पिछले कई महीनों से पंजाब में बेअदबी कानून, फिल्म सतलुज को एक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से हटाए जाने और 1980-90 के दशक के मानवाधिकार मामलों पर फिर से बहस जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे हैं. इन सभी विषयों पर गंभीर चर्चा होना जरूरी है. लेकिन ऐसा बाकी सभी अहम मुद्दों की कीमत पर नहीं होना चाहिए.
जब टीवी और सोशल मीडिया पर इन मुद्दों पर शोर मचा हुआ है, तब पंजाब का कर्ज 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है. दूसरी ओर किसान संगठन लगातार और जायज तरीके से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं. लेकिन इन दोनों मुद्दों को उतना लगातार ध्यान नहीं मिल रहा, जितना पहचान और पुराने विवादों से जुड़े मुद्दों को मिल रहा है. कोई राज्य सिर्फ बहस करके आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल सकता. उसे एक-एक समस्या का समाधान करना होगा.
कर्ज की चुनौती का सामना करें
पंजाब पर बढ़ता कर्ज अब टिकाऊ स्थिति में नहीं है. अगर राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है, तो शुरुआत यहीं से करनी होगी. ऐसे तीन सुधार हैं, जो गरीबों के लिए जरूरी कल्याणकारी योजनाओं को छुए बिना वित्तीय स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं.
पहला, किसानों को मुफ्त बिजली देने की योजना. इस पर हर साल करीब 10,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं और यह करीब 14 लाख ट्यूबवेल कनेक्शन्स पर लागू है. इसे इस तरह बदला जाना चाहिए कि सिर्फ पीएम-किसान योजना के पात्र किसानों को ही मुफ्त बिजली मिले. अप्रैल-जुलाई 2025 की किस्त के दौरान पंजाब में पीएम-किसान के 11.34 लाख लाभार्थी थे. यानी करीब 20 प्रतिशत ट्यूबवेल कनेक्शनों पर बिजली का बिल लिया जा सकता है. इससे हर साल करीब 2,000 करोड़ रुपये की बचत होगी.
इसका MSP की बहस से भी सीधा संबंध है. जब किसी किसान वर्ग को बिजली की कीमत चुकानी होगी, तो यह खेती की लागत का हिस्सा बन जाएगी और इसे कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की लागत तय करने वाली व्यवस्था में शामिल किया जाना चाहिए. इसे छिपी हुई सब्सिडी की तरह बाहर नहीं रखा जाना चाहिए. अगर बिजली की कीमत को लागत में शामिल नहीं किया गया, तो कानूनी MSP की व्यवस्था अधूरी लागत के आधार पर होगी.
दूसरा, पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) के निजी बिजली कंपनियों के साथ किए गए पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) में सिर्फ मामूली बदलाव काफी नहीं होंगे. इन समझौतों में बिजली ली जाए या नहीं, फिर भी तय क्षमता शुल्क देना पड़ता है. राज्य को ऐसा कानूनी ढांचा बनाना चाहिए जिससे सबसे विवादित PPA रद्द किए जा सकें, खासकर वे जो बिना प्रतिस्पर्धी बोली के किए गए थे या बाद में एकतरफा पाए गए. इसके बाद इन्हें बिजली नियामक के पास भेजा जाए ताकि तय समय सीमा में उचित और लागत के हिसाब से नए समझौते तय किए जा सकें.
तीसरा, GST की निगरानी छापों और अधिकारियों की मर्जी पर आधारित कार्रवाई के बजाय फोरेंसिक और AI आधारित ऑडिट के जरिए होनी चाहिए. इससे रिटर्न, इनवॉइस और इनपुट टैक्स क्रेडिट में गड़बड़ियों का पता चल सकेगा. इससे बड़े टैक्स चोरों से ज्यादा वसूली होगी और नियमों का पालन करने वाले छोटे कारोबारियों को कम परेशान होना पड़ेगा.
चौथा, एक छोटा लेकिन प्रतीकात्मक रूप से अहम कदम यह होगा कि ब्रिटिश दौर के इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट को खत्म कर दिया जाए, क्योंकि वे पंजाब अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (PUDA) जैसा ही काम करते हैं. उनकी जमीन और संपत्तियों को एक राज्य स्तरीय पेशेवर संस्था के तहत लाया जाए. इससे प्रशासनिक खर्च कम होगा और जमीन से जुड़े फैसलों में मनमानी के कई केंद्र भी खत्म होंगे.
