पिछले दिनों नई दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ तथाकथित पैलेट गन के इस्तेमाल ने भारतीय पुलिस व्यवस्था के अंदर के सबसे चिंताजनक विरोधाभास को एक बार फिर उजागर कर दिया. 12 बोर की पंप एक्शन शॉटगन का इस्तेमाल 2010 से शुरू हुआ और यह जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद विरोधी मुहिम का पर्याय बन गई. वहां इसका इस्तेमाल हिंसा पर उतारू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था. हजारों लोग वहां इनके छर्रों से घायल हुए, कई लोगों को इनके कारण आंखों की रोशनी पूरी या आधी गंवानी पड़ी. 2024 में किसानों के आंदोलन के दौरान, 2023 में मणिपुर में जातीय हिंसा, और 2025 में लद्दाख में भी विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ इनका जब-तब इस्तेमाल किया गया.
हर वारदात इस जानी-पहचानी बहस को जन्म देती रही है कि क्या इसका इस्तेमाल वाजिब था? क्या पैलेट गन के इस्तेमाल की प्रक्रिया का पालन किया गया? क्या इनका इस्तेमाल करने वाली पुलिस को इसकी ट्रेनिंग मिली थी ? पैलेट गन का जो विज्ञान है और उसके कारण जिस तरह का जख्म होता है उनके मद्देनजर उनका प्रयोग क्या उचित है?
ये जायज सवाल हैं, लेकिन ये मूल मुद्दे को नहीं छूते.
समस्या यह नहीं है कि पैलेट गन का इस्तेमाल जायज है या नहीं. असली समस्या यह है कि उन्हें व्यक्तियों के बीच भेदभाव करने के हिसाब से नहीं बनाया गया है. जिस हथियार से सैकड़ों छर्रे दागे जाते हों उन्हें सिर्फ यह कहकर मनुष्यों को नियंत्रित करने के पुलिसिया औज़ार में नहीं बदला जा सकता कि वे ‘कम जानलेवा’ हैं.
इतिहास, अस्त्र विज्ञान और अनुभव, सबका निष्कर्ष यही है: समय आ गया है कि भारत भीड़ नियंत्रित करने के आम अभियानों से पैलेट गन की छुट्टी कर दे.
युद्ध के लिए बना हथियार
एक साथ कई शॉट दागने वाली स्मूदबोर गन या शॉटगन सबसे प्राचीन बंदूकों में है, जो आज भी वजूद में है. राइफलों और आधुनिक असाल्ट राइफलों के आने से बहुत पहले, 16वीं सदी से ही सेनाएं स्मूदबोर वाली बंदूकों पर भरोसा करती रही हैं, जिनमें युद्ध के मकसद से कई छर्रे भरे जा सकते हैं. आंतरिक और बाह्य बैलिस्टिक्स के अविकसित विज्ञान के कारण चूक होती थी, जिसकी भरपाई एक साथ कई गोलियां दाग कर की जाती थी.
मशहूर ‘ब्लंडरबस’ बंदूकें और शुरुआती मस्केट्स इसी सिद्धांत पर आधारित थीं. कम दूरी पर निशाना साधने में ये जबरदस्त थीं, क्योंकि उन्हें सटीकता की जरूरत नहीं थी. एक ही डिस्चार्ज में कई दुश्मन सैनिकों को घायल किया जा सकता था या लड़ाई की आपाधापी में निशाना चूकने की भी भरपाई की जा सकती थी.
औद्योगिक क्रांति ने युद्ध का स्वरूप बदल दिया. राइफल वाले बैरल, लंबी बुलेट, और जिन बंदूकों में बुलेट को पीछे से लोड किया जाता था उन्होंने मार करने की दूरी और सटीकता में नाटकीय वृद्धि कर दी. पेशेवर सेनाओं ने स्मूदबोर वाली बंदूकों को युद्धक्षेत्र के लिए प्राथमिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना छोड़ दिया क्योंकि एक साथ ताबड़तोड़ कई गोलियां दागने के मुक़ाबले सटीक निशानेबाजी ज्यादा असरदार साबित होती थी.
लेकिन शॉटगन दूसरे रूप में बनी रहीं.
