पिछले दस सालों में, भारत में PhD एनरोलमेंट में काफी बढ़ोतरी हुई है. ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन रिपोर्ट से पता चलता है कि 2023-24 में, PhD एनरोलमेंट 3,43,559 था. जैसे-जैसे डॉक्टरेट की पढ़ाई बढ़ रही है, यह समझना ज़रूरी है कि PhD का तय समय, रेगुलर प्रोग्रेस रिव्यू और इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट, स्कॉलर्स को अपना काम पूरा करने और अच्छी क्वालिटी की रिसर्च करने में कैसे मदद करते हैं.
यूजीसी के 2022 के पीएचडी नियमों के तहत, पीएचडी पूरी करने की न्यूनतम अवधि तीन साल है, जिसमें कोर्सवर्क भी शामिल है. इसमें कहा गया है कि दाखिले की तारीख से अधिकतम छह साल के अंदर पीएचडी पूरी हो जानी चाहिए. हालांकि, तय नियमों के तहत समय बढ़ाया जा सकता है. अगर किसी यूनिवर्सिटी के नियम या अध्यादेश इसकी अनुमति देते हैं, तो दोबारा रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के जरिए दो साल तक और समय बढ़ाया जा सकता है. महिला पीएचडी छात्रों और 40 प्रतिशत से ज्यादा दिव्यांगता वाले लोगों को दो साल तक की अतिरिक्त छूट मिल सकती है. इस तरह पीएचडी पूरी करने की कुल अवधि 10 साल तक हो सकती है. महिला छात्र पीएचडी के दौरान 240 दिनों तक मातृत्व या बच्चे की देखभाल के लिए छुट्टी भी ले सकती हैं.
यूजीसी के ये नियम केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य कानूनों के तहत बनाए गए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं. हालांकि, आईआईटी, जो राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (आईएनआई) हैं, मुख्य रूप से इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी एक्ट, 1961 के तहत चलते हैं. इसके साथ ही वे अपने नियमों, अध्यादेशों और सीनेट से मंजूर अकादमिक नियमों के अनुसार भी काम करते हैं.
आईआईटी बॉम्बे में पीएचडी का रजिस्ट्रेशन छह साल के लिए वैध होता है और उसके नियम रिसर्च की प्रोग्रेस के आधार पर आठ साल तक समय बढ़ाने की अनुमति देते हैं. आईआईटी मद्रास में, अगर कोई छात्र तय अवधि तक पहुंच जाता है, तो डॉक्टोरल कमेटी उसकी प्रोग्रेस की हर मामले के आधार पर समीक्षा कर सकती है. इसमें दोबारा रजिस्ट्रेशन और समय बढ़ाने का भी प्रावधान है. आईआईटी कानपुर की सीनेट तय अधिकतम अवधि के बाद भी हर मामले के आधार पर पीएचडी जारी रखने की अनुमति दे सकती है. पीएचडी पूरी करने के लिए तय अवधि एक ढांचा देती है. पीएचडी पूरी करने के लिए अधिकतम तय अवधि एक आखिरी सीमा है, न कि हर छात्र से उतने ही समय में पीएचडी पूरी करने की उम्मीद की जाती है.
इन संस्थानों के उदाहरण दिखाते हैं कि पीएचडी प्रोग्राम में इसे पूरा करने के लिए एक तय अवधि होती है. इसके साथ रिसर्च की समय-समय पर समीक्षा और जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाने के मौके भी दिए जाते हैं. यह तरीका मानता है कि अलग-अलग लोगों की जरूरतें और पीएचडी रिसर्च के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं.
एक टाइमलाइन सभी PhDs के लिए फिट नहीं
आइए, एक्सपेरिमेंटल साइंस और इंजीनियरिंग में PhD रिसर्च को एक उदाहरण के तौर पर लेते हैं. यहां, एक PhD स्कॉलर को एक एक्सपेरिमेंटल सेटअप बनाने, एक डिवाइस बनाने या खास इक्विपमेंट इस्तेमाल करने के लिए स्लॉट बुक करने की ज़रूरत हो सकती है. कभी-कभी, उन्हें नतीजों की कंसिस्टेंसी चेक करने के लिए बार-बार मेज़रमेंट करने पड़ सकते हैं.
इसी तरह, लाइफ साइंसेज जैसे दूसरे एरिया में, रिसर्च बायोलॉजिकल साइकिल, सैंपल कलेक्शन और एथिक्स अप्रूवल पर निर्भर हो सकती है, जिनमें से हर एक में समय लग सकता है. थ्योरेटिकल या कम्प्यूटेशनल रिसर्च में, आइडिया को मैच्योर होने में काफी समय लग सकता है, और इन आइडिया को बार-बार वैलिडेशन की ज़रूरत हो सकती है.
