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Wednesday, 28 October, 2026
होममत-विमतबांग्लादेश टैगोर को मुस्लिमों से नफरत करने वाला बता रहा है. क्या वह Gen Z की कसौटी पर खरे उतरेंगे?

बांग्लादेश टैगोर को मुस्लिमों से नफरत करने वाला बता रहा है. क्या वह Gen Z की कसौटी पर खरे उतरेंगे?

कभी सांस्कृतिक पहचान के रूप में सम्मान पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की अब बांग्लादेश में आलोचना हो रही है. उन पर ऊंचे वर्ग का समर्थक होने, सांप्रदायिक होने और यहूदियों के अलग देश की मांग का समर्थन करने के आरोप लगाए जा रहे हैं.

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जैसा कि एक पुरानी कहावत है, क्रांतियां सिर्फ अपने ही लोगों को खत्म नहीं करतीं, बल्कि अक्सर उन सभी चीज़ों को भी गिरा देती हैं, जिन्हें कभी पवित्र और अटूट माना जाता था. बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त 2024 में हुआ आंदोलन, जिसका नेतृत्व मुख्य रूप से शेख हसीना सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने किया था, ने न सिर्फ उस समय की सरकार को गिरा दिया, बल्कि बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियों और स्मारकों को भी गिराया और उन्हें नुकसान पहुंचाया.

यह आंदोलन और इसके बाद का दौर यहीं नहीं रुका. इसने उन विचारों की भी जांच-पड़ताल की, जिनके आधार पर देश बना था. साथ ही, इतिहास की उन बड़ी हस्तियों पर भी सवाल उठाए गए, जिनसे ये विचार आए थे.

ऐसी ही सबसे अहम हस्तियों में से एक, जिनका लिखा गीत “आमार शोनार बांग्ला” (मेरा सुनहरा बंगाल) बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना, को अब एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है, जो अंदर ही अंदर यहूदियों के अलग देश का समर्थक था, जिसका जमींदार के रूप में विवादित अतीत था और जो मुस्लिमों से नफरत करता था. ऐसा सिर्फ देश के Gen Z यानी नई पीढ़ी के लोग ही नहीं, बल्कि वहां के कुछ बड़े नेता, सोशल मीडिया पर असर रखने वाले लोग और लेखक भी कर रहे हैं.

बांग्लादेश में अरबों टका का सवाल यह है: पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश, दोनों जगह के बंगालियों के बीच अब तक सम्मान पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर क्या Gen Z की कसौटी पर खरे उतर पाएंगे?

रवींद्रनाथ टैगोर कौन?

टैगोर के जन्म और पुण्यतिथि पर कई दिनों तक चलने वाले राष्ट्रीय और सांस्कृतिक कार्यक्रमों, निबंध प्रतियोगिताओं, शिक्षण संस्थानों में होने वाली गोष्ठियों और उनके जीवन व समय पर आधारित किताबों और फिल्मों के जरिए बांग्लादेश में उनका सम्मान किया जाता रहा है, लेकिन जुलाई के आंदोलन के बाद पैदा हुए सामाजिक और राजनीतिक बदलावों के बीच बांग्लादेश के लोग अब उनकी रचनाओं के जरिए उनकी राजनीति और दुनिया को देखने के नजरिए की जांच कर रहे हैं. इससे उनके मन में सवाल उठा है: जो देश इज़रायल को मान्यता नहीं देता और उसके साथ उसके औपचारिक राजनयिक या व्यापारिक संबंध नहीं हैं, वह ऐसे व्यक्ति को किस नज़र से देखेगा, जो कम से कम इज़रायल बनाने के विचार के प्रति सहानुभूति रखता था?

टीवी और कॉलेज कैंपस में होने वाली बहसों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट में भी टैगोर के यहूदी देश यानी इज़रायल को स्वीकार करने के विचार की आलोचना हो रही है. टैगोर का निधन 7 अगस्त 1941 को हुआ था, जबकि इज़रायल सात साल बाद, 14 मई 1948 को बना था.

लेकिन बांग्लादेश के लोकप्रिय डिजिटल मीडिया और समाचार पेज ‘फ्राइडे पोस्ट’ की 11 अक्टूबर की एक पोस्ट अब तेज़ी से वायरल हो रही है. इसमें कहा गया है कि यहूदी देश बनाने को लेकर हुई बहसों के दौरान टैगोर ने पूर्व और पश्चिम के संबंधों, सांस्कृतिक पहचान और पूर्वी सभ्यता को फिर से मजबूत बनाने पर होने वाली चर्चाओं में अहम जगह बनाई थी. पोस्ट के मुताबिक, उस दौर में यहूदी बुद्धिजीवी अक्सर उनकी रचनाओं का ज़िक्र करते थे.

यरुशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के शिमोन लेव के हवाले से पोस्ट में लिखा है, “टैगोर अपने समय में यहूदी और यहूदी देश के समर्थकों की दुनिया में भारत के सबसे प्रमुख प्रतिनिधि थे. टैगोर की रचनाओं को मिली पहचान के जरिए भारत ने यहूदी फिलिस्तीन में एशियाई पहचान बनाने में एक और योगदान दिया. इसमें पूर्व के दोबारा उभरने पर जोर दिया गया और उसे उसकी ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ा गया.”

इस पोस्ट में पैन-सेमिटिक एशियाई यहूदी राष्ट्रवाद के सबसे प्रमुख समर्थकों में से एक रब्बी बेन्यामिन के हवाले से यह भी कहा गया है, “भारत के रास्ते यूरोप और अमेरिका के मशहूर देशों के रास्तों से ज्यादा साफ हैं. यह सब टैगोर की कविताओं और गांधी के धैर्य की ताकत से हासिल हुआ.”

बांग्लादेश के इस समाचार संस्थान ने टैगोर के 1930 में ‘द ज्यूइश स्टैंडर्ड’ को दिए इंटरव्यू का भी जिक्र किया है, ताकि यह दिखाया जा सके कि वह इजरायल बनाने के विचार के समर्थक थे. समाचार संस्थान के मुताबिक, टैगोर से पूछा गया था कि क्या वह यहूदी राष्ट्रवाद का समर्थन करते हैं.

‘फ्राइडे पोस्ट’ के मुताबिक, “उन्होंने जवाब दिया था, ‘मैं यहूदी राष्ट्रवाद के विचार का सम्मान करता हूं और इसके लिए काम करने वाले लोगों की निस्वार्थ भावना की प्रशंसा करता हूं. मैंने जितना हो सका, उतनी करीब से इस बात पर नजर रखी है कि आपका यह विचार लगातार किस तरह हकीकत में बदल रहा है. आपने इस दिशा में असाधारण प्रगति की है.’”

ऐसी बातों के आधार पर टैगोर को पढ़ने पर उस देश के युवा कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, जहां के बहुत बड़े हिस्से के लोग फिलिस्तीन की आजादी के आंदोलन का समर्थन करते हैं?

जिस दिन यह पोस्ट आई, उसी दिन ‘द डेली स्टार’ ने खबर दी कि राष्ट्र संवाद मंच के अध्यक्ष एएनएम आयास और तीन अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया. आरोप है कि उन्होंने ढाका के सेगुनबागीचा इलाके में बांग्लादेश शिल्पकला अकादमी में टैगोर की एक दीवार पर बनी तस्वीर या लिखावट को बिगाड़ने की कोशिश की थी. राष्ट्र संवाद मंच एक राष्ट्रवादी समूह है, जो जुलाई 2024 के आंदोलन के बाद बना था.

क्या टैगोर के खिलाफ गुस्से की वजह सिर्फ यहूदी देश को लेकर उनके विचार हैं? ऐसा नहीं है. बांग्लादेश के नेता और वकील असदुज्जमान फुआद, जिन्हें बैरिस्टर फुआद के नाम से जाना जाता है, ने सिर्फ टैगोर ही नहीं, बल्कि बंगाली हिंदुओं के उस वर्ग के खिलाफ भी जोरदार अभियान चलाया है, जिससे टैगोर आते थे. टीवी बहसों और सार्वजनिक भाषणों में फुआद यह विचार रखते रहे हैं कि 1793 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से शुरू की गई स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था से टैगोर जैसे लोगों को फायदा हुआ था. इस व्यवस्था ने औपनिवेशिक बंगाल में जमीन के मालिकाना हक और कर वसूली के तरीके बदल दिए थे और जमींदारों को फायदा पहुंचाया था.

फुआद ने कहा, “बंगाली मुस्लिमों को दो स्तरों पर भेदभाव का सामना करना पड़ा—एक तरफ अंग्रेज मालिकों से और दूसरी तरफ हिंदू जमींदारों से. टैगोर उस ऊंची जाति के हिंदू जमींदार वर्ग से आते थे, जिसने बंगाली मुस्लिमों को हाशिये पर धकेला.” उन्होंने आगे कहा कि बंटवारे के समय ढाका की आबादी में हिंदू सिर्फ 30 प्रतिशत थे, लेकिन 70 प्रतिशत जमीन उनके पास थी. उनके मुताबिक, इससे पता चलता है कि टैगोर जैसे लोगों ने बंगाली मुस्लिम आबादी को किस तरह हाशिये पर रखा था.

