2023) में भारतीय नागरिकों ने लोकतंत्र को सरकार का सबसे अच्छा रूप बताया है. लेकिन राज्यों के स्तर पर तस्वीर ज्यादा जटिल है. उदाहरण के लिए, हमारी स्टडी में पाया गया कि 2020 में बिहार में लोकतंत्र का समर्थन 2022 के उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय सैंपल की तुलना में काफी कम था. इन बदलावों से पता चलता है कि भारत में लोकतंत्र के समर्थन को पूरे देश में एक जैसी भावना के रूप में नहीं देखा जा सकता. इसके बजाय, यह सरकार के कामकाज के स्थानीय अनुभवों, क्षेत्रीय राजनीतिक संस्कृति और चुनावी परिस्थितियों को दिखाता है. जहां सरकार की नाकामी और संस्थाओं की कमजोरी ज्यादा साफ दिखाई देती है, वहां लोगों का भरोसा कम हो सकता है. इसका मतलब जरूरी नहीं कि वे लोकतंत्र से ही निराश हैं, बल्कि वे इस बात से निराश हो सकते हैं कि लोकतंत्र असल में काम कैसे करता है.
इसी समय, तानाशाही वाली मजबूत लीडरशिप का समर्थन भी लोकतंत्र के समर्थन के साथ मौजूद है. यह दोहरा रुख 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले किए गए ऑनलाइन सर्वे में सबसे ज्यादा दिखाई देता है. इसमें राज्यों के स्तर पर दिखे रुझानों की तुलना में मजबूत और केंद्रीकृत नेतृत्व का समर्थन ज्यादा था. यह पैटर्न कुछ हद तक ऑनलाइन सैंपल की जनसांख्यिकीय संरचना की वजह से भी हो सकता है. इसमें शहरी, पढ़े-लिखे और दुनिया से ज्यादा जुड़े लोग अधिक थे. ऐसे लोग भागीदारी वाले फैसले लेने की प्रक्रिया की तुलना में तेजी से काम करने और नीतियों में निरंतरता को ज्यादा महत्व दे सकते हैं.
विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में, जहां आर्थिक विकास और स्थिरता सबसे बड़ी प्राथमिकताएं होती हैं, ऐसी पसंद को अक्सर “इंस्ट्रूमेंटल डेमोक्रेसी” कहा जाता है. इसका मतलब है कि लोग लोकतंत्र के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं, लेकिन जब लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं धीमी या बिखरी हुई लगती हैं, तब वे निर्णायक नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं.
संस्थाओं पर भरोसा: लोकतंत्र की दोधारी तलवार
दूसरी बड़ी बात संस्थाओं पर भरोसे की जटिल भूमिका से जुड़ी है. आम तौर पर माना जाता है कि सरकार, अदालतों और सेना जैसी संस्थाओं पर भरोसा लोकतांत्रिक स्थिरता को मजबूत करता है. लेकिन हमारे नतीजे इससे कहीं ज्यादा जटिल तस्वीर दिखाते हैं. सभी जगहों पर सरकार और सेना पर भरोसा लोकतंत्र के समर्थन से सकारात्मक रूप से जुड़ा हुआ है. इसका मतलब है कि जो नागरिक सरकारी संस्थाओं को वैध मानते हैं, उनके लोकतांत्रिक सिद्धांतों का समर्थन करने की संभावना भी ज्यादा होती है.
हालांकि, अदालतों पर भरोसा एक अलग और दोहरा पैटर्न दिखाता है. कुछ जगहों पर यह लोकतंत्र के समर्थन को मजबूत करता है. वहीं दूसरी जगहों पर इसका संबंध मजबूत और तानाशाही वाले नेतृत्व के समर्थन से भी दिखाई देता है.
यह उम्मीद से अलग नतीजा एक जरूरी बात सामने लाता है. नागरिकों का संस्थाओं पर भरोसा अपने आप लोकतंत्र के समर्थन में नहीं बदलता. जहां अदालतों को सत्ता के केंद्रीकरण में साथ देने या कार्यपालिका को अपनी सीमा से आगे बढ़ने में मदद करने वाली संस्था के तौर पर देखा जाता है, वहां अदालतों पर भरोसा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के समर्थन का संकेत हो सकता है, जिसमें ज्यादा नियंत्रण हो और अलग-अलग विचारों के लिए कम जगह हो. इसलिए न्यायपालिका पर भरोसा हमेशा तानाशाही वाली सोच के खिलाफ सुरक्षा का काम नहीं करता.
इस नजरिए से भारत का अनुभव राजनीतिक वैज्ञानिक नैन्सी बर्मियो के बताए “डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग” जैसा है. इसका मतलब लोकतंत्र का अचानक खत्म होना नहीं है, बल्कि संस्थाओं का धीरे-धीरे इस तरह इस्तेमाल होना है कि सत्ता के केंद्रीकरण को सही ठहराया जा सके. नागरिक न्यायपालिका या सरकार पर भरोसा करते रह सकते हैं, भले ही ये संस्थाएं धीरे-धीरे कार्यपालिका के प्रभुत्व का साधन बन जाएं.
इस तरह, भरोसा खुद दोधारी तलवार बन जाता है. यह लोकतंत्र को स्थिर कर सकता है या उसके कमजोर होने को सही ठहरा सकता है.
मीडिया मायने रख ता है
स्टडी में यह भी सामने आया है कि मीडिया का माहौल लोकतंत्र और तानाशाही को लेकर लोगों के विचारों को काफी प्रभावित करता है, लेकिन इसका असर अलग-अलग परिस्थितियों में अलग होता है. सभी सर्वे में हमने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर, यूट्यूब और इंस्टाग्राम को अखबार और टेलीविजन जैसे पारंपरिक मीडिया से अलग देखा.
दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल हमेशा लोकतंत्र के समर्थन के लिए नुकसानदायक नहीं होता, जैसा कि अक्सर माना जाता है. कुछ परिस्थितियों में, जैसे 2024 के लोकसभा सर्वे में, व्हाट्सऐप का इस्तेमाल लोकतंत्र में ज्यादा भागीदारी से जुड़ा हुआ था. ऐसा संभवतः इसलिए है क्योंकि बंद ग्रुप्स में राजनीतिक चर्चा और लोगों को एकजुट करने में इसकी भूमिका होती है.
हालांकि, इसका संबंध इतना सीधा नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव के सर्वे में सोशल मीडिया का इस्तेमाल संस्थाओं पर घटते भरोसे और तानाशाही वाली सोच को स्वीकार करने की ज्यादा संभावना से भी जुड़ा था. यह हैरान करने वाली बात नहीं है, क्योंकि इस बात के सबूत बढ़ रहे हैं कि सोशल मीडिया लोगों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है और राजनीतिक ताकतों द्वारा इसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है.
पारंपरिक मीडिया भी मिली-जुली तस्वीर दिखाता है. अखबार और टेलीविजन को आम तौर पर जागरूक नागरिकता को बढ़ावा देने वाला माना जाता है, लेकिन राजनीतिक माहौल और मीडिया के मालिकाना ढांचे के आधार पर ये लोकतंत्र और तानाशाही, दोनों तरह की सोच को मजबूत कर सकते हैं.
जैसे-जैसे बड़े मीडिया समूह राजनीतिक सत्ता के करीब होते जा रहे हैं, स्वतंत्र पत्रकारिता और राजनीतिक संदेश के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है. मुख्य बात यह है कि सिर्फ माध्यम यह तय नहीं करता कि लोगों का लोकतंत्र को लेकर क्या नजरिया होगा. महत्वपूर्ण यह है कि हर माध्यम में किस तरह की जानकारी दी जा रही है, वह कितनी भरोसेमंद है और अलग-अलग विचारों के लिए कितनी जगह है.
मिले-जुले राजनीतिक विचारों की चुनौती
इन सभी नतीजों को साथ में देखें तो भारत की राजनीतिक संस्कृति में एक बदलाव दिखाई देता है. यह बदलाव ऐसे मिले-जुले राजनीतिक विचारों के बढ़ने का है, जिसमें नागरिक एक साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्व देते हैं और मजबूत, केंद्रीकृत नेतृत्व को लेकर भी सहज महसूस करते हैं.
इसे सिर्फ विरोधाभास मानने के बजाय, इसे लोकतांत्रिक उम्मीदों और प्रभावी शासन की इच्छा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखना ज्यादा सही हो सकता है. कई भारतीयों के लिए लोकतंत्र एक ऐसा आदर्श है जिसे बचाए रखना जरूरी है, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि लोकतंत्र तेजी से काम करे, जवाबदेही तय करे और व्यवस्था बनाए रखे. जब लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं इन मामलों में उम्मीद के मुताबिक काम करती हुई नहीं दिखतीं, तो एक निर्णायक नेता की अपील और मजबूत हो जाती है.
यह दोहरा रुख जरूरी नहीं कि लोकतंत्र को खारिज करने का संकेत हो, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि लोग अब लोकतंत्र से क्या उम्मीद करते हैं, उसमें बदलाव आ रहा है. जैसे-जैसे भारत का लोकतंत्र आगे बढ़ रहा है, उसके नागरिक प्रभावी शासन के मतलब को नए तरीके से समझ रहे हैं और इसी प्रक्रिया में लोकतंत्र के मतलब को भी बदल रहे हैं.
इन नतीजों का असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि ब्राजील, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे बड़े और विविध लोकतंत्रों पर भी पड़ता है. लोकतांत्रिक मूल्यों और तानाशाही वाली सोच का एक साथ मौजूद होना बताता है कि लोकतंत्र का कमजोर होना हमेशा उसके पूरी तरह खत्म होने की कहानी नहीं होती. यह साथ-साथ मौजूद रहने की कहानी भी हो सकती है, जिसमें लोकतंत्र का ढांचा बना रहता है, लेकिन लोकतांत्रिक नियम और मूल्य कमजोर होते जाते हैं.
नीति बनाने वालों और नागरिक समाज के लिए इसका मतलब है कि संस्थाओं में पारदर्शिता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करने की जरूरत है. साथ ही, मीडिया को समझने की क्षमता और अलग-अलग विचारों को बढ़ावा देना भी जरूरी है. संस्थाओं पर भरोसा जवाबदेही के जरिए हासिल किया जाना चाहिए, सिर्फ बातों के जरिए इसे नहीं मान लेना चाहिए.
आखिरकार, 21वीं सदी में लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए यह समझना जरूरी है कि उसका स्वरूप बदल रहा है और यह समझना भी जरूरी है कि नागरिक उससे क्या उम्मीद करते हैं. लेकिन इसके साथ भागीदारी, समानता और सत्ता पर नियंत्रण जैसे उसके मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं होना चाहिए.
तबरेज़ अहमद नियाज़ी, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के ‘सेंटर फ़ॉर ट्रस्टेड इंटरनेट एंड कम्युनिटी’ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर हैं, और साथ ही ‘डिजिटल कैंपेन्स एंड प्रोपेगैंडा लैब’ के डायरेक्टर भी हैं.
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