खिलाड़ियों ने पाया कि तेजी से उड़ते पक्षियों को उनकी चमड़ी बचाते हुए निशाना बनाने के लिए छोटे-छोटे छर्रों का जाल फैला देना काफी है. पूरी 20वीं सदी में, खिलाड़ियों की शॉटगन के कारतूसों और पुर्जों के डिजाइन में सुधार होते रहे, धुआं रहित पाउडर आदि बनाए गए. ये शॉटगन युद्ध लड़ने के हथियार के रूप में नहीं बल्कि शिकार करने वाली बंदूक के रूप में उभरे और आज भी इसी रूप में कायम हैं.
पैलेट गन के ‘कम घातक’ होने का भ्रम
खतरे का अंदाजा लगाने के लिए बाहरी प्रहार करने की शॉटगन की क्षमता और उसके कारतूस के पीछे के विज्ञान को समझना होगा.
छोटे खेलों या पक्षियों का शिकार करने के मकसद से बनाए गए शॉटगन के कारतूस में 6 से लेकर 600 तक छोटे-छोटे छर्रे भरे होते हैं. संख्या शिकार किए जाने वाले पक्षी के हिसाब से तय होती है. बंदूक की नली का आकार इससे तय होता है कि उस व्यास के कितने छर्रे एक पाउंड से बनाए जा सकते हैं. भारत में ज़्यादातर 12 बोर की शॉटगन इस्तेमाल होती है. गोली दागे जाने के बाद छर्रों के विस्तार को नियंत्रित करने के लिए नली के एक सिरे के आकार को छोटा रखा जाता है.
पुलिस ने जिस पैलेट गन का इस्तेमाल किया वह 12 बोर की पंप एक्शन शॉटगन है जिसके मेगज़ीन में चार कारतूस भरे जा सकते हैं. भारतीय पुलिस शॉट नं. 9 वाले कारतूस का इस्तेमाल करती है जिससे मुख्यतः स्कीट शूटिंग (मिट्टी के कबूतर पर निशाना साधने) की जाती है. इन कारतूसों में .08 इंच के करीब 650 छर्रे भरे होते हैं. ये छर्रे सीसे, स्टील, रबर या प्लास्टिक के होते हैं. भारत में अब तक केवल सीसे के छर्रे इस्तेमाल किए जाते रहे हैं.
छर्रे बंदूक के मुंह से 1150-1200 फीट प्रति सेकंड की गति से निकलकर बाहर हवा के दबाव के कारण कुछ दूर जाकर कोन के आकार में फैल जाते हैं. शुरू के 10-15 गज तक वे 10-15 इंच के व्यास वाले एक बड़े गोले के रूप में बढ़ते हैं और 900-1000 फीट प्रति सेकंड की घातक गति हासिल कर लेते हैं. इतनी दूरी के अंदर शॉटगन राइफल के बुलेट से भी ज्यादा बड़ा घाव कर सकती है क्योंकि सैकड़ों छर्रे एक साथ चोट करते हैं.
अपराधी लोग उसकी इस विशेषता का खूब फायदा उठाते रहे हैं. इटली का माफिया छोटी नली वाली जिस कुख्यात ‘लुपारा’ शॉटगन का इस्तेमाल करता था वह इसलिए ज्यादा खौफनाक लगता था क्योंकि कम दूरी से वह भयानक मार करती थी.
दूरी बढ़ने के साथ छर्रों का फैलाव भी बढ़ जाता है. 20-25 गज की दूरी पर वे 20-30 इंच के व्यास में और 30, 40, 50 गज की दूरियों पर क्रमशः 30, 40, 50 इंच के व्यास में फैल जाते हैं. इस तरह, दूरी के साथ छर्रों का फैलता दायरा अपने रास्ते में कई लोगों को घायल कर सकता है.
इस सबका नतीजा खतरनाक विरोधाभास के रूप में सामने आता है. कम दूरी पर यह हथियार एक निशाने को भारी चोट पहुंचाता है, तो ज्यादा दूरी पर यह खतरनाक रूप से बेकाबू हो जाता है और गंभीर चोट पहुंचाता है. यह अंधा कर सकता है, खोपड़ी और रीढ़ की हड्डी को तोड़ सकता है, और जानलेवा भी बिल्कुल साबित हो सकता है.
