दो साल पहले देवेंद्र फडणवीस ने कांग्रेस की “ट्रोल आर्मी” पर अपनी पत्नी को निशाना बनाने का आरोप लगाया था. कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार की अमृता फडणवीस की इंस्टाग्राम रील्स पर की गई टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए, महाराष्ट्र के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री ने कहा था कि उन्हें कांग्रेस के व्यवहार पर कोई हैरानी नहीं है और उन्होंने कहा था, “चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए.” इसका मतलब लगभग यह है कि ‘उन्हें शर्म आनी चाहिए.’ लेकिन पिछले कुछ दिनों में फडणवीस को एक नया निशाना मिल गया है—अपनी ही पार्टी के समर्थक.
महाराष्ट्र के मध्य-पश्चिमी हिस्से के शहर अहिल्यानगर से बताए जा रहे वीडियो में छोटे बच्चों को अमृता के फ्लेक्स पोस्टरों पर चप्पलों से मारते और उनमें आग लगाते देखा जा सकता है. इस दौरान हंसते हुए युवकों का एक समूह यह सब देख रहा है. दूसरे वीडियो में स्कूली छात्राएं अपने क्रॉक्स जूतों के साथ प्रदर्शन करती दिखाई दे रही हैं. भगवा कपड़े पहने पुरुष मंच से उनके लाइफस्टाइल की आलोचना कर रहे हैं. यह सब इसलिए क्योंकि फडणवीस ने कहा कि वह सभी को शामिल करने वाले गरबा का समर्थन करती हैं—वहीं विश्व हिंदू परिषद (VHP) और उनके पति की पार्टी ने पूरे महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया स्थलों पर मुस्लिमों को रोकने की मांग की है.
कुछ हफ्ते पहले चंद्रपुर में एक शिव मंदिर के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए अमृता ने कहा था कि हिंदू त्योहार अपने स्वभाव से ही सभी को शामिल करने वाले होते हैं और हर किसी को उन्हें मनाने की अनुमति होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, “इस मुद्दे पर मुझे सबसे ज्यादा ट्रोल होने वाली पॉलिटिकल वाइफ बनाया जाएगा, लेकिन एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर, अपनी व्यक्तिगत हैसियत से मैं कह सकती हूं कि नवरात्रि और गरबा जैसे हमारे त्योहारों को हर जगह पसंद किया जाता है. इसलिए जो भी व्यक्ति आस्था और भक्ति के साथ इनमें शामिल होना चाहता है, उसके साथ उसके धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए.”
इससे वह पार्टी के रुख से टकराव की स्थिति में आ गई हैं. खासकर महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे के रुख से, जिन्होंने आरोप लगाया है कि ऐसे त्योहारों के दौरान “लव जिहाद” की घटनाएं बढ़ जाती हैं. भड़काऊ भाषणों के कारण अपनी राजनीतिक पहचान बनाने वाले राणे ने कार्यक्रम में आने वालों की पहचान की अनिवार्य जांच की मांग की है. उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए.
राजनीतिक नेता की पत्नी की सीमाएं
जिस राज्य में खुले तौर पर किसी समुदाय के खिलाफ भेदभाव को स्वीकार किया जाने लगा है, वहां एक हिंदू महिला का हिंदू मंदिर में खड़े होकर हिंदू त्योहार में सभी को शामिल करने की बात करना ही उकसाने वाला माना जा रहा है. ये बातें कहने के बाद से अमृता को सोशल मीडिया पर उन्हीं लोगों की ओर से बेहद बुरे हमले का सामना करना पड़ रहा है, जो BJP का समर्थन करते हैं और यह बात इसलिए भी खास है क्योंकि अपने रूप-रंग और संगीत से जुड़े सपनों को लेकर अमृता को पहले से ही लगातार ट्रोल किया जाता रहा है. यहां तक कि उसी इंटरव्यू में फडणवीस ने “लव जिहाद” को स्वीकार किया था, इसका भी कोई फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने इसके खिलाफ कड़े कानूनों की वकालत की और सुझाव दिया कि हिंदू महिलाओं को उनकी “संस्कृति” के बारे में सलाह और शिक्षा दी जानी चाहिए.
महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने अब एक्स से उन कई अकाउंट्स की जानकारी मांगी है, जिन्होंने अमृता की आलोचना की थी. यह मांग BNSS की धारा 94 के तहत की गई है. नोटिस में कहा गया है कि इन पोस्ट में “मानहानि वाले आरोप, आपत्तिजनक टिप्पणियां और ऐसी सामग्री है, जो महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचा सकती है और लोगों की भावनाओं को भड़का सकती है.”
मीडियानामा की एक रिपोर्ट में पाया गया कि नोटिस में शामिल ज्यादातर यूजर्स ने अपनी टिप्पणियां हटा दी थीं, लेकिन जो टिप्पणियां अभी भी उपलब्ध थीं, उनमें “सेक्सिस्ट और सांप्रदायिक भाषा के साथ-साथ ‘लव जिहाद’ के संदर्भ भी थे.”
एक दशक से भी ज्यादा समय से अमृता को एक ऐसे मज़ाक के तौर पर पेश किया जाता रहा है, जिसे अलग-अलग विचारधारा वाले लोगों के बीच भी दर्शक मिल जाते हैं. विपक्ष का मानना है कि उनका संगीत करियर एक ऐसा दिखावा है, जिसे उनके पति के पद का फायदा मिलता है. वहीं उनके पति के समर्थक इस बात से नाराज़ हैं कि वह एक चुप रहने वाली और पति की बात मानने वाली राजनीतिक नेता की पत्नी की छवि में फिट नहीं बैठतीं. जिस दिन वह कोई म्यूजिक वीडियो जारी करती हैं या एथलीजर के मैचिंग कपड़े पहनकर किसी कार्यक्रम में पहुंचती हैं, कमेंट करने वाले लोग उनके खिलाफ एकजुट हो जाते हैं. सबकी सोच यह है कि मुख्यमंत्री की पत्नी को समुद्र तट साफ करने के लिए इससे ज्यादा संस्कारी कपड़े पहनने चाहिए.
अमृता की ओर से मिलने वाली कुछ आलोचनाएं ऐसी हैं, जिनके पीछे वजह भी है. सेल्फी लेने का उनका शौक, जिसमें कई बार अपनी सुरक्षा और दूसरों की असहजता की भी परवाह नहीं दिखती, अब सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है. वह दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “राष्ट्रपिता” बता चुकी हैं. ये आरोप भी सामने आए हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने एक्सिस बैंक को फायदा पहुंचाया, जहां फडणवीस इस साल की शुरुआत तक एक वरिष्ठ पद पर थे. कुछ लोगों का कहना है कि यह सीधी तौर पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव यानी स्त्री-विरोधी सोच है.
यह पहली बार भी नहीं है जब दक्षिणपंथी लोगों का उनके प्रति धैर्य खत्म हुआ है. 2017 में हिंदुत्व समर्थक अकाउंट्स ने उन पर आरोप लगाया था कि वह “बी सांता” नाम से चलाए गए क्रिसमस गिफ्ट अभियान के जरिए गरीब बच्चों के लिए मिशनरियों का काम कर रही हैं. गरबा पर उनकी टिप्पणी के बाद अब यह मामला और बढ़ गया है. विपक्ष, BJP का आधार वोट, वामपंथ और दक्षिणपंथ—अब सभी उनसे एक ही चीज़ चाहते हैं: कि वह कम दिखाई दें और, सच कहें तो, कम बोलें.
लेकिन जिस महिला के पास कोई सरकारी पद नहीं है और जो किसी भी मतदाता के प्रति जवाबदेह नहीं है, उससे चुप रहने या देश की आदर्श बहू की तरह कपड़े पहनने की मांग क्यों की जा रही है? क्या मुख्यमंत्री की पत्नी होना अपने साथ बोलने पर पाबंदी लेकर आता है?
खुली बगावत
जहां तक अमृता की बात है, वह इन तानों से काफी हद तक बेपरवाह रही हैं.
