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Monday, 2 November, 2026
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कश्मीर के शासक हमेशा से मस्जिदों पर नियंत्रण चाहते रहे हैं, ताजा विवाद भी इसी का हिस्सा है

कश्मीर के राजनीतिक किरदार एक ज़हरीली स्क्रिप्ट पर चल रहे हैं जिसे वे अच्छी तरह जानते हैं—और जिसका अंत बार-बार दुखद हुआ है.

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आग की लपटें तेजी से फैलते हुए गोला-बारूद के भंडार के दरवाजे तक पहुंच गई थीं. उन्होंने आग बुझाने की कोशिश कर रहे सैनिकों को पीछे धकेल दिया था और जमजमा नाम की उस विशाल तोप के पास से गुजर रही थीं, जिसके प्रशंसकों का मानना था कि उसमें स्वर्ग की दुनिया के सबसे मजबूत किलों को भी तबाह करने की ताकत थी. मुकेरियां के लोगों को लगने लगा था कि अब एक भयानक विस्फोट होना तय है. लेकिन तभी अचानक आग की लपटें धीमी पड़ गईं और बुझ गईं.

1793 की इस घटना को चमत्कार बताया गया. इसने एक राज का खुलासा किया. बारूदखाने के ऊपर बने एक एकांत कमरे को उसमें रखी पवित्र निशानियों ने बचा लिया था. इनमें पैगंबर मोहम्मद की पगड़ी और चोगा, उनके चमड़े के जूते और लकड़ी की छड़ी शामिल थे. वहां उनकी बेटी फातिमा अल-जहरा की इस्तेमाल की हुई एक नमाज की चटाई भी थी. इसके अलावा खून से सना एक रूमाल भी था, जो उनके पति इमाम अली के शहीद होने के समय उनके पास था.

पिछले कई हफ्तों से कश्मीर में इस बात पर तीखी बहस चल रही है कि क्या शुक्रवार की सामूहिक नमाज में मौलवियों को एक जैसे विषयों पर आधारित खुतबा देना चाहिए. केंद्र शासित प्रदेश के वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष दरख्शां अंद्राबी का कहना है कि इस तरह के उपदेशों से नशे की लत जैसी बुराइयों से लड़ने और इस्लाह यानी नैतिक सुधार को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी. वक्फ बोर्ड के नियंत्रण में करीब 100 मस्जिदें हैं. बीजेपी की इस नेता के आलोचकों का कहना है कि वह इस्लाम के पालन में सरकारी दखल को बढ़ावा दे रही हैं.

इस बहस की जड़ें कश्मीर की आम धार्मिक सोच में गहरी हैं. इससे 2008 में शुरू हुए धार्मिक टकराव फिर भड़क सकते हैं. उस समय इस्लामवादियों की एक नई पीढ़ी का टकराव स्थापित राजनीतिक दलों और भारतीय राज्य से हुआ था. कश्मीर के धार्मिक दक्षिणपंथियों के लिए 1819 में महाराजा रणजीत सिंह की खालसा सरकार की ओर से कश्मीर पर कब्जा किए जाने के साथ ही कश्मीरी इस्लाम और गैर-मुस्लिम शासकों के बीच अस्तित्व की लड़ाई शुरू हो गई थी.

माई सदा कौर के किले में लगी आग की कहानी दिखाती है कि कैसे शक और गहरी चोट ने कश्मीर के बाकी भारतीय समाज के साथ रिश्तों को आकार दिया. यह भी दिखाती है कि ऐसा होना तय नहीं था. बारूदखाने में आग लगने के बाद हजारों श्रद्धालु मुकेरियां पहुंचे और सिंह को पवित्र निशानियों का रक्षक, मस्जिदों का निर्माता और पंजाब के मुसलमानों का संरक्षक बताकर उनकी तारीफ की.

सिंह अपने यहां आने वाले लोगों से कहा करते थे, “ईश्वर चाहता था कि मैं सभी धर्मों को एक ही नजर से देखूं. इसलिए उसने मेरी एक आंख की रोशनी छीन ली.”