यह भी पढ़ें: दुर्गा पूजा के भव्य आयोजन के बाद तारिक रहमान की असली परीक्षा—हसीना की वापसी, हिंदू वोट और इस्लामी कट्टरपंथियों के फरमान

‘हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े समर्थक’

शिक्षाविद और ‘ए ग्लोबल सोशियोलॉजी ऑफ कास्ट एंड पावर’ किताब के लेखक शतानिक पाल ने दिप्रिंट से कहा कि आज बांग्लादेश में टैगोर को नकारने की विडंबना यह है कि टैगोर के परिवार को उनके समय के हिंदू समाज ने लंबे समय तक दूर रखा था. इसकी वजह यह थी कि उनके परिवार को ‘पीराली ब्राह्मण’ कहा जाता था.

पाल ने कहा, “पीराली ब्राह्मण ऐसे ब्राह्मणों का एक समूह था, जिन्हें मध्यकाल और उसके बाद के शुरुआती दौर में मुस्लिमों के साथ कारोबार करने या सामाजिक संबंध रखने के कारण अपवित्र माना जाता था.”

पाल ने आगे कहा कि टैगोर सभी धर्मों के कट्टरपंथियों के खिलाफ थे. आज बांग्लादेश के कुछ लोग जिस तरह उनके विचारों को चुनिंदा तरीके से पेश कर रहे हैं, वह दुखद है.

आज टैगोर का मजाक उड़ाने वाले बांग्लादेश के कई युवा मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एम.ए. मतीन की किताब ‘आमादेर स्वाधीनता संग्रामेर धाराबाहिकता एबोंग प्रासंगिक किछु कथा’ (हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का क्रम और उससे जुड़ी कुछ बातें) के अंशों का खूब इस्तेमाल करते हैं. सेना के इस पूर्व अधिकारी ने टैगोर को एक कट्टर हिंदू, मुस्लिमों से नफरत करने वाला व्यक्ति बताया है. उनका आरोप है कि टैगोर बंगाल के बंटवारे के खिलाफ थे और ढाका विश्वविद्यालय की स्थापना का भी विरोध करते थे.

‘डेली वादा’ में ‘कवि या पितामह?’ शीर्षक से लिखे एक लेख में एम. अहमदुल्लाह लिखते हैं कि टैगोर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान और उनकी कविताओं, संगीत व विचारों से जुड़ी गद्य रचनाओं के विशाल संग्रह का इस्तेमाल अक्सर समाज को अपनी मर्जी के मुताबिक ढालने की बड़ी योजनाओं के लिए किया गया है.

अहमदुल्लाह लिखते हैं, “आलोचकों का कहना है कि राजनीति में टैगोर की इस छवि का इस्तेमाल अक्सर बांग्लादेश के मुस्लिम बहुमत पर दबाव डालने के लिए किया गया. इससे उन्हें अपनी स्थानीय विरासत, ऐतिहासिक यादों और अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान के कुछ हिस्सों को पीछे छोड़ने या मिटाने के लिए मजबूर किया गया.”

शिक्षाविद और मौखिक इतिहास के जानकार अविषेक बिस्वास ने दिप्रिंट से कहा कि साहित्य की किसी भी महान हस्ती को नए नजरिए से दोबारा पढ़ना अच्छी बात है. लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि 1905 में टैगोर हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े समर्थक बनकर सामने आए थे.

बिस्वास ने कहा, “बांग्लादेश के Gen Z को टैगोर को सिर्फ धर्म के सीमित नजरिए से नहीं पढ़ना चाहिए. उन्होंने ऐसी दुनिया की कल्पना की थी, जहां इंसान सिर ऊंचा करके चल सके.”

दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोगों ने आज बांग्लादेश में टैगोर के खिलाफ पैदा हुई भावना के लिए बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भी जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि हसीना के शासन में टैगोर को एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष देवता का दर्जा दे दिया गया था, जिस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते थे.

बांग्लादेश के नई दिल्ली स्थित उच्चायोग में प्रेस मंत्री रह चुके फैसल महमूद लिखते हैं, “टैगोर की प्रशंसा करना राजनीतिक पहचान का जरूरी हिस्सा बन गया था. उनके बारे में सरकार की ओर से पेश की गई छवि पर सवाल उठाने वाले को असभ्य, सांप्रदायिक या अंदर ही अंदर इस्लामी कट्टरपंथ का समर्थक बताकर देशद्रोही जैसा माना जाता था. उस सरकार की दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग थे—एक, सभ्य नागरिक जो टैगोर के उद्धरण देते थे, और दूसरे, असभ्य व संदेह की नजर से देखे जाने वाले विद्रोही.”

हसीना के बाद खुद को नए सिरे से गढ़ रहे बांग्लादेश में टैगोर को फिर से पहले जैसा सम्मान मिलने में शायद कुछ समय लगेगा.

दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह लेख उनके निजी विचार है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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