ये सारी विशेषताएं लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था से मेल नहीं खाती हैं. इसके विपरीत, आधुनिक राइफल की एक गोली भी ज्यादा घातक होती है, फिर भी रिंगलीडरों या हिंसक लोगों को निशाना बनाने में ज्यादा कारगर हो सकती है. इसलिए, यह एक भ्रम ही है कि पैलेट गन ‘कतई घातक नहीं’ है. वैज्ञानिक पहलू से तो यह राइफल के मुक़ाबले ‘कम जानलेवा’ है लेकिन बेहद दोषपूर्ण और मनमानी है.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार हाइकमीशन (OHCHR) और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए शॉटगन के इस्तेमाल पर बार-बार सवाल उठाया है क्योंकि उनका आक्रमण मनमाना होता है और उनसे सटीक निशाना नहीं लगाया जा सकता तथा अवांछित मौतों से नहीं बचा जा सकता.
इसलिए, मसला केवल जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग का ही नहीं है बल्कि मनमाने बल प्रयोग का भी है.
पुलिस मैनुअल मेन सही निर्देश दिया गया है कि पैलेट गन का इस्तेमाल भीड़ से 50 गज की दूरी से किया जाए और निशाना कमर के नीचे लगाया जाए. इतनी दूरी से छर्रों की गति घटकर 350-400 फीट प्रति सेकंड रह जाती है और वे कम घातक हो जाते हैं. छर्रे कमर से ऊपर हमला न करें, इसके लिए ‘मजल डिफ़्लेक्टर भी लगाए गए हैं. ये तरीके पेशेगत रूप से उचित हैं.
दंगे फायरिंग रेंज नहीं होते
भीड़ का समान कर रहे पुलिसवालों को तनाव, डर, और संकुचित दृष्टि से जूझना पड़ता है. मानव स्वभाव उन्हें सामने दिख रही भीड़ के पैरों पर नहीं बल्कि उसके केंद्र, लोगों की छाती, पर निशाना लगाने को उकसाता है. इस मानसिक प्रवृत्ति को सेना और पुलिस में अच्छी तरह दर्ज किया जाता रहा है.
भारत में जो अनुभव आए हैं वे इस वास्तविकता को उजागर करते रहे हैं. जंतर-मंतर से हाल में जो तस्वीरें आईं वे बहुत कुछ कहती हैं. उनमें दिखता है कि RAF का एक जवान बंदूक को अपने कंधे की ऊंचाई तक उठाकर सीधा ताने हुए है, उसे वह नीचे नहीं झुकाता. कायदे से बंदूक की नली सीध से 30-45 डिग्री नीचे की ओर झुकी होनी चाहिए. उसकी बंदूक पर ‘मजल डिफ़्लेक्टर’ भी नहीं लगा है.
दो अस्पतालों से ‘RTI’ के तहत मिले जवाबों से जाहिर है कि 20 जुलाई को प्रदर्शन कर रहे 10 लोगों को चेहरों, सीनों, बांहों, और पीठ पर छर्रे से जख्म हुए. एक युवक की तो एक आंख की रोशनी भी जा सकती है.
कोई माहिर निशानेबाज भी इस नियम को नहीं बदल सकता कि पैलेट गन से निकले छर्रे कोन के आकार में फैलकर ही हमला करेंगे. जब निशाना 30 गज दूर का लगाया जाएगा तब फैलते कोन के 25 से 50 गज के दायरे में लोग घायल हो सकते हैं. हर छर्रा अपनी दिशा में भागेगा. कुछ छर्रे लक्ष्य पर हमला करेंगे, तो कुछ छर्रे तमाशबीनों, पत्रकारों को चोट पहुंचा सकते हैं. ट्रेनिंग खतरों को कम कर सकती है. लेकिन यह इस हथियार की मूल प्रकृति को नष्ट नहीं कर सकती.