हाल ही के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “ट्रोलिंग मुझे हंसाती है.” कई मायनों में अमृता एक “आदर्श” राजनीतिक नेता की पत्नी से अलग हैं. 2014 में जब उनके पति पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब आम तौर पर उम्मीद की जाती थी कि वह अपनी ज़िंदगी को नए हिसाब से ढालेंगी—शायद अपने पति के विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालेंगी, दिखाई देंगी लेकिन बोलेंगी नहीं. इसके बजाय, उन्होंने एक अखबार से साफ कहा था कि वह अपनी नौकरी जारी रखेंगी.
उन्होंने कहा था, “मैंने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है. मैं हमेशा काम करती रहूंगी क्योंकि मैं भी बौद्धिक रूप से आगे बढ़ना चाहती हूं. यह मेरी पहचान का एक मजबूत हिस्सा है.”
भारतीय राजनीतिक नेताओं की पत्नियों के आम तौर-तरीकों के हिसाब से यह खुली बगावत थी. कुछ ही ऐसी महिलाएं रही हैं, जिन्होंने अपने पतियों की छाया से बाहर निकलने की कोशिश की और उन्हें इसकी सजा मिली.
1997 में चारा घोटाले में CBI की चार्जशीट के बाद बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को इस्तीफा देना पड़ा, तो उन्होंने अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया. राबड़ी देवी के पास न तो कोई राजनीतिक अनुभव था और न ही उन्होंने औपचारिक पढ़ाई की थी. तब तक वह दंपति के नौ बच्चों की परवरिश कर रही थीं. मुख्यमंत्री बनते ही रातोंरात वह पूरे देश में मज़ाक का विषय बन गईं. राबड़ी देवी शायद यादव की जगह कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बनी थीं, लेकिन उन्हें जिस तरह की बेइज्जती झेलनी पड़ी, उसमें वर्ग को लेकर बहुत ज्यादा भेदभाव था. दिल्ली के मीडिया ने उनकी भाषा, घूंघट और उनके बोलने-चलने के तरीके का लगातार मज़ाक उड़ाया. राबड़ी देवी अब अपने दम पर एक राजनेता हैं, लेकिन उनका मजाक उड़ाया जाना आज भी जारी है.
सोनिया गांधी के सार्वजनिक जीवन में आने पर भी इसी तरह की आलोचना हुई. उनके इतालवी मूल से लेकर उनके उच्चारण और धर्म तक, हर चीज़ पर बेहद निजी तरीके से हमला किया गया. गांधी ने इसका जवाब कम बोलकर और सार्वजनिक कार्यक्रमों में कम नज़र आकर दिया. यहां तक कि उन्होंने राजनीतिक पद लेने से भी इनकार कर दिया.
अमृता फडणवीस के बारे में ऐसा कोई नहीं कह सकता. उन्होंने हर मौके पर बोलना चुना है. यही वजह है कि भारतीय राजनीति में उनके जैसी मिसालें बहुत कम हैं. उनकी तुलना कुछ हद तक मार्था मिशेल से की जा सकती है. जॉन मिशेल की पत्नी मार्था मिशेल, जो रिचर्ड निक्सन के अटॉर्नी जनरल थे, काफी प्रभावशाली और रूढ़िवादी विचारों वाली सोशलाइट थीं और अक्सर पत्रकारों के सामने बिना किसी रोक-टोक के अपनी राय रखती थीं. जब उन्होंने वॉटरगेट कांड से जुड़ी बातों पर चुप रहने और पार्टी के तय संदेश पर बने रहने से इनकार कर दिया, तो वह इस घोटाले का एक प्रमुख चेहरा बन गईं.
हालांकि, अमृता की सामान्य और उचित टिप्पणियों को लेकर मचा विवाद चाय के प्याले में आए तूफान जैसा है. मार्था मिशेल के उलट, फडणवीस और उनके पति एक-दूसरे के साथ पूरी तरह खड़े हैं. पार्टी और उसके समर्थक उनकी बातों को पसंद न करें, लेकिन उनके पति उनकी बात कहने के अधिकार का आखिरी दम तक बचाव करेंगे.
करनजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व संपादक और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार उनके निजी हैं.
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