scorecardresearch
Saturday, 11 July, 2026
होममत-विमतIIT प्राचीन ज्ञान प्रणालियों का अध्ययन जारी रखें, लेकिन रिसर्च के तरीके आलोचना के लिए खुले हों

IIT प्राचीन ज्ञान प्रणालियों का अध्ययन जारी रखें, लेकिन रिसर्च के तरीके आलोचना के लिए खुले हों

आधुनिक शोध में, हम विवादास्पद या लीक से हटकर शोध-प्रश्नों से पीछे नहीं हटते. इसके बजाय, हम उन पर ज़्यादा कड़े सुरक्षा उपाय लागू करते हैं.

Text Size:

भारत के बौद्धिक इतिहास में ज्ञान की खोज और अध्ययन की एक लंबी और विविध परंपरा रही है. इस विरासत का कुछ हिस्सा अच्छी तरह दर्ज है. जबकि कुछ ज्ञान सिर्फ पांडुलिपियों, मौखिक परंपराओं या व्यवहारिक तरीकों के रूप में आज भी मौजूद है. यही विविधता बताती है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली यानी IKS का गंभीर अकादमिक अध्ययन क्यों जरूरी है. पिछले कुछ वर्षों में कई IIT ने नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत IKS पर केंद्र, कोर्स और रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किए हैं.

इन अध्ययनों में गणित, भाषा विज्ञान, तर्कशास्त्र, धातुकर्म, वास्तुकला, जल प्रबंधन और पांडुलिपियों जैसे कई विषय शामिल हैं. कुछ शोधकर्ता चेतना, धार्मिक अनुष्ठानों या पारंपरिक मान्यताओं से जुड़े विवादित दावों की भी जांच कर रहे हैं. कई लोग इसे भारत की बौद्धिक विरासत को दोबारा खोजने, दर्ज करने और समझने की लंबे समय से जरूरी कोशिश मानते हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि कुछ ऐसे दावे, जिनकी वैज्ञानिक जांच ठीक से नहीं हुई है, उन्हें विज्ञान के रूप में पेश किया जा सकता है, जिससे उन्हें गलत तरीके से विश्वसनीयता मिल सकती है.

हाल के वर्षों में इन प्रयासों को लेकर रुचि भी बढ़ी है और आलोचना भी हुई है. इससे यह सवाल सामने आता है कि IIT कैसे नए और अलग तरह के सवालों के लिए खुले रह सकते हैं, बिना उन वैज्ञानिक तरीकों से समझौता किए जिन पर अकादमिक रिसर्च की विश्वसनीयता टिकी होती है. इससे कई सवाल खड़े होते हैं.

क्या IKS का मूल्यांकन मुख्य रूप से उसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के आधार पर होना चाहिए, उसके वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर, या फिर दोनों के साफ तय किए गए संतुलन के आधार पर? किसी IKS से जुड़े दावे को वैज्ञानिक रूप से भरोसेमंद मानने से पहले रिसर्च के सबूत, नैतिक समीक्षा, विशेषज्ञों की जांच और दोबारा जांच में सही साबित होने जैसे कौन से न्यूनतम मानक पूरे होने चाहिए? IIT कैसे यह सुनिश्चित करें कि IKS का हर ऐसा दावा, जिसे परखा जा सकता है, उसे आधुनिक रिसर्च के उन्हीं मानकों पर जांचा जाए? इसलिए IKS पर अच्छी रिसर्च के लिए स्पष्ट सोच जरूरी है, न कि अंधा सम्मान या मजाक. इसी वजह से IIT IKS का अध्ययन करने की क्षमता विकसित कर रहे हैं, ताकि ऐतिहासिक महत्व, दार्शनिक मूल्य, व्यावहारिक उपयोगिता और वैज्ञानिक सत्यता के बीच साफ अंतर किया जा सके.

IIT ऐसे सवालों पर भी रिसर्च करते हैं जिनका जवाब अभी तक नहीं मिला है, जिन पर विवाद है या जो शायद सही भी न हों. उनका काम हर पुराने दावे को सही साबित करना नहीं है. बल्कि उनका उद्देश्य इंजीनियरिंग, कंप्यूटिंग, भाषा विज्ञान, मानव सोच, डिजाइन, पर्यावरण अध्ययन और मानविकी जैसे विषयों को मूल ग्रंथों और जीवित परंपराओं के साथ जोड़कर अध्ययन करना है. लेकिन नए विचारों के लिए खुलापन अपनाने का मतलब यह नहीं कि वैज्ञानिक तरीके छोड़ दिए जाएं.