धर्मों के बीच टकराव

कश्मीर के प्रधानमंत्री लेफ्टिनेंट कर्नल एलियट कॉल्विन अपनी खिड़की से देख रहे थे कि कट्टरपंथी नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला बगीचे में एक पेड़ की छाया में नमाज पढ़ रहे थे. वह उस दरगाह को दोबारा बनाने की मांग कर रहे थे, जिसके बारे में उनका दावा था कि वह कभी वहां मौजूद थी. वहां उस दरगाह का कोई निशान दिखाई नहीं दे रहा था. इसके बावजूद अब्दुल्ला ने कहा कि वह हर रात वहां एक दीया जलाएंगे और शुक्रवार को नमाज पढ़ाएंगे.

1893 की एक पांडुलिपि में सचमुच इस बात का जिक्र था कि उस इलाके में कहीं एक दरगाह थी. लेकिन वह नेता पुरातात्विक शोध नहीं कर रहे थे. कश्मीर के आजादी के आंदोलन की भाषा धर्म थी.

पिछली सदी की शुरुआत से ही शिक्षित कश्मीरी मुसलमानों की एक नई पीढ़ी धर्म का इस्तेमाल लोगों को बड़े पैमाने पर एकजुट करने के लिए करने लगी थी. वे डोगरा शासन में संस्थागत भेदभाव और भारी करों से परेशान थे. श्रीनगर की पत्थर मस्जिद, जो कश्मीर की एकमात्र मुगल शैली में बनी पत्थर की मस्जिद है, इस संघर्ष का प्रमुख प्रतीक बन गई. यह स्पष्ट नहीं है कि 1623 में बनकर तैयार होने के कुछ ही समय बाद पत्थर मस्जिद में नमाज पढ़ना क्यों बंद कर दिया गया था. बाद में इसका इस्तेमाल अस्तबल और अनाज के गोदाम के रूप में किया गया. उस समय इस पर कोई विरोध भी नहीं हुआ.

पंजाब में इसी तरह के धार्मिक विवादों का सामना करने पर खालसा सरकार ने तुरंत कदम उठाए थे. 1753 में मुस्लिम सामंती शासक नवाब भिखारी खान ने गुरु अर्जुन सिंह की स्मृति से जुड़े एक कुएं के पास मस्जिद बनवाई थी. बाद में अकाली सिखों ने उस मस्जिद और उसके आसपास की जमीन पर कब्जा कर लिया. लाहौर पर कब्जा करने के बाद सिंह ने मस्जिद मुसलमानों को वापस कर दी और उसकी मरम्मत का इंतिजाम भी किया. मोहम्मद शेख के मुताबिक, सिंह ने लाहौर की बादशाही मस्जिद और वजीर मस्जिद में नमाज पढ़ी थी. उन्होंने अपनी दो पत्नियों मोरां सरकार और गुल बेगम के लिए दो और मस्जिदें बनवाई थीं. उनकी दोनों पत्नियां इस्लाम का पालन करती रहीं, जिससे रूढ़िवादी लोग नाराज थे.

हालांकि, कश्मीर खालसा सरकार का दूसरा सबसे ज्यादा कमाई करने वाला प्रांत बन गया था, लेकिन शुरुआती नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकी. लगातार युद्धों से थक चुके और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सैन्य मुकाबले में अपना खजाना खाली कर चुके रणजीत सिंह के पास हालात सुधारने के लिए न तो संसाधन बचे थे और न ही ऊर्जा.

इतिहासकार इंदु बांगा ने दिखाया है कि खालसा सरकार के तहत कश्मीर में पंजाब की धर्मार्थ व्यवस्था अपनाई गई थी. इसके तहत सरकार की ओर से चलाए जाने वाले ट्रस्ट सभी धार्मिक संस्थानों को अनुदान, जमीन और करों में छूट देते थे. सिंह ने इस्लाम को भी उदारता से आर्थिक मदद दी थी. लेकिन डोगरा शासन ने हिंदू धार्मिक कामों और मंदिरों को खूब आर्थिक मदद दी. ऐसे में शिक्षित कश्मीरियों के एक नए वर्ग ने शिक्षा, नौकरियों और धार्मिक गतिविधियों में समान अधिकारों की मांग शुरू कर दी.

इसके बाद 1931 में कश्मीर में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे. औपनिवेशिक सरकार के अधिकारी बर्ट्रेंड ग्लैंसी की जांच में विधानसभा बनाने और उसमें सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश की गई. साथ ही, मस्जिदों को मुसलमानों के नियंत्रण में वापस देने की बात भी कही गई. 1934 में हुए चुनावों में, हालांकि वोट देने का अधिकार बहुत सीमित था, शेख अब्दुल्ला एक प्रभावशाली नेता बनकर उभरे. पत्थर मस्जिद भी एक बड़े कारोबारी ख्वाजा साद-उद-दीन शॉल को सौंप दी गई. वह रूढ़िवादी सोच रखते थे और श्रीनगर के मौलवी मीरवाइज यूसुफ शाह और महाराजा, दोनों के मित्र थे.