जो राज्य अपनी वित्तीय स्थिति खुद सुधारता है, वह वित्त आयोग से मिलने वाले हिस्से या नीति आयोग के साथ बातचीत में शिकायत करने के बजाय मजबूत स्थिति में होता है.
जमीन के बाजार को खुला बनाइए
पंजाब में आज भी बड़ी संख्या में जमीन के सौदे रजिस्टर्ड बिक्री दस्तावेज के बजाय बिना रजिस्टर्ड “एग्रीमेंट टू सेल” के जरिए होते हैं. इससे सरकार को स्टांप ड्यूटी का नुकसान होता है, जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद पैदा होते हैं और औपचारिक निवेश भी कम होता है. अगर ऐसे समझौतों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया जाए और इसके लिए उचित समय दिया जाए, तो सरकार की आय भी बढ़ेगी और बाजार में भरोसा भी.
इसके साथ ही एक और कदम यह होना चाहिए कि खेती की चेंज ऑफ लैंड यूज (Change of Land Use) की मंजूरी से होने वाले अतिरिक्त लाभ का कुछ हिस्सा उन छोटे किसानों को भी मिले, जिनकी जमीन शहरों के विस्तार में शामिल होती है. अभी इसका पूरा फायदा डेवलपर्स को मिलता है. इससे गांवों में असंतोष कम होगा और लोग योजनाबद्ध शहरी विकास का समर्थन करेंगे.
ग्रामीण कर्ज पर भी बराबर ध्यान देने की जरूरत है. पंजाब में आढ़तियों की कमीशन और कर्ज व्यवस्था खेती की जमीन पर एक तरह का छिपा हुआ बोझ बन चुकी है. ब्याज का खर्च फसल बेचने की व्यवस्था में ही शामिल रहता है और ज्यादातर किसान इसे पूरी तरह समझ या तय नहीं कर पाते.
अगर धीरे-धीरे बैंकों के जरिए पारदर्शी फसल ऋण व्यवस्था लागू की जाए और आढ़तियों की भूमिका कम की जाए, तो इससे किसानों की आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत होगी. यह बार-बार कर्ज माफी देने से ज्यादा असरदार होगा और सरकार पर भी कम बोझ डालेगा.
मनमानी वाली व्यवस्था खत्म करें
दो संस्थागत सुधार ऐसे हैं, जो अभी अफसरशाही की मनमानी में फंसी आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ा सकते हैं. एक बस परमिट से जुड़ा है और दूसरा पंजाब के सहकारी क्षेत्र से.
बस रूट परमिट आज भी एक अपारदर्शी प्रक्रिया से दिए जाते हैं. इससे छोटे शहरों के मजदूरों और व्यापारियों के लिए आखिरी छोर तक परिवहन सुविधा कमजोर रहती है. अगर ये परमिट प्रतिस्पर्धी ई-नीलामी के जरिए दिए जाएं, तो यह समस्या काफी हद तक हल हो सकती है.
दूसरा, पंजाब का सहकारी क्षेत्र. इसमें चीनी मिलें, सहकारी समितियां और मार्केटिंग फेडरेशन शामिल हैं. यह अब भी सरकारी निरीक्षण और नियंत्रण वाली व्यवस्था में चलता है.
अगर केंद्र के मॉडल सहकारी कानून को अपनाया जाए, सहकारी चुनाव राज्य चुनाव आयोग कराए और पंजीकरण तथा विवाद निपटारे की जिम्मेदारियां अलग कर दी जाएं, तो इस क्षेत्र में सदस्यों की स्वतंत्रता और वित्तीय अनुशासन दोनों लौट सकते हैं. अभी यह क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा.
सिर्फ घोषणाएं नहीं, विकास के नए इंजन बनाइए
सिर्फ खराब व्यवस्थाओं को सुधारना काफी नहीं होगा. पंजाब को नई संभावनाएं भी खड़ी करनी होंगी.
मोहाली में एक पंजाब स्टार्टअप एंड स्किल्स मिशन शुरू किया जा सकता है, जो सफल इनक्यूबेटर मॉडल पर आधारित हो. इससे वह तकनीकी प्रतिभा पंजाब में ही रुक सकती है, जो आज बेंगलुरु, टोरंटो और दूसरे शहरों में चली जाती है.
