नई दिल्ली: कांग्रेस द्वारा देशभर में छात्रों तक पहुंच बनाने के अभियान की घोषणा किए हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है. परीक्षा और भर्ती में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और जनसभाओं का वादा करने वाला यह अभियान अब धीमा पड़ता दिख रहा है. इसकी वजह लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का विदेश दौरे पर होना है, जिसके चलते अभियान को टालना पड़ा है.
कांग्रेस ने 17 जून को ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की शुरुआत बड़े जोर-शोर से की थी. पार्टी ने इसे देशभर का आंदोलन बताते हुए परीक्षा पेपर लीक, बेरोजगारी और छात्रों व नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के हितों की रक्षा करने में केंद्र सरकार की कथित विफलता जैसे मुद्दों को उठाने का फैसला किया था.
पार्टी की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियां होनी थीं. इसके बाद अगली बड़ी रैली देहरादून में प्रस्तावित थी. लेकिन राहुल गांधी के विदेश दौरे के बढ़ जाने के कारण इन रैलियों को टालना पड़ा. उनके 17 जुलाई के आसपास लौटने की उम्मीद है. उनकी गैरमौजूदगी में होने वाली सभी रैलियां फिलहाल स्थगित कर दी गई हैं. अभी तक नई तारीखों का ऐलान नहीं किया गया है.
कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर राहुल गांधी के विदेश दौरे का उद्देश्य नहीं बताया है.
23 जून को बीजेपी आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर एक पोस्ट में राहुल गांधी की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाया था. उन्होंने लिखा था, “राहुल गांधी फिर विदेश चले गए हैं. ऐसे समय में जब संसद, पार्टी संगठन और सार्वजनिक जीवन लगातार सक्रिय रहने की मांग करते हैं, उनका बार-बार विदेश जाना एक साफ सवाल खड़ा करता है. आखिर ऐसी कौन सी बात है जो भारत में उनकी जिम्मेदारियों से ज्यादा जरूरी है. सोचने वाली बात है.”
मई में मालवीय ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने अपने 22 साल के राजनीतिक जीवन में “कम से कम 54 ऐसे विदेश दौरे किए हैं जिनका पता लगाया जा सकता है.” उन्होंने इन यात्राओं पर करीब 60 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान भी लगाया था और पूछा था कि इसका खर्च कैसे उठाया गया. कांग्रेस पहले भी ऐसे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता चुकी है.
2015 में राहुल गांधी करीब दो महीने के लिए विदेश चले गए थे. उस दौरान उन्होंने संसद के बजट सत्र का बड़ा हिस्सा और विवादित भूमि अधिग्रहण विधेयक पर हुई बहस मिस कर दी थी.
दिसंबर 2020 में जब कांग्रेस किसानों के आंदोलन के समर्थन में अपना अभियान तेज कर रही थी, तब भी राहुल गांधी विदेश गए थे.
अक्टूबर 2024 में हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उनका चिली दौरा भी राजनीतिक विवाद का कारण बना था. वहीं सितंबर 2025 में उन्होंने उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन के शपथ ग्रहण समारोह में भी हिस्सा नहीं लिया था. बीजेपी ने आरोप लगाया था कि उस समय भी वह विदेश दौरे पर थे.
कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ को सिर्फ एक राजनीतिक अभियान नहीं, बल्कि उससे कहीं बड़ा अभियान बताया था. इसकी घोषणा करते हुए पार्टी ने इसे “न्याय के लिए देशव्यापी आवाज” कहा था और देशभर के छात्रों से एकजुट होकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था की मांग करने की अपील की थी, जो मेहनत का सम्मान करे, योग्यता की रक्षा करे, पारदर्शिता सुनिश्चित करे और लोगों का भरोसा फिर से कायम करे.
इस अभियान के तहत इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) ने कई राज्यों में प्रदर्शन किए. उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में लगातार सामने आ रही समस्याओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की. अभियान शुरू होने के बाद कई राज्यों में विरोध कार्यक्रम भी आयोजित किए गए.
लेकिन जमीनी स्तर पर अभियान को सीमित समर्थन मिला है. अभियान की घोषणा के बाद राहुल गांधी की मौजूदगी वाली सिर्फ एक बड़ी जनसभा हुई, जो राजस्थान के कोटा में आयोजित की गई. पार्टी द्वारा घोषित बाकी सभी रैलियां अब टाल दी गई हैं. इससे उस अभियान की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं जिसे देशव्यापी आंदोलन बताया गया था.
यह सुस्ती ऐसे समय आई है जब परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर कांग्रेस से अलग भी विरोध प्रदर्शन जारी हैं.
शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, ने कहा कि उनके अनिश्चितकालीन अनशन के 13वें दिन उनकी सेहत “स्थिर” है. CJP का प्रदर्शन 21वें दिन में पहुंच गया है. प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं.
वांगचुक ने 20 जुलाई को संसद तक मार्च निकालने का भी ऐलान किया है. उसी दिन संसद का मानसून सत्र शुरू होगा. अब तक केंद्र सरकार की ओर से इस प्रदर्शन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. कांग्रेस ने भी इस प्रदर्शन या वांगचुक के अनशन पर कोई बयान जारी नहीं किया है.
कांग्रेस ने अभी तक यह नहीं बताया है कि टाली गई रैलियां कब दोबारा आयोजित की जाएंगी. पार्टी के सूत्रों ने यह भी कहा कि पार्टी के कई नेताओं को भी राहुल गांधी के ठिकाने की जानकारी नहीं है.
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने कहा कि किसी नेता का विदेश जाना असामान्य नहीं है. लेकिन राहुल गांधी के दौरे को लेकर आधिकारिक जानकारी न होने से राजनीतिक अटकलों को जगह मिल गई है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “राहुल गांधी का विदेश जाना कोई गलत बात नहीं है. लेकिन विपक्ष के नेता होने के नाते लोगों को यह पता होना चाहिए कि वह कहां हैं, चाहे वह सिर्फ फुटबॉल मैच ही क्यों न देखने गए हों. जानकारी की कमी बीजेपी को उन पर हमला करने का मौका देती है क्योंकि इससे यह धारणा बनती है कि वे गायब हैं. राहुल गांधी जहां भी जाते हैं, चाहे निकोबार जाएं या कहीं और, वह जगह चर्चा में आ जाती है. लेकिन इस समय किसी को नहीं पता कि वह कहां हैं और इससे स्वाभाविक रूप से अटकलें लगती हैं. अगर थोड़ी स्पष्टता होती तो काफी अनावश्यक विवाद से बचा जा सकता था.”
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