हालांकि, दो साल से भी कम समय में शॉल को मस्जिद शेख अब्दुल्ला को सौंपनी पड़ी. यह इस बात का संकेत था कि भविष्य की दिशा अब जनता की राजनीति तय करेगी, न कि राजाओं का दैवीय अधिकार.

धार्मिक नेताओं पर नियंत्रण

अब्दुल्ला धर्म की राजनीतिक ताकत को समझते थे. उन्होंने मस्जिदों और उनके मौलवियों पर अपना नियंत्रण बनाए रखा. दूसरे उपनिवेशवाद के बाद के दौर के नेताओं की तरह, वह कश्मीर के भीतर अपने राजनीतिक विरोधियों और बड़े क्षेत्र में मौजूद विरोधियों से अलग एक धार्मिक व्यवस्था बनाना चाहते थे. तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने 1924 में दियानेत की स्थापना की थी. यह संस्था मौलवियों को नौकरी देती है और देश की सुन्नी मस्जिदों की निगरानी करती है. इसका बजट 3.5 अरब डॉलर से ज्यादा है.

मिस्र के धार्मिक बंदोबस्ती मंत्रालय, विजारत अल-अवकाफ, के पास भी इसी तरह की शक्तियां हैं. सऊदी अरब, यमन और इस्लाम के सिद्धांतों पर चलने का दावा करने वाले कई देशों में भी ऐसी संस्थाएं हैं. हालांकि, उदार लोकतंत्रों ने आम तौर पर सरकार और धर्म को अलग रखा है.

अब्दुल्ला की मंशा को भले ही समझा जा सकता हो, लेकिन उनके कदम सही नहीं थे. उन्होंने पत्थर मस्जिद पर नियंत्रण रखने के लिए इदारा औकाफ-ए-इस्लामिया की स्थापना की. 1953 में उन्हें पद से हटाए जाने तक यह संस्था कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले एक निजी ट्रस्ट के अधीन रही. इसके बाद उनके उत्तराधिकारी बख्शी गुलाम मोहम्मद ने इस संस्था की जिम्मेदारी संभाली.

2003 में कांग्रेस-पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की गठबंधन सरकार ने एक कानून बनाया. उस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस का लंबे समय से चला आ रहा दबदबा कम हो रहा था. इस कानून के तहत सरकार के नियंत्रण वाला जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड बनाया जा सका. इससे कश्मीर में वक्फ से जुड़ी व्यवस्थाएं काफी हद तक देश के दूसरे हिस्सों के मॉडल जैसी हो गईं. 2019 के बाद वक्फ का प्रशासन केंद्र सरकार के कानून के तहत आ गया.

बीजेपी ने अपनी नई शक्तियों का इस्तेमाल अपने वैचारिक संदेश को आगे बढ़ाने के लिए किया. अंद्राबी ने विवादों के बीच दरगाह के बाहर अशोक स्तंभ के शेरों वाली एक पट्टिका लगवाई. यह दरगाह नेशनल कॉन्फ्रेंस का एक धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है.

कश्मीर की राजनीति के दोनों पक्षों के लिए यह काफी हद तक बिना किसी राजनीतिक नुकसान वाला कदम रहा है. नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी हिंदू राष्ट्रवाद के हमलावर इरादों की निंदा करती हैं. वहीं, बीजेपी अपने समर्थकों के सामने अपने कदमों को अनुशासन लागू करने और इस्लाम की ताकत कम करने की प्रतिबद्धता के तौर पर पेश करती है.

भारत में इस बात पर गंभीर बहस की जरूरत है कि धार्मिक संस्थानों को कैसे नियंत्रित किया जाना चाहिए और उनका सरकार के साथ कैसा रिश्ता होना चाहिए. लेकिन कश्मीर के राजनीतिक दल एक ऐसे जहरीले रास्ते पर चल रहे हैं, जिसकी पटकथा उन्हें अच्छी तरह याद है. यह रास्ता बार-बार त्रासदी पर खत्म हुआ है.

प्रवीण स्वामी ‘दिप्रिंट’ में कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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