आधुनिक रिसर्च में विवादित या अलग तरह के सवालों से बचा नहीं जाता. बल्कि ऐसे मामलों में और ज्यादा सख्त वैज्ञानिक नियम अपनाए जाते हैं. शोधकर्ता होने के नाते हम यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी निष्कर्ष की सीमा उपलब्ध सबूतों के अनुसार ही हो, चाहे विषय कोई भी हो. यह भी कोई नई बात नहीं है कि सामान्य वैज्ञानिक रिसर्च भी कई बार पहले से बनी धारणा, कमजोर जांच, सिर्फ सकारात्मक नतीजों को प्रकाशित करने की प्रवृत्ति या जरूरत से ज्यादा बड़े दावों जैसी समस्याओं से प्रभावित होती है. फिर भी विज्ञान इसलिए मजबूत बना हुआ है क्योंकि उसकी कार्यप्रणाली हमेशा आलोचना के लिए खुली रहती है. IKS को न तो इन मानकों से छूट मिलनी चाहिए और न ही पहले से गलत मान लेना चाहिए. सही तरीका यही है कि सभी के लिए एक जैसे वैज्ञानिक मानक लागू हों.

यहीं पर एक दार्शनिक अंतर को समझना भी जरूरी है. प्राकृतिक दुनिया से जुड़े अलग-अलग सवालों के जवाब देने के लिए अलग-अलग तरीकों की जरूरत होती है. आम तौर पर पांडुलिपियों के लिए पाठ विश्लेषण, पुरानी वस्तुओं के लिए पुरातत्व, समय तय करने के लिए ऐतिहासिक विश्लेषण, समुदायों की परंपराओं के लिए नृविज्ञान, विचारों के लिए दार्शनिक विश्लेषण और कारणों की जांच के लिए प्रयोग आधारित तरीके अपनाए जाते हैं. लेकिन इनमें से एक या कई सही तरीके अपनाने का मतलब यह नहीं कि हर निष्कर्ष समान रूप से भरोसेमंद होगा. जरूरी यह है कि सवाल के अनुसार सही तरीका चुना जाए और साफ बताया जाए कि उपलब्ध सबूतों के आधार पर उस निष्कर्ष तक कैसे पहुंचा गया.

इसलिए IIT को IKS के लिए रिसर्च की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने वाला एक स्पष्ट ढांचा तैयार करना चाहिए. शोधकर्ताओं को यह साफ बताना चाहिए कि उनके दावे का आधार क्या है, उन्होंने कौन सा तरीका अपनाया, उसकी सीमाएं क्या हैं और उस दावे की स्थिति क्या है. क्या वह दर्ज किया गया इतिहास है, संभावित पुनर्निर्माण है, किसी समुदाय की मान्यता है, जांचा जा सकने वाला अनुमान है, बार-बार सही साबित हुआ निष्कर्ष है या अभी भी अनसुलझा प्रस्ताव है? इस तरह का रिसर्च तरीका जरूरी है ताकि भ्रम और संदेह कम हो सकें. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और जनता का भरोसा, दोनों सुरक्षित रहेंगे.

आलोचना जरूरी है

आइए कुछ उदाहरणों को समझते हैं. प्रयोग आधारित रिसर्च के लिए IIT और दूसरे संस्थान सिर्फ विषय विशेषज्ञ वैज्ञानिकों को ही नहीं, बल्कि इतिहासकारों, भाषा विशेषज्ञों, सांख्यिकी विशेषज्ञों और नैतिकता के जानकारों को भी शामिल कर सकते हैं. जहां जरूरत हो, वहां उन समुदायों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता है जिनके पास यह पारंपरिक ज्ञान है. असाधारण दावों और बड़े निष्कर्षों के लिए अलग और सख्त नियम होने चाहिए. गोपनीयता और नैतिक सीमाओं का पालन करते हुए रिसर्च का डेटा और कोड सार्वजनिक किया जाना चाहिए. इससे दूसरे संस्थान भी उसी रिसर्च को दोहराकर उसके नतीजों की जांच कर सकेंगे. IIT को ऐसे नतीजे भी प्रकाशित करने चाहिए जो IKS के दावों का समर्थन करते हों और ऐसे नतीजे भी जो जांच में सही साबित न हुए हों. इससे यह साफ रहेगा कि IKS रिसर्च का उद्देश्य सिर्फ किसी बात को सही साबित करना नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष जांच करना है.