लेकिन यह मिशन सिर्फ मोहाली तक सीमित नहीं होना चाहिए. पंजाब के जिला शहरों में कृषि प्रसंस्करण, डेयरी टेक और छोटे उद्योगों से जुड़े स्टार्टअप्स को भी शुरुआती निवेश और मार्गदर्शन मिलना चाहिए.
इंवेस्ट पंजाब को सिर्फ बड़े निवेश के ऐलान कराने पर ध्यान देने के बजाय उन उद्योगों को आगे बढ़ाना चाहिए, जो पहले से पंजाब में सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं. हो सकता है वे सुर्खियां कम बटोरें, लेकिन रोजगार ज्यादा देंगे.
विदेशों में रहने वाले पंजाबियों (NRI) के निवेश के लिए भी बेहतर रणनीति की जरूरत है. पंजाब का NRI समुदाय बड़ा, संपन्न और राज्य से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है. लेकिन उनसे जुड़ाव अभी ज्यादातर औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित है. जिसे निवेश का मजबूत जरिया होना चाहिए था, वह साल में होने वाले एक सम्मेलन जैसा बनकर रह गया है.
अगर NRI के लिए एक अलग निवेश व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें बुनियादी ढांचे और कृषि उद्योग में पारदर्शी निवेश के विकल्प हों, और उनके लिए तेज काम करने वाला एक विशेष सुविधा केंद्र बनाया जाए, तो उनकी रुचि वास्तविक निवेश में बदली जा सकती है.
पंजाब के पास विमानन, पर्यटन और डेयरी जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी संभावनाएं हैं.
पटियाला का विमानन ढांचा पायलट प्रशिक्षण और विमान रखरखाव केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है. इससे देश में इस क्षेत्र की कमी भी पूरी होगी.
धार्मिक और विरासत पर्यटन की संभावनाओं का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है, खासकर इस मामले में कि पर्यटक सिर्फ एक दिन के बजाय ज्यादा समय तक यहां रुकें.
इसी तरह डेयरी, जिसे लंबे समय से पंजाब की “दूसरी फसल” कहा जाता है, उसे आज तक वह स्तर का प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और निर्यात निवेश नहीं मिला, जिसने गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बदल दी.
लेकिन अगर सड़कें, सीवर व्यवस्था, पानी की आपूर्ति और ठोस कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सुविधाएं ठीक नहीं होंगी, तो इनमें से किसी भी क्षेत्र में गंभीर निवेश नहीं आएगा.
जिला योजना समितियां, जिन्हें संविधान के तहत अहम भूमिका दी गई है, लगभग निष्क्रिय पड़ी हैं. इन्हें फिर से सक्रिय करना होगा ताकि गांव और शहरों की संयुक्त योजना बनाई जा सके.
यह काम भले ही आकर्षक न लगे, लेकिन यही तय करता है कि कोई निवेशक पहली यात्रा के बाद दूसरी बार पंजाब आएगा या नहीं.
नदियों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दें
अप्रैल 2025 से सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित किए जाने के बाद अब पूरे देश में पश्चिमी नदियों — सिंधु, झेलम और चिनाब — को भारत के भीतर सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए विकसित करने पर चर्चा हो रही है. इसके लिए केंद्र सरकार के तहत एक वेस्टर्न रिवर्स डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाने का भी विचार है.
हालांकि ये नदियां पंजाब से होकर नहीं गुजरतीं, लेकिन अगर भविष्य में चिनाब या झेलम का पानी रावी-ब्यास नदी प्रणाली से जोड़ा जाता है, या भारत के हिस्से के पश्चिमी नदी जल का नया बंटवारा होता है, तो इसका पंजाब की लंबे समय की जल और बिजली सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ेगा.
इस विषय पर दिल्ली में चर्चा हो रही है, चाहे पंजाब उसमें शामिल हो या नहीं. इसलिए जब तक इसकी रूपरेखा तैयार हो रही है, पंजाब के लिए जरूरी है कि वह अपना पक्ष साफ तौर पर रखे.
पंजाब में अपनी नदियों के बेहतर प्रबंधन की भी उतनी ही जरूरत है. जल सुरक्षा सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि उद्योग और खेती दोनों के लिए भी बेहद जरूरी है.