सबक नहीं सीखे
जम्मू-कश्मीर में छर्रे फायर करती शॉटगनों के इस्तेमाल के बाद इनकी मदद से भीड़ को नियंत्रित करने को लेकर बहस खत्न हो जानी चाहिए थी. पैलेट गन का सबसे पहले इस्तेमाल 2010 में माचिल फर्जी एनकाउंटर के बाद चार महीने तक चले आंदोलन के दौरान किया गया था. जम्मू-कश्मीर के सौरा में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के एक अध्ययन के अनुसार, पैलेट गन के छर्रों से छह लोग मारे गए, 192 घायल हुए. छह लोगों की आंखों की पूरी या आधी रोशनी चली गई. ज़्यादातर लोगों को कमर से ऊपर छर्रे लगे.
2018 में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने विधानसभा को बताया था कि कश्मीर में 8 जुलाई 2016 से 27 फरवरी 2017 तक 6,000 लोग पैलेट गन से घायल हुए. इनमें से 728 लोगों की आंखों में छर्रे लगे. करीब 54 लोगों की आंखों की रोशनी कम हुई. संसद में पेश सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2016 से अगस्त 2017 के बीच छर्रों से घायल 17 लोगों की मौत हुई.
डॉक्टरों ने बताया कि आंखों को इस तरह की चोट लड़ाई के मैदान से बाहर शायद ही लगती पाई गई है. कई घायल तो हमेशा के लिए अंधे हो गए. कई घायलों के चेहरे खराब हो गए. कुछ तमाशबीन छिटकते छर्रों की जद में आए. हरेक गंभीर चोट ने नागरिकों और सरकार के बीच दूरी बढ़ाई. यह पैलेट गन की शायद सबसे बड़ी खराबी है. जिन मामलों में इनका इस्तेमाल कानूनन वैध है उनके भी रणनीतिक नतीजे अक्सर उलटे साबित होते हैं. नेत्रहीन हुए लोगों की तस्वीरें कानून-व्यवस्था की बहाली को लेकर सरकार के दावों पर भारी पड़ती हैं. आधुनिक लोकतंत्र ऐसे हथियारों को बर्दाश्त कर सकता है जो इतनी बड़ी राजनीतिक कीमत वसूलते हों.
प्राचीन निशानी को आराम दें
20 जुलाई को जो प्रदर्शन हुआ और उस पर पुलिस ने जो हमला किया वह भारत में डिजिटल रूप से शायद सबसे ज्यादा रिकॉर्ड की गई घटना थी. देसी और विदेशी मीडिया के अलावा युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने मोबाइल पर आंदोलन के हर मिनट को कैद किया और इंटरनेट पर बाढ़ ला दी. भीड़ को धीरे-धीरे नियंत्रित करने की स्थापित प्रक्रियाओं का जमकर उल्लंघन किया गया. गनीमत है कि पैलेट गन के केवल सात कारतूस इस्तेमाल किए गए. लेकिन राजधानी के केंद्रीय इलाके में इनके इस्तेमाल ने मामले को केंद्र में ला दिया है.
इतिहास सबक देने से पीछे नहीं हटता. पेशेवर सेनाओं ने स्मूदबोर वाली शॉटगन को खारिज कर दिया है क्योंकि उन्होंने पाया कि यूं ही मनमानी गोलीबारी के मुक़ाबले सटीक निशानेबाजी ज्यादा बेहतर है. लेकिन पुलिस तंत्र ने उसी विशेषता को अपना लिया जिसे सैनिकों ने एक सदी पहले खारिज कर दिया.
पैलेट गन की फायरिंग को ‘गैर-घातक’ बताना उसकी असली प्रवृत्ति को नकारना है. पुलिस दबाव में गलतियां करती है सिर्फ इसलिए ही ये गन खतरनाक नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी हैं कि उन्हें इस तरह बनाया है कि वे चौड़े क्षेत्र में कई छर्रे बिखेर सकती हैं. एक साथ कई लोगों को चोट पहुंचाने वाले हथियार जिस युग के लिए बनाए गए, वह युग बीत चुका है. उस युग की बची हुई यह निशानी लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था के औज़ार के रूप में अपनी उपयोगिता खो चुकी है. भारत इसे आराम देने का नैतिक साहस दिखाए.
लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वे नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC-in-C रहे. रिटायरमेंट के बाद, वे आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.
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