ऐतिहासिक और समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने पड़ सकते हैं, लेकिन वे भी उतने ही सख्त होने चाहिए. जिन समुदायों के ज्ञान को दर्ज किया जाए, उन्हें उचित पहचान मिलनी चाहिए. उनकी सहमति, उन्हें श्रेय देने और उन्हें होने वाले लाभ जैसे मुद्दों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. IIT में होने वाली IKS रिसर्च का उद्देश्य उपलब्ध जानकारी को बढ़ाना, लंबे समय से अनदेखी किए गए ज्ञान को सामने लाना और पारंपरिक ज्ञान की जांच करना होना चाहिए, बिना सबूतों के मानक को कम किए.

यह तरीका नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के शैक्षणिक उद्देश्य के अनुरूप है. यह नीति भारत की जड़ों से जुड़ी ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने की बात करती है, जिसमें आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक जांच, कई विषयों को साथ लेकर पढ़ाई और उच्च गुणवत्ता वाली रिसर्च पर जोर हो.

जब IIT IKS का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं, तो इसका एक और महत्वपूर्ण असर होता है. हमारे छात्र यह जान पाएंगे कि भारत ने भाषा, तर्कशास्त्र, गणित, चिकित्सा, धातुकर्म, कला और दर्शन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किया है. साथ ही वे यह भी सीखेंगे कि किसी दावे की जांच कैसे होती है, उसे कैसे बदला जाता है और कई बार कैसे खारिज भी किया जाता है. वे समझेंगे कि बौद्धिक आत्मविश्वास पाने के लिए अपने विचारों की खुली जांच और आलोचना को स्वीकार करना कितना जरूरी है. इसलिए IKS को संस्थागत रूप देने का मूल्यांकन उसके रिसर्च नतीजों, विशेषज्ञों की समीक्षा और अलोकप्रिय विचारों की भी स्वतंत्र जांच करने की आजादी के आधार पर होना चाहिए.

अगर इसे सही तरीके से किया जाए, तो IKS का अध्ययन IIT की प्रतिष्ठा को कम नहीं बल्कि और मजबूत कर सकता है. इससे सामग्री विज्ञान, टिकाऊ डिजाइन, जल प्रबंधन, भाषा विज्ञान, कंप्यूटिंग, मानव सोच, वास्तुकला और संरक्षण जैसे आधुनिक जरूरतों वाले क्षेत्रों में अलग और महत्वपूर्ण रिसर्च हो सकती है. इससे इंजीनियर, इतिहासकार, दार्शनिक और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले लोग साथ मिलकर काम कर सकेंगे. यह भी दिखाया जा सकता है कि दुनिया के साथ अकादमिक स्तर पर जुड़ने के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान भूलना जरूरी नहीं है.

साथ ही, आलोचना की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. यह कमजोर रिसर्च प्रक्रिया, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे, अस्पष्ट शब्दों और किसी विचार का समर्थन करने तथा निष्पक्ष जांच करने के बीच के टकराव को सामने ला सकती है. लेकिन आलोचना सबसे ज्यादा तब उपयोगी होती है, जब वह रिसर्च के मानकों को बेहतर बनाती है. यह कहना कि पूरा IKS क्षेत्र ही गलत है, वैज्ञानिक सोच के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है जिसमें कहा जाता है कि सीमित उदाहरणों के आधार पर पूरे क्षेत्र के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए.

IIT के पास भारत की बौद्धिक विरासत का अध्ययन करने का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी. लेकिन यह अध्ययन खुला, विविध और बिना किसी भावनात्मक पक्षपात के होना चाहिए. उद्देश्य यह नहीं है कि परंपरा को सबूतों से ऊपर रखा जाए या सबूतों को संस्कृति से ऊपर. बल्कि उद्देश्य यह है कि सांस्कृतिक विरासत को गंभीर और व्यवस्थित ज्ञान के विषय के रूप में समझा जाए. IIT इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकते हैं क्योंकि उनके पास वैज्ञानिक क्षमता, कई विषयों को जोड़ने की ताकत और जनता का भरोसा है. आलोचना को मजबूत IKS बनाने का एक साधन बनने दीजिए, ताकि यह आधुनिक भारतीय उच्च शिक्षा का एक भरोसेमंद हिस्सा बन सके.

ममिडाला जगदीश कुमार, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की NEP 2020 समीक्षा समिति के चेयरमैन और IIM कलकत्ता के BoG के चेयरमैन हैं; साथ ही वे पहले JNU के वाइस-चांसलर और UGC के चेयरमैन भी रह चुके हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


share & View comments