सतलुज एंड ईस्टर्न रिवर्स वाटर्स अथॉरिटी ऑफ पंजाब का प्रस्ताव नागरिकों की ओर से तैयार किया गया एक मसौदा है. इसमें सतलुज, ब्यास, रावी और घग्गर नदियों के लिए एक स्वतंत्र और न्यायिक निगरानी वाली वैधानिक संस्था बनाने की बात कही गई है.
इस प्रस्तावित संस्था का खर्च राज्य सरकार के बजट से नहीं, बल्कि नदी तल से होने वाले खनन की रॉयल्टी और बिजली कंपनियों व बड़े औद्योगिक जल उपभोक्ताओं से लिए जाने वाले उपकर (सेस) से चलाया जाएगा.
यह संस्था बिना शोधन के छोड़े जाने वाले गंदे पानी, बिना नियंत्रण के रेत खनन और पानी के मनमाने बंटवारे जैसी समस्याओं से निपटेगी. ये समस्याएं समय-समय पर खेती और उद्योग दोनों को प्रभावित करती हैं.
यह संस्था अपने खर्च खुद चलाने वाले मॉडल का भी उदाहरण हो सकती है, जिसे पंजाब दूसरे क्षेत्रों में भी अपना सकता है. क्योंकि राज्य के बजट में अब अतिरिक्त खर्च की बहुत कम गुंजाइश बची है.
सबसे अच्छा पाने की कोशिश में बहुत अच्छा भी न खो दें
पंजाब के पास आर्थिक सुधार के लिए विचारों की कमी नहीं है. अगर कुछ है, तो शायद जरूरत से ज्यादा विचार हैं. हर राजनीतिक दल किसी न किसी योजना को अपना बताता है और दूसरे दल उस पर शक करते हैं.
लेकिन जिस चीज की सबसे ज्यादा कमी है, वह है उन कामों को लागू करने का अनुशासन, जिन्हें अभी किया जा सकता है, बजाय इसके कि आदर्श समाधान का इंतजार किया जाए.
ऊपर बताए गए सभी सुझाव जानबूझकर सीमित दायरे वाले हैं. PPA का नया ढांचा PSPCL की वित्तीय हालत रातोंरात ठीक नहीं कर देगा. NRI निवेश व्यवस्था बजट सुधार का विकल्प नहीं बन सकती. नदी प्रबंधन प्राधिकरण अकेले पंजाब के जल विवाद खत्म नहीं कर देगा.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब तक कोई एक बड़ा और पूरी तरह सही समाधान न मिले, तब तक कुछ भी न किया जाए. पंजाब को जो बहुत अच्छे कदम अभी उठाए जा सकते हैं, उन्हें लागू करना चाहिए और फिर अगले सुधार की ओर बढ़ना चाहिए.
हर कदम का अलग-अलग मूल्यांकन किया जा सकता है. क्या चेंज ऑफ लैंड यूज (CLU) से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का नियम लागू किया गया? क्या बस रूटों की ई-नीलामी हुई? क्या इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट का PUDA में विलय पूरा हुआ? क्या नदी पर लगाया गया सेस वसूला जा रहा है?
इनमें से किसी भी काम के लिए संविधान में संशोधन, लंबी अदालत की लड़ाई या टीवी पर बहस की जरूरत नहीं है. जरूरत सिर्फ लगातार और गंभीर प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है, जो एक-दो दिन की खबरों से आगे जाकर काम करे.
पंजाब का कर्ज कम नहीं होगा और MSP का मुद्दा भी पहचान की राजनीति या टीवी पर ज्यादा शोर मचाने से हल नहीं होगा, चाहे लोगों की शिकायतें कितनी भी सच्ची और गंभीर क्यों न हों.
इन समस्याओं का समाधान वैसे ही होगा, जैसे ज्यादातर टिकाऊ सुधार होते हैं. किसी एक परफेक्ट समाधान से नहीं, बल्कि कई बहुत अच्छे सुधारों को लगातार लागू करने और हर साल आगे बढ़ाने से. चाहे उस समय सरकार किसी भी पार्टी की क्यों न हो, जब आखिरकार नतीजे दिखने लगें.
लेखक पंजाब कैडर के 1984 बैच के रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं, जो पंजाब सरकार में स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए थे. वे kbssidhu.substack.com पर लिखते हैं. विचार निजी हैं.
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