सोशल-साइंस रिसर्च में, स्कॉलर को फील्ड सर्वे करने और डेटा इकट्ठा करने पड़ सकते हैं. इसी तरह, ह्यूमैनिटीज स्कॉलर को अलग-अलग जगहों पर मौजूद आर्काइव और कलेक्शन तक पहुंच की ज़रूरत हो सकती है, जिसमें लंबी दूरी की यात्रा शामिल है. इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च करने में चुनौतियों में अलग-अलग डिसिप्लिन और ऑर्गनाइज़ेशन के एक्सपर्ट के साथ काम करना शामिल है.
हालांकि, रिसर्च अलग-अलग तरीकों से की जाती है, लेकिन PhD पूरी करने की ज़रूरतें अलग-अलग डिसिप्लिन में सख्त होती हैं. नतीजों के फाइनल शेप लेने से पहले प्रोग्रेस अलग-अलग स्टेज पर हो सकती है. रेगुलर रिव्यू का मकसद प्रोग्रेस का अंदाज़ा लगाना और स्कॉलर्स को उनके रिसर्च प्लान के बारे में अलग-अलग स्टेज पर फीडबैक देना है.
ज़्यादा समय लगने का मतलब खराब रिसर्च नहीं है
जबकि स्कॉलर्स ओरिजिनल रिसर्च करते हैं, लेकिन नतीजे पक्के नहीं हो सकते. यह एक और कारण है कि PhD पूरी होने में लगने वाले वक्त में अंतर हो सकता है. उदाहरण के लिए भले ही कोई स्कॉलर्स किसी ऐसे आइडिया से शुरू करें जो शुरू में अच्छा लगे, फिर भी उसे बदलने या दिशा बदलने की ज़रूरत हो सकती है. कुछ मामलों में, सुपरवाइज़र बदल सकता है या कोई अचानक पर्सनल सिचुएशन बन सकती है. ऐसे हालात रिसर्च की प्रोग्रेस में रुकावट डाल सकते हैं.
PhD पूरी होने में ज़्यादा समय लगने का कारण ज़रूरी नहीं कि काबिलियत या कमिटमेंट की कमी हो. इसी तरह, जल्दी पूरा करने से ही रिसर्च की क्वालिटी तय नहीं होती.
अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए PhD प्रोग्राम में साफ तौर पर तय स्टेज होते हैं. आमतौर पर, PhD स्कॉलर्स जिन मुख्य स्टेज से गुज़रते हैं, वे हैं ज़रूरी कोर्सवर्क पूरा करना, रिसर्च प्रपोज़ल तैयार करना, हर सेमेस्टर में प्रोग्रेस रिव्यू पेश करना, प्री-सिनॉप्सिस जमा करना और फ़ाइनल थीसिस जमा करना. डॉक्टोरल रिसर्च करते समय, स्कॉलर्स को अपने काम के नेचर और प्रोग्रेस के आधार पर कॉन्फ्रेंस में शामिल होने और रिसर्च पेपर लिखने के मौके भी मिल सकते हैं.
रेगुलर रिव्यू के दौरान ही दिक्कतों का पता लगाया जा सकता है और अगर ज़रूरत हो, तो रिसर्च प्लान को एडजस्ट किया जा सकता है. ऐसे रिव्यू स्कॉलर्स, सुपरवाइज़र्स और इंस्टीट्यूशन्स को आगे की प्रोग्रेस के लिए ज़रूरी स्टेप्स को कोऑर्डिनेट करने में मदद करते हैं. एक्सटेंशन के मामले में, कौन सा काम पहले ही पूरा हो चुका है और क्या करना बाकी है, इस बारे में साफ गाइडेंस स्कॉलर्स को रिसर्च के आखिरी स्टेज की प्लानिंग करने में मदद कर सकता है.
PhD प्रोग्राम्स को सिर्फ अपने फायदे के लिए छोटा या लंबा करने की कोई ज़रूरत नहीं है. मकसद साफ है—मुश्किल रिसर्च को वक्त पर पूरा करना. रिसर्च के नेचर और प्रोग्रेस और स्कॉलर्स के हालात को ध्यान में रखते हुए, लागू नियमों के तहत सक्षम इंस्टीट्यूशनल अथॉरिटी एक्सटेंशन पर विचार कर सकती है.
PhD ड्यूरेशन को सबसे अच्छे से स्टेज-वाइज़ हुई प्रोग्रेस, रिसर्च की क्वालिटी और स्कॉलर्स के हालात को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है. साफ़ टाइमलाइन, रेगुलर रिव्यू, एकेडमिक सपोर्ट और सही एक्सटेंशन मिलकर स्कॉलर्स को मुश्किल रिसर्च को सक्सेसफुली पूरा करने में मदद करते हैं. जैसे-जैसे PhD प्रोग्राम्स बढ़ रहे हैं, जो अच्छी बात है, ज्ञान को आगे बढ़ाने और समाज में योगदान देने में डॉक्टोरल रिसर्च की क्वालिटी सेंट्रल बनी हुई है.
ममिडाला जगदीश कुमार, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की NEP 2020 समीक्षा समिति के चेयरमैन और IIM कलकत्ता के BoG के चेयरमैन हैं; साथ ही वे पहले JNU के वाइस-चांसलर और UGC के चेयरमैन भी रह चुके हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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